Psychiatrist Psychopathy and Sociopath मनोविकारी, साइकोपैथी और सोशियोपैथ
गेस्ट कॉलम | लाइफ स्टाइल | जीवन मंत्र| नया इंडिया| Psychiatrist Psychopathy and Sociopath मनोविकारी, साइकोपैथी और सोशियोपैथ

मनोविकारी, साइकोपैथी और सोशियोपैथ

Psychiatrist Psychopathy and Sociopath

मनोविज्ञान में साइकोपैथी, दिमागी बीमारी न होकर पर्सनॉल्टी (व्यक्तित्व) से जुड़ा विकार है जिसे एएसपीडी यानी एंटीसोशल पर्सनॉल्टी डिस्आर्डर कहते हैं, इससे पीड़ित लोग साइकोपैथ कहलाते हैं। लोग साइकोपैथ और सोशियोपैथ को एक मानते हैं लेकिन मेडिकली ये दोनों अलग हैं। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक सोशियोपैथ व्यक्ति में पाये जाने वाले असामाजिक लक्षण, सामाजिक और आसपास के वातावरण से जुड़े कारकों पर आधारित होते हैं जबकि साइकोपैथी के लक्षण जन्मजात या स्वभाविक होते हैं। Psychiatrist Psychopathy and Sociopath

साइकोपैथ के बारे में आम धारणा है कि वह किसी दिमागी बीमारी से पीड़ित एकान्त में रहनेवाला,  रहस्यमयी, सनकी, अर्ध-पागल व्यक्ति होगा जो पूरी तरह गलत है। मनोविज्ञान में साइकोपैथी, दिमागी बीमारी न होकर पर्सनॉल्टी (व्यक्तित्व) से जुड़ा विकार है जिसे एएसपीडी यानी एंटीसोशल पर्सनॉल्टी डिस्आर्डर कहते हैं, इससे पीड़ित लोग साइकोपैथ कहलाते हैं। ये चालाक, स्वार्थी, झूठे, अंहकारी, कृतघ्न, असंवेदनशील, गैर-जिम्मेदार, जोड़-तोड़ में माहिर व सामाजिक नियमों की परवाह नहीं करते, मन मुताबिक बात न होने पर दूसरों को अपमानित करने लगते हैं। इनमें दूसरों को चोट पहुँचाना, हर जगह खुद को आगे रखना, सही-गलत में अंतर न करना, गलती पता चलने पर पछतावा नहीं, सहानुभूति जताने में दिक्कत और लापरवाही जैसे लक्षण होते हैं।

वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में महिलाओं की तुलना में साइकोपैथिक  पुरूषों की संख्या अधिक है और सामान्य लोगों की तुलना में इनकी मृत्युदर ज्यादा। मनोविज्ञान में साइकोपैथ दो तरह के हैं- एक तो वे जिन्हें कभी कोई चिंता नहीं होती, इन्हें प्राइमरी साइकोपैथ कहते हैं, ऐसे लोगों में साइकोपैथी की समस्या जेनेटिक कारणों से जन्मजात होती है। दूसरे वे जो हमेशा चिंतित और व्याकुल रहते हैं, इनकी अस्थिर भावनायें वातावरण के कारकों पर निर्भर होती हैं। ये लोगों को नजरअंदाज करते हैं और यदि ऐसा व्यक्ति इनके सामने आ जाये जो इन्हें नापसन्द है तो ये बदसलूकी करते हैं। (Psychiatrist Psychopathy and Sociopath)

ज्यादातर लोग साइकोपैथ और सोशियोपैथ को एक मानते हैं लेकिन मेडिकली ये दोनों अलग हैं। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक सोशियोपैथ व्यक्ति में पाये जाने वाले असामाजिक लक्षण, सामाजिक और आसपास के वातावरण से जुड़े कारकों पर आधारित होते हैं जबकि साइकोपैथी के लक्षण जन्मजात या स्वभाविक होते हैं। 

क्या वजह साइकोपैथ होने की?

व्यक्ति के साइकोपैथ होने के पीछे जेनेटिक-नॉन जेनेटिक दोनों तरह के कारक हैं, इनसे दिमाग के काम करने का तरीका प्रभावित होता है। मशहूर मनोवैज्ञानिक फ्रॉयड के मुताबिक साइकोपैथी जेनेटिक कारकों और प्रतिकूल सामाजिक परिस्थितियों के बीच परस्पर क्रिया का परिणाम है।

जेनेटिक: स्टैनफोर्ड यूनीवर्सिटी में हुए अध्ययनों से पता चला कि व्यक्ति साइकोपैथ आनुवांशिक (जेनेटिक)  कारकों से होता है और इसका प्रभाव मध्यम रहता है लेकिन साइकोपैथी के लक्षण कितने गम्भीर होंगे यह उसके आसपास के वातावरण या जीवन में घट रही घटनाओं पर निर्भर है।

वातावरण: बहुत से लोगों का साइकोपैथिक व्यवहार इन वजहों से होता है जैसेकि बचपन में शारीरिक रूप से हुई उपेक्षा, खराब सामाजिक-आर्थिक स्थिति (गरीबी), परिवार में ज्यादा लोग होने से माता-पिता का बच्चों पर ध्यान न देना, माता-पिता या भाई-बहनों का आपराधिक इतिहास, मां-बाप से खराब रिश्ते, परिवार टूट जाना, कम उम्र में मां बनना या मां बनने के बाद हमेशा तनाव में रहना।

दिमागी चोट: रिसर्च से सामने आया कि दिमागी चोट का हिंसा तथा अपराध जैसे साइकोपैथिक लक्षणों से गहरा सम्बन्ध है। दिमाग के प्रि-फ्रंटल कार्टिक्स में लगी चोट से व्यक्ति साइकोपैथ हो जाता है जिससे उसकी नैतिक निर्णय लेने की क्षमता घटती है व सामाजिक तर्कशीलता विकसित नहीं हो पाती इस कारण व्यवहार में आवेग और आक्रामकता आती है और उन लोगों के प्रति पछतावे व सहानुभूति की भावना नहीं रहती जिनके प्रति वे अपराध करते हैं।

Read also अनियमित धड़कन भी है एक बीमारी!

कैसे होते हैं साइकोपैथ?

मनोचिकित्सकों के मुताबिक इनमें अति-आत्मविश्वास और सामाजिक हठधर्मिता होने से तनाव तथा खतरे के प्रति इनकी सहनशीलता दूसरों से अधिक होती है जिससे ये दुस्साहसी हो जाते हैं, ऐसा केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र के एक हिस्से एमिग्डाला की वजह से होता है जो हमारी डर या भय से सम्बन्धित भावनायें कंट्रोल करता है।

दिमाग का सामने वाला भाग (फ्रंटल लोब) विचार और भावनायें नियन्त्रित करता है। फ्रंटल लोब में गड़बड़ी के कारण साइकोपैथ आवेग, उत्तेजना और तीव्र इच्छाओं को नियन्त्रित करने में असफल रहते हैं व सामाजिक व्यवहार से जुड़े नियमों का पालन नहीं कर पाते।

इनमें नजदीकी तथा गहरे रिश्ते बनाने का अभाव तथा खुद को बड़ा महसूस कराने के लिये दूसरों के शोषण की प्रवृत्ति होती है जिससे स्वभाव क्रूर व विध्वंसकारी हो जाता है, ये दूसरों से सहानभूति भी तभी जताते हैं जब लगता है कि ऐसा करने से इनका समाजिक कद बढ़ेगा।

झूठे और दिखावटी: आत्मसम्मान तथा आकर्षक व्यक्तित्व का दिखावा करने में ये आगे रहते हैं।  आदतन ये बिना वजह बात-बात पर झूठ बोलते है और किसी भी चीज से जल्द ऊब जाते हैं जिससे इनका वैवाहिक जीवन छोटा और जल्द तलाक की नौबत आ जाती है।

स्वार्थी: वास्तविक जज्बातों की कमी और स्वार्थ हेतु रिश्ते बनाने की वजह से इनमें असली भावनायें नहीं रहतीं। ये काम निकालने के लिये दिखावटी अपनापन जताते हुए इमोशनल होने का ड्रामा करते हैं, परवाह नहीं करते कि इससे किसी की भावनायें आहत होंगी। इनमें पश्चाताप की भावना नहीं होती और अपने सभी कृत्यों के लिये दूसरों को जिम्मेदार मानते हैं। फ्रॉयड का कहना है कि गलती सबसे होती है लेकिन साइकोपैथ गलती करके कभी पछताता नहीं जबकि सामान्य आदमी को गलती पता चलने पर पछवाता होता है।

षडयन्त्रकारी और आक्रामक: ज्यादातर साइकोपैथ षडयन्त्रकारी-आक्रामक व्यक्तित्व के होते हैं, इन्हें दूसरों की कोई परवाह नहीं होती। प्रिंसटन विश्वविद्यालय में हुए शोधों से पता चला कि हिंसा या अपराध में शामिल 60 प्रतिशत लोग साइकोपैथ होते हैं। बार-बार जेल जाना व नशीली दवाओं का सेवन इनके लिये आम बात है, ऐसे लोगों को हिरासत में रखने के लिये उच्च-सुरक्षा वाले डिटेंशन सेन्टरों की जरूरत पड़ती है।

यौन अपराधी: उग्रता और आवेग के कारण ज्यादातर साइकोपैथ यौन अपराधों में लिप्त हो जाते हैं। प्लान बनाकर गलत काम या अपराध करना वास्तव में साइकोपैथिक व्यवहार का लक्षण है।

पता कैसे चलता है साइकोपैथ होने का?

व्यक्ति साइकोपैथ है या नहीं इसका सही पता तो 18 वर्ष की उम्र के बाद चलता है लेकिन कुछ लोगों में इसके हल्के संकेत 11 साल की उम्र से मिलने लगते हैं। साइकोपैथी की पुष्टि के लिये आमतौर पर क्लेक्ले मानदंडों पर आधारित पीसीएल-आर यानी साइकोपैथी चैकलिस्ट-रिवाइज्ड लिस्ट इस्तेमाल की जाती है, इसे पुष्टि का गोल्ड स्टैंडर्ड मानते हैं।

यदि पुष्टि में संदेह है तो साइकोपैथिक पर्सनॉल्टी लिस्ट इस्तेमाल की जाती है, इसमें व्यक्तित्व से जुड़े करीब 154 लक्षणों को क्रमबद्ध करके शामिल किया गया है जैसेकि निर्भयता, आवेग, कोल्ड हार्डनेस (दूसरों के प्रति दया संवेदना, सहानुभूति न दिखाना) इत्यादि। 

बहुत से मामलों में साइकोपैथी पुष्टि हेतु लिये डीएसएम यानी डॉयग्नोस्टिक एंड स्टैटिस्टकल मैनुअल ऑफ मेंटल डिस्आर्डर इस्तेमाल किया जाता है। इसमें आजतक ज्ञात सभी मानसिक रोग वर्गीकृत हैं, चूंकि साइकोपैथी को बीमारी नहीं माना जाता इसलिये डीएसएम इसे एएसपीडी यानी एंटीसोशल पर्सनॉल्टी डिस्आर्डर के रूप में शामिल किया गया है।

अमेरिकन साइकॉयट्रिक एसोसियेशन द्वारा स्थापित मानसिक बीमारियों के अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण से सम्बन्धित टूल्स (जैसे मिनेसोटा मल्टीफेसिक पर्सनॉल्टी लिस्ट, कैलीफोर्निया मनोवैज्ञानिक लिस्ट, असामाजिक व्यक्तित्व विकार पैमाना, लेवेन्सन सेल्फ रिपोर्ट साइकोपैथी स्केल और हेयर सेल्फ रिपोर्ट साइकोपैथी स्केल) का प्रयोग भी इसकी पुष्टि में आ रहे संदेह निवारण में किया जाता है।

इलाज कितना कारगर? 

साइकोपैथी का इलाज इतना मुश्किल है कि मनोचिकित्सक इसे असाध्य पर्सनॉल्टी डिस्आर्डर मानते हैं क्योंकि इसके ज्यादातर मरीज इलाज करवाना ही नहीं चाहते, यदि येन-केन-प्रकारेण इलाज शुरू कर दिया जाये तो वे सहयोग नहीं करते। अभी तक कोई ऐसी सटीक दवा या थेरेपी उपलब्ध नहीं है जो साइकोपैथी से जुड़ी समस्यायें जैसे भावनाओं की कमी, खराब सामाजिक व्यवहार का सीधे-सीधे इलाज कर सके। कुछ मरीजों का यदि साइकोथेरेपी से इलाज किया जाता है तो वे हेरा-फेरी करने या धोखा देने के तरीके सीख लेते हैं जिससे उनके द्वारा अपराधों को अंजाम देने की आशंका और बढ़ जाती है।

सजा देकर इलाज करने जैसे तरीके आमतौर पर इन मरीजों पर कारगर नहीं होते क्योंकि असंवेदनशील होने के कारण इन्हें किसी सजा या खतरे से कोई फर्क नहीं पड़ता। उम्र बढ़ने के साथ ज्यादातर साइकोपैथ ड्रामेटिक पर्सनॉल्टी डिस्आर्डर, आत्मरंजित (खुद को महत्वपूर्ण समझना), बॉर्डरलाइन पर्सनॉल्टी डिस्आर्डर, पैरानॉयड पर्सनॉल्टी डिस्आर्डर, स्किजॉय्ड पर्सनॉल्टी डिस्आर्डर, पैनिक, ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिस्आर्डर, स्किजोफ्रेनिया, डिप्रेशन और एडीएचडी जैसे मानसिक विकारों से ग्रस्त हो जाते हैं।

रिवार्ड थेरेपी: इसके तहत मरीजों को इनाम आधारित मैनेजमेंट सिस्टम का हिस्सा बनाकर उन्हें सभ्य व्यवहार के लिये इनाम दिया जाता है। सुधार केन्द्रों में साइकोपैथी के मरीजों को दिये जाने वाले इलाज और थेरेपी का मकसद आत्महित, सामाजिक कार्यों और हस्तक्षेपों पर ध्यान केन्द्रित करवाना है जिससे मरीज किसी तरह का स्किल सीख कर अपने जीवन के लक्ष्यों को असामाजिक तरीकों से नहीं बल्कि सामाजिक और सही तरीकों से हासिल कर सके। 

मेडीकेशन: एंटीसाइकोटिक, एंटीडिप्रेसेंट और मूड स्थिर करने वाली दवाओं से मानसिक बीमारियों में सुधार करके आवेग और आक्रामकता नियन्त्रित करते हैं। यह बात ध्यान रखें कि अमेरिका के एफडीए विभाग ने साइकोपैथी के इलाज हेतु अभी तक किसी दवा को मंजूरी नहीं दी है। क्लीनिक ट्रॉयल में क्लोजापिन नामक एंटीसाइकोटिक दवा ने साइकोपैथी के मरीजों के खराब व्यवहार और असामाजिक व्यक्तित्व विकार में सुधार करके इस क्षेत्र में कुछ सफलता जरूर हासिल की है।

निष्कर्ष: फॉरेन्सिक और क्लीनिकल परिदृश्य में साइकोपैथी के मरीजों का इलाज ज्यादातर मामलों में विफल रहा है और यह भी देखा गया कि इलाज से लक्षण और ज्यादा खराब हुए। इसके बावजूद मनोचिकित्सा के कुछ आधुनिक तरीकों को आजमाया जा रहा है जिनके असर से मरीजों के हिंसक व्यवहार और नशीले पदार्थों के सेवन में कमी आयी। जहां तक साइकोपैथिक मरीजों द्वारा किये अपराध पर सजा और जमानत की बात है तो यह पूरी तरह से उनके पीसीएल-आर स्कोर पर निर्भर है,  आपराधिक अदालतों में जोखिम और उपचार की क्षमता का मूल्यांकन करने के लिये आमतौर पर इसी विधि का इस्तेमाल होता है। Psychiatrist Psychopathy and Sociopath

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
रैली, रोड शो पर 22 तक रोक
रैली, रोड शो पर 22 तक रोक