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ज्यादा लम्बे हाथ-पैर भी जानलेवा

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अंगों के जोड़ पर मौजूद कनेक्टिंग टिश्यू कमजोर होने का बुरा असर हृदय, आंखों, रक्त वाहिकाओं और स्केलेटन (कंकाल) पर पड़ता है जिससे शरीर कमजोर, हाथ-पैर असामान्य रूप से पतले-लम्बे हो जाते हैं, मेडिकल साइंस में इस बीमारी को मार्फन सिंड्रोम के नाम से जानते हैं। यदि हमारी महाधमनी (एयोर्टा) जो दिल से निकलकर सम्पूर्ण शरीर में रक्त आपूर्ति करती है इसकी चपेट में आ जाये तो जान पर बन आती है। arms and legs

मांसपेशियों के कनेक्टिंग टिश्यू हमारी सही शारीरिक संरचना के लिये जिम्मेदार होते हैं, ये शिप के लंगर की तरह काम करते हैं। अंगों के जोड़ पर मौजूद कनेक्टिंग टिश्यू कमजोर होने का बुरा असर हृदय, आंखों, रक्त वाहिकाओं और स्केलेटन (कंकाल) पर पड़ता है जिससे शरीर कमजोर, हाथ-पैर असामान्य रूप से पतले-लम्बे हो जाते हैं, मेडिकल साइंस में इस बीमारी को मार्फन सिंड्रोम के नाम से जानते हैं। यदि हमारी महाधमनी (एयोर्टा) जो दिल से निकलकर सम्पूर्ण शरीर में रक्त आपूर्ति करती है इसकी चपेट में आ जाये तो जान पर बन आती है। पीड़ित पर इसके असर की घातकता इस बात पर निर्भर है कि कौन सा अंग या मांसपेशी इसकी चपेट में आयी है। यह लाइलाज जेनेटिक बीमारी है लेकिन वर्तमान में उपलब्ध मेडिकल सुविधाओं से इसे काफी हद तक मैनेज किया जा सकता है। इस बीमारी के देश में प्रतिवर्ष करीब दस लाख मामले आते हैं और यह लिंग-नस्ल-जाति में भेदभाव नहीं करती।

लक्षण क्या उभरते हैं?

इसके लक्षण एक ही परिवार के सदस्यों में अलग-अलग हो सकते हैं, क्योंकि यह सिंड्रोम शरीर के अलग-अलग हिस्सों को प्रभावित करता है। कुछ लोगों में हल्की लेकिन कुछ में लाइफ थ्रेटनिंग जटिलताएं विकसित होने से ये लक्षण उभरते  हैं-

पतला-लंबा शरीर, अनुपातहीन रूप से लंबे हाथ-पैर और उंगलियां, ऊंचा धनुषाकार तालू और एक-दूसरे पर चढ़े दांत, हृदय में मर्मरध्वनि, बाहर निकली या अंदर धंसी ब्रेस्टबोन, असामान्य रूप से घुमावदार रीढ़, एक्सट्रीम नियरसाइटिडनेस (केवल पास का दिखाई देना) और फ्लैट फुट।

क्यों होती है यह बीमारी?

शरीर के वे जीन जो कनेक्टिव टिश्यूज (संयोजी ऊतकों) की लोच और ताकत के लिये जिम्मेदार प्रोटीन बनाते हैं के खराब होने पर व्यक्ति इसका शिकार हो जाता है। ज्यादातर लोगों को यह रोग माता-पिता से विरासत में मिलता है। यदि माता या पिता में से कोई भी इससे ग्रस्त है तो बच्चे में इसकी सम्भावना 50 प्रतिशत होती है, लेकिन मार्फन सिंड्रोम से ग्रस्त लगभग 25% लोगों में यह खराब जीन माता-पिता से न आकर पहली बार उन्ही में विकसित होता है।

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मुश्किले क्या-क्या?

मार्फन सिंड्रोम से ये जटिलतायें हो सकती हैं-

हृदय संबंधी: यह घातक कॉम्प्लीकेशन है, इसमें हृदय और रक्त वाहिकाएं शामिल होती हैं। दोषपूर्ण कनेक्टिंग टिश्यू के कारण हृदय से निकलकर सम्पूर्ण शरीर में रक्त आपूर्ति करने वाली महाधमनी (एयोर्टा) के हृदय से जोड़ वाला स्थान कमजोर हो जाता है जिससे ये कॉम्प्लीकेशन्स हो सकते हैं-

एयोर्टिक इनियोरिज्म: हृदय से निकलने वाले रक्त के दबाव के कारण महाधमनी की दीवार बाहर निकल आती है, जैसे हवा भरने पर टायर की कमजोर जगह। मार्फन सिंड्रोम ग्रस्त लोगों में, महाधमनी की जड़ यानी महाधमनी जहां दिल से जुड़ी होती है पर ऐसा होने की संभावना सबसे अधिक होती है।

एयोर्टिक डाइसेक्शन: कई परतों से बनी एयोर्टा वॉल की सबसे आंतरिक और बाहरी परत के बीच छोटे आंसू की तरह रक्त की बूंद आ जाने से छाती या पीठ में तेज दर्द होता है, इसे अरोटिक डाइसेक्शन कहते हैं, इसकी वजह से एयोर्टा स्ट्रक्टचर कमजोर होकर टूट सकता है, जोकि जानलेवा स्थिति है।

वाल्व में खराबी:  मार्फन सिंड्रोम से हृदय वाल्व के टिश्यू कमजोर होने से वाल्व में खिंचाव पैदा होता है जिससे वाल्व ठीक से काम नहीं कर पाते। ऐसे में हृदय पर जोर पड़ने से हार्ट फेल हो जाता है।

आंखों की जटिलताएं: मार्फन सिड्रोम से आंखों में ये समस्यायें हो जाती हैं-

लेंस खिसकना: कनेक्टिव टिश्यू की कमजोरी से आंख के भीतर फोकस करने वाला लेंस अपनी जगह से हट जाता है, मेडिकल साइंस में इसे एक्टोपिया लेंटिस कहते हैं, मार्फन सिंड्रोम ग्रस्त करीब 50 प्रतिशत लोगों को यह समस्या होती है।

रेटिनल प्रॉब्लम: मार्फन सिंड्रोम से रेटिना डिचैटमेंट होने या रेटिना में आंसू आने के कारण प्रकाश के प्रति संवेदनशील ऊतक काम नहीं कर पाते जिससे दृष्टि खराब हो जाती है।

ग्लूकोमा या मोतियाबिंद की जल्द शुरूआत: इससे आंखों की ये समस्याएं कम उम्र में विकसित होने लगती हैं। ग्लूकोमा से आंख के भीतर दबाव बढ़ता है, जो ऑप्टिक तंत्रिका को नुकसान पहुंचा सकता है। मोतियाबिंद से आंख के लेंस में धुंध आने से दिखाई देना कम हो जाता है।

स्कैलटन (कंकाल) संबंधी जटिलताएं: इस बीमारी से रीढ़ की हड्डी में असामान्य वक्रता यानी स्कोलियोसिस हो जाता है। कुछ लोगों में पसलियों का सामान्य विकास बाधित होने से ब्रेस्टबोन बाहर या छाती में धँसी दिखाई देती है। पीठ के निचले भाग तथा पैरों में दर्द मार्फन सिंड्रोम से होने वाला मुख्य कॉम्प्लीकेशन है।

प्रेगनेन्सी कॉम्प्लीकेशन्स: मार्फन सिंड्रोम से एयोर्टा (महाधमनी) के कनेक्टिंग टिश्यू खराब होने के कारण हृदय से इसका जोड़ कमजोर होने लगता है, गर्भावस्था में हृदय सामान्य से अधिक रक्त पंप करता है जिससे इस जोड़ पर अतिरिक्त तनाव आने से इसके टूटने का खतरा बढ़ जाता है, यह लाइफ थ्रेटनिंग कंडीशन है।

पुष्टि कैसे?

इसकी पुष्टि काफी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि लोगों में अलग-अलग लक्षण उभरते हैं चाहे वे एक ही परिवार के क्यों न हों। पुष्टि के लिये फिजिकल जांच के पश्चात दिल की गहन जांच हेतु इकोकार्डियोग्राम, सीटी स्कैन और एमआरआई की जाती है। नेत्र परीक्षण से भी इसकी पुष्टि होती है, इसके अंतर्गत स्लिट लेंस एक्जाम और आई प्रेशर टेस्ट किया जाता है। बहुत से मामलों में जेनेटिक टेस्ट से पुष्टि की जाती है साथ ही यह भी पता चल जाता है कि बच्चों में इसके जाने की सम्भावना कितनी है।

इलाज क्या है?

जेनेटिक होने के कारण इसका कोई इलाज नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों को कंट्रोल किया जा सकता है। जब मेडिकल साइंस आज जैसी एडवांस नहीं थी तो इससे पीड़ित लोग युवावस्था में ही मर जाते थे लेकिन आज उपलब्ध मेडिकल सुविधाओं से सामान्य जीवन जीना सम्भव है।

यदि एयोर्टा इसकी चपेट में है तो डॉक्टर ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने वाली दवाओं से तनाव कम करके एयोर्टा के टूटने का जोखिम घटाते हैं, यदि एयोर्टा क्षति ग्रस्त हो गयी है तो सर्जरी की जरूरत पड़ती है। जब एयोर्टा का व्यास 2 इंच से ज्यादा हो जाता है तो सर्जरी से इसे काटकर सिंथेटिक ट्यूब लगा देते हैं। दिल के वाल्व में खराबी होने पर उसे सर्जरी से बदल देते हैं। 

नेत्र विशेषज्ञ लेंस फिक्स करके और मोतियाबिंद हटाकर दृष्टि सम्बन्धी दोष दूर करते हैं। आज ऐसी लेजर तकनीक उपलब्ध है जिससे रेटिना डिचैटमेंट ठीक किया जा सकता है। आंखों में स्थायी कॉन्टेक्ट लेंस लगाकर दृष्टि सामान्य की जाती है। रीढ़ की हड्डी में स्कोलियोसिस होने पर विशेषज्ञ डॉक्टर ब्रेसिंग से इसे काफी हद तक ठीक कर देते हैं इसी तरह सर्जरी से ब्रेस्ट बोन ठीक की जा सकती है।

कैसी हो जीवनशैली?

यदि इस मार्फन सिंड्रोम का असर महाधमनी (एयोर्टा) पर हुआ है तो खेल कूद या ऐसी स्पर्धात्मक गतिविधियों से दूर रहना चाहिये जिनसे ब्लड प्रेशर बढ़ता हो, क्योंकि ब्लड प्रेशर बढ़ने से एयोर्टा क्षतिग्रस्त हो सकती है। सेहत ठीक रहे इसके लिये नियमित टहलें और हल्के-फुलके व्यायाम करें। यदि डॉक्टर ने ब्लड प्रेशर की दवा लिखी है तो उसे नियत समय पर लें और ब्लड प्रेशर की जांच करते रहें। चूंकि यह जेनेटिक बीमारी है इसलिये बच्चे पैदा करने से पहले जेनेटिक टेस्टिंग करायें और पता करें कि बच्चों में इसके जाने की सम्भावना कितने प्रतिशत है। मार्फन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे दृष्टि समस्याओं के कारण स्कूल में संघर्ष कर सकते हैं इसलिये जितनी जल्द हो चश्मा या कॉन्टैक्ट लेंस लगवा दें। स्कोलियोसिस के लिए एक ब्रेस लगाया जा सकता है और टेड़े-मेड़े दातों और जबड़े को डेन्टिस्ट आसानी से ठीक कर सकते हैं।  

नजरिया

यह बीमारी कैरियर और रिश्तों पर बुरा डालती है इसलिये ऐसे लोगों को मानसिक सपोर्ट की जरूरत होती है। यदि आपका प्रियजन इससे पीड़ित है तो हमेशा उसका मनोबल बढ़ायें और प्रयास करें कि उस पर फिजिकल स्ट्रेस न आये, उसे भारी सामान न उठाने दें। आज इंटरनेट पर ऐसे अनेक सहायता समूह मौजूद हैं जो पीड़ितों को सही ढंग से गाइड कर सकते हैं। एक बात याद रखें कि मार्फन सिंड्रोम का इलाज करने के लिये कम से कम चार डॉक्टरों की जरूरत पड़ सकती है- हृदय रोग, नेत्र रोग, हड्डी रोग, और जेनेटिक विशेषज्ञ। जब भी डॉक्टर से मिलने जायें तो उसे डिटेल में मेडिकल तथा फैमिली हिस्ट्री बतायें।

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