पसर रहा है मल्टीपल माइलोमा...... - Naya India
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पसर रहा है मल्टीपल माइलोमा……

हाल में यह खबर सुनकर कि देश की जानी-मानी चरित्र अभिनेत्री व भाजपा सांसद श्रीमती किरण खेर मल्टीपल माइलोमा से बीमार हैं तो दुख के साथ आश्चर्य हुआ क्योंकि मेरी जानकारी के अनुसार इस दुलर्भ कैंसर के हमारे देश में न के बराबर केस हैं। इस सम्बन्ध में जब जानकारी हासिल की तो पता चला कि पिछले कुछ वर्षों से इस बीमारी ने अपने देश में इतने पांव पसार लिये हैं कि हर साल कई लाख केस सामने आ रहे हैं। यह बीमारी क्या है?, कौन इसकी चपेट में आ सकते हैं? और आज की तारीख में इलाज के क्या विकल्प मौजूद हैं जानने के लिये मैंने मायो क्लीनिक (जैक्सनविले, फ्लोरिडा, अमेरिका) के जाने-माने कैंसर (प्लाज्मा सेल डिस्आर्डर) विशेषज्ञ डा. सिकन्दर आइलावाधी (एमडी) से सम्पर्क किया तो उनसे मल्टीपल माइलोमा के सम्बन्ध में ये जानकारी हासिल हुई-

शरीर में मौजूद प्लाज्मा सेल्स को नुकसान पहुंचाने वाले इस कैंसर से इम्युनिटी, हड्डियां, गुर्दे और लाल रक्त कणिकायें नष्ट होने लगती हैं जिसका परिणाम हड्डियों में दर्द, बुखार और किडनी फेलियर के रूप में सामने आता है।

प्लाज्मा कोशिकायें एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिकायें हैं जो हड्डियों में पाये जाने वाले नरम ऊतकों जिन्हें डाक्टरी भाषा में बोन मैरो कहते हैं से बनती हैं। बोन मैरो से ही एंटीबॉडी बनाने वाली प्लाज्मा कोशिकायें भी बनती हैं, एंटीबॉडी एक विशेष प्रोटीन है जो शरीर को बीमारियों और संक्रमण से लड़ने में मदद करता है।

मल्टीपल माइलोमा में बोन मैरो में कुछ असामान्य प्लाज्मा सेल्स विकसित होकर तेजी से खुद को रिप्लीकेट (अपनी प्रतियां बनाने लगते हैं) करते हैं जिससे बोन मैरो में असामान्य कोशिकाओं की संख्या बढ़ने  से स्वस्थ कोशिकाओं का निर्माण घट जाता है।

स्वस्थ रक्त कोशिकाओं की भांति कैंसर युक्त कोशिकायें भी एंटीबॉडी बनाने की कोशिश करती हैं और नाकाम रहने पर शरीर के लिये हारिकारक मोनोक्लोनल प्रोटीन या एम प्रोटीन नामक असामान्य एंटीबॉडी बना देतीं हैं जिनके शरीर में एकत्रित होने से किडनी को नुकसान पहुंचता है और अनेक गम्भीर समस्यायें पैदा हो जाती हैं। बोन मैरो में असामान्य कोशिकाओं का यह तीव्र उत्पादन कुछ समय में मल्टीपल माइलोमा जैसे घातक कैंसर का रूप ले लेता है। गम्भीरता और इलाज के लिहाज से इसे दो वर्गों में बांटा गया है-

इंडोलेन्ट माइलोमा: यह धीरे-धीरे बढ़ता है क्योंकि इसमें एम प्रोटीन और एम प्लाज्मा सेल्स धीमी गति से बढ़ते हैं जिससे रोगी को ज्यादा गम्भीर लक्षणों का सामना नहीं करना पड़ता। गति धीमी होने से रोगी, बोन ट्यूमर जैसे कॉम्प्लीकेशन्स से बच जाता है।

सोलीटेरी माइलोमा: इस कैंसर में हड्डियों में ट्यूमर बनने से रोगी को असहनीय दर्द और ज्यादा समय अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता है, हालांकि इलाज से आराम भी आ जाता है लेकिन क्लोज मॉनीटरिंग की जरूरत होती है।

लक्षण क्या हैं?

इसके लक्षण प्रत्येक व्यक्ति के लिये अलग-अलग हो सकते हैं। शुरूआत में लक्षणों का पता ही नहीं चलता, बीमारी बढ़ने के साथ रोगी इन्हें महसूस करता है। मेडिकल साइंस में सीआरएबी के नाम से प्रचलित चार लक्षणों में से कम से कम एक जरूर महसूस होता है। सीआरएबी मतलब कैल्शियम, रेनल फेलियर, एनीमिया और बोन डैमेज।

इसमें हड्डियां खराब होने के कारण खून में कैल्शियम बढ़ने से पीड़ित को अधिक प्यास, जी मिचलाना, उल्टी, पेट में खराबी और भूख मर जाने जैसे लक्षण महसूस होते हैं। डाक्टरों का कहना है कि खून में कैल्शियम  बढ़ जाने से रोगी भ्रमित होने के साथ कॉन्सटीपेशन का शिकार हो जाता है।

बीमारी बढ़ने के साथ शरीर में एम प्रोटीन का स्तर बढ़ता है जिसका असर किडनी फेलियर  के रूप में सामने आता है और खून में स्वस्थ रक्त कणिकाओं की कमी से एनीमिया होने के कारण शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को जरूरी मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाती जिससे  वह थकान, चिड़चिड़ापन तथा सिर चकराने जैसे लक्षण महसूस करता है।

बोन मैरो (अस्थि मज्जा) और हड्डियों में कैंसर युक्त सेल्स फैलने से हड्डियां कमजोर होने लगती हैं तथा रोगी को फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। एक्स-रे से पता चला है कि कैंसर सेल्स हड्डियों में छोटे-छोटे  छेद कर देते हैं जिनकी वजह से असहनीय दर्द होता है। पीड़ित को हड्डियों का दर्द पीठ, पेल्विस (कमर और कूल्हे का भाग), पसलियों तथा स्कल में महसूस होता है। इनके अलावा रोगी को कुछ अतिरिक्त लक्षण भी महसूस होते हैं जैसेकि- पैरों में कमजोरी या सुन्नता, वजन घटना, उलझन, पेशाब करने में परेशानी,  बार-बार संक्रमण और नजर धुंधलाना।

क्यों होता है मल्टीपल माइलोमा?

इसका सटीक कारण अभी तक अज्ञात है, रिसर्च के मुताबिक इसकी शुरूआत एक असमान्य प्लाज्मा सेल्स से होती है जो बोन मैरो में तेजी से बढ़ते हैं। ऐसे माइलोमा सेल्स का जीवन चक्र असामान्य होता है, जब इन्हें मरना चाहिये ये नहीं मरते व अनिश्चित काल तक विभाजित होने से इनकी संख्या बढ़ती रहती है। इस बढ़ती संख्या के कारण स्वस्थ कोशिकाओं का उत्पादन घटने से रोगी की हालत गम्भीर हो जाती है।

किन्हें हो सकती है ये बीमारी?

यब बीमारी महिलाओं की बजाय पुरूषों को अधिक होती है। विशेष रूप से जिनकी उम्र 50 वर्ष से ज्यादा हो। इसके अलावा मोटापा, रेडियेशन से एक्सपोजर और पेट्रोलियम इंडस्ट्री में काम करने वालों को इसका रिस्क ज्यादा है। यदि किसी के परिवार में एमजीयूएस अर्थात मोनोक्लोनल गैमोपैथी का इतिहास है तो उन्हें भी इसका रिस्क है, यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें प्लाज्मा कोशिकायें एम प्रोटीन बनाने लगती हैं।

पुष्टि कैसे होती हैं?

इसकी पुष्टि के लिये फिजिकल जांच, ब्लड और यूरीन टेस्ट किये जाते हैं। जब इन टेस्टों से मल्टीपल माइलोमा का संदेह होता है तो बीमारी की गम्भीरता और असलियत जानने के लिये कुछ अन्य टेस्ट किये जाते हैं।

मल्टीपल माइलोमा के लिये जिम्मोदार एम प्रोटीन का पता ब्लड और यूरीन टेस्ट से चलता है। कैंसरस सेल्स बीटा-2 माइक्रोग्लूबिन नामक एक अन्य प्रोटीन भी बनाते हैं जिसका पता बल्ड टेस्ट से चलता है। इनके अतिरिक्त ब्लड टेस्ट से बोन मैरो में प्लाज्मा सेल्स का प्रतिशत, किडनी फंक्शन्स, ब्लड सेल काउंट, कैल्शियम लेवल और यूरिक एसिड लेवल पता चलता है।

एक्स-रे, एमआरआई और सीटी स्कैन जैसे इमेजिंग टेस्टों से मल्टीपल माइलोमा से डैमेज हड्डियों की जानकारी मिलती है। बीमारी की पुष्टि और गम्भीरता जानने के लिये बोन मैरो बॉयोप्सी की जाती है, इससे पता चलता है कि कैंसर सेल्स कितनी तेजी से मल्टीप्लाई हो रहे हैं। पुष्टि के बाद स्टेज का निर्धारण ब्लड सेल काउंट, ब्लड और यूरीन में प्रोटीन की मात्रा तथा ब्लड में कैल्शियम लेवल से होता है। यह निर्धारण दो तरीकों से होता है- ड्यूरी सेलमन सिस्टम और इन्टरनेशनल स्टेजिंग सिस्टम।

ड्यूरी सेलमन सिस्टम, खून में एम प्रोटीन, कैल्शियम और लाल रक्त कणिकाओं का स्तर और बीमारी से डैमेज हड्डियों की मात्रा जबकि इन्टरनेशनल स्टेजिंग सिस्टम, ब्लड प्लाज्मा और बीटा-2 माइक्रोग्लूबिन के स्तर पर आधारित है। ये दोनों सिस्टम मल्टीपल माइलोमा को तीन स्टेजों में डिवाइड करते हैं। डाक्टर इन्हीं स्टेजों के हिसाब से बीमारी का इलाज करते हैं। तीसरी स्टेज सबसे गम्भीर होती है।

इलाज क्या है इसका?

अभी तक इस बीमारी का पूरी तरह से इलाज नहीं है लेकिन उपलब्ध इलाज से इसके दर्दनाक लक्षण, कॉम्प्लीकेशन्स तथा बढ़ने की गति धीमी करते हैं। इसके लिये टारगेट थेरेपी, बॉयोलॉजिकल थेरेपी, कीमोथेरेपी, कोरटीकोस्टीराइड्स, रेडियेशन थेरेपी, स्टेम सेल्स ट्रांसप्लांट और अल्टरनेटिव मेडीसिन का प्रयोग होता है। अल्टरनेटिव मेडीसिन के रूप में एक्यूपंचर, अरोमाथेरेपी, मसाज, मेडीकेशन और रिलेक्सेशन मैथड प्रयोग किये जाते हैं।

बैक पेन के इलाज के लिये दर्दनिवारक दवायें और बैक ब्रेस, हड्डियों का क्षय रोकने या धीमा करने के लिये ड्रग थेरेपी, किडनी से जुड़े कॉम्प्लीकेशन्स के लिये डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट, संक्रमण रोकने के लिये एंटीबॉयोटिक्स और एनीमिया के लिये एरिथ्रोपोइटिन का प्रयोग होता है।

मल्टीपल माइलोमा से साथ जीवन

यदि बीमारी की पुष्टि हो गयी है तो इसके साथ जीवन बिताने के लिये सबसे जरूरी है कि पीड़ित को अपनी बीमारी के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी हो। डाक्टर से अपने ट्रीटमेंट प्लान और साइड इफेक्ट्स की पूरी जानकारी लें और खुद को मानसिक रूप से मजबूत करें। पीड़ित के परिवार वालों को चाहिये कि वे मित्रों और शुभचिंतकों का सपोर्ट ग्रुप बनायें जो रोगी को भावनात्मक सहारा दे। आजकल ऑनलाइन सपोर्ट ग्रुप भी बनाये जाते हैं। इस तरह के ग्रुप, पीड़ित को मोटीवेट करके उसके दर्द और चिड़चिड़ेपन  को कम करते हैं।

पीड़ित को हमेशा डाक्टर के निर्देशानुसार हेल्दी डाइट दें और उसकी ओवरआल हेल्थ पर नजर रखें। उसे अधिक से अधिक रेस्ट करने दें, यदि सम्भव हो तो हल्के-फुल्के व्यायाम करायें तथा उससे जुड़े किसी भी शेड्यूल को ओवरलोड न करें। ऐसा नहीं है कि इस बीमारी की पुष्टि होते ही इसके नकारात्मक लक्षण नजर आने लगेंगे, कुछ को तो ऐसे लक्षण कई वर्षों बाद महसूस होते हैं। जहां तक सर्वाइवल रेट की बात है तो अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के मुताबिक पहली स्टेज में 62 महीने या पांच साल, दूसरी स्टेज में 44 महीने या अधिकतम चार साल और तीसरी स्टेज में 29 महीने या अधिकतम तीन साल का सर्वाइल रेट है। यह सभी के लिये समान हो जरूरी नहीं है कुछ लोग तो आसानी से दस तक निकाल लेते हैं। कैंसर (प्लाज्मा सेल डिस्आर्डर) विशेषज्ञ डा. सिकन्दर आइलावाधी (एमडी) का कहना है कि इसके इलाज में प्रयोग होने वाली टारगेट और बॉयोलाजिकल थेरेपी में दिनों-दिन अच्छी प्रगति हो रही है और ऐसा लगता है कि अगले दो या तीन साल में इसकी सटीक दवा बाजार में उपलब्ध होगी।

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