ब्लू बेबी सिन्ड्रोम याकि जन्म से हृदय दोष

विष्णु प्रिया सिंह

खेतों में पैदावार बढ़ाने के लिये बहुत अधिक मात्रा में अमोनियम नाइट्रेट और पोटेशियम नाइट्रेट जैसे फर्टिलाइजरों का इस्तेमाल और तामसी खान-पान का परिणाम है ब्लू बेबी सिन्ड्रोम। इस बीमारी के ज्यादातर मामलों में शिशु के जन्म से उसका हार्ट खराबी याकि डिफेक्ट लिए होता है। इसमें हृदय और हृदय से जुड़ी रक्त वाहनियों की दीवारों में छेद होने से लेकर उनका सही ढंग से विकास न होना तक शामिल है। ब्लू बेबी सिन्ड्रोम में शिशु के शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह सही ढंग से न होने के कारण उसका शरीर हल्का नीला दिखाई देने लगता है। शरीर में जिन स्थानों की स्किन ज्यादा पतली होती है (जैसेकि होंठ, कान, आखों के आसपास और नाखून इत्यादि) वहां पर नीलापन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। डाक्टरी भाषा में इसे साइनोसिस कहते हैं। हमारे देश में पिछले दो दशकों में ब्लू बेबी सिन्ड्रोम के मामलों में कई गुना बढ़ोत्तरी हुई है। इससे ग्रस्त शिशु को तुरन्त विशेष डाक्टरी देखरेख और उपचार की जरूरत होती है अन्यथा उसके जीवन को खतरा हो सकता है। यदि यह जेनेटिक नहीं है तो खानपान सम्बन्धी सावधानियों के साथ गर्भस्थ शिशु को इससे बचाया जा सकता है।

ब्लू बेबी सिन्ड्रोम ग्रस्त शिशुओं का रंग ऑक्सीजन की कमी से नीलापन लिये होता है। मानव शरीर में जब खून हृदय से पम्प होकर फेफड़ों की तरफ जाता है जहां उसमें ऑक्सीजन मिल जाती है तत्पश्चात ऑक्सीजन युक्त यह खून वापस हृदय की ओर सर्कुलेट होने के बाद पूरे शरीर में प्रवाहित होता है। जब शिशु के हृदय और फेफड़ों में किसी तरह की समस्या होती है तो खून, ऑक्सीजन को अच्छी तरह से सोख नहीं पाता है और शिशु की त्वचा का रंग नीलापन ले लेता है। खून में ऑक्सीजन की कमी के प्रमुख कारण हैं-

ट्रेटालॉजी ऑफ फॉलोट:मेडिकल लैंग्वेज में इसे टीओएफ कहते हैं। रेयर जन्मजात हृदय दोष से पीड़ित शिशु में ब्लू बेबी सिन्ड्रोंम का यह प्राइमरी कारण है। यह वास्तव में चार तरह के हृदय दोषों का कॉम्बीनेशन है, इसकी वजह से हृदय से फेफड़ों की ओर जाने वाला रक्त प्रवाह धीमा हो जाता है और कम ऑक्सीजन वाला रक्त सम्पूर्ण शरीर में प्रवाहित होने लगता है। टीओएफ के कई मामलों में हृदय की लेफ्ट और राइट वेन्ट्रीकल्स को अलग करने वाली दीवार (wall) में छेद होता है या राइट वेन्ट्रीकल से पलमोनरी, फेफड़ों तथा आर्टरी की ओर जाने वाला रक्त प्रवाह, मसल (मांसपेशियों) द्वारा अवरूद्ध होता है।

मेथेमोग्लेबिनेमिया:नाइट्रेट प्वाइजनिंग से होने वाली इस कंडीशन का कारण शिशु के डिब्बा बंद बेबी फूड को कुएं के पानी से तैयार करना या घरेलू बेबी फूड में नाइट्रेट रिच फूड जैसे कि पालक, धनिया, ब्रोकली, चुकन्दर इत्यादि का प्रयोग है। 1 से 6 माह तक के शिशु इससे प्रभावित होते हैं। शिशु के भोजन में शामिल नाइट्रेट जब शरीर में सर्कुलेट होता है तो यह हीमोग्लोबिन से जुड़कर मेथेमोग्लोबिन उत्पन्न करता है। इससे खून में मौजूद हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन को ले जाने में असमर्थ हो जाता है और शिशु का शरीर नीला पड़ने लगता है। अधिकतर मामलों में मेथेमोग्लेबिनेमिया कंडीशन नाइट्रेट की वजह से होती है, यह जन्मजात हो ऐसा रेयर है। तीन माह से कम उम्र वाले शिशुओं में मेथेमोग्लेबिनेमिया के चांस बहुत ज्यादा होते हैं। कई बार प्रिमैच्योर डिलीवरी होने से भी शिशु के अंग सही ढंग से काम नहीं कर पाते हैं ऐसे में भी मेथेमोग्लेबिनेमिया हो जाता है, यह किडनी और पाचन तन्त्र के पूरी तरह से काम न करने से होता है। कुछ मामलों में एंटीबॉयोटिक और एनीस्थीसिया भी इसके लिये जिम्मेदार होते हैं।

मां की सेहत और खानपान:ब्लू बेबी सिंड्रोम का एक कारण मां का लाइफ स्टाइल और खानपान भी होता है। यदि मां प्रेगनेन्सी के दौरान मदिरा सेवन और धूम्रपान करती रहती है तो शिशु में ब्लू बेबी सिंड्रोम के चांस बढ़ जाते हैं। इसके अलावा मां की खराब सेहत (एनीमिया) और टाइप-2 डायबिटीज भी इसके लिये जिम्मेदार होते हैं। प्रेगनेन्सी के दौरान यदि डायबिटीज को कंट्रोल न किया जाये तो शिशु जन्मजात हृदय दोष के साथ पैदा हो सकता है।

डाउन सिन्ड्रोम:डाउन सिंड्रोम के साथ पैदा होने वाले शिशुओं में जन्मजात हृदय दोष के चांस ज्यादा होते हैं। डाउन सिन्ड्रोम वाले शिशुओं में उनके 21 वें क्रोमोज़ोम की एक अतिरिक्त प्रति (कॉपी) होती है। इसे ट्रिसोमी 21 कहते हैं। इसके कारण शिशु का शारीरिक और मानसिक विकास स्लो होता है और वह डिसेबिल्टीज का शिकार हो सकता है। इनमें से कुछ डिसेबिल्टीज तो लाइफ टाइम रहती हैं, ऐसे शिशुओं की उम्र कम होती है। जिनमें गम्भीर डिसेबिल्टीज नहीं होती हैं वे डाउन सिन्ड्रोम के साथ हेल्दी लाइफ जीते हैं। आजकल हुए मेडिकल एडवांसमेंट के कारण डाउन सिड्रोम से आसानी से ऊबर सकते हैं। वर्तमान में उपलब्ध मेडिकल डेटा के अनुसार 7000 शिशुओं में 1 शिशु डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त होता है। ऐसे बच्चों के फेशियल फीचर सपाट (फ्लैट), कमजोर बुद्धि विकास, गर्दन छोटी, छोटा सिर और छोटे और असामान्य कान, थायराइड की समस्या, ऊभरी हुई आंखें और मांसपेशिया कमजोर रहती हैं। डाउन सिंड्रोम वाले शिशु पैदा तो सामान्य आकार में होते हैं लेकिन इनका विकास धीमा होता है।

लक्षण-सिम्पटम्स
ब्लू बेबी सिंड्रोम में शिशु की त्वचा नीलापन लिये होती है साथ में ये लक्षण भी नजर आते हैं-
बार बार उल्टी आना, डायरिया, सीजर, चिड़चिड़ापन, सुस्ती, दूध पीने में समस्या, बहुत लार बहना, वजन न बढ़ना, दिल की धड़कन या सांस तेज होना, हाथ और पैरों की उंगलियां जुड़ी रहना शारीरिक और मानसिक विकास धीमा होना।

डॉयग्नोज करना
ब्लू बेबी सिन्ड्रोम को कन्फर्म करने के लिये डाक्टर पूरी मेडिकल हिस्ट्री के अलावा फिजिकल जांच, ब्लड टेस्ट, चेस्ट एक्स-रे (फेफड़ों और हार्ट के आकार की जांच), इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (इससे हार्ट की इलेक्ट्रिक गतिविधियों की जांच होती है), ईको-कार्डियोग्राम (इससे हार्ट की एनाटॉमी (संरचना) जांचते हैं), कार्डियक कैथेटराइजेशन (इससे हार्ट की आर्टिरीज को देखा जाता है), ऑक्सीजन सैचुरेशन टेस्ट (इससे ब्लड में ऑक्सीजन को मापते हैं) इत्यादि टेस्ट करते हैं।

इलाज-ट्रीटमेंट
सर्जरी और बैलूनिंग: ब्लू बेबी सिन्ड्रोम का सही कारण पता चलने के बाद इसका इलाज किया जाता है। गम्भीर मामलों में जन्मजात हृदय दोष होने पर सर्जरी और बैलूनिंग की जरूरत पड़ती है।
मेडीकेशन: बीमारी की गम्भीरता के अनुसार इसका इलाज दवाइयों से किया जाता है, मेथेमोग्लेबिनेमिया से ग्रस्त शिशु का इलाज मेथेलीन ब्लू नामक दवा से करते हैं, यह ब्लड में ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करती है। अधिकांश मामलों में इस दवा को नीडिल के द्वारा वेन में पहुंचाया जाता है।

बचाव-प्रवेन्शन
यदि इस बीमारी का कारण जेनेटिक है तो इससे बचना मुश्किल है लेकिन अन्य कारणों में कुछ सावधानियों से इससे बचा जा सकता है-
कुऐं के पानी से बचें: शिशु के खाने-पीने में कुऐं के पानी का इस्तेमाल न करें जब तक कि वह 12 महीने का न हो जाये। कुऐं के पानी को उबालने से भी उसमें मौजूद नाइट्रेट समाप्त नहीं होता है। यदि कुऐं का पानी ही एक मात्र स्रोत है तो लोकल हैल्थ अधिकारी से पानी में नाइट्रेट की मात्रा की जांच करायें। पानी में नाइट्रेट की मात्रा प्रति लीटर 10 मिलीग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिये।
नाइट्रेट युक्त भोजन से बचें: शिशु को नाइट्रेट रिच फूड जैसे कि पालक, धनिया, ब्रोकली, चुकन्दर इत्यादि को किसी भी रूप में न दें।
एल्कोहल और धूम्रपान से परहेज : गर्भवती महिलायें शराब और धूम्रपान से दूर रहें यदि वे डॉयबिटीज ग्रस्त हैं तो डाक्टर को इसकी जानकारी दें तथा इससे सम्बन्धित मेडीकेशन में कोताही न बरतें।

नजरिया-दृष्टिकोण
ब्लू बेबी सिन्ड्रोम डायग्नोज होते ही डाक्टर की सलाह के अनुसार चलें। यदि वह सर्जरी या बैलूनिंग के लिये कहता है तो उसकी बात मानें। सामान्य मामलों में यह बीमारी मेडीकेशन से ठीक हो जाती है। एक बार सही इलाज होने के बाद बच्चे छोटी-मोटी परेशानियों के चलते सामान्य जीवन जीते हैं। कई बार शिशु को ब्लू बेबी सिन्ड्रोम की समस्या अस्पताल से छुट्टी मिलने के कुछ दिनों बाद होती है, यदि पैरेन्ट्स को शिशु की स्किन का कोई भी भाग नीलेपन में नजर आये तो तुरन्त डाक्टर को सूचित करें। इस सिन्ड्रोम से ग्रस्त शिशुओं का इलाज पैड्रीयेट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट करता है, ऐसे में इलाज के लिये उसी अस्पताल को चुनें जहां पैड्रीयेट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट तथा इसके इलाज की समस्त सुविधायें हों। जिन अस्पतालों में शिशुओं की डिलीवरी होती है वहां पैड्रीयेट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट के होने के चांस कम होते हैं ऐसे में यदि एक या दो दिन के बच्चे को डाक्टर की सलाह पर किसी दूसरे अधिक सुविधा सम्पन्न अस्पताल में शिफ्ट करना पड़े तो हिचकिचायें नहीं। शिशु को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने के लिये शिशु जीवन रक्षक उपकरणों (इन्क्यूबेटर इत्यादि) से लैस एम्बुलेंस का ही प्रयोग करें। बच्चा छोटा है इसकी सर्जरी या बैलूनिंग कैसे होगी यह सोचकर घबराने की जरूरत नहीं है, वर्तमान समय में ऐसी किसी भी स्थिति से निबटने के लिये अति एडवांस मेडिकल सुविधायें उपलब्ध हैं और सही इलाज से शिशु पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं।

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