मुंह व गले का कैंसरः बदसूरती और बर्बादी - Naya India
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मुंह व गले का कैंसरः बदसूरती और बर्बादी

विष्णु प्रिया सिंह

बदसूरती व बरबादी वाली बीमारी है मुंह कैंसर, इसे ओरल कैंसर भी कहते हैं। तंबाकू, गुटका और ध्रूमपान तो इसके मुख्य कारण हैं ही, इनके अलावा और भी कई कारण सामने आ रहे हैं जिनसे यह और ज्यादा फैलने लगा है। हमारे देश में प्रतिवर्ष 2.5 लाख से ज्यादा लोग इसके शिकार बनते हैं। इससे बचा जा सकता है और इसे ठीक भी किया जा सकता है, लेकिन इसके लिये मुंह कैंसर के सम्बन्ध में सही जानकारी होनी जरूरी है।

मुंह कैंसर मुंह और गले के ऊतकों (टिश्यू) को अपना शिकार बनाता है। यह मुंह, गले और होठों के स्क्वेमस सेल में फैलता है। व्यक्ति को इसका पता तब चलता है जब यह लिम्फ नोड और गले तक फैल जाता है। इसके ज्यादातर मरीज 40 वर्ष से अधिक उम्र वाले होते हैं। पुरूषों में महिलाओं की अपेक्षा मुंह कैंसर होने के चांस दोगुने होते हैं। यदि शुरूआत में इसका पता चल जाये तो मरीज के बचने के चांस बढ़ जाते हैं। यह मुंह के इन भागों में होता है-

होंठ और जीभ।
गालों का अंदरूनी भाग और जीभ के नीचे वाला भाग।
कठोर और सॉफ्ट तालू।

यदि व्यक्ति अपने दांतों की केयर के लिये डेन्टिस्ट के पास जाता है तो मुंह कैंसर का पता सबसे पहले उसे ही चलता है। यदि डेन्टिस्ट आपको मुंह में किसी पुराने छाले या जख्म के सम्बन्ध में बताये तो इसे हल्के में न लें और तुरन्त ही जांच करायें।

मुंह कैंसर के कारण
तंबाकू: मुंह के कैंसर का मुख्य कारण तंबाकू सेवन है। तंबाकू सेवन में सिगरेट, सिगार और पाइप पीने के साथ-साथ गुटका खाना भी शामिल है। हमारे देश में तंबाकू युक्त गुटखा चबाने वाले ही सबसे ज्यादा इसके शिकार होते हैं। जो लोग रेगुलर तंबाकू सेवन करने के साथ ज्यादा मात्रा में शराब पीते हैं वे बहुत जल्दी मुंह कैंसर का शिकार होते हैं।

ह्यूमैन पेपिलोमा वायरस संक्रमण (HPV):तंबाकू के बाद मुंह के कैंसर का यह दूसरा मुख्य कारण है। जो लोग बहुत ज्यादा सेक्सुअली एक्टिव होते हैं और ओरल सेक्स में लिप्त रहते हैं उनमें इस वायरस का संक्रमण हो जाता है, और वे मुंह कैंसर का शिकार हो जाते हैं। यह सेक्सुअली ट्रांसमिट होने वाला वायरस है और स्किन-टु-स्किन सम्पर्क से फैलता है। यह मुंह के अलावा गले में भी हो जाता है। इसकी सबसे गम्भीर अवस्था oropharyngeal cancer होती है। इसे रेयर माना जाता है। इस अवस्था में कैंसर, गले के मध्य से लेकर जीभ तक के भाग को अपनी चपेट में ले लेता है।

एचपीवी (HPV) वायरस, मुंह के अंदरूनी भाग में हुए छोटे जख्मों से व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करता है। 14 से 69 साल तक की उम्र के लोगों में यह होता है। एक रिसर्च के मुताबिक जैसे-जैसे लोगों का ओरल सेक्स के प्रति रूझान बढ़ता जा रहा है इसके मरीजों की संख्या पिछले दस वर्षों में तीन गुना हो गयी है। एचपीवी वायरस से होने वाले संक्रमण के 100 प्रकार और कई सब-टाइप सामने आये हैं इनमें एचपीवी-16 नामक सबटाइप सबसे ज्यादा खतरनाक है।

जो लोग ओरल सेक्स के साथ स्मोकिंग भी करते हैं उनके इस वायरस से संक्रमित होने के चांस तीस प्रतिशत अधिक होते हैं। पुरूषों में यह संक्रमण महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा जल्दी होता है। मल्टीपल सेक्स पार्टनर जैसी आदतें इसे और बढ़ावा देतीं हैं। एक क्लीनिकल रिसर्च के अनुसार, किसी व्यक्ति ने अपने जीवन काल में बीस से ज्यादा लोगों से सेक्स सम्बन्ध बनाये हैं तो वह इस वायरस से बहुत जल्दी संक्रमित होगा। स्मोकिंग इस वायरस के फैलने में सहायक है, स्मोकिंग में गरम धुआं मुंह में जाता है तो मुंह के अंदर छोटे-छोटे कट बन जाते हैं, जिनसे यह वायरस आसानी से शरीर में प्रवेश कर जाता है। ओपन मुंह किसिंग भी इसका एक कारण है। HPV संक्रमण का पता शरीर में वायरस प्रवेश के काफी सालों के बाद चलता है। जब व्यक्ति का इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ता है तो यह वायरस एक्टिव हो जाता है। इसी वजह से 40 वर्ष से ज्यादा उम्र वाले लोग ही इससे सबसे ज्यादा संक्रमित पाये जाते हैं।

यदि पहले ओरल कैंसर डायग्नोज हुआ हो: यदि कभी पहले मुंह कैंसर हो चुका है और आप इसका इलाज भी करा चुके हैं तो यह दोबारा हो भी सकता है।

फैमिली हिस्ट्री: यदि फैमिली में किसी को किसी भी तरह का कैंसर हुआ है तो भी मुंह कैंसर होने के चांस बढ़ जाते हैं।

कमजोर इम्यून सिस्टम: यदि ज्यादा लम्बे समय तक किसी का इम्यून सिस्टम कमजोर रहता है तो वह मुंह कैंसर का शिकार हो जाता है।

क्रोनिक फेशियल सन एक्सपोजर: जो लोग बहुत ज्यादा समय तक सूरज की किरणों के सीधे सम्पर्क में रहते हैं उन्हें मुंह कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

कुपोषण: जिन लोगों के खाने में सही मात्रा में पोषक तत्व नहीं होते हैं उन्हें मुंह कैंसर होने के चांस बढ़ जाते हैं।

मुंह कैंसर के लक्षण
मुंह कैंसर में ये लक्षण नजर आते हैं-
गले में खराश होना, गला बैठ जाना, दर्द होना और गटकने में परेशानी।
गालों और गले में गांठों की ग्रोथ होना।
मुंह से खून आना, मुंह के अंदर किसी तरह का मांस बढ़ना (एब्नार्मल ग्रोथ) और खांसने में खून आना।
होठों और मुंह में जख्म और मुंह या होठों के ऊपरी या अंदरूनी हिस्से में सफेद, लाल और सफेद या लाल चक्कते पड़ना।
निचले होंठ, चेहरे, गले या थुड्डी का सुन्न पड़ना और जीभ में दर्द रहना।
जबड़ों में दर्द या अकड़न, दांतों का ढीला पड़ना और डेन्चर लगाने में मुश्किल होना।
कानों में लगातार दर्द रहना और लिम्फ नोड का बढ़ जाना।
वजन का तेजी से कम होना।

नोट: उपरोक्त लक्षणों में से कुछ लक्षण जैसेकि गले की खराश या कानों का दर्द कुछ और कारणों से भी हो सकते हैं। इन लक्षणों में से कोई लक्षण लम्बे समय तक बना रहता है या फिर एक से ज्यादा लक्षण दिखाई दें तो तुरन्त ही डाक्टर से सम्पर्क करें।

मुंह कैंसर डायग्नोज करना
इसका पता करने के लिये डाक्टर मुंह के अंदरूनी भागों और गले के पिछले हिस्से, जीभ, गालें, गले की लिम्फ नोड इत्यादि की जांच करते हैं। यदि डाक्टर को किसी तरह की ग्रोथ, ट्यूमर या जख्म दिखाई देते हैं तो वे ब्रश बॉयोप्सी या टिश्यू बायोप्सी के लिये रिफर करते हैं। ब्रश बायोप्सी दर्द रहित टेस्ट होता है, जबकि टिश्यू बायोप्सी में टिश्यू का एक पीस निकालकर कैंसर की जांच के लिये भेजा जाता है।

इन दोनों टेस्टों के अलावा डाक्टर ये टेस्ट भी करवाते हैं-

एक्स-रे: इससे पता चलता है कि कैंसर सेल्स जबड़ों, छाती और फेफड़ों तक तो नहीं फैला है।
सीटी-स्कैन: इससे कैंसर के सोर्स का पता चलता है कि वह शरीर के किस हिस्से (मुंह, गला, गरदन, फेफड़े इत्यादि) में है।
पेट (PET)-स्कैन: इससे पता चलता है कि कैंसर का फैलाव लिम्फ नोड या किसी अन्य अंग तक तो नहीं हुआ है।
एमआरआई (MRI)-स्कैन: इसके द्वारा सटीकता से पता चलता है कि कैंसर की स्टेज क्या है और उसका फैलाव कितना है।
इंडोस्कोपी: इसके द्वारा नथुनों, साइनस, गले के अंदरूनी भाग, श्वसन नली और वायु नली की जांच की जाती है।

मुंह कैंसर की स्टेज
इसकी चार स्टेज होतीं हैं-
स्टेज-1: इसमें ट्यूमर दो सेंटीमीटर या उससे छोटा होता है और कैंसर, लिम्फ नोड तक नहीं फैला होता है।
स्टेज-2: इसमें ट्यूमर दो से चार सेंटीमीटर तक हो सकता है और कैंसर के सेल्स लिम्फ नोड तक नहीं फैले होते हैं।
स्टेज-3: इसमें ट्यूमर चार सेंटीमीटर से बड़ा होता है और कैंसर के सेल्स लिम्फ नोड तक नहीं फैले होते हैं और यदि फैले भी हैं तो इससे केवल एक लिम्फ नोड ही प्रभावित होता है। इसके शरीर का कोई भी अंग प्रभावित नहीं होता है।
स्टेज-4: इसमें ट्यूमर किसी भी आकार का हो सकता है और कैंसर सेल्स लिम्फ नोड तथा शरीर के अन्य अंगों तक पहुंच जाते हैं।

HPV संक्रमण से बचाव
HPV संक्रमण के कुछ प्रकारों के लिये वैक्सीन बन गयी है, लेकिन इसके कुछ टाइप ऐसे हैं जो ठीक नहीं होते हैं और दवाओं के द्वारा ही इनके साथ जीवन काटा जा सकता है। ज्यादा गम्भीर मामलों में इलाज के लिये सर्जरी, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी या इनका कॉम्बीनेशन प्रयोग किया जाता है लेकिन अब क्रायो थेरेपी के द्वारा भी इसका उपचार होने लगा है। इसके अलावा interferon alpha-2B इंजेक्शन को इसके इलाज में प्रयोग किया जाता है। इसका इलाज और ठीक होने की सम्भावना इस बात पर निर्भर होती है कि इसकी स्टेज कौन सी है। एचपीवी संक्रमण को STD डिसीज (सेक्सुअली ट्रांसमिट डिसीज) कहते हैं। इससे बचाव का सबसे अच्छा तरीका है कि सेफ सेक्स की आदत डालें और ज्यादा पार्टनर न बदलें। अपने पार्टनर से खुलकर बात करें कि उसका आखिरी बार STI टेस्ट कब हुआ था और उसका परिणाम क्या था। यदि पार्टनर को इसका पता नहीं है तो ओरल सेक्स से बचें। प्रत्येक छह माह में डेन्टिस्ट के पास जायें और अपना चैकअप करायें, यदि मुंह के अंदर कुछ भी असामान्य पता चले तो तुरन्त ही डाक्टर से कन्सल्ट करें। यदि सम्भव हो एचपीवी वैक्सीनेशन करायें। इसके वैक्सीनेशन में दो या तीन शॉट्स दिये जाते हैं जो 6 महीने के अंतर से लगते हैं। यह वैक्सीनेशन 9 साल से बड़ी उम्र में होता है। पहले यह केवल 26 साल की उम्र तक ही हो सकता था लेकिन अब इसके नये संस्करण Gardasil 9 के आने से 27 साल से लेकर 45 साल तक के लोग भी वैक्सीनेशन करा सकते हैं।

मुंह कैंसर का इलाज
मुंह कैंसर का इलाज इसके टाइप, स्टेज शरीर में इसकी लोकेशन पर निर्भर है। इसके इलाज में इन तरीकों का इस्तेमाल होता है-
सर्जरी: कैंसर की शुरूआती स्टेज में सर्जरी के द्वारा ट्यूमर और कैंसर युक्त लिम्फ नोड्स को निकाल देते हैं, साथ ही साथ मुंह और गले के कैंसर वाले टिश्यूज को भी रिमूव करते हैं।
रेडियेशन थेरेपी: इस थेरेपी में 2 से 8 सप्ताह तक, सप्ताह के पांचों दिन, दिन में एक या दो बार कैंसर वाली जगह पर रेडियेशन डालते हैं। यदि कैंसर की एडवांस स्टेज है तो रेडियेशन के साथ कीमों थेरेपी को भी इस्तेमाल करते हैं।
रेडियेशन थेरेपी के साइड इफेक्ट: रेडियेशन थेरेपी का शरीर पर नकारात्मक प्रभाव भी होता है जैसेकि- मुंह और गले में खराश रहना, मुंह का सूखना, कम लार बनना, दांत कमजोर होना, मितली और उल्टी आना, मसूड़ों में जख्म व उनसे खून का रिसाव, स्किन और मुंह में इन्फेक्शन, जबड़ों में जकड़न और दर्द की शिकायत, डेन्चर पहनने में परेशानी, थकावट रहना, स्वाद और सूंघने की क्षमता कम होना, स्किन में सूखापन और जलन रहना, वजन कम होना और थाइराइड में परिवर्तन।
कीमो थेरेपी: इस थेरेपी में दवाइयों से कैंसर सेल्स को मारते हैं। इसमें दवा टेबलेट के रूप में या इंजेक्शन के रूप में इस्तेमाल की जाती है। कीमोथेरेपी में ज्यादातर मरीजों को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं होती है। इस थेरेपी में ज्यादातर मरीज ओपीडी पेसेन्ट की तरह से जाते हैं।
कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट: बालों का झड़ना, मुंह और मसूड़ों में दर्द रहना और खून आना, शरीर में खून की कमी होना, कमजोरी आना, भूख न लगना, मितली-उल्टी और डाइरिया की बार-बार शिकायत रहना, मुंह और होठों पर छाले पड़ना, हाथों-पैरो का सुन्न पड़ना इत्यादि।
टारगेटेड थेरेपी: इस थेरेपी में ऐसी दवाइयों को इस्तेमाल करते हैं जो कैंसर सेल पर एक विशेष प्रोटीन की परत चढ़ा देती हैं जिससे उसकी ग्रोथ रूक जाती है।
टारगेटेड थेरेपी के साइड इफेक्ट: इसमें मरीज को बुखार, सिर दर्द, उल्टी, डायरिया, स्किन में चकत्ते पड़ना और अन्य एलर्जिक रियेक्शन हो सकते हैं।
खानपान:मुंह कैंसर के इलाज में मरीज की भूख मर जाती है, वजन गिरता है और उसे भोजन खाने या निगलने में दर्द होता है, इसलिये डाक्टर से परामर्श करके मरीज को अच्छे पोषक तत्वों वाला भोजन देना चाहिये।

मुंह कैंसर से रिकवरी
कैंसर के इलाज के बाद मरीज की रिकवरी इस बात पर निर्भर होती है कि उसका इलाज किस तरीके से हुआ है। सर्जरी के पहले मरीज को सूजन और दर्द की समस्या होती है लेकिन सर्जरी द्वारा छोटे ट्यूमर रिमूव करने के बाद ये समस्यायें समय के साथ कम हो जाती हैं। यदि मरीज के मुंह से किसी बड़े ट्यूमर को सर्जरी से रिमूव किया गया है तो उसे खाना चबाने, निगलने या बात करने में परेशानी हो सकती है। ऐसा भी हो सकता है कि सर्जरी के बाद डाक्टर को मरीज के मुंह की हड्डियों और टिश्यू को दोबारा बनाने के लिये एक रिकन्सट्रक्टिव सर्जरी करनी पड़े ऐसे में मरीज बोलने और खाने की क्षमता पुन: हासिल कर ले इसके लिये उसे रिहैबलिटेशन सेन्टर भेजना पड़ सकता है।

दृष्टिकोण
मुंह कैंसर के इलाज के बाद अपना दृष्टिकोण सकारात्मक बनाये रखें और डाक्टर के पास रेगुलर चैकअप के लिये जायें। यदि डाक्टर मरीज से कुछ टेस्ट करवाने के लिये कहता है तो इसमें कोताही न बरतें। यदि मुंह में किसी भी तरह का कुछ असामान्य महसूस होता है तो डेन्टिस्ट या ऑन्कालॉजिस्ट से सम्पर्क करें।