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फोबिया: डरे होने की मानसिक बीमारी!

Phobia The mental illness

मनोविज्ञान के मुताबिक फोबिया एक तरह का एंग्जायटी डिसऑर्डर है जिसके कारण व्यक्ति किसी सिचुएशन, जीवित प्राणी, जगह या वस्तु के बारे में अवास्तविक-तर्कहीन भय अनुभव करता है वह भी एक्सट्रीम में। फोबिया पीड़ित अपने जीवन को काल्पनिक खतरों से बचाते हैं, ये खतरा चाहे किसी वस्तु से हो या किसी स्थिति से। इनके लिये ये खतरा किसी वास्तविक खतरे से बहुत बड़ा होता है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि फोबिया एक अतिरंजित तर्कहीन भय है। Phobia The mental illness

आधुनिक वक्त में फोबिया शब्द बहुत कॉमन है। अक्सर सुनने में आता है कि फलां व्यक्ति को फलां फोबिया है, लेकिन कम लोग ही फोबिया की वास्तविकता से परिचित होते हैं। मनोविज्ञान के मुताबिक फोबिया एक तरह का एंग्जायटी डिसऑर्डर है जिसके कारण व्यक्ति किसी सिचुएशन, जीवित प्राणी, जगह या वस्तु के बारे में अवास्तविक-तर्कहीन भय अनुभव करता है वह भी एक्सट्रीम में। फोबिया पीड़ित अपने जीवन को काल्पनिक खतरों से बचाते हैं, ये खतरा चाहे किसी वस्तु से हो या किसी स्थिति से। इनके लिये ये खतरा किसी वास्तविक खतरे से बहुत बड़ा होता है। उदाहरण के लिये यदि कोई लिफ्ट में जाने से डरता है तो वह इस डर से सौ सीढ़ियां चढ़ लेगा लेकिन लिफ्ट इस्तेमाल नहीं करेगा। यदि उसे लिफ्ट इस्तेमाल के लिये मजबूर किया जाये तो दिल की धड़कन बढ़ जायेगी, पसीना आयेगा, चीखेगा-चिल्लायेगा और यह भी हो सकता है कि कपड़ों में पेशाब निकल जाये।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि फोबिया एक अतिरंजित तर्कहीन भय है। “फोबिया” शब्द का प्रयोग किसी विशेष कारक से ट्रिगर होने वाले डर को संदर्भित करने के लिए किया जाता है। अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन (एपीए) के अनुसार फोबिया तीन तरह का होता है-

स्पेसिफिक फोबिया: यह किसी स्पष्ट कारण से ट्रिगर होने वाला तीव्र-तर्कहीन भय है। इसे साधारण फोबिया मानते हैं और यह जीवन को तब तक प्रभावित नहीं करता जब तक पीड़ित के सामने फोबिया का स्पष्ट कारण न आ जाये। उदाहरण के लिये यदि किसी को सांप से फोबिया है तो उसके जीवन पर तब तक इसका कोई असर नहीं होगा जब तक कि उसका सामना सांप से न हो। 

सोशल फोबिया या सोशल एंग्जॉयटी: इससे पीड़ित व्यक्ति को अपनी सामाजिक स्थिति की वजह से सार्वजनिक अपमान का भय रहता है जिससे कारण वह सामाजिक समारोहों में जाने के नाम से अंदर ही अंदर तीव्र भय महसूस करता है। यहां समझने वाली बात यह है कि उसे सामाजिक समारोह अटैंड करने में शर्म नहीं बल्कि डर लगता है।

एगोराफोबिया: फोबिया के लिये इस्तेमाल होने वाली यह अम्ब्रेला टर्म है, इससे पीड़ित व्यक्ति को आमतौर पर सार्वजनिक स्थानों या बंद जगहों (लिफ्ट, एलीवेटर या पब्लिक ट्रांसपोर्ट) पर जाने में तीव्र भय महसूस होता है। एगोराफोबिया पीड़ित अक्सर पैनिक डिस्आर्डर का शिकार हो जाते हैं।

सोशल और एगोरा, कॉम्प्लेक्स श्रेणी का फोबिया है क्योंकि इनके ट्रिगर होने कारण एक से ज्यादा होता है। सही कारण स्पष्ट न होने से कॉम्प्लेक्स फोबिया पीड़ितों के लिये इससे बचना मुश्किल होता है।

व्यक्ति में फोबिया का पता तब चलता है जब वह अपने डर के कारण से बचने के लिये जीवन को ऑर्गनाइज करना शुरू कर देता है। फोबिया सामान्य भय के लिये होने वाली प्रतिक्रिया से ज्यादा गम्भीर मामला है इसलिये फोबिया पीड़ितों को उन स्थितियों या वस्तुओं से बचना चाहिये जिनसे उनमें एंग्जॉयटी ट्रिगर होती हो।

क्या लक्षण उभरते हैं फोबिया में?

भय के स्रोत के संपर्क में आने पर अन्कंट्रोल्ड चिंता की अनुभूति, डर के स्रोत से हर कीमत पर बचना, स्रोत के संपर्क में आने पर ठीक से काम न कर पाना, यह जानते हुए भी कि भय तर्कहीन और अतिरंजित है फिर भी भावनाओं को कंट्रोल करने में असमर्थता।

भय के स्रोत के सम्पर्क में आने पर ये शारीरिक लक्षण उभरते हैं-

पसीना आना, असामान्य श्वास, धड़कन तेज होना, कपकपी, गर्मी या ठंड महसूस होना, सीने में दर्द या जकड़न, मुंह सूखना, भ्रम और भटकाव, जी मिचलाना, सिर चकराना, सिरदर्द, पेट में गुड़गुड़ होना इत्यादि।

जिस वस्तु या स्थिति से फोबिया हो उसके बारे में सोचकर एंग्जॉयटी होने लगती है। यदि छोटे बच्चों को फोबिया है तो वे ज्यादा रोने के अलावा सहम जाते हैं, माता-पिता से चिपके रहते हैं, उनके पीछे छिपने का प्रयास करते हैं और अपनी व्यथा दिखाने के लिये तरह-तरह की हरकतें करते हैं।  

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कॉम्प्लेक्स फोबिया, व्यक्ति को किसी एक फोबिया की तुलना में अधिक प्रभावित करता है। उदाहरण के लिये एगोराफोबिया से ग्रस्त व्यक्ति और भी कई तरह के फोबिया से ग्रस्त हो सकता है जैसेकि मोनोफोबिया यानी अकेले रहने का डर और क्लॉस्ट्रोफोबिया यानी बंद जगहों में फंसने का डर इत्यादि। एगोराफोबिया की गम्भीर स्थिति में लोग अपने घर से निकलना ही बंद कर देते हैं।

फोबिया कितनी तरह का?

वैसे तो फोबिया के सैकड़ों टाइप हैं लेकिन जिनसे ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं वे हैं-

क्लौस्ट्रफ़ोबिया: संकुचित, सीमित स्थानों में जाने से डरना, ऐसे लोग लिफ्ट या छोटी बंद जगहों से जाने से घबराते हैं।

एरोफोबिया: इससे ग्रस्त लोग हवाई सफर से डरते हैं। गुजरे जमाने के मशहूर फिल्म अभिनेता मनोज कुमार इससे पीड़ित थे और इसी डर से उन्होंने हमेशा रेल से सफर किया, केवल एक बार हवाई यात्रा की वह भी फिल्म पूरब और पश्चिम की शूटिंग हेतु इंग्लैड जाने के लिये, नींद की गोलियां खाकर।

अरकोनोफोबिया: इससे ग्रस्त व्यक्तियों को मकड़ियों से डर लगता है।

ड्राइविंग फोबिया: इससे ग्रस्त व्यक्ति कार, बस, ट्रक जैसे वाहन चलाने से डरता है।

इमेटोफोबिया: पीड़ित को हमेशा डर रहता है कि उसे उल्टी होने वाली है, यदि वह किसी को उल्टी करता देख लें तो तुरन्त उसे तुरन्त उल्टी हो जायेगी और वह कांपने लगेगा।

हाइपोकॉन्ड्रिया: पीड़ित को हमेशा डर रहता है कि वह बीमार हो जायेगा, व्यक्ति के सामने किसी अन्य की बीमारी का जिक्र करने मात्र से वह खुद को बीमार समझने लगता है।

ज़ूफोबिया: इसमें व्यक्ति जानवरों से डरता है और इस वजह से कभी भी चिड़ियाघर (जू) नहीं जाता।

एक्वाफोबिया: इसमें व्यक्ति पानी के नजदीक जाने से डरता है और कभी भी तैरने के बारे में नहीं  सोचता, यदि उसे तैरने के लिये कहा जाये तो वह वहां से भागने की कोशिश करने लगता है।

एक्रोफोबिया: इसमें व्यक्ति ऊंचाई से डरता है, यदि उसे किसी ऊंची जगह से नीचे देखना पड़े तो उसकी हालत खराब हो जाती है।

रक्त, चोट और इंजेक्शन (बीआईआई) फोबिया: पीड़ित, चोट या खून देखकर बुरी तरह घबरा जाता है, उसे   इंजेक्शन से इतना डर लगता है कि वह इंजेक्शन लगवाते समय चीखऩे-चिल्लाने या रोने लगता है।

मनोविज्ञान के अनुसार समय और तकनीक बदलने के साथ नये-नये फोबिया विकसित होते हैं, उदाहरण के लिये आजकल एक नया फोबिया सामने आया है जिसे नोमोफोबिया कहते हैं। इससे पीड़ित व्यक्तियों को अपने पास हमेशा सेलफोन या कंप्यूटर चाहिये, यदि उन्हें ये चीजें न मिलें तो उनकी धड़कन तेज हो जाती है, पसीना आने लगता है और वे असुरक्षित महसूस करते हैं।

क्यों होता है फोबिया?

फोबिया की शुरूआत बचपन, किशोरावस्था या शुरूआती वयस्कता में होती है ऐसे बहुत कम मामले हैं जिनमें 30 की उम्र के बाद लोग फोबिया ग्रस्त हुए हों। जहां तक कारणों की बात है तो यह किसी तनावपूर्ण अनुभव या भयावह घटना की वजह से होता है। 

स्पेसीफिक फोबिया 4 से 8 साल की उम्र के दौरान विकसित होता है। उदाहरण के लिये छोटे बच्चे जब माता-पिता की बात नहीं मानते तो उन्हें किसी कमरे या छोटे स्थान पर बंद कर दिया जाता है, ऐसे बच्चे अक्सर क्लॉस्ट्रोफोबिया का शिकार हो जाते हैं। बचपन में शुरू होने वाला फोबिया परिवार के किसी सदस्य के फोबियाग्रस्त होने से भी होता है, उदाहरण के लिए, यदि माँ को अरकोनोफोबिया है, तो बच्चे में भी इसकी सम्भावना बढ़ जाती है।

कॉम्पलेक्स फोबिया जीवन के डरावने अनुभव, मस्तिष्क रसायनों में उतार-चढ़ाव और आनुवंशिकी का संयोजन होता है, ये बचपन की यादों और आदतों की प्रतिध्वनि भी हो सकते हैं, यदि किसी ने बचपन में अधिक खतरा महसूस किया है और आज सुरक्षित माहौल में है तो भी पुरानी यादें और खतरे से निपटने की आदतें उसके जहन में रहती हैं जो फोबिया का कारण बनती हैं।

जीवन में घटी खतरनाक और घातक घटनायें मस्तिष्क के विशेष भागों में संग्रहित रहती हैं, फोबिया की स्थिति तब बनती है जब व्यक्ति जीवन में कभी भी उसी तरह की घटना का सामना करता है मस्तिष्क के ये क्षेत्र पहले से स्टोर तनावपूर्ण स्मृति को पुनः ताजा कर देते हैं और कभी-कभी एक से अधिक बार। फोबिया में दिमाग के वे क्षेत्र जो भय या स्ट्रेस से निपटते हैं, वे ही अतीत में घट चुकी भयावह घटना के समय दी गयी प्रतिक्रियायों को दोहराने लगते हैं।

शोध से पता चला कि फोबिया का सम्बन्ध दिमाग में पिट्यूटरी ग्रंथि के पीछे स्थित एमिग्डाला से होता है। एमिग्डाला द्वारा फाइट या फ्लाइट (लड़ो या भागो) वाली स्थिति के हारमोन रिलीज करने से दिमाग और शरीर अत्यधिक एलर्ट तथा तनावपूर्ण स्थिति में आ जाते हैं जिससे व्यक्ति का रियेक्शन  असामान्य हो जाता है।  

इलाज क्या है इसका?

किसी भी तरह का फोबिया हो इलाज से ठीक हो जाता है। इलाज का पहला कदम है मनोचिकित्सक से बात करना जिससे वह फोबिया की सही पहचान कर सकें। इलाज किसी एक दवा से होगा यह जरूरी नहीं है, कई बार एक से ज्यादा दवाओं और थेरेपी के संयोजन से इलाज किया जाता है। थेरेपी में लोगों को सिखाते हैं कि भय और चिंता के लक्षणों को कैसे कम किया जाये और जिन वस्तुओं या स्थितियों से उन्हें फोबिया है वे उनके प्रति अपनी प्रतिक्रियायें कैसे मैनेज करें।

फोबिया के इलाज में शारीरिक लक्षणों को कंट्रोल करने के लिये बीटा ब्लॉकर और दिमाग को शांत रखने के लिये एंटीडिप्रेसन्ट दिये जाते हैं।  

एंटीडिप्रेसन्ट के रूप में सेरोटोनिन रीपटेक इनहिबिॉटर इस्तेमाल होते हैं ये मस्तिष्क में सेरोटोनिन के स्तर ठीक रखते हैं जिससे मूड अच्छा हो जाता है। सोशल एंग्जॉयटी के लिए मोनोमाइन ऑक्सीडेज इनहिबिटर और ट्राईसाइक्लिक एंटीडिप्रेसेंट (क्लोमीप्रामाइन/एनाफ्रेनिल) दिये जाते हैं। ज्यादा गम्भीर मामलों में ट्रैंक्विलाइज़र देते हैं जैसेकि बेंजोडायजेपाइन। ये चिंता (एंग्जॉयटी) कम करता है लेकिन एल्कोहलिक लोगों पर इसका प्रयोग वर्जित है। एफडीए ने इसके इस्तेमाल को लेकर चेतावनी जारी की है कि ऐसी दवाओं पर शारीरिक निर्भरता बढ़ती है जो बाद में जीवन के लिए खतरा हो सकती है। इनका शराब, ओपिओइड और अन्य पदार्थों के साथ सेवन करने से मृत्यु हो सकती है।

डिसेन्सिटाइजेशन या एक्सपोजर थेरेपी: यह डर के स्रोत के प्रति प्रतिक्रिया बदलने में मदद करती है। इसमें मरीज को स्टेप-बाइ-स्टेप ट्रेनिंग दी जाती है कि फोबिया का सामना कैसे किया जाये।  एरोफोबिया का डर कम करने के लिये चिकित्सक पहले उड़ने के बारे में सोचने के लिये कहता है, इसके बाद विमानों की तस्वीरें दिखाता है। जब व्यक्ति को इनसे परेशानी नहीं होती तो मरीज तो किसी के साथ हवाई अड्डे ले जाते हैं। यह क्रिया तब तक करते हैं जब तक मरीज हवाई अड्डे से डरना न बंद कर दे। इसके बाद इसे एक नकली हवाई जहाज के केबिन में बिठाते हैं। यदि यहां उसका व्यवहार सामान्य है तो आखिरी स्टेप में असली विमान में बिठाते हैं, इस तरह से उसका डर दूर हो जाता है।

संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (सीबीटी): इसमें मनोचिकित्सक मरीज को फोबिया के स्रोत को समझने और प्रतिक्रिया देने के विभिन्न तरीकों, भावनाओं और विचारों को नियंत्रित करना सिखाते हैं।

नजरिया

सभी तरह का फोबिया हो इलाज से ठीक हो जाता है। यदि किसी दोस्त या प्रियजन को फोबिया है तो उसका मजाक उड़ाने के बजाय उसकी मदद करें। स्पेसिफिक फोबिया के मामले में दोस्त और परिवार वाले भी मदद कर सकते हैं लेकिन कॉम्प्लेक्स फोबिया होने पर मनोचिकित्सक से परामर्श जरूरी है। फोबिया पीड़ितों को कभी भी अपनी समस्या के सम्बन्ध में मदद मांगने से हिचकना नहीं चाहिये। इस सम्बन्ध में वे अपने दोस्तों और परिवारों को खुलकर बतायें तो उनका जीवन बेहतर हो सकता है।

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