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दिमागी जैकब रोग खतरनाक

जानलेवा संक्रामक दिमागी रोग है जैकब डिसीस

इसका पूरा नाम क्रूट्सफेल्ड-जैकब डिसीस (सीजेडी) है मेडिकल साइंस में इसे प्रियन डिसीस के नाम से भी जाना जाता है। तेजी से बढ़ने वाले इस संक्रामक दिमागी रोग (न्यूरोडिजेनरेटिव डिस्आर्डर) के 90 प्रतिशत मामलों में रोगी की मृत्यु एक वर्ष के अंदर हो जाती है। इसमें ब्रेन सेल्स नष्ट होने से रोगी की याददाश्त कमजोर और मांसपेशियों में ऐंठन होती है, बीमारी बढ़ने के साथ रोगी की पर्सनाल्टी बदलती है और वह डिमेन्शिया का शिकार हो जाता है। इसके कई टाइप हैं और सबसे कॉमन टाइप स्पोराडिक सीजेडी है। हमारे देश में प्रतिवर्ष इसके कई हजार मामले दर्ज होते हैं। इसकी पूरी तरह से क्योर नहीं है लेकिन दवाओं से इसे मैनेज किया जाता है।

लक्षण क्या हैं?

इसके शिकार व्यक्ति में ये लक्षण उभरते हैं-

– रोगी डिमेन्शिया का शिकार हो जाता है जिससे उसकी सोचने, कारण जानने, कम्युनीकेट करने और अपनी देखभाल करने की क्षमता घटने लगती है।

– रोगी एटाक्सिया का शिकार हो जाता है जिससे शारीरिक संतुलन और क्वार्डीनेशन बिगड़ जाता है।

– रोगी के व्यवहार में परिवर्तन आने से वह भ्रम व भटकाव की स्थिति में रहने लगता है।

– दौरे (सीजर्स) पड़ते हैं व मांसपेशियां ऐंठने के साथ उनमें अकड़न आ जाती है।

– हमेशा नींद या तन्द्रा में रहता है और बात करने में कठिनाई महसूस होती है।

– कुछ मामलों में रोगी अंघेपन का शिकार हो जाता है।

क्यों होती है यह बीमारी?

यह बीमारी, प्रियन नामक संक्रामक एजेंट से होती है जो एक तरह का स्मॉल प्रोटीन है। यह प्रोटीन कुछ स्तनधारियों के ऊतकों में पाया जाता है। प्रियन प्रोटीन में खराबी आने से इसके टिश्यू असामान्य रूप से मुड़कर गुच्छे में तब्दील हो जाते हैं जिसकी वजह से शरीर में मौजूद सामान्य प्रोटीन भी प्रियन की इस गलत संरचना से संक्रमित होने लगता हैं। जिससे नर्व सेल्स नष्ट होने के कारण दिमाग की कोशिकाओं की संरचना बिगड़ने से दिमाग को चोट लगने जैसी अनुभूति होती है और ब्रेन सेल्स मरने लगते हैं, इस वजह से दिमाग में स्पन्ज की तरह छेद बन जाते हैं। इसी कारण जैकब डिसीस को स्पन्जीफार्म इन्सेफैलोपैथी कहते हैं।

एक रिसर्च से पता चला है कि प्रियन प्रोटीन का संक्रमण गायों में होने वाली मैड काउ डिसीस (बोविन स्पॉन्जीफार्म इन्सेफैलोपैथी या बीएसई) के लिये जिम्मेदार है। 1990 और 2000 में इंग्लैंड में फैली मैड काउ डिसीस से बड़ी संख्या में जानवरों की मृत्यु हो गयी थी और इन जानवरों से बने खाद्य पदार्थों के सेवन से मनुष्य भी संक्रमित हुए थे। यही कारण है कि मैड काउ डिसीस (बीएसई) और मनुष्यों में होने वाली जैकब बीमारी (वीसीजेडी) को एक दूसरे से लिंक माना जाता है।

कितने टाइप हैं इसके?

स्पोराडिक सीजेडी: इसकी चपेट में 20 से 70 वर्ष की उम्र वाले व्यक्ति आते हैं। एक स्टडी से पता चला है कि 50 वर्ष या इससे ज्यादा उम्र के लोगों को अधिक रिस्क होता है। इसमें प्रियन प्रोटीन असामान्य रूप से म्यूटेट होता है। जैकब डिसीस से ग्रस्त 85 प्रतिशत रोगी स्पोराडिक सीजेडी का शिकार होते हैं और 65 वर्ष से ऊपर के लोगों को इसका रिस्क सबसे अधिक होता है। इस बीमारी और मैड काउ डिसीस में किसी तरह का लिंक नहीं है।

फैमिलियल सीजेडी: यह जेनेटिक रोग है और इसमें व्यक्ति अपने माता-पिता या परिवार के सदस्यों से म्यूटेट हुए प्रियन प्रोटीन को ग्रहण करता है।

वैरियेन्ट सीजेडी: जैकब डिसीस का यह टाइप जानवरों से मनुष्यों में जाता है। जब यह जानवरों में होता है तो इसे मैड काउ डिसीस या बीएसई कहते हैं। यह बीमारी, जवान लोगों को अपनी चपेट में लेती है। जब मनुष्य मैड काउ डिसीस से संक्रमित जानवर का मांस खाता है तो उसके संक्रमित होने के चांस बढ़ जाते हैं। यदि सक्रंमित व्यक्ति का रक्त किसी को चढ़ा दिया जाये या उसका टिश्यू किसी में ट्रांसप्लांट हो जाये तो उसे यह बीमारी हो जाती है। अनेक मामलों में पाया गया कि यह अच्छी तरह से स्टरलाइज न किये गये सर्जिकल उपकरणों से भी फैल जाती है। ऐसा उस स्थिति में होता है जब ब्रेन, आंखों और दातों की सर्जरी में इस्तेमाल किये उपकरण अच्छी तरह से साफ न किये गये हों।

किन्हें ज्यादा रिस्क है?

उम्र बढ़ने के साथ इससे संक्रमित होने का रिस्क बढ़ता है लेकिन यह रिस्क उसी स्थिति में है जब कोई बीमार व्यक्ति के थूक, रक्त, पसीने (फ्लूड) या टिश्यू के सम्पर्क में आ जाये। यह बीमारी ज्यादा न फैले इसलिये डाक्टर रोगियों को ये अतिरिक्त सावधानियां बरतने की सलाह देते हैं-

– अपने हाथों और चेहरे को शरीर से निकलने वाले फ्लूड के सम्पर्क में आने से बचायें। जैसेकि पसीना, थूक, छींक से उड़ने वाले ड्राप्लेट, शरीर से बहने वाले रक्त और आंसू इत्यादि।

– खाना खाने, स्मोकिंग या पानी पीने से पहले हाथ और चेहरा अच्छी तरह से धोयें।

– शरीर पर लगे चोट या जख्म के लिये हमेशा वाटरप्रूफ वैंन्डेज प्रयोग करें।

इसके अलावा जानवरों के मांस का सेवन करने वालों को इसका रिस्क ज्यादा होता है।

पुष्टि कैसे होती है?

पुष्टि की प्रक्रिया में डाक्टर कम्पलीट मेडिकल हिस्ट्री जानने के बाद फिजिकल और न्यूरोलॉजिकल जांच करते हैं। चूंकि यह बीमारी तेजी से बढ़ती है इसलिये दिमाग पर इसका असर जानने के लिये एमआरआई, कैट स्केन, लम्बर पंचर, ईईजी जैसे इमेजिंग टेस्टों के साथ कुछ ब्लड टेस्ट किये जाते हैं। ब्लड टेस्ट से उन बीमारियों का पता लगाते हैं जिनकी वजह से डिमेन्शिया हो सकता है जैसेकि हाइपोथॉयराइडिज्म और सिफलिस। जब डाक्टर को लगता है कि मरीज को सीजेडी होने की सम्भावना है तो इसे कन्फर्म करने के लिये ब्रेन टिश्यू की बॉयोप्सी की जाती है।

क्या इसका इलाज है?

अभी तक इस बीमारी का कोई प्रभावी इलाज नहीं है लेकिन दवाइयों से इसे मैनेज किया जाता है। इलाज में दर्द कम करने और पर्सनाल्टी तथा व्यवहार में आ रहे असामान्य बदलावों को रोकने वाली दवाओं का प्रयोग होता है। मनोवैज्ञानिक लक्षणों को कंट्रोल करने के लिये एंटीडिप्रेशन और सेडेटिव्स दवायें और दर्द कम करने के लिये ओपियेट दवायें और मांसपेशियों की ऐंठन रोकने के लिये सोडियम वेलप्रोएट और क्लोनाजपाम जैसी दवाओं का प्रयोग होता है।

बीमारी का प्रभाव कम हो इसलिये हाइड्रेशन और न्यूट्रियेंट दिये जाते हैं। इसके लक्षण निमोनिया, किसी अन्य संक्रमण या हार्ट सम्बन्धी समस्याओं से ज्यादा बिगड़ जाते हैं इसलिये डाक्टर हमेशा इस तरह का मेडीकेशन प्रयोग करते हैं कि मरीज इन सबसे बचा रहे।

आजकल योरोप और अमेरिका में इसके प्रभावी इलाज के लिये कुछ नयी थेरेपीज प्रयोग की जा रही हैं जिसमें एंटी-प्रियान एंटीबॉडीज और एंटी प्रियान्स प्रमुख हैं। इनसे शरीर की असामान्य पीआरपी को बदलते हैं।

रोकथाम कैसे हो?

कुछ सावधानियां बरतकर इस बीमारी की रोकथाम की जा सकती है-

– उन स्थानों से जानवरों न लायें जहां यह बीमारी रही हो।

– जानवरों के ब्रेन और स्पाइनल कॉर्ड इत्यादि का भोजन के रूप में सेवन न करें।

– बासी मांसाहारी भोजन से बचें।

– रोगी से जब भी मिलें तो मास्क लगाकर और दस्ताने पहनकर मिलें।

– रोगी को आइसोलेट रखें और इस सम्बन्ध में डाक्टर की सलाह मानें।

– किसी भी तरह की सर्जरी से पहले सर्जिकल उपकरणों को अच्छी तरह से स्टरलाइज करें।

– यदि फैमिली हिस्ट्री में यह बीमारी है तो उसे जेनेटिक काउन्सलर से बात करनी चाहिये।

नजरिया

इस बीमारी से पीड़ित 90 प्रतिशत लोगों की एक साल में मृत्यु हो जाती है। केवल 10 प्रतिशत मरीज ही सर्वाइव कर पाते हैं और वह भी गहन चिकित्सा से। ऐसे में सावधानी ही इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका है। यदि लोगों को इसके बारे में पता हो तो वे सावधानी बरतकर इसका प्रसार रोक सकते हैं अन्यथा यह एक से दूसरे में फैलती जायेगी। अभी इसका कोई प्रभावी इलाज नहीं है इसलिये इसके इलाज का फोकस सपोर्टिव केयर और लक्षणों को शांत करने पर रहता है। जैसे-जैसे यह बीमारी बढ़ती है मरीज को प्रशिक्षित नर्स की जरूरत पड़ती है जिससे उसकी जिंदगी आसान हो सके। इसकी दवा की खोज पर रिसर्च जारी है और यह सम्भव है कि एक या दो सालों में इसका स्थायी इलाज मिल जाये ऐसे में अभी उपलब्ध दवाओं से इसे जितने लंबे समय तक मैनेज किया जाये रोगी के लिये उतना ही अच्छा है।

 

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