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क्या है डाउन सिन्ड्रोम बीमारी?

down syndrome causes symptoms हाल में ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफिलिक्स ने सेरोगेसी पर मिमी नाम की हिंदी फिल्म रिलीज की है। कॉमेडी से शुरू होने वाली इस फिल्म की कहानी में मोड़ डाउन सिन्ड्रोम बीमारी से आता है। फिल्म को कॉमेडी से भावनात्मक दिशा में मोड़ देने वाली इस बीमारी के बारे में जानने की जिज्ञासा में मैंने इस क्षेत्र के विशेषज्ञों से बात की तो पता चला कि डाउन सिंड्रोम के साथ जन्मे बच्चे और उनके माता-पिता बहुत कठिन जीवन बिताते हैं, ऐसे में डाउन सिंड्रोम की सम्भावना समाप्त करने के लिये जरूरी है कि लोगों में इस बाबत जागरूकता बढ़े विशेषरूप से उन जोड़ों में जो पहली बार माता-पिता बनने जा रहे हैं।

क्यों होता है डाउन सिंड्रोम?

डाउन सिंड्रोम की वजह नवजात शिशु में 21 वें क्रोमोसॉम यानी गुणसूत्र की एक अतिरिक्त कॉपी होना है, इसे मेडिकल साइंस में ट्रिसोमी 21 भी कहते हैं। इस अतिरिक्त कॉपी के कारण शिशु का मानसिक और भौतिक विकास धीमा होने से वह कई तरह की विकलांगताओं से घिर जाता है, इनमें से कुछ तो उम्रभर रहती हैं।

वंश बढ़ाने की प्रक्रिया में माता-पिता के जीन्स बच्चों में जाते हैं और ये जीन्स ही माता-पिता के क्रोमोसॉम्स (गुणसूत्र) बच्चों में ले जाते हैं। गर्भ में जब बच्चे की कोशिकायें विकसित होती हैं तो प्रत्येक सेल (कोशिका) में 23 जोड़ी यानी कुल मिलाकर 46 क्रोमोसॉम होते हैं। इनमें से आधे मां और आधे पिता से आते हैं। डाउन सिंड्रोम कंडीशन में इनमें से के एक क्रोमोसॉम ठीक से अलग नहीं हो पाता और दो की बजाय उसकी तीन कॉपियां बन जाती हैं अर्थात 21 वें क्रोमोसॉम की एक अतिरिक्त आंशिक प्रति बनने से बच्चे के मस्तिष्क और शारीरिक विकास में बाधा आती है। डाउन सिंड्रोम फेडरेशन ऑफ इंडिया के मुताबिक हमारे देश में 830 में से एक बच्चा किसी न किसी रूप में डाउन सिंड्रोम के साथ पैदा होता है इसीलिये यह सबसे कॉमन जेनेटिक डिस्आर्डर है। मेडिकल साइंस के मुताबिक डाउन सिंड्रोम के तीन टाइप हैं-

ट्रिसोमी-21: इस कंडीशन में बच्चे की प्रत्येक कोशिका (सेल) में 21 वें क्रोमोसॉम की अतिरिक्त कॉपी होने से उसमें 46 की बजाय 47 क्रोमोसॉम होते हैं। डाउन सिंड्रोम के 95 प्रतिशत पीड़ित इसी टाइप से ग्रस्त होते हैं।

मोजाइसिज्म: इस कंडीशन 21 वें क्रोमोसॉम की प्रति बच्चे के सभी सेल्स में न होकर केवल कुछ सेल्स में ही होती है।

रार्बटसोनियान ट्रांसलोकेशन: इस कंडीशन में सेल डिवीजन के समय 21 वां क्रोमोसॉम टूटकर 14 वें या किसी अन्य क्रोमोसॉम से जुड़ जाता है जिससे बच्चे में डाउन सिंड्रोम के कुछ लक्षण आ जाते हैं।

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किन्हें है ज्यादा रिस्क?

रिसर्च के मुताबिक यदि महिला 35 वर्ष की उम्र के बाद मां बनती है तो बच्चे के डाउन सिन्ड्रोम से ग्रस्त होने के चांस बढ़ते हैं। जैसे-जैसे मां की उम्र बढ़ती है बच्चे में इसका रिस्क बढता है। यदि पिता की उम्र 40 वर्ष से ज्यादा है तो यह रिस्क और ज्यादा है। इसके अलावा जिनकी फैमिली हिस्ट्री में यह बीमारी है या जिन्होंने जेनेटिक ट्रांसलोकेशन कैरी किया है उनके बच्चों को डाउन सिंड्रोम का रिस्क दूसरों से अधिक रहता है।

लक्षण क्या हैं डाउन सिंड्रोम के?

मेडिकल साइंस में हुई तरक्की से गर्भ में ही पता चल जाता है कि बच्चा डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त है या नहीं। यदि गर्भावस्था के शुरूआती दिनों में डाउन सिंड्रोम की पुष्टि हो जाये तो डाक्टर गर्भपात की सलाह देते हैं। डाउन सिंड्रोम के साथ जन्में बच्चों में कुछ विशिष्ट लक्षण होते हैं जैसेकि – छोटा सिर, फ्लेट फेशियल फीचर्स, छोटी गर्दन, उभरी आंखें और जीभ, कानों का असामान्य आकार और मांसपेशियों में कमजोरी। डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे 11 माह में बैठना, 17 माह में क्रॉलिंग तथा 26 माह में चलना सीख पाते हैं।

डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त शिशु औसत आकार में पैदा होता है लेकिन ग्रोथ सामान्य शिशुओं से धीमी होती है। मानसिक और शारीरिक विकास धीमा होने से बच्चों में सीखने की क्षमता कम,  व्यवहार में आवेग, निर्णय लेने की क्षमता में कमी, ध्यान केन्द्रित करने में कठिनाई जैसे लक्षण होते हैं। कुछ में तो जन्मजात ह्दय दोष, बहरापन, कमजोर दृष्टि, मोतियाबिंद, कूल्हे की समस्या, ल्यूकेमिया, क्रोनिक कॉन्सटीपेसन, स्लीप अपेनिया (नींद के दौरान सांस लेने में दिक्कत), डिमेन्शिया, हाइपोथॉयरायडिज्म, मोटापा, दांतों का देर से बढ़ना और बुढ़ापे में अल्जाइमर तथा इपीलिप्सी जैसी समस्यायें हो सकती हैं। एक रिसर्च में सामने आया है कि डाउन सिंड्रोम पीड़ितों को रेसिपिरेटरी इंफेक्शन, यूरीनरी ट्रैक इंन्फेक्शन और स्किन इंफेक्शन से संक्रमित होने के चांस दूसरों से ज्यादा होते हैं।

 

गर्भावस्था में स्क्रीनिंग

डाउन सिंड्रोम की फैमिली हिस्ट्री या मां की उम्र 35 और पिता की 40 वर्ष से अधिक होने पर  गर्भावस्था में स्क्रीनिंग अनिवार्य है। यह प्रक्रिया इन चरणों में होती है-

पहली तिमाही: गर्भधारण की पहली तिमाही में अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट से भ्रूण में डाउन सिंड्रोम स्क्रीनिंग करते हैं, लेकिन इन टेस्टों के परिणाम गलत होने की सम्भावना भी रहती है। परिणाम ठीक न होने पर प्रेगनेन्सी के 15 वें सप्ताह एमनियोटेंसिस टेस्ट किया जाता हैं।

सेल-फ्री डीएनए: इसमें मां से ब्लड टेस्ट से डीएनए की खराबी का पता लगाते हैं।

दूसरी तिमाही: गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में अल्ट्रासाउंड और क्यूएमएस टेस्ट से डाउन सिंड्रोम के अलावा दिमाग तथा रीढ़ की हड्डी से सम्बन्धित दोष पता चलते हैं। यह टेस्ट प्रेगनेन्सी के 15 से 20 सप्ताह के बीच किया जाता है। यदि इसमें कुछ असामान्य है तो इसे बर्थ डिफेक्ट का हाई रिस्क मानते हैं।

प्रसव पूर्व स्क्रीनिंग टेस्ट

शिशु में डाउन सिंड्रोम का पता लगाने के लिये प्रसव पूर्व ये टेस्ट किये जाते हैं-

एमनियोंटेंसिस: गर्भ के 15 वें सप्ताह किये जाने वाले इस टेस्ट में डॉक्टर एमनियोटिक द्रव्य का नमूना लेकर बच्चे में क्रोमासॉम (गुणसूत्र) की संख्या जांचते हैं।

कोरियोनिक विल्स सैम्पलिंग (सीवीएस): इस टेस्ट में प्लेसेंटा से सेल्स (कोशिकायें) लेकर भ्रूण के क्रोमोसॉम्स का विश्लेषण करते हैं। यह जांच गर्भावस्था के 9 वें और 14 वें सप्ताह के बीच होती है। इस टेस्ट में गर्भपात का खतरा होता है लेकिन म्यो क्लीनिक, अमेरिका के डॉक्टरों के मुताबिक ऐसा रिस्क 1 प्रतिशत से कम है।

पर्क्यूटेनियस गर्भनाल ब्लड सैम्पलिंग (कॉर्डोसेन्टसिस): इस टेस्ट में गर्भनाल के ब्लड से क्रोमोसोमल (गुणसूत्रों) दोषों की जांच की जाती है। यह जांच 18 वें सप्ताह में होती है इसलिये गर्भपात का खतरा अधिक है। इसकी जरूरत तब पडती है जब पहले किये टेस्टों के परिणाम संदेहास्पद हों।

जन्म के समय परीक्षण

शिशु के जन्मते ही डॉक्टर सबसे पहले फिजिकल जांच करते हैं, यदि इस जांच में डाउन सिंड्रोम के लक्षण नजर आते हैं तो इसकी पुष्टि कैरियोटाइप नामक ब्लड टेस्ट से की जाती है।

इलाज क्या है डाउन सिंड्रोम का?

डाउन सिंड्रोम का इलाज नहीं है लेकिन कई तरह के सपोर्ट और एजूकेशनल प्रोग्रामों से डाउन सिंड्रोम पीड़ित और उसके परिवार की मदद की जाती है जिससे उनका जीवन आसान हो। इस तरह के प्रोग्राम बच्चे के बचपन से शुरू हो जाते हैं, इनके जरिये बच्चे को सेन्सरी स्किल, सोशल स्किल, सेल्फ हेल्प स्किल, मोटर स्किल और लैंग्वेज तथा कॉग्नीटिव एबिल्टी की ट्रेनिंग दी जाती है।

डाउन सिंड्रोम पीड़ित बच्चों के लिये स्कूल जाना जरूरी है हालांकि इनकी बौद्धिक क्षमता सामान्य बच्चों से धीमी होती है लेकिन स्कूल न जाने से विकास और धीमा हो सकता है। ऐसे में शुरू में इन्हें स्पेशल स्कूल भेजें, बाद में सामान्य स्कूल में। मामूली डाउन सिंड्रोम होने पर सीधे सामान्य स्कूल भेजना ज्यादा बेहतर है।

 

डाउन सिंड्रोम के साथ जीवन

हाल के दशकों में डाउन सिंड्रोम वाले लोगों के जीवन काल में काफी सुधार आया है जहां 1960 तक डाउन सिंड्रोम के साथ पैदा हुआ बच्चा अक्सर अपना 10 वां जन्मदिन नहीं देख पाता था लेकिन आज इनकी औसत आयु 50 से 60 वर्ष हो गयी है। यदि परिवार में डाउन सिंड्रोम पीड़ित बच्चा है तो माता-पिता को इस क्षेत्र से जुड़े मेडिकल प्रोफेशनल्स की मदद लेनी होगी। ये प्रोफेशनल बौद्धिक और शारीरिक समस्याओं में मदद के साथ दिल सम्बन्धी बीमारियों, ल्यूकेमिया और संक्रमण से होने वाले कॉम्प्लीकेशनों से बचाने में मदद करते हैं। डाउन सिंड्रोम ग्रस्त बच्चे के साथ मां या बाप में से किसी एक को पूरी तरह से समर्पित रहना पड़ता है साथ ही परिवार वालों और दोस्तों का समर्थन भी जरूरी है। आजकल इंटरनेट पर डाउन सिंड्रोम से पीड़ितों के अनेक ग्रुप हैं इनसे जुड़कर नयी-नयी बातें पता चलती रहती हैं। यदि डाउन सिंड्रोम पीड़ित को विवाह की उम्र में पार्टनर मिल जाये तो उसे शादी कर लेनी चाहिये। कहीं बच्चों में यह समस्या न हो ये सोचकर कई लोग शादी नहीं करते लेकिन इसके चांस 25-50 प्रतिशत ही हैं और आज स्क्रानिंग सुविधायें इतनी एडवांस हैं कि प्रेगनेन्सी की शुरूआत में इसका पता चल जाता है और ऐसा होने पर गर्भपात का विकल्प तो है ही।

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