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सोशल मीडिया से फैलती घातक बीमारी (एडीएचडी)

एडीएचडी अर्थात अटेन्टशन डेफिसिट हाइपर एक्टीविटी डिस्ऑर्डर (एडीएचडी) से दिमाग इतना कमजोर हो रहा है कि कि 15 से 28 साल के 80 प्रतिशत सोशल मीडिया यूजर एडीएचडी से ग्रस्त हैं। इससे जहां पढ़ने, सोचने, समझने और चिंतन-मनन की क्षमता घटी है वहीं व्यक्ति में अति-सक्रियता आने से वह बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में काम करने लगा है जिसका कैरियर और व्यक्तित्व पर नकारात्मक असर हो रहा है।याददाश्त इतनी कमजोर हो गयी है कि अब 6 डिजिट का ओटीपी भी याद नहीं होता बल्कि बार-बार देखकर फीड करना पड़ता है। attention deficit hyperactivity disorder

सोशल मीडिया का नकारात्मक असर अब इंसान के दिमाग और व्यक्तित्व पर दिखने लगा है।कोलम्बिया यूनीवर्सिटी (अमेरिका) के मनोविज्ञान विभाग में हुए शोध से पता चला कि सोशल मीडिया के नये एप्स (स्नैपचैट, टिकटॉक, रील्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब-शार्ट) के कारण लोगों में बहुत कम समय में ज्यादा जानने की आदत से ध्यान केन्द्रित करने व सीखने में परेशानी के साथ जल्द बोरियत और धैर्य घट रहा है, हाल ये है कि अब मनोरंजन के वीडियो भी सेकेंडों में ही चाहिये, यदि पांच मिनट का वीडियो देखना पड़े तो फास्ट फॉरवर्ड करके देखते हैं। इन एप्स का असर एडीएचडी अर्थात अटेन्टशन डेफिसिट हाइपर एक्टीविटी डिस्ऑर्डर के रूप में सामने आया है, यह इतना व्यापक है कि 15 से 28 साल के 80 प्रतिशत सोशल मीडिया यूजर एडीएचडी से ग्रस्त हैं।

इससे जहां पढ़ने, सोचने, समझने और चिंतन-मनन की क्षमता घटी है वहीं व्यक्ति में अति-सक्रियता आने से वह बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में काम करने लगा है जिसका कैरियर और व्यक्तित्व पर नकारात्मक असर हो रहा है। याददाश्त इतनी कमजोर हो गयी है कि अब 6 डिजिट का ओटीपी भी याद नहीं होता बल्कि बार-बार देखकर फीड करना पड़ता है। सोशल मीडिया से पहले भी लोग एडीएचडी से पीड़ित थे लेकिन उस समय ये संख्या आज की तुलना में मात्र 7 प्रतिशत थी, आज यह संख्या दिनोदिन बढ़ रही है और स्कूल जाने वाले बच्चे इससे सबसे ज्यादा पीड़ित हैं।

क्या है एडीएचडी?

मनोविज्ञान में इस मानसिक बीमारी को अटेन्शन डेफिसिट हाइपर एक्टीविटी डिसआर्डर कहते हैं, इसकी वजह से व्यक्ति अतिसक्रियता (हाइपर एक्टिव) और आवेगी (इम्पल्सिव) हो जाता है, जल्द विचलित होने के साथ काम पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाता, न ज्यादा समय तक स्थिर रह पाता है। बात बीच में काटने या बातचीत में बाधा डालना इनकी आदत होती है।

बच्चों में एडीएचडी: 5 से 17 साल के 10 बच्चों में से कम से कम 1 बच्चा इससे पीड़ित है, यह बच्चों में पाया जाने वाला सबसे आम न्यूरोडेवलपमेंट डिसआर्डर है। इन बच्चों को सबसे ज्यादा परेशानी स्कूल में होती है, ये विषय पर ध्यान नहीं दे पाते व अतिसक्रियता के कारण इन्हें कंट्रोल करना मुश्किल होता है। इस मनोविकार की पुष्टि लड़कियों की अपेक्षा लड़कों में जल्द होती है क्योंकि लड़कों की प्रवृत्ति मनोभाव छिपाने के बजाय प्रकट करने की होती है। एडीएचडी पीड़ित लड़कियों में अतिसक्रियता के लक्षण कम होते हैं लेकिन वे डे-ड्रीमिंग यानी कल्पनालोक में खोयी रहती हैं और अतिसक्रिय के बजाय अति-बातूनी हो जाती हैं।

वयस्कों में एडीएचडी: एडीएचडी पीड़ित बच्चों में से 60 प्रतिशत को यह मनोरोग वयस्क होने पर भी रहता है, शेष 40 प्रतिशत में इसके लक्षण समय के साथ कम हो जाते हैं। यदि वयस्क होने पर भी इसके लक्षण हैं तो इलाज जरूरी है अन्यथा इसकी वजह से टाइम मैनेजमेंट में दिक्कत, चीजें याद न रहना और अधीरता जैसे लक्षणों का सामना करना पड़ता है।

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कितनी तरह की है ये बीमारी?

मनोचिकित्सकों के मुताबिक इसके तीन प्रकार हैं-

प्रिडोमिनेन्टिली इनअटेंटिव: इससे पीड़ित लोग ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते और न ही निर्देशों का सही ढंग से पालन, जिससे काम समय पर पूरा नहीं होता। एडीएचडी ग्रस्त बच्चा क्लास में पीछे शांत बैठा रहेगा और प्रयास करेगा कि वह किसी की नजरों में न आये या उसे कोई जिम्मेदारी न मिले। शोधों से पता चला है कि एडीएचडी के इस टाइप से लड़कों के बजाय लड़कियां ज्यादा प्रभावित होती हैं।

प्रिडोमिनेन्टिली हाइपरएक्टिव इम्पल्सिव: इससे पीड़ित लोग अति-सक्रिय और आवेगी होते हैं।  फिजूलखर्ची की आदत के अलावा कभी भी अपनी बारी का इंतजार नहीं करते, यदि लाइन में हैं तो लाइन तोड़कर आगे पहुंचने में लगे रहेंगे। बात बीच में काटना या बार-बार टोकना इनकी आदत होती है। ये काम पूरा नहीं कर पाते उसे बीच में अधूरा छोड़कर कुछ और करने लगते हैं।

कम्बाइंड हाइपरएक्टिव इम्पल्सिव एंड इनअटेन्टिव: यह एडीएचडी का सबसे कॉमन टाइप है, इसके पीड़ितों में असावधानी और अतिसक्रियता दोनों तरह के लक्षण होते हैं। इनमें काम पर ध्यान देने में असमर्थता के साथ आवेग की प्रवृत्ति सामान्य व्यक्ति से कई गुना अधिक होती है।

ये लक्षण उभरते हैं एडीएचडी में?

बच्चे हों या वयस्क एडीएचडी से पीड़ित होने पर ये लक्षण उभरते हैं-

अस्थिर बुद्धि: एडीएचडी का पहला लक्षण अस्थिर बुद्धि के रूप में प्रकट होता है जिसकी वजह से व्यक्ति किसी भी एक प्वाइंट पर फोकस नहीं कर पाता। ऐसे लोग जल्द विचलित होते हैं व दूसरों की बात सुनना पसन्द नहीं करते। डिटेलिंग को अनदेखा करने से ये काम ढंग से पूरा नहीं कर पाते।

हाइपर फोकस: कुछ लोग एडीएचडी से हाइपर फोकस का शिकार हो जाते हैं, वे किसी एक में इतने खो जाते हैं कि अपने आसपास के लोगों पर ध्यान नहीं दे पाते या उन्हें इग्नोर करते हैं, जिसका निगेटिव असर रिलेशनशिप पर पड़ता है।

संगठनात्मक कौशल और मोटीवेशन की कमी: संगठनात्मक कौशल की कमी से ये न तो कार्यों पर ट्रैक रख पाते हैं और न ही उन्हें तार्किक रूप से प्राथमिकता दे पाते। इनमें मोटीवेशन की कमी होती है जिसकी वजह से भविष्य में क्या करना चाहिये के बारे में सही ढंग से सोच नहीं पाते।

टाइम मैनेजमेंट में दिक्कत: टाइम मैनेजमेंट के सवाल पर ये इतने चिंतित हो जाते हैं कि समय सीमा के तहत किये जाने वाले कार्यों को अनदेखा करके उबाऊ मानने लगते हैं। इनके काम समय से पूरे नहीं होते और किसी मीटिंग या समारोह में भी समय से नहीं पहुंचते।

भूलने की बीमारी: ये नियमित रूप से चीजों को भूलने लगते हैं, इन्हें याद ही नहीं रहता कि कौन सी चीज कहां रखी थी, महत्वपूर्ण तिथियां भूल जाते हैं जिससे रिलेशनशिप में दिक्कतें होती हैं। जो यह नहीं जानते कि व्यक्ति एडीएचडी पीड़ित है वे इसे लापरवाही या दिमाग की कमी मानते हैं।

आवेग या इम्पल्सिविटी: एडीएचडी पीड़ितों में आवेग कई तरह से प्रकट होता है जैसेकि बातचीत के दौरान दूसरों को बाधित करना, कार्यों में जल्दबाजी, बिना परिणाम सोचे काम करना, जल्दबाजी में अपनी क्षमता से ज्यादा खर्च करके शॉपिंग करना इत्यादि।

इमोशनल कन्सर्न: इनमें भावनाओं का प्रवाह दूसरों से अधिक होता है जिससे ये जल्द ऊबकर कुछ नया तलाशने लगते हैं। छोटी-छोटी कुंठायें असहनीय लगने से डिप्रेशन में चले जाते हैं या इनकी मनोदशा में तेजी से बदलाव होते हैं।

निगेटिव सेल्फ इमेज: अपने बारे में हाइपर क्रिटकल से इनके दिमाग में खुद की नकारात्मक छवि बन जाती है। ऐसा आंशिक रूप से ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई के साथ संगठनात्मक कौशल और टाइम मैनेजमेंट में कमी जैसे लक्षणों से होता है,  एडीएचडी ग्रस्त वयस्क इन कमियों को व्यक्तिगत विफलताओं या कम उपलब्धि के रूप में देखते हैं।

बेचैनी और चिंता: दिमाग में चिंताजनक घटनायें लगातार चलने से ये बैचेन व चिंतित रहते हैं। इस सम्बन्ध में तुरन्त कुछ न कर पाने से तड़प और निराशा पैदा होती है जिसके लक्षण बार-बार घूमने या टहलने, हाथ पैर हिलाने या पटकने तथा फिजूलखर्ची के रूप में सामने आते हैं। ये एक जगह न बैठकर बार-बार जगह बदलते हैं।

थकान: यह आश्चर्यजनक लग सकता है लेकिन बेचैनी, अतिसक्रियता, नींद न आना और दवाओं के साइड इफेक्ट से एडीएचडी ग्रस्त लोग थके-थके रहते हैं जिससे इन्हें काम पर फोकस करने में  परेशानी होने लगती है।

स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही: सन 2013 में हुए शोध के मुताबिक ये अपने स्वास्थ्य के बारे में लापरवाह रहते हैं। ऐसा आवेग, मोटीवेशन की कमी, भावनात्मक चिंताओं और संगठनात्मक क्षमता में कमी से होता है। समय पर संतुलित भोजन न करने व जो भी मिल जाये उससे भूख मिटा लेने के साथ व्यायाम व जरूरी दवाओं की उपेक्षा और तनाव तथा चिंता का स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

रिलेशनशिप कन्सर्न: जीवन में व्यक्तिगत या कार्य सम्बन्धी उपलब्धियां होने के बाद भी एडीएचडी पीड़ितों को प्रोफेशनल, प्रेम-प्रंसग तथा आदर्शवादी रिश्ते निभाने में दिक्कतें होती हैं क्योंकि इनमें बीच में बात काटना, जल्दबाजी, लापरवाही और जल्द ऊबने जैसी आदतें होती हैं। डॉयवोर्स हो या कोई अन्य रिलेशनशिप कन्सर्न सभी में एक जैसा पैटर्न रहता है। ये एक जगह टिक नहीं पाते व जल्दी-जल्दी नौकरी बदलते हैं इसलिये इन्हें इन्सेन्सटिव, गैर जिम्मेदार तथा बेपरवाह माना जाता है।

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मादक द्रव्यों का सेवन: 2014 की एक शोध समीक्षा से पता चला कि एडीएचडी ग्रस्त वयस्कों में मादक द्रव्यों के सेवन की सम्भावना दूसरों की तुलना में अधिक होती है, ये शराब, तंबाकू तथा नशीली दवाओं का सेवन करने लगते हैं। एडीएचडी पीड़ित अपना इलाज खुद करने के चक्कर में मादक पदार्थों का उपयोग करते हैं, वे सोचते हैं कि ऐसा करने से फोकस, नींद में सुधार के साथ उन्हें चिंता से राहत मिलेगी।

कारण क्या हैं एडीएचडी के?

सोशल मीडिया के मकड़जाल से आज एडीएचडी एक आम समस्या है वैज्ञानिक इसे ऐसी न्यूरोलॉजिकल उत्पत्ति मानते हैं जिसमें जेनेटिक्स की अहम भूमिका है। डोपामाइन की कमी इसका बड़ा कारण है, दिमाग में बनने वाला डोपामाइन कैमिकल संकेतों को एक तन्त्रिका से दूसरी में ले जाता है जिससे भावनात्मक प्रतिक्रियायें और मूवमेंट ट्रिगर होते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि एडीएचडी के गम्भीर मरीजों की दिमागी संरचना दूसरों से भिन्न होने के कारण इनके दिमाग में ग्रे मैटर वाला भाग छोटा होता है, ग्रे मैटर वाला भाग ही स्पीच, आत्म-संयम, निर्णय लेने और मांसपेशियों के नियन्त्रण में अहम भूमिका निभाता है। स्टेनफोर्ड यूनीवर्सिटी (अमेरिका) के मनोविज्ञान विभाग में हुई रिसर्च से पता चला कि यदि महिला गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान करती रहे तो होने वाले बच्चे में एडीएचडी का रिस्क बहुत ज्यादा होता है।

एडीएचडी की पुष्टि कैसे?

इसकी पुष्टि के लिये डॉक्टर लक्षणों पर ध्यान देते हैं और पता करते हैं कि बीते छह माह में व्यक्ति की एक्टीविटीज क्या थीं। इस सम्बन्ध में परिवार के सदस्यों, स्कूल के अध्यापकों तथा साथ पढ़ने वाले छात्रों से जानकारी ली जाती है। इसके अलावा पीड़ित की फिजिकल जांच के साथ उसकी अन्य स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं की जांच होती है। यदि डॉक्टर को एडीएचडी का संदेह है तो वह पीड़ित को एडीएचडी विशेषज्ञ के पास भेजता है, यह विशेषज्ञ समस्या के हिसाब से मनोचिकित्सक या न्यूरोलॉजिस्ट में से कोई भी हो सकता है।

इलाज क्या है इसका?

माइल्ड केसों का इलाज बिहैवियरल थेरेपी है लेकिन गम्भीर अवस्था में दवाओं और थेरेपी दोनों की जरूरत पड़ती है। जहां तक थेरेपी की बात है तो मनोचिकित्सक बिहैवियरल, साइको या टॉक थेरेपी इस्तेमाल करते हैं। बिहैवियरल थेरेपी में माता पिता और बच्चे दोनों को सिखाते हैं कि बच्चे का व्यवहार मॉनीटर करके कैसे मैनेज किया जाये। इसमें व्यवस्थित रहना, प्लान पर डटे रहना तथा शुरू किये काम को फिनिश करना सिखाते हैं। इसके अलावा समय पर संतुलित भोजन, स्ट्रेस मैनेजमेंट व भरपूर नींद लेने की ट्रेनिंग तथा आत्म सम्मान की भावना बढाने पर काम किया जाता है।

दवाओं से ब्रेन कैमिकल अंसतुलन ठीक करते हैं, इस सम्बन्ध में सिमुलेन्ट और नॉन सिमुलेंट दवायें इस्तेमाल होती हैं। एडीएचडी मेडीकेशन से सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम सिमुलेट करते हैं, इस तरह की दवायें दिमाग में डोपामाइन और नॉरपेनफ्रिन जैसे कैमिकल्स बढ़ाती हैं, ऐसी दवाओं में रिटालिन और एम्फेटामाइन का इस्तेमाल सर्वाधिक है। जब ये दवायें काम नहीं करतीं या पीड़ित पर इसके साइड इफेक्ट नजर आते हैं तो डॉक्टर नॉनस्टिमुलेन्ट दवाओं से दिमाग में नॉरपेनफ्रिन का स्तर बढ़ाते हैं, ऐसे में प्रमुखता से प्रयोग की जाने वाली दवायें हैं स्ट्राटेरा और बूप्रोपियोन। यह याद रखें कि यदि इन दवाओं के फायदे हैं तो साइड इफेक्ट भी हैं। इसलिये इनका सेवन डॉक्टर के निर्देशानुसार ही करें व  अपनी मर्जी से न तो डोज परिवर्तित करें और न ही इन्हें बंद करें।

प्राकृतिक उपचार: खान-पान बदलें व बैलेंस तथा हेल्दी डाइट लें। रोजाना 60 मिनट व्यायाम करें और कम से कम सात घंटे की नींद लें। यदि नींद नहीं आ रही तो किताबें पढ़ने की आदत डालें। फोन, कम्प्यूटर और टीवी की स्क्रीन पर कम से कम समय बितायें। अध्ययनों से सामने आया है कि योगा, टाइ-ची और आउटडोर गतिविधियों में समय बिताने से इसके लक्षण कम होते हैं। मेडीटेशन इससे उबरने में मददगार है। जिन वस्तुओं से एलर्जी हो उनसे दूर रहें व एडिक्टिव खाने से बचें, ऐसा करने से इसके लक्षण कम होंगे।

क्या एडीएचडी अपंगता है?

एडीएचडी न्यूरोडेवलपमेन्टल डिसआर्डर है लेकिन इसे सीखने-समझने सम्बन्धी अपंगता नहीं माना गया है,  हालांकि एडीएचडी ग्रस्त होने से सीखना कठिन होता है लेकिन यह भी सम्भव है कि जिन लोगों को एडीएचडी है वे पहले से ही सीखने में असक्षम हों। जो बच्चे इसका शिकार होते हैं उनके शिक्षकों को चाहिये वे इन पर ज्यादा ध्यान दें, इनके लिये अलग से एसाइनमेंट और टेस्ट सिस्टम बनायें जिसमें अधिक समय दिया गया हो साथ ही व्यक्तिगत इनाम प्रणाली विकसित करें। वैसे तकनीकी  रूप से इसे विकलांगता नहीं माना गया है लेकिन व्यक्ति पर इसका असर जीवनभर रहता है।

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एडीएचडी और डिप्रेशन

इससे पीड़ित लोगों को डिप्रेशन का रिस्क सर्वाधिक होता है। बच्चों पर हुई रिसर्च में एडीएचडी से पीड़ित बच्चों में दूसरों की तुलना में डिप्रेशन के चांस पांच गुना अधिक पाये गये, इससे पीड़ित 31 प्रतिशत वयस्क डिप्रेशन के शिकार पाये गये। यदि व्यक्ति डिप्रेशन और एडीएचडी से पीड़ित है लेकिन इलाज केवल डिप्रेशन का हो रहा है तो यह दोनों से उबरने में मदद करता है। इलाज के रूप में इस्तेमाल की जा रही टॉक थेरेपी दोनों में मददगार है और एंटीडिप्रेशन दवायें जैसेकि बुप्रोपियन डिप्रेशन के साथ एडीएचडी ठीक करने में मदद करती है।

एडीएचडी के साथ जीवन

यदि आप या आपका बच्चा इससे पीड़ित है तो अपेक्षा आधारित स्ट्रक्चर वाला एक नियमित शेड्यूल बनायें। वयस्कों को चाहिये कि वे अपने दैनिक कार्यों की सूची बनायें और कलैन्डर तथा रिमाइंडर सेट करें,  इससे ऑर्गनाइज रहने में मदद मिलती है। बच्चों के लिए होमवर्क असाइनमेंट लिखने और रोज़मर्रा की वस्तुएं, जैसे खिलौने, बैकपैक्स इत्यादि को नियत स्थानों पर रखें इससे ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी। एक बात याद रखें कि चाहे बच्चे हों या वयस्क अगर एडीएचडी का इलाज न किया जाये तो जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, इससे पढ़ाई, काम और रिश्ते प्रभावित होते हैं लेकिन समय पर किया गया इलाज हालात सुधारने में मददगार है और देखा गया है कि इलाज के बाद एडीएचडी वाले बहुत से लोग पूर्ण और सफल जीवन का आनंद लेते हैं।

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