मेकुला क्षय यानी घातक नेत्र रोग

आंखों की इस बीमारी में सेन्ट्रल दृष्टि (सीधी नजर) के धीरे-धीरे कमजोर होने से व्यक्ति लगभग अंधेपन की ओर अग्रसर होने लगता है इसमें रेटिना के केन्द्र को नुकसान पहुंचता है और इलाज में कोताही बरतने पर कुछ समय पश्चात सेन्ट्रल दृष्टि समाप्त हो जाता है। मेडिकल साइंस में विजन (दृष्टि) दो तरह का होता है- सेन्ट्रल और पेरीफेरल। जब हम सीधे आगे देखते हैं तो वह हमारा सेन्ट्रल दृष्टि है। जब हम सीधे देखते हैं तो जो साइडों में दिखाई देता है उसे पेरीफेरल्स दृष्टि (परिधीय दृष्टि) कहते है। मैकुलर डिजेनरेशन में सेन्ट्रल दृष्टि खराब हो जाता है परन्तु पेरीफेरल दृष्टि बना रहता है जिससे पीड़ित को साइडों से थोड़ा-थोड़ा दिखाई देता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट में इस रोग को दृष्टि लॉस का मुख्य कारण माना गया है। इसमें आंख के पीछे की ओर मौजूद रेटिना का एक छोटा क्षेत्र जिसे मेकुला कहते हैं का धीरे-धीरे क्षय (डिटीरीअरेशन) होने लगता है। हमारे देश में प्रतिवर्ष इससे 5 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं। इसे ठीक नहीं किया जा सकता लेकिन समय पर इलाज कराने से इसे बढ़ने से रोका जा सकता है।

इस नेत्र रोग के बारे में सही जानकारी हासिल करने के लिये मैंने दिल्ली के मशहूर नेत्र विशेषज्ञ (ऑफथालमोलोजिस्ट) और आई सर्जन डा. राकेश गुप्ता (निदेशक-श्रेया आई सेन्टर, दिल्ली) से बातचीत की और उनसे जो उपयोगी जानकारी हासिल की आज के कॉलम में नया इंडिया के पाठकों के लिये प्रस्तुत है-

मैकुलर डिजेनरेशन के दो टाइप हैं- ड्राई मैकुलर डिजेनरेशन और वैट (गीला) मैकुलर डिजेनरेशन। इस नेत्र रोग से ग्रस्त 85 से 90 प्रतिशत व्यक्ति ड्राई मैकुलर डिजेनरेशन से पीड़ित होते है। इसमें मैकुला में अल्प मात्रा में कुछ पीला जमाव होने लगता है जिसे ड्रूसेन कहते हैं, यही रेटिना की क्षति और दृष्टिहीनता का कारण बनता है। शुरू में यह एक या दोनों आंखों में पनपता है लेकिन कुछ समय बाद इससे दोनों आंखों ही प्रभावित हो जाती है।

मैकुलर डिजेनरेशन से ग्रस्त 10 से 15 प्रतिशत लोग वेट मैकुलर डिजेनरेशन से पीड़ित होते हैं, इसमें रेटिना और मैकुला के अंतर्गत असामान्य रक्तवाहिकायें (ब्लड वेसल्स) विकसित होने या इनसे ब्लीडिंग या फ्लूड लीक होने से दृष्टि के केन्द्र में एक डार्क स्पॉट दिखाई देने लगता है।

लक्षण क्या हैं मैकुलर डिजेनरेशन के?

यह प्रोग्रेसिव (लगातार बढ़ने वाली)बीमारीहै, इसका सीधा सा मतलब है कि समय बीतने के साथ स्थिति और खराब होती जायेगी। बीमारी की शुरूआती स्टेज में इसके कोई लक्षण महसूस नहीं होते, साथ ही यदि इसने मरीज की दोनों आंखों को एक साथ प्रभावित किया है तो नजर में आये परिवर्तनों को नोटिस करना मुश्किल होता है। समय बीतने पर सीधे आगे की ओर देखने पर दृष्टि में विरूपण (डिस्टॉरसन), सेन्ट्रल दृष्टि में कमी, देखने के लिये अधिक लाइट की जरूरत, कम लाइट में देखने में दिक्कत, चेहरे पहचानने में दिक्कत, धुंधलापन, रंगों की चमक फीकी दिखाई देने जैसे लक्षण महसूस होते हैं।

वैट (गीले) मैकुलर डिजेनरेशन में विजुअल डिस्टॉरशन और सेन्ट्रल दृष्टि में कमी जैसे लक्षणों के अलावा फील्ड ऑफ दृष्टि में ब्लरी स्पॉट, धुंधली दृष्टि (हेज़ी दृष्टि) और दृष्टि में तेजी से खराबी आने जैसे लक्षण उभरते हैं।

क्यों होता है मैकुलर डिजेनरेशन?

अभी तक स्पष्ट रूप से यह ज्ञात नहीं है कि कुछ लोगों में मैकुलर डिजेनरेशन क्यों होता है लेकिन इस क्षेत्र में हुए शोध के मुताबिक स्मोकिंग, 60 वर्ष से अधिक उम्र, ब्लड प्रेशर/कार्डियोवैस्कुलर बीमारी, फैमिली हिस्ट्री, मोटापा और अनहैल्दी डाइट जैसे फैक्टर इसका रिस्क बढ़ाते हैं।

कैसे पुष्टि होती है इसकी?

जैसे ही उम्र 45 वर्ष की हो, साल में एक बार आंखों का चैकअप जरूर कराना चाहिये। यदि इससे पहले दृष्टि में कोई भी परिवर्तन महसूस हो तो तुरन्त आंखों के डाक्टर से मिलें। दृष्टि परिवर्तन के कारणों का पता लगाने के लिये कई टेस्ट होते हैं और इस प्रक्रिया में पहले एक विशेष आई-ड्रॉप से आंखें डाइलेट करने के बाद आंखों की जांच की जाती है जिससे आंखों में फ्लूड, ब्लड या पीलेपन का पता चल सके। जांच के दौरान नेत्र विशेषज्ञ सेन्ट्रल दृष्टि के फील्ड की जांच के लिये एक ग्रिड को देखने के लिये कहते हैं। यदि आपको इस ग्रिड में कुछ लाइनें फेडेड या टूटी हुई दिखाई दें तो इसे मैकुलर डिजेनरेशन का लक्षण माना जाता है। इसके बाद ये टेस्ट किये जाते हैं-

फ्लोरेसिन एंजियोग्राफी: इस टेस्ट में आंखों की ब्लड वेसल्स जांचने के लिये भुजा की वेन में रंगीन डाइ इंजेक्ट करने के पश्चात एक विशेष कैमरे से आंखों की तस्वीर ली जाती है। इन तस्वीरों से रेटिना और ब्लड वेसल्स में आये बदलावों को देखकर समस्या का पता लगाते हैं।

इंडोसायनिन ग्रीन एंजियोग्राफी: यह फ्लोरेसिन टेस्ट के समान ही है, इसमें इंडोसाइनिन ग्रीन डाइ को इंजेक्ट किया जाता है, इस टेस्ट से मैकुलर डिजेनरेशन का टाइप पता चलता है।

ऑप्टिकल कोहरेन्स टोमोग्राफी: इसमें रेटिना की क्रॉस-सेक्शनल तस्वीरें ली जाती हैं जिससे रेटिना में सूजन, उसकी मोटाई और पतलेपन की जानकारी मिलती है। मैकुलर डिजेनरेशन की पुष्टि होने के बाद भी डाक्टर यह टेस्ट करते हैं ताकि उन्हें पता चल सके कि मरीज की आंखों पर इलाज का क्या असर हो रहा है।

क्या जटिलताएं हो सकती हैं?

इसका सबसे बड़ा कॉम्प्लीकेशन यही है कि आप पढ़ने (रीडिंग), टीवी देखने और ड्राइविंग जैसे काम  नहीं कर सकते। अपने सामने बैठे व्यक्ति के चेहरे को देखेंगे तो चेहरे के स्थान पर काला धब्बा दिखाई देगा। इस रोग से पीड़ित 30 प्रतिशत मरीज एंग्जायटी और डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। यदि बीमारी की शुरूआती स्टेज है तो कार ड्राइव करने के बारे में डाक्टर से बात करें, इसी तरह से एंग्जॉयटी और डिप्रेशन महसूस होने पर भी डाक्टर को बतायें। ऐसी स्थिति में मेन्टल हैल्थ इम्प्रूव करने के लिये मेडीटेशन, काउंसलिंग और विजुअल इम्पेयरमेंट से ग्रस्त लोगों के ग्रुप ज्वाइन करना मददगार साबित होते हैं।

मैकुलर डिजेनरेशन से ग्रस्त दस लोगों में से एक व्यक्ति को विजुअल हैलुसनेशन महसूस होते हैं, ऐसा वास्तव में लोदृष्टि स्टिमुलेशन की वजह से होता है। जैसे-जैसे दृष्टि घटता है तो हमारा ब्रेन इस कमी को पूरा करने के लिये फाल्स इमेज या हैलुसनेशन क्रियेट करने लगता है। यहां यह याद रखें कि यह मेन्टल हैल्थ की समस्या नहीं है बल्कि ऐसा नजर कमजोर होने से होता है। ऐसे में अपने डाक्टर से खुलकर बात करें जिससे वह आपको इसका सही समाधान बता सके ताकि आपको इसके साथ जीवन जीने में आसानी हो।

इलाज क्या है इस रोग का?

इस रोग को ठीक नहीं किया जा सकता केवल इसके बढ़ने की गति को धीमा कर सकते हैं। वर्तमान में इस रोग के इलाज के लिये इन तरीकों का इस्तेमाल होता है-

ड्राइ मैकुलर डिजेनरेशन ट्रीटमेंट: इसके अंतर्गत डाक्टर लो दृष्टि रिहैबलिटेशन स्पेशलिस्ट के पास जाने की सलाह देते हैं। ये स्पेसलिस्ट मरीज को दृष्टि लॉस के साथ जीवन जीने का प्रशिक्षण देते हैं। कुछ मामलों में डाक्टर सर्जरी से दृष्टि इम्प्रूव करते हैं लेकिन ये पूरी तरह से रोग की गम्भीरता और आंख के स्वास्थ्य पर निर्भर है। इस सर्जरी से आंख में टेलिस्कोपिक लेंस इम्प्लांट करते हैं जिससे फील्ड ऑफ दृष्टि मैग्नीफाई हो सके।

वेट मैकुलर डिजेनरेशन ट्रीटमेंट: इसमें भी लो दृष्टि रिहैबलिटेशन स्पेशलिस्ट की मदद लेना लाभदायक होता है। इसके अलावा रोग की ग्रोथ कम करने के लिये आंख में दवाओं का प्रयोग भी किया जाता है जिससे नयी ब्लड वेसल्स की ग्रोथ रूके। इस उपचार में कई सप्ताह लगते हैं तब कहीं जाकर इसका असर महसूस होता है। एंटी वीईजीएफ इंजेक्शन से नजर को बचाया जा सकता है।

वेट मैकुलर डिजेनरेशन ट्रीटमेंट के एक अन्य विकल्प के रूप में फोटोडायनामिक थेरेपी का प्रयोग किया जाता है। इसके तहत भुजा (आर्म) की वेन से मेडीकेशन इंजेक्ट करते हैं और फिर स्पेशल लेजर के जरिये ब्लड वेसल्स की लीकेज को बंद किया जाता है। इस थेरेपी से दृष्टि इम्प्रूव हो जाती है लेकिन इस ट्रीटमेंट को कई बार करना पड़ता है।

फोटोकॉगुलेशन नामक एक अन्य थेरेपी का प्रयोग भी वेट मैकुलर डिजेनरेशन में किया जाता है, इसमें हाई-इनर्जी लेजर बीम्स से आंख में बनी एब्नार्मल ब्लड वेसल्स को नष्ट करते हैं। इस थेरेपी का उद्देश्य ब्लीडिंग रोककर मैकुला को और क्षति-ग्रस्त होने से बचाना है। इस ट्रीटमेंट के साइड इफेक्ट के तौर पर लेजर से आंख में स्कार आ जाता है जिससे ब्लाइंट स्पॉट क्रियेट होने का रिस्क बढ़ जाता है। ट्रीटमेंट के पूरी तरह से सफल होने के बाद भी  एब्नार्मल ब्लड वेसल्स फिर से बन जाती है जिससे फिर ट्रीटमेंट कराना पड़ता है।

कैसे रोकें मैकुलर डिजेनरेशन को?

इसे रोकने का कोई पक्का जरिया नहीं है लेकिन हेल्दी लाइफ स्टाइल अपनाकर इसके रिस्क को कम किया जा सकता है। इसके अंतर्गत अपनी जीवनशैली में ये बदलाव करें-

– धूम्रपान तुरन्त छोड़ दें।

– ब्लड प्रेशर और कार्डियोवैस्कुलरबीमारीहोने पर तुरन्त इलाज करायें।

– ओवरवेट होने की स्थिति में वजन घटायें।

– नियमित व्यायाम करें।

– खाने में फल और सब्जियों की मात्रा बढ़ाये और अखरोट को शामिल करें, इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड भरपूर मात्रा में होता है जो मैकुलर डिजेनरेशन का रिस्क घटाता है। मांसाहारी लोग अपने भोजन में मछली शामिल करें।

नजरिया

यह हमेशा याद रखें कि इस बीमारी को ठीक नहीं किया जा सकता लेकिन इसके बढ़ने की गति को रोका जा सकता है। यदि आप आंखों का रेगुलर डायलेटेड चैकअप कराते हैं तो इसका शुरूआत में पता चल जायेगा, इस स्टेज में इलाज से इसकी प्रोग्रेस धीमी कर सकते हैं। इस बीमारी का अंतिम परिणाम बहुत कष्टप्रद है ऐसे में शुरुआती स्टेज में किया गया इलाज इस कष्ट को काफी हद तक कम कर सकता है। इस रोग की पुष्टि होने पर अनुभवी नेत्र विशेषज्ञ से ही इलाज करायें व इलाज के देसी तरीकों से दूर रहें अन्यथा जो दृष्टि कुछ सालों में समाप्त होगी वह एक या दो माह में ही चली  जायेगी।

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