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सुन्न व चुभन माने संभव ब्रेन स्ट्रोक संकेत

अगर सुन्नता और चुभन के साथ चलने में दिक्कत या पैर ड्रैग करना, बेसुधी, बोलने में दिक्कत, दृष्टि में धुंधलाहट या न दिखाई देना, बॉउल और ब्लेडर पर नियन्त्रण खोना, कमजोरी या गम्भीर दर्द हो तो तुरन्त न्यूरोलॉजिस्ट से मिलें क्योंकि ये ब्रेन स्ट्रोक, हेमरेज या ब्रेन ट्यूमर का संकेत हो सकता है।…यदि ब्रेन में ब्लड सप्लाई शीघ्रता से रिस्टोर न हो तो ब्रेन स्थायी रूप से डैमेज हो जाता है जिसका परिणाम लकवा (पैरालिसिस), कोमा या मृत्यु के रूप में सामने आता है। हमारे देश में लकवाग्रस्त और कोमा में जाने वाले 87 प्रतिशत लोग इस्केमिक स्ट्रोक का शिकार होते हैं। Brain Stroke treatment symptoms

शरीर के किसी भाग का सुन्न पड़ जाना या उसमें चुभन (टिंगलिंग) जैसी संवेदनायें वैसे तो एक पोजिशिन में बैठने या अपनी बांह पर सोने से होती हैं लेकिन इनका बार बार होना किसी गम्भीर न्यूरो प्रॉब्लम  का संकेत हो सकता है। ये संवेदनायें ज्यादातर हाथों व पैरों में होती हैं। मेडिकल साइंस में इन्हें पेरेस्टेसिया कहते हैं। ये किन गम्भीर बीमारियों का संकेत हो सकती हैं इस बारे में सटीक जानकारी के लिये मैनें देश के सुप्रसिद्ध न्यूरोइंटरवेंशनल सर्जरी विशेषज्ञ डा गौरव गोयल (डायरेक्टर एंव हैड इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस में न्यूरोइंटरवेंशनल सर्जरी, मेदान्ता-द मेडीसिटी, गुरूग्राम (हरियाणा)) से बात की तो उन्होंने बताया कि-

आमतौर पर ऐसी संवेदनायें एक स्थिति में देर तक बैठने या एक करवट सोने के अलावा किसी कीड़े के काटने, टॉक्सिक सीफूड, शरीर में विटामिन बी-12/पोटेशियम/कैल्शियम/सोडियम के असामान्य स्तर, जोस्टर वायरस चिकनपॉक्स (शिंगल्स), रेडियेशन थेरेपी या कीमोथेरेपी जैसे मेडीकेशन से होती हैं। कुछ बीमारियां जैसे न्यूरोपैथी, डॉयबिटीज, माइग्रेन, रेनॉड्स फिनोमिना, मल्टीपल स्कलेरोसिस, सीजर्स, सख्त आर्टरी और अंडरएक्टिव थॉयराइड में भी सुन्नता और चुभन जैसे लक्षण महसूस होते हैं।

चिंताजनक स्थिति तब बनती है जब सुन्नता और चुभन का कारण न्यूरो यानी नर्व रिलेटिड समस्या हो,  ऐसा अक्सर गर्दन की नर्व या स्पाइन में मौजूद हेरिनियेटिड डिस्क इंजरी, ब्रेन ट्यूमर, ब्रेन हेमरेज की ब्लीडिंग से हुई दिमागी सूजन या स्पाइन की सूजन से होता है। नर्व दबने से सुन्नता और चुभन महसूस होती है, कई मामलों में देखा गया है कि इस तरह का दबाव कारपल टनल सिंड्रोम, स्कार टिश्यू, इन्लार्ज ब्लड वेसल्स तथा इंफेक्शन से भी पड़ता है।

अगर सुन्नता और चुभन के साथ चलने में दिक्कत या पैर ड्रैग करना, बेसुधी, बोलने में दिक्कत, दृष्टि में धुंधलाहट या न दिखाई देना, बॉउल और ब्लेडर पर नियन्त्रण खोना, कमजोरी या गम्भीर दर्द हो तो तुरन्त न्यूरोलॉजिस्ट से मिलें क्योंकि ये ब्रेन स्ट्रोक, हेमरेज या ब्रेन ट्यूमर का संकेत हो सकता है।

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ब्रेन स्ट्रोक: ब्रेन स्ट्रोक (ब्रेन इस्कीमिया या सेरिब्रल इस्कीमिया) के बारे में बात करते हुए डॉ गोयल ने बताया कि नसों में ब्लॉकेज के कारण दिमाग (ब्रेन) को खून की सप्लाई रूकती है तो दिमाग में ऑक्सीजन न पहुंचने से ब्रेन सेल्स मरने लगते हैं। दिमाग के जिस हिस्से की ब्लड सप्लाई बाधित होती है उस हिस्से से कंट्रोल होने वाले अंग काम करना बंद कर देते हैं। दिमाग के दायें भाग की ब्लड सप्लाई बंद होने पर शरीर का बायां और बायें भाग की ब्लड सप्लाई बंद होने पर दाहिना भाग प्रभावित होता है। ऐसे में यदि ब्रेन में ब्लड सप्लाई शीघ्रता से रिस्टोर न हो तो ब्रेन स्थायी रूप से डैमेज हो जाता है जिसका परिणाम लकवा (पैरालिसिस), कोमा या मृत्यु के रूप में सामने आता है। हमारे देश में लकवाग्रस्त और कोमा में जाने वाले 87 प्रतिशत लोग इस्केमिक स्ट्रोक का शिकार होते हैं। ब्रेन स्ट्रोक तीन तरह के होते हैं- इस्केमिक, हेमरेज और ट्रांसियेंट इस्केमिक अटैक।

इस्केमिक स्ट्रोक का सबसे गम्भीर रूप ग्लोबल इस्केमिया है, इसमें दिमाग में आक्सीजन सप्लाई पूरी तरह रूक जाती है कई बार इसका कारण हार्ट अटैक होता है। इसके अलावा यदि व्यक्ति ज्यादा देर तक कार्बन मोनोआक्साइट के सम्पर्क में रहे तो भी ग्लोबल इस्कीमिया की स्थिति बनती है।

रक्त प्रवाह में रूकावट या तेजी से होने वाला परिवर्तन इस्केमिक स्ट्रोक का कारण है जैसेकि हाई ब्लड प्रेशर, अथेरोस्क्लेरोसिस (सख्त धमनियां), कोलोस्ट्रोल बढ़ना, क्लॉटिंग, कॉन्जेनियल हार्ट डिफेक्ट, एरिदमिया, सिकल सेल एनीमिया, मोटापा, डायबिटीज, स्मोकिंग, बहुत ज्यादा शराब पीना, कोकीन या मेथाम्फेटामाइन जैसे ड्रग लेना। कुछ मामलों में इस्केमिक स्ट्रोक जेनेटिक कारणों से होता है, पुरूषों को महिलाओं की अपेक्षा स्ट्रोक के चांस ज्यादा हैं, उम्र बढ़ने के साथ यह खतरा और भी बढ़ जाता है।

मरीज पर स्ट्रोक के लक्षण इस बात पर निर्भर हैं कि स्ट्रोक से दिमाग का कौन सा हिस्सा प्रभावित हुआ है इस्केमिक स्ट्रोक के ये लक्षण सभी मामलों में कॉमन होते हैं-

– देखने की क्षमता का प्रभावित होना या डबल विजन।

– शरीर के ऊपरी अंगो में कमजोरी, यह कमजोरी एक तरफ या दोनों तरफ भी हो सकती है।

– चक्कर आना, सिर घूमना या भ्रमित होना।

– सिर में अचानक अहसनीय दर्द और नाक से खून आना।

– अंगो का तालमेल खत्म या कम होना व रिस्ट (कलाई) या फुट (पैर) ड्रॉप होना।

– चेहरा एक ओर लटकना और कुल्ला करने में परेशानी।

ब्रेन हेमरेज:जब दिमाग में नस फटने से होने वाली ब्लीडिंग को ब्रेन ब्लीडिंग या इंट्राक्रेनियल हेमरेज कहते हैं। यह मेडिकल इमरजेंसी है इसमें तुरन्त मेडिकल सहायता की जरूरत होती है, इलाज में देरी से मरीज कोमा में या उसकी जान भी जा सकती है। ब्रेन ब्लीडिंग में ऑक्सीजन सप्लाई रूकने से दिमाग के अंदरूनी भाग में सूजन आती है इसे सेरेब्रेल एडीमा कहते हैं। दिमाग में बहा खून हेमेटोमा के रूप में जमा होता है जिसका अतिरिक्त दबाब ऑक्सीजन को दिमाग के अंदरूनी भागों में जाने से रोकता है और परिणाम है मृत्यु। यदि ब्रेन हेमरेज के कारणों की बात करें तो यह हैड इंजरी, हाई ब्लड प्रेशर, ब्लड वेसल्स में खराबी, ट्यूमर और सेरेब्रल एन्यूरिज्म से होता है। इसके लक्षण सुन्नता, चुभन, सीजर्स, अचानक तेज  सिरदर्द, खाना निगलने में दिक्कत, डबल विजन, बैलेंस खोना, बोलने में लड़खड़ाहट और बेसुधी के रूप में उभरते हैं।

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ब्रेन हेमरेज से पैरालिसिस, शरीर के किसी भाग में सुन्नता, दृष्टि चले जाना, मेमोरी लॉस, बात करने में दिक्कत और व्यक्तित्व में परिवर्तन हो सकता है। ब्रेन हेमरेज के मामलों में सर्जरी से दिमाग पर पड़ने वाला दबाब कम किया जाता है, वर्तमान में इसका इलाज न्यूरोइंटरवेंशन सर्जरी से होता है जिसमें सफलता के चांस 99 प्रतिशत हैं लेकिन इसके लिये मरीज का समय पर अस्पताल पहुंचना जरूरी है।

ब्रेन ट्यूटर: ट्यूटर वास्तव में असामान्य कोशिकाओं की गांठ है जो स्कल (खोपड़ी) के अंदर पनपती है, ऐसी सीमित जगह पर किसी भी तरह की असामान्य ग्रोथ बड़ी समस्या है। ब्रेन ट्यूमर, कैंसरस और नॉन कैंसरस (बिनाइन) दोनों तरह का होता है और ये दोनों ही खतरनाक हैं। जब नॉन कैंसरस ट्यूमर बड़ा होता है तो खोपड़ी के अंदरूनी भाग पर दबाब पड़ने से ब्रेन डैमेज के चांस बनते हैं जो जानलेवा  है। हमारे देश में प्रतिवर्ष इसके कई लाख मामले दर्ज होते हैं। ब्रेन ट्यूमर के 95 प्रतिशत मामलों में सर्जरी की जरूरत पड़ती है वर्तमान में यह कार्य नॉन इंटरवेन्शनल (बिना चीर-फाड़) के आसानी से किया जाता है। केवल बिनाइन ट्यूमर के उन मामलों में सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती जिनमें ट्यूमर की लोकेशन ब्रेन के लिये खतरनाक न हो।

ब्रेन ट्यूमर के दो टाइप हैं प्राइमरी और सेकेंडरी। प्राइमरी ट्यूमर दिमाग में पनपता है और ज्यादातर नॉन कैंसरस (बिनाइन) होता है। सकेंडरी ब्रेन ट्यूमर या मेटास्टेटिक ट्यूमर कैंसरस होता है यह शरीर के किसी अन्य भाग में पनपकर दिमाग में प्रवेश करता है।

मरीज पर ब्रेन ट्यूमर के लक्षण दिमाग में उसकी लोकेशन या आकार पर निर्भर हैं। कुछ ट्यूमर सीधे-सीधे ब्रेन टिश्यू डैमेज करते हैं और कुछ दिमाग में दबाब बनाते हैं। शरीर पर ब्रेन ट्यूमर के लक्षण दिमाग पर दबाब पड़ने से नजर आते हैं। पहला लक्षण सिरदर्द है, जो सुबह उठने पर  ज्यादा व सोते, खांसते, छींकते या व्यायाम करते समय बढ़ता है। इसके अलावा उल्टी, धुंधला दिखाई देना, भ्रमित रहना, सीजर्स, चेहरे के एक भाग में कमजोरी और दिमाग के फंक्शनों में बदलाव इसके अन्य लक्षण हैं।

ब्रेन ट्यूमर बढ़ने पर चेहरे पर भद्दापन, मेमोरी लॉस, लिखने-पढ़ने में परेशानी, सुनने, निगलने, स्वाद लेने और सूंघने में दिक्कत, चुस्ती-फुर्ती में कमी, वर्टिगों, पलकें उठाने में परेशानी, आंखों की पुतलियों का क्वार्डीनेशन बिगड़ना, हाथ कांपना, बैलेंस बिगड़ना, शरीर के किसी हिस्से का सुन्नता या चुभन, चलने में दिक्कत और चेहरे, भुजाओं तथा टांगों की मांसपेशियों में कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

खतरे की पुष्टि कैसे?

ये लक्षण सामान्य हैं या किसी गम्भीर बीमारी का संकेत, जानने के लिये मरीज की शारीरिक और मेडिकल हिस्ट्री की जांच की जाती हैं,  स्ट्रोक का संदेह होने पर हाथ की उंगलियों का ग्रिप, क्वार्डीनेशन और सेन्सेशन टेस्ट किया जाता है। मरीज के अंगों में क्वार्डीनेशन समाप्त होना, बाजुओं और पैरों में कमजोरी, ग्रिप खराब होने या बोलने में परेशानी से काफी हद तक पक्का हो जाता है कि मामला इस्केमिक स्ट्रोक का है। पुष्टि के लिये सिर (कपाल) का सीटी स्कैन करते हैं, सीटी स्कैन में खून का रिसाव या थक्के दिखाई देने का अर्थ ब्रेन हेमरेज है। कई बार यह स्थिति ब्रेन ट्यूमर से भी होती है लेकिन सीटी स्कैन से ब्रेन ट्यूमर का पता लग जाता है।

ब्रेन में ब्लीडिंग न होने का मतलब इस्केमिक स्ट्रोक है, ऐसे में एमआरआई से दिमाग में क्लॉट की सही पोजीशन पता चलती है। ब्लड क्लॉटिंग का कारण जानने के लिये इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम,  ईको-कार्डियोग्राफी, एंजियोग्राफी के अलावा कुछ ब्लड टेस्ट किये जाते हैं।

रिकवरी में समय कितना?

स्ट्रोक, हेमरेज या ट्यूमर के इलाज के लिये मरीज को अस्पताल में पांच दिन से सात दिन तक डाक्टरों की निगरानी में रहना पड़ता है (यदि मरीज की सर्जरी इन्टरवेन्शन तरीके से हुई है) वैसे यह मरीज की कंडीशन और सर्जरी के मैथड पर निर्भर है। इलाज के बाद प्रभावित अंगों को फिर काम लायक बनाने के लिये फिजियोथ्रेपी होती है। फिजियोथ्रेपी कितने दिन चलेगी यह स्ट्रोक से खराब हुए अंग की दशा पर है, ये अवधि एक से छह महीने तक की हो सकती है। फिजियोथ्रेपी अंगों का क्वार्डीनेशन ठीक करने का कारगर उपाय है, यह दवाओं जितनी ही जरूरी है। फिजियोथ्रेपिस्ट द्वारा बतायी एक्सरसाइज मरीज जितनी बार दोहरायेगा उतनी जल्द रिकवरी होगी।

क्या सावधानियां जरूरी?

ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर कंट्रोल रखें, समय-समय पर हेल्थ चैकअप करायें जिससे खून में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइगिलिसराइड का स्तर पता चलता रहे, अगर ये रेंज से बाहर हैं तो डाक्टर से परामर्श करें। तैलीय भोजन, लाल मांस (मीट) और कोलोस्ट्रॉल बढ़ाने वाले पदार्थों का सेवन बंद करें। यदि कोई हार्ट डिसीस (वाल्व में खराबी या दिल की असामान्य धड़कन) तो जल्द से जल्द इलाज करायें।

खाने में नमक-चीनी की मात्रा कम करें, वजन न बढ़ने दें व नियमित व्यायाम करें, मेडीटेशन या प्राणायाम से स्ट्रेस कम करें, पानी खूब पियें जिससे शरीर हाइड्रेट रहे, स्मोकिंग और शराब छोड़ें।

यदि स्ट्रोक आया है तो भविष्य में दूसरा स्ट्रोक आने की सम्भावना भी रहती है। भविष्य में ऐसा न हो इसके लिये डाक्टर द्वारा लिखी दवायें समय पर लें और इन्हें बिना डाक्टर की अनुमति के बंद न करें। यदि एक बार स्ट्रोक आ चुका है तो हाई आल्टीट्यूड और कम ऑक्सीजन वाले क्षेत्रों में जाने से बचें। यदि फिर से बार-बार सुन्नता और चुभन महसूस हो तो तुरन्त न्यूरोलॉजिस्ट से मिलें।

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