मेनोपॉज की तकलीफ ऐसे करें कम

मेडिकल साइंस में मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) वह वक्त है जिसमें किसी वयस्क महिला को लगातार 12 महीने माहवारी (मेन्सुरेशन) नहीं हो और स्वभाविक रूप से उसकी गर्भधारण क्षमता समाप्त हो जाए। सामान्य रूप से मेनोपॉज 45 से 55 वर्ष की उम्र में होता है लेकिन कुछ को यह इस आयु सीमा से पहले या बाद भी हो सकता है। इस दौरान महिलाओं को अत्यन्त कष्टदायक लक्षण महसूस होते हैं जैसे कि हॉट फ्लैशेज़ (अचानक तेज गर्मी लगना), मूड स्विंग, जोड़ो में दर्द, एक या दो सप्ताह लगातार ब्लीडिंग और वजन बढ़ना इत्यादि।

मेनोपॉज एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इसमें मेडिकल सपोर्ट की जरूरत नहीं पड़नी चाहिये लेकिन बदलती जीवन शैली और खान-पान से मेनोपॉज के दौरान अनेक कॉम्प्लीकेशन हो जाते हैं जिनसे बचने के लिये मेडीकेशन व कुछ मामलों में तो सर्जरी की जरूरत पड़ती है। मेनोपॉज के दौरान नार्मल लाइफ जीते हुए इन कष्टों से कैसे बचा जाये इस सम्बन्ध में जब मैंने दिल्ली की मशहूर और अनुभवी गॉयन्कोलोजिस्ट डा. इन्दु कपूर से बात की तो उनसे यह उपयोगी जानकारी हासिल हुई-

मेनोपॉज की शुरूआत?

ज्यादातर महिलाओं में मेनोपॉज के लक्षण उनकी अंतिम माहवारी से 4 वर्ष पहले उभरने लगते हैं। कुछ में मेनोपॉज से करीब एक दशक पहले से इसके छोटे-छोटे लक्षण नजर आने लगते हैं जैसे कि एक या दो दिन अल्प मात्रा में माहवारी या इस दौरान तेज दर्द इत्यादि। इस सम्बन्ध में हुए शोध के मुताबिक 10 में से 1 महिला, मेनोपॉज के लक्षण अपनी अंतिम माहवारी के 12 वर्ष बाद तक महसूस करती है।

मेडिकल सांइस में मेनोपॉज की औसत आयु 51 वर्ष मानी गयी है लेकिन यह नस्ल और देश काल के हिसाब से दो या तीन साल आगे-पीछे होती है। उदाहरण के लिये एशियन महिलाओं में यह 45-47 वर्ष, अफ्रीकन महिलाओं के लिये 48-51 और अमेरिकन तथा योरोपियन के लिये 44 वर्ष है।

मेनोपॉज किस उम्र में होगा यह और भी कई बातों पर निर्भर है जैसेकि जेनेटिक्स और महिला का सम्पूर्ण स्वास्थ्य (विशेष रूप से ओवरी की सेहत)। मेनोपॉज एकदम नहीं होता बल्कि इसके पहले शरीर प्रि-मेनोपॉज की प्रक्रिया से गुजरता है जिसमें शरीर में बनने वाले हारमोन्स मेनोपॉज की तैयारी करते हैं। प्रि-मेनोपॉज का दौर कुछ माह या कुछ वर्ष तक चल सकता है। 50 प्रतिशत महिलायें जैसे ही 45-48 वर्ष की होती हैं उनमें प्रि-मेनोपॉज की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और इसके लक्षण बहुत कम समय के लिये अल्प मात्रा में माहवारी के रूप में दिखाई देते हैं।

करीब 40 प्रतिशत महिलाओं में प्रि-मेनोपॉज के लक्षण नहीं उभरते हुए उन्हें अचानक मेनोपॉज हो जाता है। 1 या दो प्रतिशत महिलाओं में यह 40 वर्ष की उम्र में ही हो जाता है, इसे प्रि-मैच्योर मेनोपॉज या प्राइमरी ओवेरियन इन्सफीशियेन्सी (अपर्याप्तता) कहते हैं। 5 से 8 प्रतिशत महिलायें 40 से 45 वर्ष की उम्र के बीच मेनोपॉज से गुजरती हैं, मेडिकल साइंस में इसे अरली मेनोपॉज कहते हैं। कुछ रेयर मामलों में तो 60 वर्ष की उम्र में भी मेनोपॉज हुआ। मेडिकल साइंस में मेनोपॉज की ये कंडीशन्स हैं-

प्रि-मेनोपॉज: इस अवस्था में ओवरी (अंडाशय) धीरे-धीरे एस्ट्रोजन बनाना कम करती है जिससे माहवारी में देरी या एक-दो माह का गैप पड़ने लगता है। इस अवधि में मेन्सुरेशन फ्लो (ब्लीडिंग) बहुत कम या बहुत ज्यादा होता है, ऐसा 6 से 10 वर्ष तक चल सकता है।

मेनोपॉज: जब महिला को लगातार 12 महीने तक माहवारी न हो।

पोस्ट-मेनोपॉज: माहवारी बंद हुए एक वर्ष से अधिक समय बीतने के बाद यह पीरियड शुरू होता है।

क्यों होता है मेनोपॉज?

यह एक नेचुरल प्रोसेस है जिसमें अंडाशय (ओवरी) की कार्य-क्षमता धीरे-धीरे घटती है। प्रजनन हारमोन्स  (एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन, टेस्टोस्टेरोन, फोलिकल स्टिमुलेटिंग हारमोन (एफएसएच) और ल्यूटिनाइजिंग हारमोन्स का बनना कम होने से शरीर में बदलाव आते हैं जिनसे एक्टिव ओवेरियन फोलिकल्स (सक्रिय डिम्ब-ग्रन्थि रोम) की फंक्शनिंग घट जाती है। ओवेरियन फोलिकल्स ही वह स्ट्रक्चर है जो ओवरी में अंडे का निर्माण कर उसे रिलीज करता है जिससे महिलाओं में फर्टीलिटी आने के साथ माहवारी (मेन्सुरेशन) होती है।

कभी-कभी अंडाशय और पैल्विक एरिया (श्रोणि) में सर्जरी या चोट से भी मेनोपॉज हो जाता है। इसके अलावा ओफरेक्टमी या सर्जरी से ओवरी रिमूवल, ओवरी फंक्शन बंद होना, ओवरी में एस्ट्रोजन रिसेप्टर पॉजटिव ट्यूमर के लिये की गयी हारमोन थेरेपी, सर्जरी,  रेडियोथेरेपी, पैल्विक रेडियेशन और योनि क्षेत्र में लगी चोट भी मेनोपॉज का कारण होती है।

सिम्पटम और कॉम्प्लीकेशन

मेनोपॉज में प्रत्येक महिला का अनुभव अलग-अलग होता है। मेनोपॉज के लक्षण तब बहुत गम्भीर हो जाते हैं जब अचानक या बहुत ही कम अवधि में मेनोपॉज हो जाये। म्यो क्लीनिक (अमेरिका) में हुए एक शोध के अनुसार इस तरह के मेनोपॉज का सामना करने वाली महिलाओं में 50 प्रतिशत से ज्यादा को यूट्रेस में कैंसर या सिस्ट की वजह से अचानक मेनोपॉज हुआ। रेगुलर स्मोकिंग और अधिक मदिरापान से भी अचानक मेनोपॉज हो जाता है।

प्रि-मेनोपॉज में कम माहवारी, सामान्य से कम या ज्यादा ब्लीडिंग और वैसोमोटर सिम्पटम (हॉट फ्लैशेज, कोल्ड फ्लेशेज, मूड स्विंग, नाइट स्वेटिंग और फ्लैशिंग) उभरते हैं।

मेनोपॉज में अनिद्रा, योनि में सूखापन, वजन बढ़ना, डिप्रेशन, एंग्जॉयटी (चिंता), ध्यान केन्द्रित करने में समस्या, याददाश्त कमजोर होना, कामेच्छा में कमी, त्वचा, मुंह व आंखों में सूखापन, ज्यादा यूरीनेशन, गले में खरास, ब्रेस्ट नरम होना, सिर दर्द, दिल की धड़कन बढ़ना, यूरीनरी ट्रैक इंफेक्शन (यूटीआई), मांसपेशियों में कमजोरी, जोड़ों में दर्द और अकड़न, स्तनों का ढलकना, बालों का झड़ना, चेहरे, गर्दन, छाती और पीठ के ऊपरी भाग (अपर बैक) में बालों की वृद्धि जैसे लक्षण उभरते हैं।

कॉम्प्लीकेशन्स- मेनोपॉज में एस्ट्रोजन की कमी से योनि की दीवार का पतला होना, डिस्पेरूनिया या सम्भोग के समय दर्द, मेटाबोलिक फंक्शन धीमे पड़ना, ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों का कमजोर होना), मूड स्विंग या अचानक भावनात्मक परिवर्तन, कैटरेक्ट (मोतियाबिंद), पेरिओडॉन्टल डिसीस (मसूड़ों में संक्रमण), अनियन्त्रित यूरीनेशन और कार्डियो वैस्कुलर डिसीस जैसे कॉम्प्लीकेशन्स हो सकते हैं।

मेनोपॉज और वजाइनल डिस्चार्ज

मेनोपॉज के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन का संतुलन बिगड़ने से शरीर की कार्य-प्रणाली में कई परिवर्तन होते हैं जैसेकि योनि से डिस्चार्ज होने वाले फ्लूड की मात्रा में कमी या बढ़ोत्तरी। मेडिकल भाषा में इसे वजाइनल डिस्चार्ज (योनि स्राव) कहते हैं, यह महिला जीवन की सामान्य बात है, इससे योनि में गीलापन रहता है और एसिडिक होने से यह यूटीआई जैसे संक्रमणों से बचाता है। आमतौर पर मेनोपॉज में वजाइनल डिस्चार्ज में बढोत्तरी से महिला को परेशानी तो होती है लेकिन इसके लिये किसी इलाज की जरूरत नहीं पड़ती। इलाज की जरूरत तब होती है जब वजाइनल डिस्चार्ज असामान्य हो। सामान्य डिस्चार्ज में क्लियर, सफेद या क्रीमी फ्लूड निकलता है जो ज्यादा गाढ़ा न होकर पानी की तरह व गंधहीन होता है, इससे किसी भी तरह की इरीटेशन (खुजली इत्यादि) नहीं होती। असामान्य वजाइनल डिस्चार्ज में दुर्गन्ध के अलावा योनि में जलन, खुजली (इचिंग) और सम्भोग में दर्द होता है। सफेद गाढ़े कॉटेज चीज की तरह का वजाइनल डिस्चार्ज यीस्ट इंफेक्शन, ग्रे कलर का डिस्चार्ज बैक्टीरियल इंफेक्शन और इसका भूरा-पीला रंग डेस्क्यूमेटिव इन्फ्लेमेटरी वजाइनिटिस या वजाइनल एट्रॉफी का सूचक है। इसके गुलाबी-ग्रे कलर होने का अर्थ है कि यूट्रेस से ब्लड आ रहा है। मेनोपॉज के बाद ब्लड आना यूट्रेस में किसी गम्भीर समस्या (कैंसर या सिस्ट) का सूचक है।

मेनोपॉज की पुष्टि

यदि महिला की उम्र 45 वर्ष के आस-पास है और मासिक धर्म अनियमित हो गया है तो जरूरी है कि वह डाक्टर (गॉयन्कोलोजिस्ट) से मिले। मेडिकल साइंस में हुई एडवांसमेंट से एक नये ब्लड टेस्ट पीको-एएमएच एलिसा से पता लगाया जा सकता है कि महिला मेनोपॉज में प्रवेश कर रही है या किसी अन्य कारण से माहवारी बंद हुई है। यह टेस्ट प्रि-मेनोपॉज स्टेज से गुजर रहीं महिलाओं के लिये भी उपयोगी है, क्योंकि प्रि-मेनोपॉज स्टेज में भी महिला का स्वास्थ्य नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है।

मेनोपॉज की पुष्टि के लिये डाक्टर, एस्ट्राडियोल नामक ब्लड टेस्ट की मदद लेते हैं, इससे रक्त में प्रजनन हारमोन्स (एस्ट्रोजन और एफएसएच) का स्तर पता चलता है। यदि एक वर्ष से लगातार माहवारी नहीं हो रही और रक्त में एफएसएफ का स्तर 30 से अधिक है तो मेनोपॉज की पुष्टि हो जाती है।

इस टेस्ट के अलावा लार (स्लाइवा) परीक्षण और ओटीसी (ओवर द काउंटर) यूरीन टेस्ट से भी मेनोपॉज की पुष्टि की जाती है प्रि-मेनोपॉज में महिला शरीर में एफएसएच और एस्ट्रोजन लेवल रोजाना ऊपर-नीचे होता है इसलिये डाक्टर मेनोपॉज कन्फर्म करने के लिये मेडिकल हिस्ट्री, माहवारी से जुड़ी जानकारी और अन्य सम्बन्धित लक्षणों को मेनोपॉज की पुष्टि का आधार बनाते हैं।

महिला की हेल्थ हिस्ट्री और लक्षणों को देखकर डाक्टर कुछ एडीशनल ब्लड टेस्ट भी लिख सकते हैं। इन टेस्टों से उन बीमारियों को रूलआउट किया जाता है जिनसे मेनोपॉज जैसी कंडीशन बन सकती है। इस संदर्भ में थायराइड फंक्शन टेस्ट, ब्लड लिपिड प्रोफाइल, लीवर फंक्शन टेस्ट, किडनी फंक्शन टेस्ट, टेस्टोस्टेरोन, प्रोजेस्टेरोन, प्रौलेक्टिन, एस्ट्राडियोल और कोरियोनिक गोनाडोट्रोपिन (एचसीजी) जैसे टेस्ट किये जाते हैं।

थॉयराइड और मेनोपॉज

जब थॉयराइड ग्रन्थि शरीर के लिये जरूरी मात्रा से कम हारमोन बनाती है तो हाइपोथॉयरायडिज्म नामक कंडीशन बनती है। मेनोपॉज और हाइपोथॉयरायडिज्म के कई लक्षण एक जैसे हैं। 45 से 55 वर्ष के आयु वर्ग की महिलाओं में हाइपोथॉयरायडिज्म आम समस्या है और यही वह समय है जब महिलायें मेनोपॉज से गुजरती हैं। मेनोपॉज के समय महिला शरीर में एस्ट्रोजन की कमी से थॉयराइड ग्रन्थि की कार्य-क्षमता घटती है जिससे हाइपोथॉयरायडिज्म होता है। इसमें महिलाओं में ठंड के प्रति संवेदनशीलता, ब्लड में कोलोस्ट्रोल व ट्राइग्लिसराइड  बढ़ना, हार्ट रेट घटना, याददाश्त में कमजोरी, थकान, वजन बढ़ना, मांसपेशियों और जोड़ों में कमजोरी, डिप्रेशन, सैडनेस, गला बैठना और त्वचा में सूखापन जैसे लक्षण उभरते हैं। इनकी वजह से मेनोपॉज के लक्षण ज्यादा  जटिल हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में गॉयन्कोलोजिस्ट से मिलें और थायराइड फंक्शन टेस्ट करायें। थॉयराइड के उपचार से मेनोपॉज के कष्टों में कमी आने से जीवन कुछ हद तक सामान्य हो जाता है।

कैसी हो मेनोपॉज में डाइट?

मेनोपॉज के दौरान या बाद में शरीर मे प्रोजेस्टेरॉन और एस्ट्रोजन का बैंलेस बिगड़ने से होने वाली समस्याओं को पौष्टिक और संतुलित आहार से कम किया जा सकता हैं-

  1. मेनोपॉज के दौरान डेयरी पदार्थों (दूध, दही, पनीर, मक्खन इत्यादि) का सेवन शरीर में कैल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम, मैग्नीशियम, विटामिन डी और विटामिन के की कमी पूरी करता है इनसे हड्डियों को मजबूती मिलने के साथ अनिद्रा के लक्षण कम होते हैं। एक शोध में पाया गया कि दूध और चीज़ में मौजूद ग्लाइसिन नामक एमिनो एसिड मेनोपॉज के दौरान गहरी नींद प्रमोट करने के अलावा प्रि-मैच्योर मेनोपॉज का रिस्क घटाता है।
  2. ओमेगा-3 फैटी एसिड का सेवन महिला को मेनोपॉज में सहजता प्रदान करता है, इस सम्बन्ध में 483 महिलाओं पर हुए एक शोध में पाया गया कि ओमेगा-3 सप्लीमेन्ट्स लेने पर इनमें हॉट फ्लेशेज और नाइट स्वेटिंग में कमी आयी। फ्लैक्स सीड, चिया सीड, हेम्प सीड और मछली में ओमेगा-3 फैटी एसिड भरपूर मात्रा में पाये जाते हैं।
  3. मेनोपॉज के दौरान कार्डियोवैस्कुलर डिसीस (हार्ट प्रॉब्लम्स), कैंसर और असमय (जल्द) मृत्यु का रिस्क कम करने में साबुत अनाज का सेवन लाभदायक है। मेनोपॉज से गुजर चुकीं 11000 महिलाओं पर किये अध्ययन से पता चला कि रोजाना 4.7 ग्राम साबुत अनाज के फाइबर सेवन से असमय मृत्यु दर में 17 प्रतिशत कमी आयी। ब्राउन राइस, चोकर युक्त आटा, जौ, बाजरा, किनुआ और रागी में भरपूर मात्रा में फाइबर होता है।
  4. मेनोपॉज सहज बनाने में नियमित फलों और सब्जियों का सेवन लाभकारी है क्योंकि इनमें विटामिन्स, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं। मेनोपॉज से गुजर रहीं 17000 महिलाओं पर एक वर्ष तक किये एक शोध में पाया गया कि जिन महिलाओं ने फल, सब्जियों, फाइबर और सोयाबीन का नियमित सेवन किया उन्हें अन्य महिलाओं की तुलना में 19 प्रतिशत कम कष्ट महसूस हुए और वजन भी घटा।
  5. ब्रोकली, फूलगोभी, बंदगोभी और इसी तरह की हरे व गहरे रंग के पत्ते वाली सब्जियों के सेवन से स्तन कैंसर को बढ़ावा देने वाले एक टाइप के एस्ट्रोजन के स्तर में कमी और स्तन कैंसर से बचाने वाले एक अन्य टाइप के एस्ट्रोजन के स्तर में बढ़ोत्तरी हुई। गहरे रंग वाली बेरीज (ब्लू बेरी, क्रेन बैरी, अकाइ बेरी) के सेवन सेवन से हार्ट सम्बन्धी समस्याओं में कमी और ब्लड प्रेशर कंट्रोल रहता है।
  6. रोजाना 200 मिलीग्राम अंगूर के बीजों के एक्सट्रैक्ट का सप्लीमेंट के रूप में सेवन मेनोपॉज से गुजर रही महिलाओं में हॉट फ्लैशेज, अनिद्रा और डिप्रेशन कम करता है। सोयाबीन्स, छोले (सफेद चने), मूंगफली, फ्लेक्सीड, ज्वार, अंगूर, आलूबुखारा और ग्रीन टी से एस्ट्रोजन का स्तर बढ़ता है और मेनोपॉज के कष्टदायक लक्षण कम महसूस होते हैं।
  7. शरीर में एस्ट्रोजन लेवल घटने से मांसपेशियां कमजोर और हड्डियों का वजन घटता है ऐसे में मेनोपॉज से गुजर रही महिला को अच्छी क्वालिटी की प्रोटीन का सही मात्रा में नियमित सेवन जरूरी है। एक शोध के मुताबिक रोजाना 1-1.2 ग्राम प्रोटीन का सेवन अपने शरीर के प्रतिकिलो वजन के हिसाब से करना चाहिये। उदाहरण के लिये यदि महिला का वजन 60 किलो है तो उसके लिये रोजाना 60 से 70 ग्राम प्रोटीन का सेवन जरूरी है। अंडे, मीट, मछली, दूध, पनीर इत्यादि अच्छी क्वालिटी की प्रोटीन के अच्छे सोर्स हैं।
  8. मेनोपॉज के कष्टदायक लक्षणों को कम करने हेतु चीनी, कैफीन, एल्कोहल, मिर्च-मसालों युक्त भोजन और नमक का सेवन या तो कम कर दें या पूरी तरह से बंद।

जीवन शैली में बदलाव से राहत

  1. सोते समय ढीले और परतदार (लेयर्ड) सूती कपड़े पहने और शयनकक्ष को ठंडा व बिस्तर से कम्बल या रजाई दूर रखें। यदि रेगुलर नाइट स्वेट्स आ रहे हैं तो सोने के पहले स्नान करें।
  2. वजन कम करने के लिये डेली कैलोरी इनटेक घटायें और 20 से 30 मिनट नियमित व्यायाम करें।
  3. डिप्रेशन, एंग्जॉयटी, आइसोलेशन, इन्सोम्निया, सैडनेस या व्यक्तित्व में आ रहे परिवर्तनों (आइडेन्टिटी चेन्जेज) से बचने के लिये मनोचिकित्सक या अपने पति, परिवार के सदस्यों या मित्रों से इस सम्बन्ध में खुलकर बात करें।
  4. ऑस्टियोपोराइसिस का रिस्क घटाने और इनर्जी लेवल मेन्टेन करने के लिये डाइट में कैल्शियम, विटामिन डी और मैग्नीशियम सप्लीमेंट्स शामिल करें।
  5. नियमित योगा, बॉक्स ब्रीदिंग (धीमी और गहरी सांसे लेना) और मेडीटेशन से अपने आपको रिलेक्स करें। जैसे ही हॉट फ्लेशेज महसूस हों तुरन्त धीमी और गहरी सांसें लेना शुरू करें।
  6. त्वचा का सूखापन (ड्राइनेस) कम करने के लिये ज्यादा नहाने तथा स्वीमिंग से बचें और मोस्चराइजर प्रयोग करें।
  7. नींद न आने की समस्या को दूर करने के लिये रात को स्नान करने के बाद ही सोने जायें और यदि सम्भव हो तो सोने से पहले 200 मिलीलीटर गरम दूध पियें।
  8. धूम्रपान, सेकेंडहैंड स्मोक व मदिरापान से बचें। मेनोपॉज में अधिक मात्रा में मदिरापान से दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर बढ़ने से कार्डियावैस्कुलर डिसीस का रिस्क बढ़ जाता है।
  9. कई हर्बल सप्लीमेंट्स शरीर में एस्ट्रोजन कमी दूर करके मेनोपॉज के कष्टों को कंट्रोल करने में सहायक हैं। इस सम्बन्ध में ब्लैक कोहोश की जड़ों से बने सप्लीमेंट सबसे ज्यादा प्रयोग किये जाते हैं। ओमेगा-3 फैटी एसिड युक्त सप्लीमेंट्स कार्डियोवैस्कुलर बीमारियां और जिनसेंग नामक हर्ब से बने सप्लीमेंट्स फेटीक (थकान), एंग्जॉयटी और स्ट्रेस से दूर रखते हैं।
  10. एक्यूपंचर को मेनोपॉज में होने वाले कष्ट कम करने के लिये वैकल्पिक चिकित्सा के रूप में कारगर माना गया है। इस सम्बन्ध में हुए शोध से पता चला है कि यह हारमोन थेरेपी से बेहतर है।

मेडिकल -इलाज

मेनोपॉज के लक्षण गम्भीर होने से जब क्वालिटी ऑफ लाइफ प्रभावित हो तो ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ती है। यदि महिला की उम्र 60 वर्ष से कम है और मेनोपॉज को 10 वर्ष हो गये हैं तो हारमोन थेरेपी (एचआरटी) सबसे कॉमन इलाज है। इस थेरेपी से हॉट फ्लेशेज, नाइट स्वेटिंग, फ्लशिंग (गालों और गले का लाल होना), योनि की दीवारों का कमजोर होना (वजाइनल एट्रोफी) और ऑस्टियोपोराइसिस इत्यादि का इलाज किया जाता है। आजकल इस थेरेपी में स्किन पर चिपकाने वाले  पैच प्रयोग किये जाते हैं। इन्हें स्किन पर चिपकाने से हारमोन शरीर में चला जाता है। इसके अलावा इलाज के जो अन्य तरीके प्रयोग किये जाते हैं वे लक्षण विशेष के अनुसार होते हैं, जैसेकि बाल झड़ना, योनि में सूखापन या दर्द और ऑस्टियोपोराइसिस इत्यादि।

यदि बाल झड़ रहे हैं तो टॉपिकल मिनीऑक्सीडिल 5 प्रतिशत का दिन में एक बार प्रयोग करें। केटोकोनाजोल 2 प्रतिशत और जिंक पेरीथियोन 1 प्रतिशत के कॉम्बीनेशन वाले शैम्पू का प्रयोग डेन्डरफ और बालों का झड़ना रोकता है। एफ्लोरिनीथाइन हाइड्रोक्लोराइड टॉपिकल क्रीम से शरीर पर अनचाहे बालों की ग्रोथ रूकती है। फ्लैशेज, एंग्जॉयटी और डिप्रेशन कम करने के लिये पैराऑक्सीटिन 75 मिलीग्राम का प्रयोग कारगर है।

योनि में सूखापन कम करने के लिये नॉन-हारमोनल वैजाइनल मोस्चराइजर एंड लुब्रीकेंट्स और लो-डोज एस्ट्रोजन बेस्ड वैजाइनल लुब्रीकेंट का प्रयोग लाभकारी है। योनि के सूखेपन से सम्भोग में होने वाले दर्द को कम करने के लिये ओस्पेमीफेन प्रयोग की जाती है और पोस्टमेन्सुरल ऑस्टियोपोराइसिस को रोकने के लिये डेनोसुमेब, टेरीपैराटाइड, रेलोक्सीफेन या कैल्सीटोनिन का प्रयोग  होता है।

मेनोपॉज और सेक्स लाइफ

जब महिला मेनोपॉज में प्रवेश करती है तो उसकी कामेच्छा या सेक्स ड्राइव में बदलाव आते हैं। इन बदलावों से ज्यादातर में कामेच्छा कम और कुछ में बढ़ जाती है। कामेच्छा कम होने का मूल कारण शरीर में हारमोन्स का स्तर घटने से योनि में सूखापन और जकड़न का आना है। ऐसे में सेक्स लाइफ सही रखने के लिये जीवन शैली में बदलाव करें और सेक्स के समय लुब्रीकेंट प्रयोग करें। अपने देश में इस तरह के लुब्रीकेंट के रूप में नारियल का तेल सबसे उपयुक्त है। वैसे मेडिकल स्टोर पर लुब्रीकेंट के रूप में अनेक प्रकार की जेली और एस्ट्रोग्लाइड उपलब्ध होते हैं। मेनोपॉज में वजन बढ़ने से कामेच्छा कम हो जाती है ऐसे में नियमित व्यायाम व प्रोटीन और फाइबर युक्त पौष्टिक खाने को अपनाकर वजन घटायें। कीगल एक्सरसाइज ऐसे में ज्यादा उपयोगी हैं। यदि कामेच्छा में कमी का कारण शरीर में एस्ट्रोजन या अन्य हारमोन्स का ज्यादा घटना है तो डाक्टर से मिलकर हारमोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (एचआरटी) अपनायें। इसके तहत डाक्टर एस्ट्रोजन टेबलेट खाने और पैच लगाने की सलाह देते हैं, इससे योनि का सूखापन कम होने के साथ उसकी दीवारों (वजाइनल वॉल) का पतला होना रूकता है। एस्ट्रोजन थेरेपी को कभी भी अपने आप न लें,  इसके कई गम्भीर खतरे हैं, इसका गलत मात्रा और लम्बे समय तक सेवन ब्लड क्लॉट्स, हार्ट अटैक और ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क बढ़ाता है।

नजरिया

मेनोपॉज या रजोनिवृत्ति महिला के मासिक धर्म चक्र की प्राकृतिक समाप्ति और प्रजनन क्षमता के अंत का प्रतीक है। अधिकांश महिलाओं को इसका अनुभव 45 से 52 वर्ष के बीच होता है इसके कष्टप्रद लक्षण क्वालिटी ऑफ लाइफ खराब करते हैं। आमतौर पर डाक्टरी सलाह, प्राकृतिक उपचार, खानपान और लाइफ स्टाइल में परिवर्तन करके इससे होने वाले कष्टों को कम या कंट्रोल किया जा सकता है। यदि मेनोपॉज के बाद अचानक ब्लीडिंग हो या सेक्स के बाद ब्लड स्पॉट नजर आये तो तुरन्त डाक्टर से मिलें, क्योंकि यह पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम या सर्विकल कैंसर से भी हो सकता है। यदि स्वास्थ्य की नियमित जांच (विशेष रूप से आंखों और दांतों की), स्वास्थ्यवर्धक भोजन और रेगुलर व्यायाम करते रहें तो मेनोपॉज के बाद और पहले की लाइफ में कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। पौष्टिक आहार से जहां स्वास्थ्य ठीक रहता है वहीं नियमित जांच से सेहत से जुड़ी समस्याओं की सही जानकारी मिलने से समय से उपचार हो जाता है।

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