क्रोह्न याकि पाचन तंत्र में सूजन

पाचनतंत्र की लाइलाज बीमारी का नाम है क्रोहन। मेडिकल भाषा में आईबीडी (इन्फ्लेमेन्टरी बॉउल बीमारी) के नाम से जानी जाने वाली यह लाइफ लांग बीमारी है। हमारे देश में प्रतिवर्ष इसके दस लाख से ज्यादा मामले दर्ज होते हैं। इसकी गम्भीरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि लगभग तीन दशकों से रिसर्च करने वाले डॉक्टर अभी तक इसका मूल कारण नहीं खोज पाये हैं। ज्यादातर मामलों में इस बीमारी में छोटी आंत और मलाशय (कॉलन) में सूजन होती है। वैसे यह सूजन गैस्ट्रोइनटेस्टिनल (जीआई) ट्रैक्ट यानी मुंह से लेकर मलद्वार (एनस) तक कहीं भी हो सकती है। कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि इससे जीआई ट्रैक्ट का केवल एक भाग ही प्रभावित हुआ और शेष अप्रभावित होते है। समय के साथ इसके लक्षण बदलते रहते हैं। इसमें जीआई ट्रैक्ट में हल्की सूजन और इरीटेशन रहती है, लेकिन पुराने और गम्भीर मामलों में कॉम्पलीकेशन बढ़ने से जीवन खतरे में पड़ जाता है।

वैसे तो इसके पनपने के मूल कारण अज्ञात हैं लेकिन डॉक्टरों का मानना है कि खराब इम्यून सिस्टम, प्रदूषित वातावरण और फैमिली हिस्ट्री इसके लिये जिम्मेदार कारक हैं। क्रोह्न बीमारी के बीस प्रतिशत मामलों में पाया गया कि मरीज के माता-पिता या परिवार में पहले भी यह बीमारी किसी न किसी को हुई है। क्रोह्न बीमारी और इसके इलाज से इम्यून सिस्टम प्रभावित होता है जिससे शरीर में इन्फेक्शन के चांस बढ़ जाते हैं। ऐसे इन्फेक्शनों में यीस्ट इन्फेक्शन या कैन्डीडाइसिस (योनि का संक्रमण) कॉमन है। इसमें स्वस्थ योनि में मौजूद यीस्ट युक्त बैक्टीरिया का बैलेंस बिगड़ता है और यीस्ट सेल मल्टीप्लाई होने लगते हैं, जिससे योनि में बहुत ज्यादा इचिंग, इरीटेशन, जलन, रैशेज तथा सूजन होती है और सफेद कॉटेज चीज जैसा पदार्थ डिस्चार्ज होने लगता है। क्रोह्न बीमारी होने पर यह संक्रमण इन्टस्टाइन ट्रैक्ट और लंग्स (फेफड़ों) दोनों को प्रभावित करता है। ऐसी स्थिति में यीस्ट इन्फेक्शन को डायग्नोज करके एंटीफंगल दवाओं से इसका उपचार जरूरी हो जाता है, जिससे कम से कम कॉम्प्लीकेशन हों।

लक्षण-सिम्पटम
क्रोह्न बीमारी के लक्षण धीरे-धीरे विकसित होते हैं तथा समय बीतने पर गम्भीर हो जाते हैं। कई मामलों में इसके लक्षण अचानक उभरते हैं। शुरूआती लक्षणों में डाइरिया, एबडॉमिनल क्रैम्प्स, मल (स्टूल) में खून, फीवर, स्किन में सूजन और लाल चक्कते, थकान, भूख न लगना, वजन गिरना, पेट साफ न होना, हमेशा बॉउल मूवमेंट की फीलिंग प्रमुख हैं। यही लक्षण फूड प्वाइजनिंग और एलर्जी के भी हैं, ऐसे में जब कोई लक्षण नजर आये तो डाक्टर से तुरन्त सम्पर्क करें ताकि असल मर्ज का पता चल जाये।

जैसे-जैसे समय बीतता है क्रोह्न बीमारी गम्भीर रूप ले लेती है और इसके लक्षणों के साथ कुछ भयंकर परेशानियां भी जुड़ जाती हैं जैसेकि पेरीनाल फ्यूचुला (एनस के आसपास कैविटी बनना और उसमें पस भरना) की वजह से असहनीय दर्द, मुंह से लेकर एनस तक कहीं भी अल्सर पनपना, जोड़ों और स्किन में सूजन, एनीमिया (जिससे सांस फूलने लगती है और व्यायाम करने की क्षमता घट जाती है) इत्यादि। यदि क्रोह्न बीमारी का पता शुरूआत में लग जाये तो सही ट्रीटमेंट से ऐसी जटिलताओं को रोककर सामान्य जीवन जिया जा सकता है।

बीमारी डॉयग्नोज करना
क्रोह्न डिसीज का पता लगाने के लिये एलीमिनेशन की लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। एक टेस्ट से इसका पता नहीं चलता इसलिये कई टेस्ट होते हैं और सम्भावित कारणों को एलीमिनेट करते हुए क्रोह्न डिसीज का पता लगाते हैं-

ब्लड टेस्ट द्वारा एनीमिया और इन्फ्लेमेशन (सूजन) की जांच होती है।
स्टूल टेस्ट से जीआई ट्रैक्ट में खून के रिसाव की जांच होती है। यदि खून का रिसाव है तो रिसाव के सही स्थान की जानकारी के लिये इंडोस्टकोपी करते हैं। लार्ज बॉउल की जांच के लिये कॉलोनस्कोपी की जाती है।
सीटी स्कैन और एमआरआई से जीआई ट्रैक्ट के प्रभावित भाग (टिश्यू और आर्गन्स) की वास्तविक स्थिति का पता चलता है। कई बार वास्तविक स्थिति जानने के लिये टिश्यू सैम्पल से बॉयोप्सी भी करते हैं।
इन सभी टेस्टों से डॉक्टर क्रोह्न बीमारी को डॉयग्नोज करते हैं, बीमारी की प्रोग्रेस जानने के लिये ये टेस्ट एक से ज्यादा बार भी किये जा सकते हैं।

क्रोह्न बीमारी के प्रकार, वैरियेशन
अभी तक क्रोह्न डिसीज के ये छह टाइप डिटेक्ट किये गये हैं-
इलिकोलाइटिस: यह क्रोह्न डिसीज का सबसे आम प्रकार है। करीब 50 प्रतिशत मरीज इसी के होते हैं। इसमें छोटी आंत का अंतिम भाग और कॉलन प्रभावित होता है।
इलिटिस: इसमें छोटी आंत के अंतिम भाग इल्यूम में सूजन हो जाती है। क्रोह्न डिसीज के तीस प्रतिशत मरीज इसी का शिकार होते हैं।
क्रोह्न कोलाइटिस: इससे केवल कॉलन प्रभावित होता है और 20 प्रतिशत लोग इसके शिकार होते हैं। यहां पर ध्यान रखें कि अल्सरेटिव कोलाइटिस और क्रोह्न कोलाइटिस दोनों ही कॉलन को शिकार बनाते हैं लेकिन क्रोह्न कोलाइटिस में इन्टस्टाइनल लाइनिंग की अंदरूनी परत प्रभावित होती है।
गैस्ट्रोड्यूडेनल क्रोह्न बीमारी: इसमें छोटी आंत का पहला भाग, पेट और ड्यूडेनम प्रभावित होता है। करीब 5 प्रतिशत मरीज इससे प्रभावित होते हैं।
जेजून्वायलिटिस: यह छोटी आंत के दूसरे भाग जेजूनम में होती है, गैस्ट्रोड्यूडेनल की तरह से इसके मरीज भी बहुत कम होते हैं।
पेरियानल बीमारी: क्रोह्न डिसीज के 30 प्रतिशत मरीज इसके शिकार होते हैं। इसमें फिश्चुला, टिश्यू के मध्य असामान्य सम्बन्ध और डीप टिश्यू संक्रमण होने से एनस के चारों ओर आउटर स्किन पर अल्सर और पस युक्त जख्म बन जाते हैं।

नोट: क्रोह्न बीमारी (सीडी या आईबीडी) और अल्सरेटिव कोलाइटिस (यूसी) के कई लक्षण एक जैसे हैं, दोनों में डाइरिया, एब्डॉमिनल पेन (दर्द) और क्रैम्पिंग, रेक्टल ब्लीडिंग, वेट लॉस और थकावट कॉमन हैं लेकिन मुख्य अंतर यह है कि अल्सेरेटिव कोलाइटिस केवल कॉलन को अफेक्ट करती है जबकि क्रोह्न बीमारी पूरे जीआई ट्रैक्ट में कहीं पर भी हो सकती है। यूसी में कॉलन की आउटमोस्ट (बाहरी) लेयर के टिश्यू ही प्रभावित होते हैं जबकि क्रोह्न बीमारी में इन्टस्टाइन टिश्यू की सभी लेयरें (परतें) प्रभावित होती हैं।

ट्रीटमेंट-इलाज
क्रोह्न बीमारी का पक्का-तुरत इलाज नहीं है लेकिन सही मेडीकेशन और डाक्टरी सलाह से इसे मैनेज कर सकते हैं। इस संदर्भ में इलाज के अनेक विकल्प उपलब्ध हैं जिन्हें बीमारी के लक्षणों और गम्भीरता के अनुसार प्रयोग करते हैं। मेडीकेशन के रूप में एंटी डायरियल और एंटी इन्फ्लेमेन्टरी ड्रग्स दिये जाते हैं। मेडीकेशन के अत्याधुनिक तरीकों में से एक बॉयोलाजिक्स को भी क्रोह्न बीमारी के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है। इसमें शरीर के इम्यून सिस्टम को ही बीमारी के ट्रीटमेंट के लिये इस्तेमाल करते हैं। कौन सा मेडीकेशन प्रयोग होगा या एक से अधिक मेडीकेशन के कॉम्बीनोशन्स प्रयोग किये जायेंगे यह बीमारी के लक्षणों, हिस्ट्री, गम्भीर कंडीशन और शरीर द्वारा इलाज के रिस्पांस पर निर्भर है। इस बीमारी में दो तरह के एंटी इन्फ्लेमेशन ड्रग्स इस्तेमाल होते हैं- ओरल-5 एमीनोसालीसाइलेट्स और कोर्टीकोस्टेराइड्स। ज्यादातर मामलों में इसके इलाज के लिये सबसे पहले एंटी इन्फ्लेमेशन ड्रग्स दिये जाते हैं। इनका प्रयोग शुरूआती अवस्था में होता है। कोर्टीकोस्टेराइड्स को गम्भीर अवस्था में प्रयोग करते हैं लेकिन बहुत कम समय के लिये।

बहुत से मामलों में इम्यून सिस्टम के ओवर रिएक्ट करने से जीआई ट्रैक्ट में सूजन हो जाती है ऐसे में इम्यूनोमॉड्यूलेटर श्रेणी के ड्रग्स दिये जाते हैं। ये सूजन को कम करने के साथ इम्यून सिस्टम के रियेक्शन को कंट्रोल करते हैं। कुछ मामलों में डाक्टर, एंटीबॉयोटिक दवाओं से सूजन और संक्रमण बढ़ाने वाले बैक्टीरिया को ट्रीट करते हैं, फिश्चुला की स्थिति में एंटीबॉयोटिक ड्रग्स पस (मवाद) को सुखाने और कैविटी को हील करने में मदद करते हैं।

क्रोह्न डिसीज की गम्भीर अवस्था में डाक्टर बॉयोलॉजिक्स थेरेपी द्वारा संक्रंमण और कॉम्पलीकेशन्स का उपचार करते हैं। बॉयोलाजिक्स ड्रग सूजन बढ़ाने वाली प्रोटीन को ब्लॉक कर देते हैं।

एक्यूपंचर: 2014 में चाइना में हुई एक रिसर्च के अनुसार क्रोह्न डिसीज के उपचार में एक्यूपंचर को लाभकारी पाया गया है, इससे डायरिया, सूजन और पेट दर्द में राहत मिलती है।

खान-पान बदलाव से उपचार
वैसे तो खाना (फूड) क्रोह्न बीमारी के लिये जिम्मेदार नहीं होता लेकिन क्रोह्न डिसीज होने पर गलत खान-पान उसे ज्यादा बिगाड़ देता है। ऐसे में खान-पान परिवर्तित करके इस बीमारी को मैनेज करते हैं। इसके लिये रजिस्टर्ड डायटीशियन से सलाह लेनी चाहिये। जब बीमारी के लक्षण नजर आयें तो खाने में रिफाइन्ड और लो-फाइबर ग्रेन्स ही प्रयोग करें, जैसेकि व्हाइट ब्रेड, व्हाइट राइस, कम फाइबर वाला दलिया, चावल से बने खाद्य पदार्थ इत्यादि। आजकल बाजार में विटामिन्स और मिनरल्स युक्त रेडी टु ईट सीरियल (दलिया) आसानी से उपलब्ध हैं, इनसे शरीर में पोषक तत्वों की पूर्ति हो जाती है। प्रोबॉयोटिक दही इसमें दवा का काम करता है, इसे डेली खाने में शामिल करें। पनीर और टोफू का सेवन लाभकारी है। फलों में केला, खरबूजा, तरबूज और आड़ू फायदेमंद है। वैसे मरीज कोई भी पका फल खा सकते हैं क्योंकि पकने से फल का फाइबर घट जाता है। फलों को छीलकर और अच्छी तरह से चबाकर खायें। सब्जियों में आलू, गाजर इत्यादि को छीलकर प्रयोग करें। सब्जियों को अच्छी तरह से पका लें। रोस्टेड और फ्राइड सब्जियों से परहेज करें। वेजीटेबल और फ्रूट जूस लो फाइबर होता है यदि डायबिटीज नहीं है तो जूस पियें। विटामिन सी युक्त फ्रूट जूस बहुत असरदार है, यह पेट को आयरन एब्जार्ब करने में मदद करता है। ज्यादा फैट वाले खाने बंद कर दें। नॉन वेजीटेरियन मरीज रेड मीट न खायें, इच्छा होने पर अंडे, चिकन और फिश खा सकते हैं। क्रोह्न डिसीज में फिश (मछली) खाना अच्छा है क्योंकि इसमें मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड सूजन कम करने में सहायक है। सामान्य चाय के स्थान पर ग्रीन टी पियें और पानी भी अधिक पियें।

इनके खाने से बचें: पॉपकार्न, नट्स, साबुत अनाज, हाई-फाइबर फूड, छिलका युक्त सब्जियां, कच्ची हरी सब्जियां, ब्रोकली और फूलगोभी, रेड मीट, बटर, कोकोनट ऑयल, प्रोसेस्ड फूड, बीज एंव छिलका युक्त फल, मसालेदार भोजन, कैफीन, एल्कोहल, सोडयुक्त पेय-पदार्थों के सेवन से बचें।

सर्जिकल ट्रीटमेंट
यदि मेडीकेशन और खानपान बदलने से बीमारी में राहत नहीं मिलती तो सर्जरी करना जरूरी हो जाता है। अभी तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 75 प्रतिशत मरीजों को कभी न कभी सर्जरी की आवश्यकता हुई है। इसमें की जाने वाली सर्जरी में डाक्टर डाइजेस्टिव ट्रैक्ट के खराब हिस्से को रिमूव करके हैल्दी सेक्शन को आपस में जोड़ते हैं। कुछ प्रोसीजरों में डैमेज टिश्यू की रिपेयरिंग और डीप इन्फेक्शन का इलाज होता है। क्रोह्न डिसीज के सर्जिकल ट्रीटमेंट में ये विकल्प उपलब्ध हैं-
स्ट्रिक्चरप्लास्टी: इस सर्जरी में छोटी आंत (इंटस्टाइन) को खोलते (वाइडन) हैं या छोटा करते हैं जिससे जख्मी और डैमेज टिश्यू के प्रभाव को कम किया जा सके।
बॉउल रिसेक्शन: इस सर्जरी में इन्टस्टाइन के डैमेज भाग को निकालकर स्वस्थ इन्टेस्टाइन को आपस में जोड़ते हैं।
ऑस्टोमी: इसमें छोटी या बड़ी आंत के डैमेज भाग को काटकर निकालने के बाद उसकी हीलिंग के लिये पर्याप्त समय देने हेतु शरीर में एक छेद बनाते हैं जिससे मल या अपविष्ट बाहर निकल सके। इस छेद से मल या अपविष्ट एकत्र करने वाला एक विशेष बैग जोड़ा जाता है। यह छेद अस्थायी भी हो सकता है और स्थायी भी।
कॉलेक्टॉमी: इस सर्जरी में कॉलन के बीमारी से ग्रस्त डैमेज भाग को काटकर निकालते हैं।
प्रोक्टोकॉलेक्टामी: अत्यन्त गम्भीर अवस्था में होने वाली इस सर्जरी में कॉलन और रैक्टम को रिमूव किया जाता है। इस सर्जरी के पश्चात कॉलेस्टोमी की जरूरत होती है। इसमें शरीर में छेद बनाकर उससे मल एकत्र करने वाले विशेष बैग जोड़ते हैं।

जीवन पर प्रभाव
क्रोह्न बीमारी से कामकाज और पर्सनल लाइफ बुरी तरह से प्रभावित होती हैं। इसका इलाज मंहगा है जिससे आर्थिक हालात खराब हो जाते हैं। गम्भीर अवस्था में यह एक तरह की अपंगता की ओर ले जाती है जिससे काम करना मुश्किल हो जाता है। फिश्चुला जैसी कंडीशन में तो उठने-बैठने में ही परेशानी होती है। जैसे ही इसके लक्षण नजर आयें तो तुरन्त डाक्टर की सलाह से इलाज करें। डाक्टरी सलाह पर खान-पान बदल लें और उस पर टिके रहें। डाक्टर यदि सर्जरी के लिये कहता है तो इस पर गम्भीरता से विचार करें।

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