एक तो वायरस, ऊपर से ऑक्सीजन की कमी!

Must Read

चारों तरफ ऑक्सीजन की मारा-मारी है। अस्पतालों में जगह नहीं, अगर है तो ऑक्सीजन नहीं, पहले तो मरीज भर्ती नहीं करना, अगर किया तो मरीज के तीमारदारों को ही ऑक्सीजन सिलिंडर का इंतजाम करना होगा। परिणाम मरीज का तीमारदार, ऑक्सीजन सिलेंडर लेने या उसे भरवाने (क्योंकि घरेलू ऑक्सीजन सिलेंडर 5-6 घंटे से ज्यादा नहीं चलता) की लम्बी-लम्बी लाइनों में लगता है। वहां सैंकड़ों की संख्या में उसके  जैसे लोग लाइनों में लगे हैं, घंटों चलने वाली कतार…. मास्क हटा या किसी से निकट संपर्क हुआ तो वह भी कोरोना संक्रमित। चूंकि कोरोना संक्रमण के लक्षण दो से चार दिन में पता चलते हैं तब तक एक तीमारदार ही पता नहीं कितनों को संक्रमित कर दे अगर मरीज घर में आइसोलेट है तो ऑक्सीजन की लाइन से लौटे तीमारदार से घर के स्वस्थ लोग संक्रमित हो जाते हैं। इस तरह कोरोना से संक्रमित होने का सिलसिला चलता रहता है….चलता रहता है……और कोरोना घर-घर में।

अब बात मरीज की, तीमारदार जब घंटों की जद्दोजहद के बाद ऑक्सीजन लेकर आता है तब तक उसकी ब्लड ऑक्सीजन इतनी नीचे चली गयी है कि फेफड़ों में भारी मात्रा में कार्बन डाइ ऑक्साइड जमा हो जाती है जिसे शरीर से बाहर निकालने के लिये उच्च-दबाब से ऑक्सीजन देने वाली मशीनों या वेन्टीलेटर की जरूरत है, परिणाम मरीज आईसीयू में। किस्मत बहुत अच्छी हुई तो आईसीयू मिला अन्यथा वहीं तड़प-तड़प के दम निकलना तय।

मेरे मित्र दिनेश चोपड़ा के साथ कुछ ऐसा ही हुआ, वे अप्रैल माह के अंतिम सप्ताह में कोरोना संक्रमित हुए, दो-तीन दिन घर में आइसोलेट रहे, जब तबियत बिगड़ी तो घर वालों ने पूर्वी दिल्ली के शांति मुकुन्द अस्पताल में भर्ती कराया। कुछ दिन सामान्य प्रेशर की ऑक्सीजन पर रहे, लेकिन हालत नहीं सुघरी। 4 मई रात्रि 11 बजे में एक मित्र ने फोन करके बताया कि उनका ऑक्सीजन लेवल 45 हो गया है, उन्हें हाई-प्रेशर से ऑक्सीजन देने वाले वेंटीलेटर की जरूरत है जो इस अस्पताल में नहीं है। दिल्ली में जो मारा-मारी है उसके चलते हाई-फ्लो ऑक्सीजन देने वाला वेंटीलेटर नहीं मिला और वे हमेशा के लिये हम सबको छोड़कर चले गये। यह कहानी केवल दिनेश चोपड़ा की नहीं है बल्कि उन सभी की है जो ऑक्सीजन की कमी से दुनिया से असमय जा रहे हैं या जिनके परिजन ऑक्सीजन की लाइनों में लगे हैं।

कैसे पता करें ऑक्सीजन की कमी का?

अस्पतालों में जगह न होने से बड़ी संख्या में कोरोना के मरीज घर में अलग-अकेले, आइसोलेट होकर इलाज करा रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि मरीज के ब्लड ऑक्सीजन स्तर पर हमेशा नजर रखी जाये। ब्लड में ऑक्सीजन के स्तर का पता फिजिकल जांच और ऑक्सीमीटर (पल्स ऑक्सीमीटर) से चलता है। स्वस्थ व्यक्ति का ब्लड ऑक्सीजन लेवल 94 से 99 के बीच में होना चाहिये। वर्तमान स्थितियों में डॉक्टरों ने  इसकी रेंज घटाकर 92-99 कर दी है, लेकिन ज्यादा समय तक 92 रहना ठीक नहीं है। इसे बढ़ते रहना चाहिये। 90 से नीचे का स्तर होने पर ऑक्सीजन का बाहरी सपोर्ट अनिवार्य है।

मरीज पर ऑक्सीजन की कमी का असर जानने के लिये एबीजी अर्थात आर्टेरियल ब्लड गैस टेस्ट किया जाता है। इसके लिये ब्लड सैम्पल लैब में भेजते हैं और एक घंटे में पता चल जाता है कि ब्लड में कितनी ऑक्सीजन, कितनी कार्बन डाइ ऑक्साइड और कितनी एसिडिटी (पीएच लेवल) है। शरीर में देर तक ऑक्सीजन कम रहने से पीएच लेवल बिगड़ता है और एसिड बढ़ने लगता है। यदि यह रेंज से बाहर है तो आईसीयू की जरूरत होती है। ब्लड में कार्बन डाइ ऑक्साइड की अधिक मात्रा जीवन के लिये खतरे का संकेत है क्योंकि इसका कुप्रभाव शरीर के टिश्यू  पर पड़ने लगता है।

ऑक्सीजन की कमी का असर

मेडिकल साइंस के मुताबिक ऑक्सीजन की कमी मानव शरीर को दो तरह प्रभावित करती है- हाइपोक्सीमिया और हाइपोक्सिया। ब्लड में ऑक्सीजन का कम स्तर (लो आर्टेरियल ऑक्सीजन सप्लाई) हाइपोक्सीमिया कहलाती है, इसमें मरीज का ब्लड ऑक्सीजन लेवल 92 प्रतिशत या इससे कम हो जाता है।

टिश्यू (अंगों) में ऑक्सीजन का स्तर कम होने से हाइपोक्सिया की कंडीशन बनती है। हाइपोक्सिया  में शरीर के अंग शिथिल पड़ने लगने हैं और ज्यादा देर तक ऐसा रहने से मल्टीपल ऑर्गन फेलियर होने लगता है जिससे किडनी, ब्रेन और हार्ट धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं।

हाइपोक्सीमिया हो या हाइपोक्सिया दोनों कंडीशन्स में सांस फूलना, जल्दी-जल्दी सांस लेना और दिल की धड़कन तेज होने जैसे लक्षण उभरते हैं। गम्भीर कंडीशन में मरीज कम्युनीकेट नहीं कर पाता, भ्रमित रहता है और कोमा में चला जाता है, ज्यादातर मामलों में मृत्यु हो जाती है।

ऑक्सीजन ही इलाज है

ब्लड में ऑक्सीजन की कमी का एक मात्र इलाज है कि जितनी जल्दी हो मरीज को ऑक्सीजन दी जाये। ऑक्सीजन देने के तीन तरीके हैं-

ऑक्सीजन सिलेन्डर से:  घरों में और छोटे अस्पतालों में सिलेंडरों से ऑक्सीजन देते हैं। इसमें ऑक्सीजन सिलेंडर पर एक फ्लो मीटर फिट करके सिलेन्डर से निकलने वाली ऑक्सीजन को कंट्रोल करते हुए एक ह्यूमिडीफॉयर में लाते हैं जहां से एक टाइट मास्क मरीज के मुंह पर लगा देते हैं। यदि मरीज की तबियत गम्भीर नहीं है तो मास्क के बजाय ऑक्सीजन की नली को नाक के पास लगा देते हैं जिससे मरीज की सांस से ही ऑक्सीजन फेफड़ों में जाती रहती है। 92 से नीचे ऑक्सीजन लेवल होने पर ऑक्सीजन हमेशा टाइट मास्क से देनी चाहिये।

ऑक्सीजन  कंसंट्रेटर से: यह मशीन वातावरण से ऑक्सीजन लेकर मरीज के फेफड़ों तक पहुंचाती है। इसका प्रयोग तभी करना चाहिये जब ऑक्सीजन का स्तर 88 या इससे ऊपर हो। क्योंकि इसमें इतना प्रेशर नहीं होता है कि यह गम्भीर मरीजों के फेफड़ों में जरूरत के मुताबिक ऑक्सीजन का फ्लो मेन्टेन कर सके। हमेशा याद रखें कि ऑक्सीजन कंस्न्ट्रेटर से धीरे-धीरे ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है और यह ऑक्सीजन सिलेन्डर से कम प्रभावी है। कंसंट्रेटर यदि दस लीटर क्षमता को हो तो ज्यादा ठिक है। पर पांच लीटर का अधिक उपलब्ध है । इसलिए इसके ही भरोसे रहना जोखिमपूर्ण है। ऑक्सीजन लेवल जब इससे स्थिर, सुरक्षित स्तर पर हो जाए तो इसे हटाकर सिलेन्डर से ऑक्सीजन दें।

वेंटीलेटर: ऑक्सीजन लेवल ज्यादा नीचे जाने पर हाई-फ्लो ऑक्सीजन सप्लाई मशीनों और वेंटीलेटर की जरूरत पड़ती है। ऑक्सीजन का स्तर 75 से नीचे जाने पर वेंटीलेटर अनिवार्य है, क्योंकि वेंटीलेटर एक साथ दो काम करता है, एक वह फेफड़ों में तेजी से ऑक्सीजन पहुंचाता है दूसरे फेफड़ों में जमा कार्बन डाइ ऑक्साइट बाहर निकालता है। इसके लिये एक ट्यूब प्रयोग करते हैं, जिसका एक सिरा वेन्टीलेटर से और दूसरा मुंह या नाक के जरिये फेफड़ों की वायु नलिका से जुड़ता है। इसे इन्ट्यूबेशन कहते हैं। वेन्टीलेटर के साथ कुछ अन्य मेडिकल उपकरण प्रयोग किये जाते हैं जिनसे ब्लड प्रेशर, हार्ट रेट, ब्रीदिंग रेट और ऑक्सीजन सैचुरेशन का पता चलता है।

गम्भीर मरीजों को लम्बे समय तक वेन्टीलेटर पर रखने के लिये  ब्रीदिंग ट्यूब को सर्जरी के जरिये गले में छेद करके मरीज की विंड पाइप (फेफड़ों की वायु नलिका) से जोड़ते हैं। यह प्रक्रिया ट्रैकियोस्टॉमी कहलाती है। ट्रैकियोस्टॉमी मैथड से वेन्टीलेटर का प्रयोग ज्यादा सुरक्षित है, इसमें ओरल हाइजीन बढ़ जाती है, गले (वोकल कॉर्ड) में कम नुकसान होता है और मरीज को बोलने तथा खाना खाने में सहूलियत रहती है।

वेन्टीलेटर सपोर्ट हटने के बाद मरीज को कुछ समय के लिये खुद से सांस लेने में परेशानी, गले में जख्म और छाती की मांसपेशियों में दर्द की शिकायत हो सकती है। क्योंकि वेन्टीलेटर के प्रयोग के दैरान जो काम छाती की मांसपेशियों को करना था वह वेन्टीलेटर ने किया इसलिये ये मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। कुछ मामलों में लंग्स और चेस्ट मसल्स को सामान्य होने में कई दिन लग जाते हैं। ऐसी समस्याओं से बचने के लिये डाक्टर वीनिंग प्रक्रिया में वेन्टीलेटर की पॉवर एक या दो दिन में धीरे-धीरे घटाकर ही इसे हटाते हैं।

क्या करें जिससे मरीज सीरियस न हो?

वेंटीलेटर या हाई-फ्लों से ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली मशीनों की जरूरत न हो इसके लिये जैसे ही मरीज की ब्लड ऑक्सीजन 92 से कम ज्योंहि होने लगे उसे ऑक्सीजन  कंसंट्रेटर से ऑक्सीजन देना शुरू करें और इसका स्तर 94 मेन्टेन करें। यदि कंन्सन्ट्रेटर से यह लेवल मेन्टेन नहीं हो रहा है तो ऑक्सीजन सिलेन्डर का इस्तेमाल करें। जब तक कोरोना संक्रमण समाप्त करने वाली दवाओं का असर दिखना शुरू न हो जाये मरीज का ब्लड ऑक्सीजन लेवल  कंसंट्रेटर या सिलिन्डर के जरिये 94 या इससे ऊपर  मेन्टेन रखें। सिलेन्डर से ऑक्सीजन सप्लाई करने की अवस्था में आपके पास हमेशा दो सिलेन्डर होने चाहिये जिससे एक सिलेन्डर समाप्त होने पर ऑक्सीजन सप्लाई ज्यादा देर के लिये बाधित न हो।

यदि सिलेन्डर या कन्सन्ट्रेटर हटाने पर थोड़ी देर में ही ऑक्सीजन लेवल गिरकर 90 या इससे नीचे जाने लगे तो मरीज को अस्पताल ले जायें क्योंकि ऐसे में हाई-फ्लों ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली मशीनों से ही उसकी जान बच सकती है। यदि डाक्टर वेंटीलेर पर डालने के लिये कह रहा है तो घबरायें नहीं, वेंटीलेटर जान बचाने वाली मशीन है जान लेने वाली नहीं।

- Advertisement -spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

साभार - ऐसे भी जानें सत्य

Latest News

‘चित्त’ से हैं 33 करोड़ देवी-देवता!

हमें कलियुगी हिंदू मनोविज्ञान की चीर-फाड़, ऑटोप्सी से समझना होगा कि हमने इतने देवी-देवता क्यों तो बनाए हुए हैं...

More Articles Like This