लंग कैंसर – द इनसाइड स्टोरी

दुनियाभर में कैंसर का सबसे कॉमन टाइप लंग कैंसर अत्यन्त घातक और जानलेवा बीमारी है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2019 में विश्वभर में इससे 20 लाख से अधिक मौतें हुईं। हमारे देश में प्रतिवर्ष इसके 12 लाख से ज्यादा मामले दर्ज होते हैं। लंग कैंसर की शुरूआत फेफड़ों के टिश्यू से होती है जहां पर यह एयर पैसेज की लाइनिंग के सेल्स को अपनी चपेट में लेता है। नॉन-स्माल सेल लंग कैंसर (एनएससीएलसी) इसका सबसे आम प्रकार है।

लंग कैंसर के कुल मरीजों में 80 से 85 प्रतिशत इसी से ग्रस्त होते हैं। इनमें से तीस प्रतिशत मरीजों में यह लंग्स के बाहरी भाग (एडिनोकार्सिनोमा) से शुरू होकर फेफड़ों की कैविटी और सरफेस लाइनिंग तक फैल जाता है। अन्य तीस प्रतिशत में यह श्वसन तन्त्र (रिसपिरेटरी ट्रैक) में पनपता है, इसे स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा कहते हैं। कुछ मामलों में एडिनोकार्सिनोमा की शुरूआत फेफड़ों में मौजूद छोटे-छोट वायु प्रकोष्ठों (एयर सैक्स या एल्विओलस) से होती है, मेडिकल लैंग्वेज में इसे एडिनोकार्सिनोमा इन सीटू (एआईएस) कहते हैं। इसके आक्रामक न होने से इसमें तुरन्त ट्रीटमेंट की जरूरत नहीं होती।

लार्ज सेल कार्सिनोमा और लार्ज सेल न्यूरोइंडोक्राइन ट्यूमर (इससे अभी हाल में मशहूर फिल्म अभिनेता इरफान खान की मृत्यु हुई थी), इसके सबसे तेजी से फैलने वाले टाइप हैं। स्मॉल सेल लंग कैंसर (एससीएलसी) इसका दूसरा कॉमन टाइप है। लंग कैंसर के कुल मरीजों में इसके मरीज 15 से 20 प्रतिशत होते हैं। यह नॉन स्मॉल सेल लंग कैंसर की तुलना में ज्यादा तेजी से फैलता है। इसके बढ़ने की तीव्रता के कारण इसके ट्रीटमेंट में दवाओं के स्थान पर सीधे कीमोथेरेपी की जाती है। कुछ मरीजों में लंग कैंसर के ये दोनों प्रकार (नॉन स्मॉल सेल लंग कैंसर और स्मॉल सेल लंग कैंसर) भी पाये गये हैं।

मेसोथेलियोमा नामक कैंसर, लंग कैंसर का एक और टाइप है, जो आमतौर पर एस्बेटॉस एक्सपोजर से होता है। इस कार्सिनॉयड ट्यूमर की शुरूआत हारमोन बनाने वाले न्यूरोइंडोक्राइन सेल्स से होती है। लंग कैंसर का सबसे खराब पहलू है कि इसका पता तब चलता है जब यह फेफड़ों के काफी बड़े भाग में फैल जाता है। इसके शुरूआती लक्षण मामूली या ठंड से होने वाली बीमारियों की भांति होते हैं जिससे ज्यादातर मरीज समय पर सही ट्रीटमेंट नहीं ले पाते। यही कारण है कि लंग कैंसर के 80 प्रतिशत केसों का शुरू में पता ही नहीं चल पाता।
सिम्पटम-लक्षण
नॉन-स्माल सेल लंग कैंसर और स्माल सेल लंग कैंसर के शुरूआती लक्षण बुनियादी तौर पर एक समान होते हैं जैसेकि-
1. बहुत लम्बे समय व दवाओं से न ठीक होने वाली खांसी, लंग कैंसर का शुरूआती लक्षण है क्योंकि सामान्य खांसी या रेसीपिरेटरी संक्रमण एक या दो सप्ताह में दवाओं से ठीक हो जाते हैं।
2. स्मोकिंग करने वाले व्यक्तियों में खांसी की फ्रिकवेंसी बढ़ने के साथ खांसते समय कर्कश आवाज और खून आना लंग कैंसर के शुरूआती लक्षणों में से एक है।
3. थोड़ा चलने पर हांफना व सांस लेने में दिक्कत (शार्टनेस ऑफ ब्रीद) भी लंग कैंसर का शुरूआती लक्षण है, क्योंकि लंग कैंसर होने पर श्वसन नलिका सिकुड़ने लगती है और फेफड़ों के ट्यूमर से फ्लूड निकलकर छाती में भर जाता है।
4. स्मोकिंग करने वाले व्यक्ति की छाती, कंधों और पीठ में दर्द लंग कैंसर की शुरूआत हो सकती है।
5. यदि स्मोकिंग करने वाले व्यक्ति के सांस लेते समय घरघराहट की आवाज आये तो ये लंग कैंसर की शुरूआत हो सकती है क्योंकि इसमें सांस लेने वाली नलिका सूजकर सकरी या ब्लॉक होने लगती है। वैसे तो ये लक्षण अन्य बीमारियों के भी होते हैं लेकिन स्मोकिंग करने वालों को इसे नजरन्दाज करना भारी पड़ सकता है।
6. व्यक्ति की आवाज में बड़े परिवर्तन जैसे कि आवाज फटना, कर्कश होना या गला बैठने जैसे लक्षण लंग कैंसर की ओर इशारा करते हैं।
7. अचानक 10 पाउंड या इससे ज्यादा वजन गिरना, भूख मर जाना, हड्डियों और सिर दर्द, लंग कैंसर या किसी अन्य गम्भीर बीमारी के शुरूआती लक्षण हैं।

लंग कैंसर फैलने पर उभरने वाले लक्षण इस बात पर निर्भर होते हैं कि इसका फैलाव फेफड़ों या शरीर में कहां तक हुआ है जैसेकि-
लिम्फ नोड: जब लंग कैंसर लिम्फ नोड तक पहुंचता है तो इससे गर्दन या कॉलरबोन में गांठें बनने लगती हैं।
हड्डियों: जब लंग कैंसर के सेल्स हड्डियों तक पहुंचते हैं तो पीठ, पसलियों और कूल्हों की हड्डियों में दर्द होने लगता है।

मस्तिष्क या रीढ़: जब लंग कैंसर सेल्स दिमाग और स्पाइन तक पहुंच जाते हैं तो इसका परिणाम सिरदर्द, चक्कर आना, संतुलन बिगड़ना या हाथों-पैरों में सुन्नता के रूप में सामने आता है।

लीवर: लंग कैंसर सेल्स के लीवर तक फैलाव का परिणाम त्वचा और आंखों के पीले पड़ने के रूप में सामने आता है।

हार्नर सिन्ड्रोम: जब कैंसर या ट्यूमर फेफड़ों के शीर्ष पर होता है तो यह चेहरे की नसों (फेसियल नर्व) पर दबाव डालता है और चेहरा एक ओर पैरालाइज हो जाता है, मेडिकल लैंग्वेज में इसे हार्नर सिन्ड्रोम कहते हैं। इसके कारण कंधों में दर्द भी रहता है।

पैरानियोप्लास्टिक सिंड्रोम: कुछ मरीजों में लंग कैंसर से हारमोन की भांति एक पदार्थ बनने लगता है जिससे अलग-अलग तरह के लक्षण उभरते हैं, इन्हें पैरानियोप्लास्टिक सिंड्रोम कहते हैं। इससे मांसपेशियों में कमजोरी, जी मिचलाना, उल्टी, शरीर में पानी की अधिकता (फ्लूड रिटेन्शन), हाई-ब्लड प्रेशर, हाई ब्लड शुगर, कन्फ्यूजन, सीजर्स और कोमा जैसी समस्यायें हो जाती हैं।

पीठ दर्द: कुछ मामलों में लंग कैंसर के कारण पीठ दर्द रहता है लेकिन पीठ दर्द से पीड़ित सभी मरीज लंग कैंसर से ग्रस्त हों ऐसा नहीं। ब्रोन्काइटिस या सूखी खांसी से भी पीठ दर्द की शिकायत हो जाती है। लंग कैंसर के मरीजों में जब फेफड़ों में मौजूद ट्यूमर स्पाइन पर दबाव डालता है तो पीठ दर्द रहने लगता है। लंग कैंसर के पसलियों और स्पाइन तक फैलने से भी यह कंडीशन बनती है।
बड़ी रक्तवाहिनी: ट्यूमर से जब सिर, हाथ और दिल के मध्य रक्त लाने ले जाने वाली रक्तवाहिनी दबती है तो चेहरे, गर्दन, ऊपरी छाती और बाजुओं में सूजन आ जाती है।

नाखून खराब होना: लंग कैंसर होने पर हाथों और पैरों के नाखूनों की शेप बिगड़ने (क्लबिंग) से ये मुड़ने लगते हैं क्योंकि नाखून के नीचे (नेल बेड) में अतिरिक्त नरम टिश्यू बनने से उंगलियों के सिरे सामान्य से ज्यादा बड़े हो जाते हैं। इस तरह की क्लबिंग, कैंसर कोशिकाओं द्वारा स्रावित पदार्थ (हारमोन या प्रोटीन) के कारण होती है।

न्यूरोलॉजिक डिटीरियोरेशन: इसमें ट्यूमर द्वारा स्पाइन पर दबाव पड़ने से बैक पेन, बाजुओं व टांगों में कमजोरी, टांगों और पैरों में अनुभूति (सेन्सेशन) की कमी, यूरीनरी और बॉउल का अंसयमित होना और स्पाइनल ब्लड सप्लाई में व्यवधान जैसी समस्यायें होतीं हैं। यह बैक पेन बिना इलाज के लगातार बढ़ता रहता है। इसमें कमी केवल सही इलाज (जैसेकि सर्जरी, रेडियेशन या कीमोथेरेपी) से ट्यूमर को रिमूव या छोटा करके ही आती है। मरीज इस दर्द को सह ले इसके लिये डाक्टर पेन मैनेजमेंट दवाइयों का सहारा लेते हैं।
कारण क्या है लंग कैंसर का?

वैसे तो लंग कैंसर किसी को भी हो सकता है लेकिन इसके 90 प्रतिशत मरीज धूम्रपान (स्मोकिंग) करने वाले होते हैं। जिस क्षण व्यक्ति धूम्रपान करता है उसी क्षण से लंग्स (फेफड़ों) के टिश्यू डैमेज होने लगते हैं लेकिन शरीर की अपने आप रिपेयर करने की क्षमता के कारण लंग्स ऐसे डैमेज को खुद ही रिपेयर कर लेते हैं, किन्तु लगातार स्मोकिंग से लंग्स की खुद रिपेयर करने की क्षमता घटने से डैमेज सेल्स पूरी तरह से रिपेयर नहीं हो पाते और क्षतिग्रस्त ही रह जाते हैं। कुछ समय बाद ये क्षतिग्रस्त सेल्स असामान्य व्यवहार करने लगते हैं जो आगे चलकर लंग कैंसर का रूप ले लेता है। स्मॉल सेल लंग कैंसर 99 प्रतिशत तक स्मोकिंग से ही होता है। जब व्यक्ति स्मोकिंग बंद कर देता है तो उसके कैंसर पीड़ित होने का रिस्क घट जाता है।

वर्ल्ड हैल्थ आर्गनाइजेशन के अनुसार जमीन में मौजूद रेडॉन (नेचुरल रेडियोएक्टिव गैस) से एक्सपोजर लंग कैंसर का दूसरा बड़ा कारण है। रेडॉन घरों की नींव में पड़ी दरारों से इमारतों में प्रवेश करती है और जब स्मोकिंग करने वाले इसके सम्पर्क में आते हैं तो लंग कैंसर के चांस कई गुना बढ़ जाते हैं।

लंग कैंसर के अन्य कारणों में जहरीले और प्रदूषित वातावरण में लम्बे समय तक सांस लेना प्रमुख है। मेसोथेलियोमा नामक लंग कैंसर एस्बेटस के सम्पर्क में आने से होता है। इसके अलावा आर्सेनिक, कैडमियम, क्रोमियम, निकल, यूरेनियम और कुछ पेट्रोलियम पदार्थों के सम्पर्क में आना भी कैंसर का कारण होता है। आनुवंशिक जेनेटिक म्यूटेशन से भी लंग कैंसर विकसित होने की सम्भावना बढ़ जाती है विशेष रूप से उस स्थिति में जब व्यक्ति घूम्रपान करने के साथ किसी कार्सिनोजेन्स (कैंसरकारक तत्व) के सम्पर्क में रहे।
कैसे बढ़ता है लंग कैंसर का रिस्क?

स्मोकिंग: लंग कैंसर का सबसे बड़ा रिस्क स्मोकिंग है। सिगरेट, सिगार, बीड़ी और पाइप जिसमें भी तम्बाकू प्रयोग की जाती है, लंग कैंसर को बढ़ावा देते हैं क्योंकि तम्बाकू में हजारों की संख्या में जहरीले पदार्थ होते हैं। सीडीसी (सेन्टरर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रवेन्शन) के अनुसार सिगरेट पीने वालों को कैंसर होने का रिस्क अन्य लोगों की तुलना में 30 गुना अधिक रहता है। जितने लम्बे समय तक व्यक्ति स्मोकिंग करता है यह रिस्क उतना ज्यादा हो जाता है।

सेकेंडहैंड स्मोक: स्मोकिंग से होने वाले नुकसान के सम्बन्ध में हुए एक शोध के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति धूम्रपान करने वाले व्यक्ति से छोड़ा गया धुआं इन्हेल (ग्रहण) करता है तो उसके लिये भी लंग कैंसर का रिस्क बढ़ जाता है। मेडिकल भाषा में इसे सेकेंडहैंड स्मोक कहते हैं। हमारे देश सन् 2018 में 36000 ऐसे लोगों की लंग कैंसर से मृत्यु हुई जिन्होने कभी भी धूम्रपान नहीं किया था लेकिन वे धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के सम्पर्क में रहे।
रेडियो-एक्टिव पदार्थों और जहरीले तत्वों से एक्सपोजर: प्राकृतिक रूप से जमीन से निकलने वाली रेडॉन नामक रेडियोएक्टिव गैस व जहरीले तत्वों (जैसे एस्बेटस, क्रोनियमस्, आर्सेनिक इत्यादि और डीजल के धुएं) से एक्सपोजर और बढ़ती उम्र, फैमिली हिस्ट्री, पर्सनल मेडिकल हिस्ट्री (लंग कैंसर सम्बन्धी) व पहले हुई रेडियेशन थेरेपी भी लंग कैंसर का रिस्क बढ़ाती है।
लंग कैंसर की स्टेजेज

कैंसर की स्टेजेज से पता चलता है कि वह कितना फैल चुका है और मरीज को किस तरह के इलाज की जरूरत है। लंग कैंसर के ठीक होने के सबसे ज्यादा चांस कैंसर के शुरूआती स्टेज में पता चलने पर होते हैं। यह जितना कम फैला होगा ठीक होने के चांस उतने अधिक होंगे। लेकिन विडम्बना यह है कि शुरूआती स्टेज में लंग कैंसर के कोई विशेष लक्षण न उभरने से इसके डॉयग्नोज में देरी होती है और जब इसका पता चलता है तब तक यह काफी फैल जाता है।
नॉन-स्मॉल लंग कैंसर की ये चार मुख्य स्टेज होती हैं-
स्टेज-1: इसमें कैंसर केवल फेफड़ों में ही होता है, बाहर नहीं।
स्टेज-2: इसमें कैंसर फेफड़ों के साथ, पास की लिम्फ नोड तक पहुंच जाता है।
स्टेज-3: इसमें कैंसर छाती के मध्य, फेफड़े और लिम्फ नोड्स तक फैल जाता है।
स्टेज-3अ: इसमें कैंसर फेफड़ों और पास के लिम्फ नोड तक फैल जाता है लेकिन उसी साइड सीमित रहता है जहां इसकी शुरूआत हुई थी।
स्टेज-3ब: इसमें कैंसर छाती के विपरीत साइड में लिम्फ नोड्स में फैलता हुआ कॉलरबोन तक पहुंच जाता है।
स्टेज-4: इसमें कैंसर दोनों फेफड़ों और इनके चारों ओर के एरिया में फैलता हुआ शरीर के दूसरे अंगों (लीवर, किडनी इत्यादि) तक पहुंच जाता है।

मेडिकल साइंस के अनुसार स्मॉल सेल लंग कैंसर (एससीएलसी) की दो मुख्य स्टेज हैं, इन्हें लिमिटेड और एक्सटेन्सिव स्टेज कहते हैं। लिमिटेड स्टेज में कैंसर का फैलाव केवल एक तरफ के फेफड़े और पास की लिम्फ नोड तक जबकि एक्सटेन्सिव स्टेज में यह दोनों फेफड़ों और लिम्फ नोड्स, फेफड़ों के चारों ओर भरे फ्लूड, बोन मैरो और शरीर के दूसरे अंगों तक फैल जाता है। अभी तक प्राप्त डेटा के अनुसार एससीएलसी से ग्रस्त तीन मरीजों में दो एक्सटेन्सिव स्टेज में ही होते हैं।
लंग कैंसर की पुष्टि

लंग कैंसर की पुष्टि शारीरिक जांच के साथ एक्स-रे, एमआरआई, सीटी और पीईटी स्कैन जैसे इमेजिंग टेस्टों से होती है। यदि मरीज को खांसते समय बलगम आता है तो स्पुटम साइटोलॉजी टेस्ट में माइक्रोस्कोपिक जांच करके कैंसर का पता लगाते हैं। यदि मरीज के फेफड़ों या आसपास के स्थानों में ट्यूमर (गांठे) हैं तो बायोप्सी से कैंसर का पता चलता है। ट्यूमर की जांच और टिश्यू सैंम्पल लेने के लिये इन तरीकों का इस्तेमाल होता है-

ब्रोन्कोस्कोपी: इसमें मरीज को बेहोश करने के बाद एक पतली ट्यूब को गले से होते हुए फेफड़ों तक ले जाकर फेफड़ों की नजदीकी जांच की जाती है।

मीडियास्टिनोस्कोपी: इसमें गर्दन के आधार पर चीरा लगाकर रोशनी से युक्त एक उपकरण को लिम्फ नोड तक ले जाकर टिश्यू का नमूना लेते हैं। यह प्रोसीजर ऑपरेशन थियेटर में किया जाता है।

नीडिल: इसमें इमेजिंग उपकरणों की सहायता लेते हुए एक सुई को छाती की दीवार के माध्यम से फेफड़ों तक ले जाकर वहां से टिश्यू निकालते हैं, इसी प्रोसीजर से लिम्फ नोड के टिश्यू का नमूना भी लिया जाता है।
इन टिश्यू सैम्पल्स को विश्लेषण के लिये पैथालॉजी लैब भेजते हैं और यदि इनमें कैंसर है तो आगे और टेस्ट जैसेकि हड्डियों का स्कैन इत्यादि करके कैंसर के फैलाव व स्टेज का पता लगाते हैं। हड्डियों के स्कैन में एक रेडियोएक्टिव रसायन को मरीज में इंजेक्ट किया जाता है जिससे हड्डियों के असामान्य या कैंसर ग्रस्त हिस्से स्क्रीन पर दिखाई देने लगते हैं। कैंसर की स्टेज का पता लगाने के लिये एमआरआई, सीटी और पीईटी स्कैन जैसे इमेजिंग टेस्ट भी किये जाते हैं।
लंग कैंसर ट्रीटमेंट

लंग कैंसर से पीड़ित व्यक्ति का इलाज एक डाक्टर न करके डॉक्टरों की एक टीम करती है। इस टीम में एक थोरासिक सर्जन (जिसे चेस्ट और लंग्स की सर्जरी में दक्षता होती है), एक लंग स्पेस्लिस्ट (पुलमोनॉलाजिस्ट), एक मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट और एक रेडियेशन ऑन्कोलॉजिस्ट शामिल होता है। कैंसर रोग विशेषज्ञ को मेडिकल साइंस में ऑन्कोलॉजिस्ट कहते हैं। कैंसर का इलाज करने से पहले यह टीम मरीज की कंडीशन के बारे में विचार-विमर्श करके इलाज का तरीका तय करती है। इलाज के दौरान सभी डॉक्टर आपस में क्वार्डीनेट करते हुए मरीज से जुड़ी प्रत्येक जानकारी और प्रोग्रेस को आपस में साझा करके इलाज करते हैं।

नॉन-स्मॉल लंग कैंसर (एनएससीएलसी) का इलाज मरीजों की हैल्थ कंडीशन के अनुसार होता है-
नॉन-स्मॉल लंग कैंसर (एनएससीएलसी) स्टेज-1: इस स्टेज में फेफड़े के कैंसर ग्रस्त भाग को सर्जरी से काट कर निकाल देते हैं, यदि कैंसर फैलने की सम्भावना है तो कीमोथेरेपी भी की जाती है।
नॉन-स्मॉल लंग कैंसर (एनएससीएलसी) स्टेज-2: इसमें फेफड़े के कैंसर ग्रस्त भाग या सम्पूर्ण फेफड़े को सर्जरी से काट कर निकाल देते हैं और कैंसर का फैलाव रोकने के लिये कीमोथेरेपी करते हैं।
नॉन-स्मॉल लंग कैंसर (एनएससीएलसी) स्टेज-3: इस स्टेज में कैंसर ट्रीटमेंट के लिये कीमोथेरेपी, सर्जरी और रेडियेशन तीनों का कॉम्बीनेशन इस्तेमाल किया जाता है।
नॉन-स्मॉल लंग कैंसर (एनएससीएलसी) स्टेज-4: इसमें कैंसर का ठीक होना मुश्किल होता है लेकिन डॉक्टर क्योर के लिये सर्जरी, रेडियेशन, कीमोथेरेपी और इम्यूनोथेरेपी का कॉम्बीमेशन प्रयोग करते हैं।
स्मॉल सेल लंग कैंसर के ट्रीटमेंट में सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियेशन तीनों को जरूरत के अनुसार अलग-अलग या कॉम्बीनेशन में प्रयोग किया जाता है। ज्यादातर केसों में कैंसर इतना एडवांस हो जाता है कि सर्जरी से क्योर मुश्किल होती है। आजकल कैंसर ट्रीटमेंट की नयी तकनीकों को क्लीनिकल ट्रॉयल के तौर पर प्रयोग किया जा रहा है, एडवांस स्टेज में मरीज अगर इन नयी तकनीकों को अपने ऊपर अजमाना चाहे को डाक्टर से कहकर ऐसा कर सकता है।

इम्यूनोथेरेपी और लंग कैंसर
ज्यादातर नॉन-स्मॉल सेल कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली इस नयी थेरेपी को बॉयोलॉजिक या बॉयोथेरेपी भी कहते हैं। इसमें इम्यून सिस्टम को प्रोत्साहित करके मजबूत बनाने वाली दवाओं से इलाज किया जाता है। जब इम्यून सिस्टम मजबूत हो जाता है तो वह कैंसर सेल्स को पहचान कर नष्ट कर देता है। लंग कैंसर डॉयग्नोज होते ही इसका प्रयोग अच्छे परिणाम देता है। इस ट्रीटमेंट के तहत इम्यून चैकप्वाइंट इनहेबिटर, मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज, लंग कैंसर वैक्सीन तथा कुछ अन्य दवाओं का प्रयोग होता है।
घरेलू उपचार

लंग कैंसर की एडवांस स्टेज में बहुत से मरीज कैंसर का इलाज कराने के बजाय इसके लक्षणों को कंट्रोल करने के इलाज पर जोर देते हैं जिससे उन्हें कम से कम कष्ट हो और शेष जीवन बिना दर्द के गुजार सकें। कैंसर के लक्षणों को कंट्रोल करने के लिये घरेलू इलाज के तौर पर इन तरीकों को इस्तेमाल किया जाता है-
मसाज: क्वालीफाइड थ्रेपिस्ट द्वारा कैंसर के मरीज की मसाज उसे दर्द तथा एंग्जॉयटी से राहत दिलाती है। ऐसे थ्रेपिस्ट कैंसर के मरीजों के संदर्भ में ही प्रशिक्षित होते हैं।
एक्यूपंचर: एक्यूपंचर से मरीज को दर्द, मतली और उल्टी कंट्रोल करने में मदद मिलती है। एक्यूपंचर थेरेपी हमेशा किसी एक्यूपंचर स्पेस्लिस्ट से ही लें, क्योंकि शरीर में रक्त की मात्रा कम होने (कैंसर के मरीजों में ऐसा अक्सर होता है) और ब्लड थिनर लेने की स्थिति में यह थेरेपी खतरनाक हो सकती है।
मेडीटेशन: कैंसर के रोगियों के लिये मेडीटेशन (ध्यान) बहुत मददगार है, इससे तनाव घटता है और मानसिक सुकून मिलता है।
हिप्नोसिस (सम्मोहन): यह थेरेपी कैंसर के रोगियों को मतली, दर्द और चिंता से राहत दिलाने में मददगार है।
योगा: इसके अंतर्गत सांस लेने की तकनीक, ध्यान केन्द्रित करने और स्ट्रेचिंग जैसी क्रियायें शामिल हैं, इन्हें अपनाकर मरीज को अच्छा महसूस होता है और उसकी नींद इम्प्रूव हो जाती है।
भांग का तेल: इसे कुकिंग ऑयल में मिलाने, मुंह में एक या दो ड्रॉप डालने या खाने में मिलाकर खाने से मतली और उल्टी में राहत मिलने से मरीज की भूख में सुधार होता है। इस सम्बन्ध में ज्यादा डेटा उपलब्ध नहीं है और इस पर अभी शोध जारी है।
लंग कैंसर पीड़ितों के लिये डाइट
लंग कैंसर के रोगियों को डाइट के सम्बन्ध में कोई प्रतिबन्ध नहीं है, डाक्टरों का कहना है कि इस बीमारी में मरीज की भूख मर जाती है इसलिये वह जो भी खाना चाहें उसे खिलाना चाहिये। यदि मरीज एक बार में पूरा खाना नहीं खा पाये तो उसे दिन में कई बार थोड़ा-थोड़ा खाना देना चाहिये। यदि मरीज का वजन गिर रहा है तो उसे हाई कैलोरी फूड और पेय पदार्थ दें।
पाचन तन्त्र ठीक से काम करता रहे इसके लिये पुदीने और अदरक की चाय और कब्ज होने पर फाइबर युक्त भोजन दें। यदि मरीज का पेट जल्द अपसेट हो रहा है और मुंह में छाले हैं तो उसे मिर्च-मसालों वाले भोजन न दें। इलाज के दौरान कीमोथेरेपी तथा अन्य दवाओं के साइड इफेक्ट के कारण मरीज की भोजन के प्रति टॉलरेन्स परिवर्तित होती रहती है, ऐसे में उसके शरीर में पोषक तत्वों की कमी पूरी करने के लिये कैंसर डॉयटीशियन की सलाह से मरीज को अच्छा पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित भोजन दें। एक बात हमेशा याद रखें कि किसी भी तरह का भोजन कैंसर ठीक नहीं कर सकता, इसलिये डाक्टर के निर्देशानुसार मरीज को ऐसी डाइट दें जिससे वह ट्रीटमेंट के साइड इफेक्ट आसानी से सह ले और अच्छा महसूस करे।
सर्वाइवल रेट और नजरिया

यदि कैंसर, पीड़ित व्यक्ति के लिम्फ नोड और ब्लड स्ट्रीम (रक्त प्रवाह) में चला गया है तो यह शरीर में कहीं भी फैल जाता है, ऐसे में मरीज कितने वर्ष जीवित रहेगा यह पूरी तरह से शरीर के कैंसर ग्रस्त भाग और उसके ट्रीटमेंट पर निर्भर है। सर्वाइवल रेट मरीज के सम्पूर्ण स्वास्थ्य और उसका शरीर, ट्रीटमेंट किस तरह से ग्रहण करता है, पर निर्भर है। नॉन-स्माल सेल लंग कैंसर (एनएससीएलसी) में पांच वर्ष का सर्वाइवल रेट लोकलाइज्ड अवस्था में 60 प्रतिशत, रीजनल अवस्था में 33 प्रतिशत, डिस्टेन्ट अवस्था में 6 प्रतिशत होता है।
स्माल सेल लंग कैंसर (एससीएलसी) के एग्रेसिव होने की वजह से इसकी लिमिटेड स्टेज में पांच वर्षीय सर्वाइवल रेट 14 प्रतिशत होता है। मेडियन सर्वाइवल 16 से 24 महीने और एक्सटेन्सिव स्टेज में 6 से 12 महीने है। मेसोथेलियोमा कैंसर में पांच वर्ष का सर्वाइवल रेट 5 से 10 प्रतिशत ही है।
आजकल उपलब्ध एडवांस दवाओं (जैसेकि इम्यूनोथेरेपी) से लंग कैंसर की तीसरी स्टेज में भी मरीज ठीक हो जाते हैं, इसलिये यदि तीसरी स्टेज डॉयग्नोज हुई है तो घबराने की जरूरत नहीं, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का शरीर दूसरे से अलग होता है। यदि बुढ़ापा और कोई अन्य बीमारी (जैसे कि हार्ट डिसीज या शुगर) नहीं है तो कैंसर को आसानी से हराया जा सकता है। इसमें ट्रीटमेंट से साथ मजबूत इच्छाशक्ति बहुत मायने रखती है। मरीज का मनोबल बनाये रखने के लिये परिवार वालों और मित्रों का सकारात्मक रवैया अहम भूमिका निभाता है।

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