कमजोर-झरझरी हड्डियां याकि ऑस्टियोपोरोसिस

विष्णु प्रिया सिंह

ऑस्टियोपोरोसिस की दशा में शरीर की हड्डियां कमजोर और झरझरी हो जाती हैं। स्वस्थ हड्डियों का ढांचा मधुमक्खी के छत्ते की भांति छोटे-छोटे छिद्रों से युक्त होता है, ऑस्टियोपोरोसिस में हड्डियों के अंदरूनी ढांचे के इन छिद्रों का स्पेस बढ़ने लगता है जिससे हड्डियों का अंदरूनी घनत्व (डेन्सिटी) और शक्ति (स्ट्रेन्थ) घट जाती है और बाहर से ये कमजोर तथा पतली हो जाती हैं। हमारे देश में ऑस्टियोपोरोसिस के 1 करोड़ से ज्यादा मामले प्रतिवर्ष दर्ज होते हैं। 40 वर्ष से ज्यादा उम्र वाली महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस सबसे ज्यादा होता है। जहां 5 पुरूषों में केवल 1 पुरूष इससे प्रभावित है वहीं देश की हर दूसरी महिला को यह बीमारी है। ऑस्टियोपोरोसिस किसी भी उम्र में हो सकता है लेकिन ज्यादातर मामलों में 45 वर्ष के ऊपर के लोग ही इसका शिकार होते हैं। इसके कारण दैनिक कार्य (खड़े होना और टहलना) करते समय फ्रैक्चर और हड्डी टूटने का खतरा बढ़ जाता है। पसलियां, कूल्हे की हड्डी (हिप बोन), स्पाइन (रीढ़ की हड्डी) और कलाई की हड्डी इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं।

लक्षण
अधिकतर मामलों में व्यक्ति को ऑस्टियोपोरोसिस का पता फ्रैक्चर होने पर चलता है। ऑस्टियोपोरोसिस की शुरूआती स्टेज में ग्रिप स्ट्रेन्थ में कमी, मसूड़े घटना (रिसीडिंग गम्स) और नाखून कमजोर और भुरभुरे (ब्रिटल) हो जाते हैं। यदि फैमली हिस्ट्री में ऑस्टियोपोरोसिस है तो इनमें से कोई लक्षण नजर आने पर तुरन्त डाक्टर से सम्पर्क करें। यदि इसका समय पर सही इलाज न किया जाये तो यह तेजी से बढ़ती है और हड्डियां पतली और कमजोर हो जाती हैं। गम्भीर अवस्था में गिरने और जोर से खांसने पर भी फ्रैक्चर हो जाता है। जैसे-जैसे यह बीमारी बढ़ती है गर्दन (नेक) और कमर (बैक) में दर्द के साथ व्यक्ति की लम्बाई (हाइट) भी कम हो जाती है। ऐसा वास्तव में कम्प्रेशन फ्रैक्चर की वजह से होता है, इसमें नेक या बैक की कोई वरटिबरा इतनी ज्यादा कमजोर हो जाती है कि वह स्पाइन के सामान्य दबाब से टूट जाती है। ऑस्टियोपोरोसिस से होने वाला फ्रैक्चर कितने समय में ठीक होगा यह फ्रैक्चर की जगह, गम्भीरता, व्यक्ति की उम्र और स्वास्थय पर निर्भर करता है।

ऑस्टियोपोरोसिस के कारण
हमारे शरीर की हड्डियों के अंदरूनी भाग में जीवित टिश्यू और मधु-मक्खी के छत्ते की तरह से छोटे-छोटे छिद्र (होल) होते हैं। जब ये छोटे-छोटे छिद्र (होल) आकार में बढ़ने लगते हैं तो ऑस्टियोपोरोसिस हो जाता है। अब प्रश्न यह उठता है कि ये छिद्र क्यों बढ़ने लगते हैं? इसका उत्तर है- हमारे शरीर में पूरी उम्र हड्डियों का लगातार पुन: प्रतिरूपण (रिमॉडलिंग) होता है।

बोन रिमॉडलिंग की प्रक्रिया के दो चरणों होते हैं- पहले चरण मंा ऑस्टियोक्लास्ट नामक स्पेशल सेल्स हड्डियों को ब्रेक डाउन (भंग) करते हैं और दूसरे चरण में ऑस्टियोब्लास्ट नामक सेल्स नयी हड्डियों का निर्माण करते हैं। स्वस्थ मनुष्य में ऑस्टियोक्लास्ट और ऑस्टियोब्लास्ट नामक दोनों प्रक्रियायें उम्र भर अच्छी तरह से क्वार्डीनेट करके काम करती हैं। इन दोनों प्रक्रियाओं के क्वार्डीनेशन में कमी होने पर ऑस्टियोक्लास्ट नामक प्रक्रिया बोन्स को जितनी तेजी से भंग करती है, ऑस्टियोब्लास्ट नामक प्रक्रिया उतनी तेजी से नयी बोन्स का निर्माण नहीं कर पाती, जिसके परिणाम स्वरूप ऑस्टियोपोरोसिस की कंडीशन बन जाती है। जवान होने पर शरीर में बहुत सी बोन्स का निर्माण होता है, इसीलिये 20 वर्ष की उम्र में हड्डियों का भार अपने अधिकतम स्तर पर होता है। इसके पश्चात बोन्स के भार में कमी आती है क्योंकि शरीर में हड्डियों के निर्माण की तुलना में उनका क्षय अधिक होता है।

हड्डियों के पुन: प्रतिरूपण (रि-मॉडलिंग) की प्रक्रिया में पैराथॉयराइड (घ्च्र्क्त) नामक हारमोन का योगदान सबसे अधिक है। शरीर में पैराथॉयराइड हारमोन का लेवल बढ़ने से ऑस्टियोक्लास्ट नामक प्रक्रिया एक्टीवेट होती है और बोन्स ज्यादा मात्रा में ब्रेक डाउन (भंग) होने लगतीं हैं। खून में मौजूद कैल्शियम, पैराथॉयराइड हारमोन की रिलीज का प्रमुख कारक है। खून में कैल्शियम की कमी (हाइपोकैल्शीमिया) से पैराथॉयराइड हारमोन का लेवल बढ़ता है और बोन्स ब्रेक डाउन में तेजी आती है। पैराथॉयराइड हारमोन का लेवल बढ़ने से हड्डियां, खून में जरूरी मात्रा में कैल्शियम रिलीज नहीं कर पाती हैं।

कैल्शियम, हार्ट की अच्छी हेल्थ, बल्ड क्लॉटिंग रोकने और मांसपेशियों के फंक्शन के लिये भी जरूरी है। हड्डियों में कैल्शियम बरकार रहे इसके लिये विटामिन डी अनिवार्य है। विटामिन डी, छोटी आंत (इन्टस्टाइन) के माध्यम से कैल्शियम को शरीर में आत्मसात करता है। एक मेडिकल शोध के अनुसार उम्रदराज लोगों में विटामिन डी की कमी हिप फ्रैक्चर का मुख्य कारण है। बिना विटामिन डी के हमारे शरीर की ब्लडस्ट्रीम, दूध से भी कैल्शियम को पूरी तरह से ग्रहण नहीं कर पाती। शरीर में विटामिन डी कम होने से ऑस्टियोक्लास्ट एक्टीवेट होते हैं और पैराथॉयराइड हारमोन (पीटीएच) का लेवल बढ़ता है जिससे बोन रिमॉडलिंग का क्वार्डीनेशन बिगड़ जाता है और ऑस्टियोपोरोसिस की कंडीशन बन जाती है।

ऑस्टियोपोरोसिस का दूसरा कारण हाइपर्थाइरॉडिज्म नामक कंडीशन है। इससे थॉयराइड ग्लैंड प्रभावित होता है। थॉयराइड ग्लैंड से ट्राईआयोडोथायरोनिन (च्र्3) और टेट्राआयोडोथायरोनिन (च्र्4) नामक दो प्राइमरी हारमोन उत्पन्न होते हैं जो सेल के द्वारा इनर्जी के प्रयोग को कंट्रोल करते हैं। थॉयराइड ग्लैंड, इन्हीं हारमोन्स को रिलीज करके मेटाबोलिज्म को रेगुलेट करता है। हाइपर्थाइरॉडिज्म नामक कंडीशन में इन दोनों हारमोन्स में कोई एक या दोनों ही बहुत ज्यादा मात्रा में रिलीज होते हैं जिससे बोन्स के पुन: प्रतिरूपण (रि-मॉडलिंग) का क्वार्डीनेशन खराब हो जाता है। लम्बे समय तक चलने वाले कुछ मेडीकेशन जैसेकि प्रेडिनिसोन या कार्टीसोन भी ऑस्टियोपोरोसिस के लिये जिम्मेदार होते हैं।

रिस्क फैक्टर
उम्र: बढती उम्र ऑस्टियोपोरोसिस का सबसे प्रमुख रिस्क फैक्टर है। जीवनभर शरीर में पुरानी बोन्स भंग होतीं है और नयी का निर्माण होता है। 30 वर्ष की उम्र के बाद बोन्स के ब्रेक डाउन (भंग) की प्रक्रिया तेज हो जाती है और निर्माण उतनी तेजी से नहीं हो पाता, इससे बोन डेन्सिटी घटती है और फ्रैक्चर के चांस बढ़ जाते हैं। उम्र बढ़ने से होने वाला ऑस्टियोपोरोसिस, सेनिल ऑस्टियोपोरोसिस कहलाता है।

मेनोपॉज: महिलाओं के संदर्भ में यह प्राइमरी रिस्क फैक्टर है। महिलाओं में 45 से 55 वर्ष की उम्र के दौरान हारमोन्स लेवल में परिवर्तन होने से मेनोपॉज की कंडीशन बनती है और बोन लॉस में तेजी आती है। आदमियों में भी इस उम्र में बोन लॉस होता है लेकिन महिलाओं की तुलना में वह बहुत धीमा होता है और इस धीमेपन के कारण वे 65 से 70 वर्ष तक की उम्र में पहुंच जाते हैं।

इनके अलावा महिला होना, कोकेशियन या एशियन होना, खराब पोषण, व्यायाम न करना, स्मोकिंग, कम वजन, स्मॉल बोन फ्रेम और फैमिली हिस्ट्री इसके अन्य रिस्क फैक्टर हैं। इनमें से खराब पोषण और व्यायाम जैसे रिस्क फैक्टरों को कंट्रोल करके ऑस्टियोपोरोसिस से बच सकते हैं। अच्छे पोषक तत्वों (कैल्शियम और विटामिन डी रिच) से भरपूर भोजन और व्यायाम हड्डियों की बेहतर हैल्थ के लिये लाभदायक है।

ऑस्टियोपोरोसिस डॉयग्नोज करना
ऑस्टियोपोरोसिस का पता लगाने के लिये बोन डेन्सिटी टेस्ट होता है। डॉक्टर मेडिकल हिस्ट्री की समीक्षा और फिजिकल जांच के पश्चात ब्लड तथा यूरीन टेस्ट से बोन लॉस का पता लगाते हैं। जब इन टेस्टों में बोन लॉस कन्फर्म होता हैं तो बोन डेन्सिटी टेस्ट किया जाता है। इस टेस्ट को मेडिकल लैंग्वेज में बोन डेन्सिटियोमेटरी या डुयेल इनर्जी एक्स-रे एब्जार्पशियोमेट्री (डेक्सा) कहते हैं। इसमें एक्स-रे द्वारा कलाई, कूल्हे और रीढ़ं की हड्डी का घनत्व मापते हैं। दर्दरहित यह टेस्ट 10 से 30 मिनट में पूरा होता है।

ऑस्टियोपोरोसिस को डॉयग्नोज करते समय यदि डाक्टर आपसे कहे कि ऑस्टियोपेनिया है तो यह न समझें कि आपने गलत सुना है। ऑस्टोपेनिया भी एक कंडीशन है लेकिन यह ऑस्टियोपोरोसिस से अलग है। ऑस्टोपेनिया बीमारी नहीं है यह न्यूतम बोन डेन्सिटी की एक अवस्था है। इसमें बोन्स की डेन्सिटी सामान्य और स्वस्थ व्यक्ति की बोन डेन्सिंटी से कम होती है लेकिन हड्डियां ऑस्टियोपोरोसिस की भांति कमजोर नहीं होती हैं। इससे जवानी में तो कोई समस्या नहीं होती है लेकिन बुढापे में यह अवस्था ऑस्टियोपोरोसिस के लिये प्रेरक का काम करती है। ऐसे में ऑस्टोपेनिया डिटेक्ट होने पर खान-पान अच्छा रखें और बोन्स को मजबूत करने से सम्बन्धित एक्सरसाइज करते रहें।

इलाज-ट्रीटमेंट
जब डॉक्टर को कन्फर्म हो जाता है कि मरीज ऑस्टियोपोरोसिस से ग्रस्त है तो वह मेडीकेशन तथा लाइफ स्टाइल में परिवर्तन के साथ ट्रीटमेंट प्लान तैयार करता है। लाइफ स्टाइल परिवर्तन में कैल्शियम और विटामिन डी युक्त भोजन तथा डेली एक्सरसाइज शामिल होते हैं। ऑस्टियोपोरोसिस की क्योर नहीं है लेकिन सही इलाज से बोन्स को मजबूती देकर उन्हें प्रोटेक्ट कर सकते हैं। इसके मेडीकेशन में जो दवायें दी जाती हैं उनसे हड्डियों के क्षय होने की गति धीमी और नयी बोन्स ग्रो करने में तेजी आती है। पुरूषों में बोन डेन्सिटी बढ़ाने के लिये टेस्टोटेरॉन थेरेपी की जाती है। महिलाओं में हारमोन थेरेपी के तहत एस्ट्रोजन का प्रयोग होता है जिससे मेनोपॉज के दौरान और बाद में बोन डेन्सिटी लॉस को रोका जा सके। आमतौर पर ऑस्टियोपोरोसिस के ट्रीटमेंट में बिसफॉस्फोनेट्स ड्रग्स का इस्तेमाल होता है। इनके द्वारा बोन्स के द्रव्यमान में होने वाले क्षय को रोकते हैं। इसे गोली और इंजेक्शन दोनो रूपों में इस्तेमाल करते हैं। हड्डियों की अच्छी सेहत के लिये कैल्शियम और विटामिन डी के साथ प्रोटीन, मैग्नीशियम, विटामिन ख़् और जिंक भी जरूरी है।

नेचुरल ट्रीटमेंट
ऑस्टियोपोरोसिस के ट्रीटमेंट में प्रयोग किये जाने वाले सभी ड्रग्स के कुछ न कुछ साइड इफेक्ट हैं। ऐसे में नेचुरल ट्रीटमेंट एक वैकल्पिक तरीका है। इसके अंतर्गत हड्डियों की अच्छी सेहत के लिये रेड क्लोवल (लाल तिपतिया घास), ब्लैक कोहोस और सोयाबीन को खाने में प्रयोग करते हैं। साथ ही खाने में दूध, दही, बादाम, ब्रोकली, अंजीर, संतरा, मछली, भिंडी, हरी मटर, गोभी, पत्ता गोभी, मशरूम, अंडे, चिकन, टोफू तथा पनीर इत्यादि को शामिल करें और रोजाना कम से कम 45 मिनट धूप में बैठें। ऑस्टियोपोरोसिस से लड़ने में सीढ़ियां चढ़ना, पैरों में वजन बांधकर चलना, लेग प्रेस, स्क्वॉट, पुशअप्स, रजिस्टेंस बैंड, डम्बबेल और साइकिलिंग जैसी एक्सरसाइज लाभकारी हैं।

बचाव
बढ़ती उम्र और मेनोपॉज के अलावा जो कारण हैं उन्हें कंट्रोल करके ऑस्टियोपोरोसिस से काफी समय तक बच सकते हैं। इसके लिये सही मात्रा में कैल्शियम और विटामिन डी सप्लीमेंट लें, नियमित वेट बियरिंग एक्सरसाइज करें और ध्रूमपान से दूर रहें। जो महिलायें, मेनोपॉज के दौरान हारमोन थेरेपी ले रहीं हैं वे डाक्टर से इस सम्बन्ध में सलाह लें कि कहीं यह थेरेपी बोन्स पर नकारात्मक प्रभाव तो नहीं डाल रही है।

लबोलुआब
ऑस्टियोपोरोसिस का जीवन पर गम्भीर प्रभाव होता है। इससे हड्डियों में कभी भी फ्रैक्चर होने से पेनफुल जीवन व्यतीत करना पड़ सकता है। ऐसे फ्रैक्चर लम्बे समय में ठीक होते हैं जिससे शरीर में अनेक कॉम्प्लीकेशन हो जाते हैं। उदाहरण के लिये कूल्हे की हड्डी का फ्रैक्चर मरीज को लम्बे समय तक बिस्तर पर लिटा सकता है जिससे ब्लड क्लॉट और निमोनिया का खतरा बढ़ जाता है तथा कई तरह के इंफेक्शन भी हो सकते हैं। ऐसे में 40 वर्ष की उम्र के बाद बोन डेन्सिटी टेस्ट करायें और ऑस्टियोपोरोसिस डॉयग्नोज होने पर डाक्टर की सलाह के अनुसार मेडीकेशन, खानपान और व्यायाम को अपनायें। यह प्रोग्रसिव डिसीज है और एक बार होने पर उम्र भर रहती है। दवाइयों से इसका बढ़ना और दर्द कम करके इसके साथ जी सकते हैं। यदि इस बीमारी के बारे में पहले से सही जानकारी है तो खान-पान और लाइफ स्टाइल बदलकर इससे बच सकते हैं।

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