कॉलन कैंसर: इलाज सम्भव है…

बड़ी आंत और मलाशय के कैंसर को मेडिकल साइंस में कॉलन या कॉलोरेक्टल कैंसर कहते हैं। ये दोनों अंग हमारे पाचन तन्त्र (डाइजेस्टिव सिस्टम) के अंतिम भाग में होते हैं। रेक्टम, कॉलन के अंतिम सिरे पर होता है। वैसे तो यह कैंसर किसी भी उम्र के लोगों को हो सकता है लेकिन 50 साल से ज्यादा उम्र वालों को इसका  रिस्क अधिक रहता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन और अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के मुताबिक 23 पुरूषों में से 1 और 25 महिलाओं में से 1 को पूरे जीवनकाल में कभी न कभी कॉलोरेक्टल कैंसर का कोई न कोई रूप अवश्य डेवलप होता है। इसकी शुरूआत बड़ी आंत या मलाशय में बिना कैंसर वाली अत्यन्त छोटी-छोटी गांठों से होती है जिन्हें पॉलिप्स कहते हैं ये बाद में कैंसरस हो जाती हैं। हमारे देश में प्रतिवर्ष इसके 10 लाख से ज्यादा मामले सामने आते हैं। वर्तमान में इसका इलाज सम्भव है और शुरूआती स्टेज में इलाज से अधिकतर लोग ठीक हो जाते हैं। इसकी पुष्टि और इलाज में देरी से यह शरीर के दूसरे भागों तक फैल जाता है जिससे ठीक होने के चांस कम हो जाते हैं। मेडिकल साइंस के अनुसार इसकी पांच स्टेज हैं-

स्टेज-0: इसे कार्सिनोमा इन सीटू कहते हैं। इस स्टेज में कॉलन या रैक्टम की अंदरूनी परत में असामान्य सेल्स पनपते हैं।

स्टेज-1: इसमें कैंसर सेल्स कॉलन की अंदरूनी परत (मुकोसा) पार करके मांसपेशियों वाली लेयर में चले जाते हैं लेकिन ये पास के किसी लिम्फ नोड या दूसरे अंगों में नहीं फैलते।

स्टेज-2: इसमें कैंसर सेल्स कॉलन की दीवारों और पास के टिश्यू (ऊतकों) तक फैल जाते हैं लेकिन लिम्फ नोड या दूसरे अंगों तक नहीं फैलते।

स्टेज-3: इसमें कैंसर सेल्स, लिम्फ नोड तक फैल जाते हैं लेकिन दूसरे अंगों तक नहीं पहुंचते।

स्टेज-4: इस स्टेज में कैंसर सेल्स लिम्फ नोड से होते हुए लीवर और फेफड़ों तक फैल जाते हैं।

लक्षण क्या हैं?

इसकी शुरूआत बिना लक्षण के होती है लेकिन कुछ समय बाद कॉन्सटीपेशन, डाइरिया, स्टूल की शेप और कलर में बदलाव, स्टूल में खून, रैक्टम से रक्त स्राव, बहुत ज्यादा गैस बनना, पेट के निचले भाग में मरोड़ व दर्द जैसे लक्षण उठते हैं।

दूसरी स्टेज या इसके बाद पीड़ित को बहुत ज्यादा थकान, कमजोरी, बिना कारण वजन कम होना, एक महीने तक स्टूल में लगातार बदलाव, पेट पूरी तरह से न साफ होना और उल्टी जैसे लक्षण महसूस होते हैं।

जब कॉलन कैंसर शरीर के दूसरे भागों में फैल जाता है तो पीड़ित को पीलिया, हाथ-पैरों में सूजन, सांस लेने में कठिनाई, क्रोनिक सिरदर्द, धुंधली दृष्टि और बोन (हड्डी) फैक्चर जैसे लक्षण उभरते हैं।

कितने टाइप होते हैं इसके?

इसके कई टाइप होते हैं और सबसे कॉमन टाइप है-एडिनोकार्सिनोमा। कॉलन कैंसर के ज्यादातर मरीज इसी से पीड़ित होते हैं। यह सेल्स में पनपता है और इससे कॉलन या रैक्टम में म्यूकस बनने लगता है। इसके अलावा दूसरे कॉलन कैंसर किसी न किसी तरह के ट्यूमर से होते हैं जैसेकि-

लिम्फोमा: यह लिम्फ नोड या कॉलन में पनपता है।

कार्सिनॉयड: यह इन्टसटाइन के हारमोन बनाने वाले सेल्स में पनपता है।

सर्कोमा: यह कॉलन के साफ्ट टिश्यू जैसेकि मांसपेशी में पनपता है।

गैस्ट्रोइन्टसटाइनल स्ट्रोमल ट्यूमर्स: इसकी शुरूआत बिनाइन (कैंसर रहित) रूप में होती है लेकिन बाद में यह कैंसरस हो जाता है। यह डाइजेस्टिव ट्रैक में पनपता है और बहुत रेयर मामलों में ही कॉलन को प्रभावित करता है।

कारण और रिस्क फैक्टर

इस सम्बन्ध में हुई रिसर्च के मुताबिक यह बीमारी स्वस्थ सेल्स के डीएनए में हुए बदलाव या म्यूटेशन से होती है। यह अनुवांशिक बीमारी है, इसका अर्थ है कि यदि यह किसी के माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी को थी तो ऐसे लोगों में कॉलन कैंसर का रिस्क अधिक होता है। ज्यादातर  मामलों में कॉलन में सेल्स की गैर-जरूरी ग्रोथ होने से पॉलिप्स (छोटी गांठे) बनती हैं, शुरू में ये बिनाइन (कैंसर रहित) होती हैं परन्तु बाद में कैंसरस हो जाती हैं। इन्हें सर्जरी से रिमूव करके कोलन कैंसर का रिस्क कम कर सकते हैं। कॉलन में क्रोनिक इन्फ्लेमेटरी डिसीस (जैसेकि अल्सरेटिव कोलाइटिस और क्रॉह्न डिसीस) से भी कॉलन कैंसर का रिस्क बढ़ता है।

50 साल की उम्र के बाद इसका रिस्क बढ़ जाता है, यदि व्यक्ति कॉलन में गांठ, पुरानी बॉउल डिसीस, फैमिली हिस्ट्री या कुछ विशेष जेनेटिक सिंड्रोम (जैसेकि फैमिलियल एडिनोमेटेस पॉलीपोसिस) से पीड़ित रहा है तो यह रिस्क और ज्यादा हो जाता है। मनुष्यों की नस्ल के हिसाब से इस कैंसर का सर्वाधिक रिस्क पूर्वी योरोपियन, यहूदियों और अफ्रीकन मूल के लोगों को होता है। मोटापा, धूम्रपान, रेड मीट, प्रोसेस्ड मीट, शराब, टाइप-2 डायबिटीज, सुस्त जीवनशैली, अधिक फैट तथा न्यूनतम फाइबर युक्त भोजन से भी इसका रिस्क बढ़ता है।

पुष्टि कैसे होती है?

यदि कोलन कैंसर की पुष्टि शुरू में हो जाये तो ठीक होने के चांस बढ़ जाते हैं। इसकी पुष्टि के लिये डाक्टर लक्षणों, फिजिकल जांच, फैमिली हिस्ट्री और मेडिकल हिस्ट्री की जानकारी लेकर रेक्टल की जांच करते हैं। इससे उन्हें लम्प्स (गांठ) या पॉलिप्स का पता चलता है।

स्टूल (मल) में रक्त की जांच के लिये फीकल टेस्ट किया जाता है। यह टेस्ट मुख्यत: दो तरह का होता है- गुआइक बेस्ड फीकल ऑकल्ट ब्लड टेस्ट(जीएफओबीटी) और फीकल इम्यूनोकैमिकल टेस्ट (एफआईटी)। पहले टेस्ट से पहले रेड मीट और एंटीइन्फ्लेमेटरी दवाओं का सेवन वर्जित है। दूसरे टेस्ट से मल में हीमोग्लोबिन का पता लगाते हैं लेकिन इसके लिये किसी खाद्य पदार्थ या दवाइयों को छोड़ने की जरूरत नहीं होती।

इन टेस्टों के अलावा कुछ ब्लड टेस्ट भी किये जाते हैं जैसेकि सीबीसी (कम्पलीट बल्ड काउंट) और लीवर फंफ्शन टेस्ट। इनसे अन्य बीमारियों और विकारों को रूल आउट करते हैं।

सिग्मोइडोस्कॉपी नामक शल्य क्रिया आधारित टेस्ट से कॉलन के अंतिम सेक्शन की गहन जांच करके कैंसर का पता लगाते हैं।

कोलोनोस्कोपी टेस्ट से बड़ी आंत में कैंसर का फैलाव पता चलता है। इस टेस्ट में कॉलन के असामान्य भाग से टिश्यू लेकर उसकी जांच करते हैं कि वे कैंसरस हैं या नहीं।

इन टेस्टों के अलावा एक्स-रे (बेरियम) टेस्ट, सीटी स्कैन जैसे टेस्ट भी कॉलन कैंसर की पुष्टि हेतु किये जाते हैं।

इलाज के विकल्प क्या हैं?

कॉलन कैंसर का इलाज इसकी स्टेज, फैलाव और मरीज की सम्पूर्ण हैल्थ पर निर्भर है। शुरूआती स्टेज में सर्जरी से कैंसर ग्रस्त गांठ रिमूव कर देते हैं। यदि, कैंसर कॉलन की दीवारों तक फैल गया है तो कैंसर ग्रस्त भाग को ही सर्जरी से काटकर निकाल देते हैं। ज्यादा गम्भीर अवस्था में कोलोस्टॉमी की जाती है जिसके तहत बड़ी आंत के कैंसरग्रस्त भाग को रिमूव करके शरीर से निकले वेस्ट को एकत्रित करने के लिये एक थैली जोड़ी जाती है। यह अस्थायी और स्थायी दोनों तरह की हो सकती है।

कैंसर को सेल्स के स्तर पर ट्रीट करने के लिये कीमोथेरेपी, रेडियेशन, टारगेट थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी प्रयोग करते हैं। टारगेटेड थेरेपी से केवल कैंसर ग्रस्त सेल्स ही नष्ट होते हैं और इसका साइड इफेक्ट भी कम है। इम्यूनोथेरेपी में मरीज के इम्यून सिस्टम को ही इतना शक्तिशाली बना देते हैं कि वह कैंसर सेल्स को खुद ही नष्ट करने लगता है।

सर्वाइवल रेट क्या है?

हालांकि कॉलन कैंसर की पुष्टि चिंता की बात है लेकिन इसका इलाज सम्भव है। सन् 2009 से 2015 तक एकत्रित डेटा के मुताबिक शुरूआती स्टेज में इलाज से न्यूनतम सर्वाइल रेट 5 वर्ष था, इसका अर्थ है कि इसकी पुष्टि के बाद पीड़ित कम से कम पांच वर्ष तक जीवित रहे। नयी दवाओं के आने से यह अवधि और बढ़ गयी है। अंतिम स्टेज में इलाज शुरू होने पर यह अवधि अधिकतम 30 महीने और न्यूनतम 6 महीने रही।

कैसे बचें इससे?

इससे बचने के लिये रेड मीट और प्रोसेस्ड मीट का सेवन बंद कर दें, शाकाहारी भोजन अपनायें, फल-सब्जियों और साबुत अनाज को अपनी डाइट में ज्यादा करें, वसा (फैट) का सेवन कम करें, वजन घटायें, धूम्रपान और शराब से दूर रहें, डॉयबिटीज कंट्रोल करें (यदि है तो), नियमित व्यायाम को अपनी जीवन शैली में शामिल करें और तनावमुक्त रहें।

कॉलन कैंसर और जीवन

कैंसर शब्द कष्टदायी मृत्यु का पर्याय है लेकिन कॉलन कैंसर के सम्बन्ध में इतना घबराने की जरूरत नहीं है। इसका उपचार सम्भव है और टारगेटेड मेडीकेशन के आने से जीवन की सम्भावना बढ़ने के साथ इलाज के साइड इफेक्ट भी कम हो गये हैं। जरूरत केवल इतनी है कि जैसे ही इसका कोई लक्षण महसूस हो तुरन्त डाक्टर से मिलें और उसके कहे अनुसार स्टूल टेस्ट करायें। डाक्टर यह सलाह भी देते हैं कि 50 या 55 की उम्र के बाद साल में एक बार स्टूल (मल) में रक्त की जांच जरूर करानी चाहिये, इस स्टेज में रक्त स्राव करने वाली गांठों को सर्जरी से रिमूव करना आसान होता है चाहे वे कैंसरस हों या बिनाइन (नॉन कैंसरस)। ऐसा करने से कॉलन कैंसर की सम्भावना कम हो जाती है। शुरूआती स्टेज में पता चलने पर यह ठीक हो जाता है। यदि किसी को कॉलन कैंसर है तो उसके परिवार वालों और दोस्तों को चाहिये कि वे पीड़ित को मानसिक रूप से मजबूत बनायें और उसके आस-पास सकारात्मक दृष्टिकोण वाले लोगों को रखें व हमेशा यह समझायें कि वह पूरी तरह से ठीक  हो जायेगा।

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