लीवर सिरोसिस: शराब का बुरा नतीजा

विष्णु प्रिया सिंह

वैसे तो लीवर यानी जिगर की सबसे घातक बीमारी, सिरोसिस के कई कारण हैं लेकिन 90 प्रतिशत मामलों में यह शराब की लत का परिणाम है। शेष दस प्रतिशत मामलों में इसका कारण सीवियर जॉन्डिस, हेपेटाइटिस या वायरल संक्रमण होता है। सिरोसिस में लीवर में घाव (जख्म) हो जाते हैं और वह काम करना बंद कर देता है या बहुत कम काम करता है। सिरोसिस से हुए नुकसान को ठीक करना मुश्किल है लेकिन बचे लीवर में और डैमेज न हो इसे कंट्रोल किया जा सकता है। लीवर सिरोसिस दुनिया की 12 वीं सबसे घातक बीमारी है।हमारे देश में प्रतिवर्ष इसके 15 लाख से ज्यादा मामले दर्ज होते हैं। इसे लीवर डिसीज की अंतिम स्टेज माना जाता ह। इसके 90 प्रतिशत मामलों में ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। लीवर शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में से एक है और यह कई जरूरी कार्यों को अंजाम देता है, जैसे कि –

लीवर ऐसे रसायनों (बाइल) का निर्माण करता है जिनसे शरीर डायटेरी फाइबर, कोलोस्ट्रोल और विटामिन A, D, E तथा K को सोख (एब्जोर्ब) सके।
यह शुगर और विटामिन्स को शरीर द्वारा भविष्य में इस्तेमाल के लिये स्टोर करता है।
रक्त (खून) साफ करता है जिससे शराब और अन्य घातक बैक्टीरिया शरीर से रिमूव होते हैं।
ब्लड क्लॉटिंग प्रोटीन बनाता है जिससे कटने पर खून का बहना बंद करने में जरूरी थक्का बनता है।

लीवर का महत्व और
लीवर शरीर का सबसे मजबूत अंग है क्योंकि यह अपने डैमेज सेल्स का पुन:निर्माण (रिजेनरेट) कर लेता है। सिरोसिस नामक कंडीशन अत्यधिक मात्रा में लम्बे समय तक रोजाना शराब के सेवन से और वायरल इंफेक्शन से बनती है। इसमें लीवर में बड़ी मात्रा में जख्म बनने से उसकी कार्य-क्षमता घट जाती है और वह पूरी तरह से काम नहीं कर पाता। बहुत से मामलों में सिरोसिस से लीवर सिकुड़कर कठोर (हार्ड) हो जाता है जिसकी वजह से पोर्टल वेन्स द्वारा लाये गये पोषक तत्वों से भरपूर खून का लीवर में प्रवाह कठिन हो जाता है।

पोर्टल वेन्स, डाइजेस्टिव अंगों से रक्त को लीवर तक लाती हैं। जब लीवर में खून पास नहीं हो पाता तो पोर्टल वेन्स पर दबाव पड़ता है और यह पोर्टल हाइपरटेन्शन नामक गम्भीर बीमारी के रूप में सामने आता है। पोर्टल हाइपरटेन्शन में वेन्स पर इतना ज्यादा दबाब बनता है कि वे फट जाती हैं और ब्लीडिंग होने लगती है।

रोजाना शराब सेवन के अलावा वायरल हेपेटाइटस सी, लीवर सोराइसिस के लिये जिम्मेदार फैक्टर है। डाक्टरों के अनुसार मोटापा भी सिरोसिस को बढ़ावा देता है और रोजाना शराब का सेवन और हेपेटाइटिस सी के साथ इसका कॉम्बीनेशन बहुत ही घातक है। एक शोध के मुताबिक लम्बे समय से दो से अधिक पैग रोजाना शराब (चाहे वह बियर हो या वाइन) का सेवन करने वाली महिलाओं में भी सिरोसिस पनपने के चांस बढ़ जाते हैं। पुरूषों के लिये लम्बे समय तक तीन से अधिक पैग शराब का सेवन सिरोसिस को सीधा आमन्त्रण है। यहां पर यह बात ध्यान रखना जरूरी है कि शराब सेवन की मात्रा प्रत्येक व्यक्ति के संदर्भ में अलग-अलग हो सकती है, इसमें व्यक्ति के रहने का क्लाइमेट (गर्म या सर्द), शारीरिक संरचना, फिजिकल एक्टीविटी और खान-पान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सिरोसिस की कंडीशन एक दिन में पैदा नहीं होती यह 10 या 12 सालों से लगातार रोजाना अत्यधिक शराब के सेवन से बनती है।

हेपेटाइटिस सी, नामक वायरल संक्रमण सेक्सुअल इंटरकोर्स और संक्रमित खून के जरिये एक से दूसरे में फैलता है।

संक्रमित खून वाली नीडिल्स इसका मुख्य स्रोत हैं, इसमें टैटू बनवाने में प्रयुक्त नीडल्स, कान छेदने में प्रयुक्त नीडल्स, ड्रग लेने में इस्तेमाल होने वाली नीडिल्स आती हैं। कुछ मामलों में टुथ-ब्रश शेयरिंग को भी इसकी वजह माना गया है। इनके अलावा सिरोसिस इन वजहों से भी हो जाता है-

हेपेटाइटिस बी: इसमें लीवर, सूजकर डैमेज हो जाता है जिससे सिरोसिस के चांस बढ़ जाते हैं।
हेपेटाइटिस डी: यह संक्रमण एक विशेष डेल्टा वायरल से होता है और इसमें भी लीवर में सूजन आने से सिरोससि की कंडीशन बन जाती है। यह नस में नशीली दवाइयां (ड्रग्स) लेने वाले लोगों में सबसे ज्यादा होता है।
ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस: यह जेनेटिक बीमारी है और महिलाओं में सबसे ज्यादा होती है। इसमें भी लीवर सूज जाने से कार्य क्षमता घटती है और सिरोसिस के चांस बढ़ जाते हैं।
बाइल डक्ट के डैमेज होने से प्राइमरी बिलेरी सिरोसिस की कंडीशन बनती है जो बाद में गम्भीर सिरोसिस में परिवर्तित हो सकती है।
शरीर में आयरन और कॉपर से सम्बन्घित दो डिस्आर्डर जिनसे शरीर की कार्य क्षमता घटती है सिरोसिस को बढ़ावा देते हैं। इसके मुख्य उदाहरण हैं विल्सन डिसीज और हीमोक्रोमेटोसिस।
अधिक मात्रा में एक्टेमिनोफेन, एंटी बॉयोटिक और एंटी-डिप्रेशन दवाइयों का सेवन भी सिरोसिस के लिये जिम्मेदार होता है।

सिरोसिस के लक्षण
सिरोसिस के मुख्य लक्षणों में भूख न लगना, नाक से ब्लीडिंग, पीलिया, स्किन पर मकड़ी की तरह से नसों का दिखाई देना, वजन कम होना, स्किन में खुजली, कमजोरी और खान-पान तथा सामाजिक गतिविधयों से अरूचि होना शामिल हैं। जब यह बीमारी बहुत गम्भीर हो जाती है तो सोचने में कन्फ्यूजन, एब्डोमिन में सूजन (एसाइटिस), पैरों में सूजन (एडिमा), नपुन्सकता (इम्पोटेन्सी) और गायनेकोमासिया (पुरूष स्तन बृद्धि) जैसे लक्षण नजर आते हैं।

सिरोसिस डॉयग्नोज करना
इस संदर्भ में डाक्टर फिजिकल जांच के साथ मेडिकल हिस्ट्री देखता है। फिजिकल जांच में स्किन और आंखों में पीलापन, हथेलियों में लालामी, हाथ कांपना, लीवर इन्लार्जमेंट, स्मॉल टेस्टीकल्स, पुरूषों में ब्रेस्ट बढ़ना, एलर्टनेस में कमी इत्यादि का अवलोकन किया जाता है। यदि डॉक्टर को इनमें से एक से ज्यादा लक्षण नजर आते हैं तो सिरोसिस कन्फर्म करने के लिये सीबीसी (कम्लीट ब्लड काउंट टेस्ट), कोग्यूलेशन ब्लड टेस्ट, एल्बूमिन टेस्ट (लीवर द्वारा उत्पन्न की जाने वाली प्रोटीन), लीवर फंक्शन टेस्ट और एल्फा फेटोप्रोटीन (लीवर कैंसर की जांच) नामक टेस्टों की जरूरत पड़ती है। इन टेस्टों में यदि सिरोसिस कन्फर्म होता है तो उसकी स्टेज का पता लगाने के लिये अपर इंडोस्कोपी, लीवर का अल्ट्रासाउंड स्कैन, एब्डोमिन का एमआरआई स्कैन और सीटी स्कैन और लीवर बॉयोप्सी जैसे टेस्ट किये जाते हैं।

जटिलताएं
जब खून लीवर से पास नहीं हो पाता है तो इस कार्य को अंजाम देने वाली रक्त वाहिकाओं पर अधिक दबाब आने से इसाफगस वेरीकेस नामक कंडीशन बनती है जिससे ब्रशिंग (लो प्लेटलेट काउंट्स से क्लॉटिंग कम होना), ब्लीडिंग (क्लॉटिंग प्रोटीन घटने से), दवाइयों से सेन्सिटीविटी, किडनी फेलियर, लीवर कैंसर, टाइप 2 डायबिटीज के लिये इन्सुलिन प्रतिरोधकता, हेपेटिक इन्सेफैलोपैथी (खून में विषैले तत्वों की मौजूदगी से दिमाग भ्रमित होना), गालस्टोन (पित्ताशय में पथरी), स्पलीन बढ़ जाना, एडिमा और एसाइटिस जैसे कॉम्प्लीकेशन पैदा हो जाते हैं।

ईलाज
सिरोसिस का इलाज इसके कारणों पर निर्भर करता है। आमतौर पर इस सन्दर्भ में ये स्टेप्स लिये जाते हैं-
एल्कोहलिक सिरोसिस के मामलों में सबसे पहले शराब का सेवन पूरी तरह से बंद कराना।
पोर्टल हाइपर टेन्शन को कंट्रोल करने के लिये बीटा ब्लॉकर और नाइट्रेट का प्रयोग।
बैन्डिंग प्रोसीजर, जिससे इसाफगस वेरीकेस से होने वाली ब्लीडिंग को कंट्रोल किया जा सके।
इन्ट्रावेनस एंटीबॉयोटिक का प्रयोग जिससे एसाइटिस से होने वाली पेरीटोनिटिस का इलाज किया जा सके।
किडनी के काम न कर पाने की स्थिति में डॉयलिसिस से खून की सफाई।
शरीर में प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिये एल्बूमिन ट्रांस्फ्यूजन।
एन्सेफ्लापथी के इलाज के लिये लेक्टूयूलोज और लो-प्रोटीन डाइट।
एल्कोहलिक मामलों में दिमागी विकार से बचने के लिये एक्सट्रा प्रोटीन डाइट।

यदि उपरोक्त वर्णित ट्रीटमेंट सिरोसिस को कंट्रोल करने में नाकाम रहते हैं तो लीवर ट्रांसप्लांट ही अंतिम उपाय है। सिरोसिस के मरीजों के लिये एल्कोहल जहर है, इसलिये यदि दवाइयों से सुधार की सम्भावना है तो जीवन भर के लिये शराब छोड़ दें। डाक्टर की सलाह से ही दवाइयां लें क्योंकि दवाइयों की गलत मात्रा भी बहुत नुकसान कर सकती है।

सिरोसिस से बचाव
शराब और ड्रग्स की आदत छोड़ें। जो लोग नॉन एल्कोहलिक हैं वे हेपेटाइटिस बी, सी और डी से बचने के लिये वैक्सीनेशन करायें (हेपेटाइटिस बी, सी और डी के 30 प्रतिशत मरीज बाद में सिरोसिस या लीवर कैंसर के शिकार हुए हैं।), सेफ सेक्स की आदत डालें, टुथ-ब्रश और नीडिल शेयरिंग से बचें। सही खान पान और नियमित व्यायाम को अपनायें।

नजरिया
लीवर सिरोसिस का इलाज बहुत मंहगा है और एल्कोहलिक सिरोसिस के मामले में एल्बूमिन प्रोटीन ट्रांसफ्यूजन की जरूरत होती है। इसका एक दिन का खर्च 6 हजार से लेकर आठ हजार रूपये तक आता है। इसमें न्यूनतम चार घंटे का समय लगता है। इलाज के साथ एल्बूमिन प्रोटीन ट्रांसफ्यूजन की प्रक्रिया भी लम्बे समय (महीनों) तक चल सकती है। सिरोसिस के ट्रीटमेंट में यदि दवाइयां काम न कीं तो लीवर ट्रांसप्लांट ही एक मात्र उपाय है जो बहुत मंहगा और जटिल है। इसमें मरीज के ब्लड ग्रुप का ही स्वस्थ व्यक्ति लीवर डोनेट कर सकता है। हमारे देश में सरकारी अस्पतालों में लीवर ट्रांसप्लांट का न्यूनतम खर्च 15 से 20 लाख रूपये और प्राइवेट अस्पतालों में 25 से 30 लाख रूपये तक आता है। ऐसा उस स्थिति में है जब डोनर आपके पास हो। यदि डोनर नहीं है तो कैडेवर लीवर ट्रांसप्लांट विकल्प बचता है जिससे मरीज की जान बच सकती है। इसमें किसी अन्य मृत व्यक्ति के लीवर का ट्रांसप्लांट मरीज में किया जाता है।

इस प्रक्रिया में काफी समय और पैसा लगता है। इसके लिये सरकारी और गैरसरकारी अस्पतालों में कैडैवर लीवर ट्रांसप्लांट के रजिस्ट्रेशन की सुविधा तो होती है लेकिन रजिस्ट्रेशन के बाद महीनों या सालों इंतजार करना पड़ता है। इसका खर्च सामान्य लीवर ट्रांसप्लांट से करीब 5 लाख रूपये अधिक होता है। कुछ प्राइवेट अस्पताल इसके लिये मल्टी सिटी कैडेवर लीवर ट्रांस्पला्ंट सुविधा उपलब्ध कराते हैं। इसमें यदि मरीज दिल्ली शहर का है और मृत व्यक्ति मुम्बई, बैंग्लोर या किसी अन्य शहर में है तो डाक्टर, मरीज को एयर एम्बुलेंस या सामान्य एयर लाइन्स से उस शहर में ले जाकर वहीं के अस्पताल में ट्रांस्प्लांट करते हैं। इसके लिये होने वाले खर्च को वहन करने की जिम्मेदारी मरीज की होती है। इसलिये यदि सिरोसिस पहली स्टेज में डायग्नोज हो गया है तो डाक्टर की सलाह पर चलें, शराब, ध्रूमपान, गुटका और अन्य किसी भी तरह के ड्रग्स के सेवन को तिलांजलि दें और सेहत में सुधार आते ही लाइफ स्टाइल और खानपान बदलकर अपने आपको पूरी तरह से स्वस्थ करें। इस बीमारी से निपटने में लंबा समय लग सकता है ऐसे में परिवार और मित्रों का सहयोग बहुत मायने रखता है, एल्कोहलिक सिरोसिस के मरीज को हमेशा शराब के लिये डिस्करेज करें और उसे भरोसा दिलायें के वह प्रयास करके शराब छोड़ सकता है और फिर से अच्छा स्वस्थ जीवन जी सकता है।

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