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यूट्रेस हटवाना, हिस्ट्रक्टमी कब जरूरी?

इन दिनों हमारे देश की महिलाओं का सेहत मामलों में सर्जरी का बहुत सामना करना पड़ रहा है। इसमें बच्चे को जन्म देने और फिर मेनोपॉज के बाद की समस्याओं का भी मसला है। ऐसे मामलों में एक वक्त सर्जरी कभी-कभार या बेहद गंभीर स्थिति में ही की जाती थी। मगर आज हालात यह हैं कि 45-50 वर्ष कीमहिलाओं को मेनोपॉज या यूट्रेस से जुड़ी समस्या होने पर डॉक्टर गर्भाशय रिमूव करने की सलाह दे देते हैं। तभी यह जानना और समझना जरूरी है कि पिछले दो दशकों में ऐसा क्या हुआ जिससे सर्जरी की अनिवार्यता बढ़ी और ऐसा क्या किया जाये जिससे यूट्रेस (गर्भाशय) रिमूवल (हिस्ट्रक्टमी) से बचा जा सके।

मेडिकल भाषा में यूट्रेस (गर्भाशय) को शरीर से काटकर स्थायी रूप से निकाल देने को हिस्ट्रक्टमी कहते हैं। डाक्टरों के मुताबिक हिस्ट्रक्टमी के कारण हैं- क्रोनिक पेल्विक पेन (योनि एरिया में लगातार असहनीय दर्द), योनि से अनियन्त्रित रक्त स्राव, सर्विकल कैंसर, ओवरी कैंसर, फिबरॉइड्स (गर्भाशय में अनचाही ग्रोथ या ट्यूमर), यूटेराइन प्रोलेप्स (वह कंडीशन जिसमें गर्भाशय योनि से बाहर लटक जाता है), ऐंडोमेट्रिओसिस और एडिनोमायोसिस (गर्भाशय की अंदरूनी परत का डिस्आर्डर)। कैंसर जैसे मामलों में हिस्ट्रक्टमी वास्तव में जान बचाने का काम करती है लेकिन अन्य मामलों में महिलाएं कुछ सावधानियां अपनाकर तथा लाइफ स्टाइल बदलकर इससे बच सकती हैं। आइये जानें कि वे कौन सी स्थितियां, समस्याएं हैं जिनमें सर्जरी (हिस्ट्रक्टमी ) से बचने के चांस हैं।

यूटेराइन प्रोलेप्स
यूट्रेस (गर्भाशय) मांसपेशियों से बना स्ट्रक्चर है जिसे पेल्विक मसल (मांसपेशी) और लिगामेंट, शरीर में सही स्थान पर जमाकर रखते हैं। पेल्विक शब्द का प्रयोग महिला के शरीर के लोअर एब्डोमिन के उस भाग के लिये होता है जहां सभी रिप्रोडक्टिव अंग स्थित होते हैं। पेल्विक मसल (मांसपेशी) और लिगामेन्ट में खिचाव आने या कमजोर पड़ने पर ये गर्भाशय को सपोर्ट नहीं दे पाते जिससे गर्भाशय अपने स्थान से खिसककर नीचे लटक जाता है। यह यूटेराइन प्रोलेप्स कंडीशन है। इसके प्रमुख लक्षण हैं- वेजाइनल ब्लीडिंग, डिस्चार्ज में बढ़ोत्तरी, सेक्सुअल इंटरकोर्स में दिक्कत, यूट्रेस का योनि से बाहर उभरना, पेल्विक में भारीपन और खिचाव की शिकायत, गेंद पर बैठे होने की अनुभूति, कॉन्सटीपेशन और मल त्याग में परेशानी, ब्लेडर खाली होने में दिक्कत और बार-बार ब्लेडर इंफेक्शन। इनमें से कोई भी लक्षण नजर आने पर तुरन्त डाक्टर को दिखायें।

महिलाओं की उम्र बढ़ने से जब इस्ट्रोजन हारमोन का स्तर घटता है तो पेल्विक मसल कमजोर होती है। इसके अलावा मोटापा, क्रोनिक कफ और क्रोनिक कॉन्सटीपेशन इसके प्रमुख रिस्क फैक्टर हैं। डाक्टर इसका पता पेल्विक मसल की फिजिकल जांच से लगा लेते हैं। पता चलते ही उपचार प्रारम्भ करें, वजन घटायें, भारी वस्तुओं को न उठायें, पेल्विक मसल को मजबूती देने वाली कीगल एक्सरसाइज करें, पेसरी नामक डिवाइस पहन कर रखें। यदि इनसे लाभ न हो तो डाक्टर की सलाह से वेजिनल एस्ट्रोजन लें। यदि कान्सटीपेशन या कफ की शिकायत रहती है तो इसका इलाज करायें, जिससे पेल्विक मसल पर प्रेशर न पड़े। इलाज में कोताही बरतने से यूट्रेस रिमूव करने की नौबत आ जाती है।

क्रोनिक पेल्विक पेन
अधिकतर मामलों में क्रोनिक पेल्विक पेन का मुख्य कारण पेल्विक इन्फ्लेमेन्टरी डिसीज (पीआईडी) है। यह, महिला रिप्रोडक्टिव आर्गन्स में होने वाला सेक्सुअली ट्रांसमिटेड संक्रमण (इन्फेक्शन) है। इसके इलाज में देरी से क्रोनिक पेल्विक (लगातार दर्द की शिकायत) पेन हो जाता है। क्लेमेडिया और गनेरिया (प्रमेह) इसी संक्रमण के टाइप हैं।

क्लेमेडिया: यह बैक्टीरिया से फैलने वाला एसटीआई (सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़) संक्रमण है। शुरूआत में इसके लक्षण पता नहीं चलते लेकिन कुछ सप्ताह के बाद परेशान करने लगते हैं। इन लक्षणों में जननांगों के अंदरूनी भाग में लाल रंग के दाने और रैसेज, यूरीनेशन में जलन, पीरियड (माहवारी चक्र) के मध्य ब्लीडिंग, लोअर एब्डोमिन में दर्द, पुरूष जननांग से पीले या हरे रंग के द्रव्य का रिसाव मुख्य हैं। लम्बे समय तक इलाज न कराने से यह संक्रमण गुदा (एनस) तक फैल जाता है। जब यह संक्रमण महिलाओं की फेलोपियन ट्यूब्स में चला जाता है तो इससे फीवर, तीव्र पेल्विक पेन, उल्टी, और मासिक चक्र के मध्य ब्लीडिंग जैसी समस्यायें होने लगती हैं।

क्लेमेडिया का मुख्य कारण बिना कंडोम सेक्स और ओरल सेक्स है। महिला-पुरूष जननांगों और उसके आसपास के एरिया के आपसी स्पर्श से यह संक्रमण फैलता है। इससे संक्रमित महिला यदि बच्चे को जन्म देती है तो उसका नवजात शिशु आंखों के संक्रमण (नेयोनेटल कन्जक्टीवाइटिस) का शिकार होकर अंधा हो सकता है। बिना प्रोटेक्शन ओरल सेक्स करने वाले व्यक्तियों की आंखे अक्सर इस संक्रमण का शिकार बन जाती हैं। ऐसी कंडीशन में आखों में लालामी, जलन, सूजन, चिपचिपाहट, आंसू बहना, फोटोफोबिया (रोशनी से परेशानी) और आंखों के चारों ओर के लिम्फ नोड्स में सूजन आ जाती है। डाक्टर फिजिकल जांच और यूरीन टेस्ट से इसका पता लगाते हैं। यदि महिलाओं में इस संक्रमण की पुष्टि होती है तो तुरन्त इसका इलाज प्रारम्भ करें अन्यथा फेलोपियन ट्यूब के संक्रमित होने पर मां बनने में दिक्कत हो सकती है।

सेक्सुअल इंटरकोर्स के समय कंडोम का प्रयोग इससे बचने का सबसे सरल उपाय है। ओरल सेक्स से बचें। जिस व्यक्ति को यह संक्रमण हो उसके अंडरगारमेन्ट अलग धोंये। सम्भव हो तो नीम के पत्ते डालकर पानी में उबालें और इससे स्नान करें तथा संक्रमित जननांग धोयें। यह संक्रमण एंटीबॉयोटिक से ठीक हो जाता है ऐसे में डाक्टर से मिलें और बिना झिझक अपनी समस्या बताकर इलाज करायें। संक्रमित अवस्था में नहाते समय पानी में एटीबैक्टीरियल द्रव्य (डेटॉल, सेवनॉल) मिला सकते हैं। बाथरूम में जिस स्टूल या चौकी पर बैठकर स्नान करते हैं उसे डेटॉल से साफ करें और किसी अन्य को उसका प्रयोग न करने दें। पश्चिमी स्टाइल की ट्ॉयलेट शीट को प्रयोग के बाद अच्छी तरह से एंटीबैक्टीरियल द्रव्य से साफ करने के बाद ही किसी अन्य को प्रयोग करने दें। इम्यून सिस्टम को स्ट्रांग करने वाला भोजन करें। इलाज में देरी से महिलाओं को गम्भीर समस्याओं से जूझना पड़ सकता है और हिस्ट्रक्टमी की नौबत आ सकती है।

गनेरिया (प्रमेह): यह भी एसटीआई अर्थात (सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज) संक्रमण है। इससे यूरेथ्ररा, योनि, एनस (गुदा), सर्विक्स, फिलोपियन ट्यूब्स, गर्भाशय, आंखें और गला संक्रमित होते हैं। क्लेमेडिया की भांति यह भी असुरक्षित ओरल, वाइजेनल और एनस सेक्स से फैलता है। गनेरिया संक्रमण के शिकार व्यक्ति को एक या दो सप्ताह बाद इसके लक्षण पता चलते हैं।

पुरूषों में इसके लक्षण यूरीनेशन में दर्द, यूरीनेशन न रोक पाना, पुरूष जननांग से मवाद (पस) रिसाव और सूजन, टेस्टीज (वृषण) में सूजन और दर्द तथा गले में लगातार खराश के रूप में सामने आते हैं। महिलाओं में योनि से सफेद क्रीमी या हल्के हरे रंग के द्रव्य का रिसाव, यूरीनेशन में दर्द और जलन, जल्दी-जल्दी यूरीनेशन, हैवी पीरियड्स, गले में खराश, सेक्सुअल इंटरकोर्स में दर्द, एब्डोमिन में तेज दर्द और बुखार।

डाक्टर इस संक्रमण को कन्फर्म करने के लिये संक्रमित एरिया से पस या द्रव्य लेकर जांच कराते हैं। गम्भीर मामलों में ब्लड टेस्ट किया जाता है। इलाज में कोताही करने पर महिलायें क्रोनिक पेल्विक पेन की शिकार हो जाती हैं। गम्भीर मामलों में इक्टोपिक प्रेगनेन्सी (इसमें फर्टाइल अंडा यूट्रेस में बाहर की ओर आ जाता है) भी हो सकती है। इससे दो या तीन माह के बाद गर्भपात हो सकता है। डिलीवरी के समय यह संक्रमण मां से बच्चे में ट्रासफर होने से नवजात पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लम्बे समय तक इससे पीड़ित महिलाओं की फर्टिलिटी घट जाती है। इसका इलाज एंटीबॉयोटिक से होता है और अनेक राज्य सरकारें सरकारी अस्पताल में इसके मुफ्त इलाज की सुविधा मुहैया कराती हैं। इससे बचाव के लिये कंडोम प्रयोग करें और ओरल सेक्स को न कहें। यदि पार्टनर के गनेरिया संक्रमित होने का जरा भी अंदेशा हो तो तुरन्त डाक्टर के पास जायें और इलाज करायें।

ऐंडोमेट्रिओसिस
उम्र के जिस दौर में महिलायें गर्भधारण करने में सक्षम होती हैं यह बीमारी उस दौरान होती है। इसमें मासिक चक्र के बीच यूट्रेस के वे टिश्यू (ऊतक) जिनकी ग्रोथ यूट्रेस में अंदर (इनसाइड) होनी चाहिये, बाहर की ओर भी (आउटसाइड) होने लगती है। जिससे माहवारी में असहनीय दर्द, इंटरकोर्स और मल-मूत्र विसर्जन में दर्द होता है। कभी-कभी यह दर्द पेल्विक एरिया से लेकर एब्डॉमिन तक फैल जाता है। दर्द के अलावा बहुत ज्यादा माहवारी, योनि क्षेत्र में सूजन और फुलावट, चकत्ते पड़ना, जलन, माहवारी के समय लोअर बैक में दर्द और उल्टी आना इसके प्रमुख लक्षण हैं। रेयर मामलों में ऐंडोमेट्रिओसिस से फेफड़े और डॉयाफ्राम भी प्रभावित हो जाते हैं।

यदि महिला ज्यादा समय तक इस बीमारी का शिकार रही है तो उसकी फर्टीलिटी घटने से मां बनने के चांस घट जाते हैं। डॉक्टरों के अनुसार यह बीमारी रेस्ट्रोग्रेड मेन्सुरेशन से होती है। इसमें माहवारी के दौरान खून का प्रवाह उल्टा हो जाता है और यह फिलोपियन ट्यूब से होकर पेल्विक कैविटी में पहुंच जाता है, जबकि सामान्य रूप से इसे योनि के रास्ते शरीर से बाहर निकलना चाहिये। कुछ नये शोधों के मुताबिक हारमोन्स का संतुलन बिगड़ने से भी यह कंडीशन बनती है। इसे कन्फर्म करने के लिये फिजिकल जांच के अलावा अल्ट्रासाउंड और लैप्रोस्कोपी की मदद ली जाती है।

इससे ग्रस्त महिलाओं का इलाज हारमोन थेरेपी से होता है लेकिन दर्द कम करने के लिये डाक्टर पेन मैनेजमेंट दवाइयां देते हैं। गम्भीर मामलों में जब हारमोन थेरेपी काम नहीं करती है तो कन्जरवेटिव सर्जरी से इलाज किया जाता है। इसमें प्रजनन अंगों को नुकसान पहुंचाये बिना केवल वे टिश्यू रिमूव किये जाते हैं जो इसका कारण हैं। यह सर्जरी लैप्रोस्कोपी से होती है। जब इस सर्जरी से काम नहीं चलता तो हिस्ट्रक्टमी ही इसका एक मात्र उपाय है।

एडेनोम्योसिस
इस कंडीशन में यूट्रेस की वॉल मोटी होने से माहवारी के दौरान हैवी ब्लीडिंग और दर्द, इंटरकोर्स के समय दर्द की शिकायत होती है। इसके अलावा माहवारी के दौरान लम्बे समय तक क्रैम्पस पड़ना, पीरियड के बीच ब्लीडिंग या स्पाटिंग, हैवी ब्लीडिंग, लम्बे समय माहवारी और एब्डॉमिनल एरिया में टेंडरनेस इसके अन्य लक्षण हैं। फिजिकल जांच के साथ अल्ट्रासाउंड से डाक्टर इसका पता लगाते हैं। गम्भीर मामलों में एमआरआई की जाती है। जैसे ही यह कंडीशन डॉयग्नोज हो इसके इलाज में शीघ्रता करें। इलाज में देरी जहां क्वालिटी ऑफ लाइफ तथा सेक्स लाइफ पर नकारात्मक असर डालती है वहीं इससे एनीमिया की कंडीशन बनने से थकावट, चिड़चिड़ापन और मूड स्विंग की समस्या हो जाती है। डाक्टर इसके इलाज में एंटी-इन्फ्लेमेटरी दवाइयों के साथ हारोमोन थेरेपी द्वारा शरीर में हारमोन्स का स्तर संतुलित करते हैं। अधिकतर मामलों में ये इलाज कारगर हैं लेकिन जब इलाज में कोताही की जाये तो यूट्रेस रिमूव करना ही एक मात्र उपाय बचता है।

फाइब्राइड्स (रसौली)
यह गर्भाशय में होने वाली असामान्य ग्रोथ है। इसका आकार बढ़ने से एब्डॉमिन में तेज दर्द और हैवी पीरियड होने लगते हैं। ज्यादातर मामलों में इसका कोई विशेष लक्षण नजर नहीं आता और यह कैंसर रहित अर्थात बिनायन होती है। इसे लियोम्योमस, म्योमस, यूट्राइन म्योमस और फाइब्रोमस भी कहते हैं। एक रिसर्च के मुताबिक 50 वर्ष की उम्र वाली लगभग 80 प्रतिशत महिलाओं में यह समस्या होती है। हारमोन्स (एस्ट्रोजन-प्रोजेस्ट्रॉन) का बैलेंस बिगड़ना और फैमिली हिस्ट्री इसके प्रमुख कारण हैं। इससे लम्बे समय तक माहवारी और बहुत ज्यादा ब्लीडिंग तथा बल्ड क्लॉट्स आना, अधिक मरोड़े (क्रैम्प्स) उठना, पेल्विक और लोअर बैक में दर्द, इंटरकोर्स में दर्द, यूरीनेशन बढ़ना, लोअर एब्डॉमिन में भारीपन तथा दबाब, एब्डॉमिन का बढ़ना और सूजन जैसी समस्यायें होती हैं।

अधिकतर मामलों में गॉयनाक्लोजिस्ट इसका पता फिजिकल जांच से लगा लेते हैं, कुछ मामलों में अल्ट्रासाउंड, पेल्विक एमआरआई की जरूरत भी पड़ती है। डॉक्टर रसोली के आकार के हिसाब से इसका इलाज करते हैं, इलाज में हारमोन थेरेपी का प्रयोग प्रमुख है। कुछ मामलों में इसे रिमूव करने के लिये सर्जरी की जाती है। घरेलू उपचार के रूप में एक्यूपंचर, योगा, मसाज तथा गरम सिकाई का प्रयोग करें। खानपान में बदलाव इसमें मददगार है, मीट और हाई-कैलोरी फूड से बचें, हरी सब्जियों, ग्रीन टी, ठंडा पानी, मछली, लहसुन, बीन्स, अखरोट, अदरक, सेब, अंगूर इत्यादि फ्लवनॉयड्स को खाने में बढ़ा दें। वजन कम करें और स्ट्रेस से बचें।

ओवेरियन सिस्ट
गर्भाशय की ओवरी (अंडाशय) में सिस्ट (गांठ) बनने से भी गम्भीर कंडीशन पैदा हो जाती है। जब सिस्ट छोटी होती हैं तो इसका कोई दुष्प्रभाव दिखाई नहीं देता लेकिन आकार बढ़ने पर अनेक कॉम्प्लीकेशन हो जाते हैं, जैसेकि पेल्विक या एब्डोमिन में एक तरफ हल्का या तेज दर्द तथा लोअर एब्डोमेन में भारीपन के साथ फुलावट महसूस होना। सिस्ट के यूट्रेस में टूटने (रैप्चर) से अचानक बहुत तीव्र पीड़ा उठती है। सिस्ट का पता चलते ही इलाज के लिये तुरन्त डाक्टर से मिलें, दवाइयों से इन्हें नष्ट किया जा सकता है। यदि सिस्ट बड़े आकार की है और रैप्चर होने का खतरा है तो सर्जरी से इसे निकलवा दें। इसमें देरी, यूट्रेस रिमूवल (हिस्ट्रक्टमी) का आधार बन जाती है।

निष्कर्ष
यूट्रेस से जुड़ी समस्याओं को सुरक्षित सेक्स, मेडीकेशन, नियमित कीगल व्यायाम, योगा, खानपान में परिवर्तन और मोटापा घटाकर ठीक कर सकते हैं तथा यूट्रेस रिमूव करने वाली सर्जरी हिस्ट्रक्टमी से बच सकते हैं। इसलिये जैसे ही कोई लक्षण नजर आयें तुरन्त गॉयनोक्लोजिस्ट से जांच करायें और उसकी सलाह पर मेडीकेशन अपनायें। गर्भाशय में किसी भी तरह की बिनायन ग्रोथ हमेशा नॉन कैंसरस होती है इसलिये सिस्ट, गांठ या रसौली होने पर घबराने की जरूरत नहीं है। कैंसर वाली गांठ होने पर यूट्रेस रिमूवल अनिवार्य है और इसके अलावा भी इलाज कराना पड़ सकता है। ऐसी किसी भी स्थिति में अच्छे और अनुभवी गॉयनोक्लोजिस्ट से सम्पर्क करें।

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