Black fungus risk : कोविड-19 टेस्ट के लिए बार-बार स्वाब सैंपल लेने से हो सकता है ब्लैक फंगस, जानें कैसे..
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कोविड-19 टेस्ट के लिए बार-बार स्वाब सैंपल लेने से हो सकता है ब्लैक फंगस, जानें कैसे..

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कहा जा रहा था कि करोना से ठीक हुए लोगों को ब्लैक फंगस अपनी चपेट में ले रहा है। लेकिन बाद में ब्लैक फंगस होने के अलग-अलग कारण सामने आये। हाल ही में एक स्टडी में ब्लैक फंगस होने के अलग कारणों की पुष्टि हुई है।  कोरोना टेस्ट करने के लिए स्वाब सैंपल देना होता है। जो काफी घातक साबित हो सकता है। इस बात की पुष्टि दिल्ली एम्स ने की है। कोविड-19 की जांच की लिए स्वाब सैंपल देना होता है। ( Black fungus risk ) इस कारण भी म्यूकोरमाइकोसिस (ब्लैक फंगस) का खतरा हो सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि सैंपल लेते वक्त स्वाब को नाक में घुमाने से फंगस और अन्य बैक्टीरिया को शरीर में घुसने से रोकने वाली नेसल म्यूकोसा चोटिल हो सकती है। इससे म्यूकोरमाइकोसिस होने का खतरा बढ़ सकता है। एम्स के मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर नवीत विग की अगुवाई में यह परीक्षण 352 मरीजों पर हुआ। जिनमें 152 मरीज कोरोना के साथ ब्लैक फंगस से संक्रमित थे जबकि 200 मरीज सिर्फ कोरोना से पीड़ित थे।

शोध में पाया गया कि 352 में 230 मरीजों ने दो से ज्यादा बार कोरोना जांच के लिए सैंपल दिया था। 230 में 116 मरीज ब्लैक फंगस से पीड़ित थे और इन लोगों ने दो से ज्यादा बार जांच कराई थी। शेष 114 मरीजों ने भी दो से ज्यादा बार जांच कराई, लेकिन उन्हें ब्लैक फंगस नहीं था। ( Black fungus risk ) यानी ब्लैक फंगस से पीड़ित 76 फीसदी मरीजों ने दो या इससे अधिक बार सैम्पल लिया था जबकि ब्लैक फंगस से पीड़ित न होने वाले 57 फीसदी मरीजों ने दो या अधिक बार स्वाब सैम्पल दिया था।

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कोरोना जांच के कारण ब्लैक फंगस होने का खतरा

दिल्ली एम्स के मेडिसिन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर और अध्ययन के सह लेखक डॉक्टर नीरज निश्चल ने बताया कि कोरोना टेस्ट के लिए सैंपल लेते समय नाक में स्वाब को घुमाया जाता हैं। ऐसा कई बार करवाने से नाक में मौजूद नेसल म्यूकोसा को क्षति पहुंच सकती है। नेसल म्यूकोसा शरीर में खतरनाक फंगस और वायरस को अंदर जाने से रोकती हैं। इसके चोटिल या कमजोर होने पर इसकी इम्यूनिटी कम हो जाती है। जिससे हवा और नाक के आसपास मौजूद फंगस आसानी से नाक के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। ( Black fungus risk ) डॉ. नीरज के अनुसार कोरोना जांच के लिए केवल एक बार ही स्वाब सैम्पल दे। हॉस्पिटल में भी जो मरीज कोरोना से ठीक होने के एडमिट है। उनकी भी बार-बार कोरोना की जांच नहीं करनी चाहिए। अगर मरीज को कोविड वार्ड से नॉन कोविड वार्ड में भेज रहे हैं तब उसकी दोबारा जांच की जा सकती है।

92 फीसदी ब्लैक फंगस मरीज मधुमेह से पीड़ित थे ( Black fungus risk )

शोध में यह बात भी सामने आई कि ब्लैक फंगस से पीड़ित 92.1 फीसदी मरीज मधुमेह से पीड़ित थे। वहीं, कोरोना संक्रमित मरीज जिन्हें यह समस्या नहीं हुई, उनमें सिर्फ 28 फीसदी ही मधुमेह से पीड़ित थे। इतना ही नहीं ब्लैक फंगस से पीड़ित मरीजों में पाया गया कि उन्होंने कोरोना के इलाज के दौरान स्टेरॉइड का अधिक इस्तेमाल किया। ब्लैक फंगस से जूझने वाले 65.8 फीसदी मरीजों ने 6 से 14 दिन तक स्टेरॉइड ली, जबकि कोरोना संक्रिमत 48 फीसदी ऐसे मरीज थे, जिन्होंने स्टेरॉइड का इस्तेमाल किया था और उनमें ब्लैक फंगस नहीं पाया गया। मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉक्टर नवीत विग का कहना है कि शोध से यह साबित होता है कि मधुमेह पीड़ित और स्टेरॉइड का अधिक इस्तेमाल करने वाले मरीजों को म्यूकोरमाइकोसिस का खतरा अधिक है। शोध में यह सामने आया है कि जिन लोगों ने कोरोना की जांच के लिए कई बार स्वाब सैम्पल दिया उनमें म्यूकोरमाइकोसिस (ब्लैक फंगस) के मामले अधिक देखे गए। ( Black fungus risk ) कोरोना की पुष्टि होने के बाद मरीज को बार बार स्वाब सैम्पल देने से बचना चाहिए। कपड़े का मास्क का इस्तेमाल कई बार न करें

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