निमोनिया से बच सकते हैं बेशर्ते….

निमोनिया फेफड़ों का जानलेवा इंफेक्शन है, यह एक या दोनों फेफड़ों को संक्रमित करता है। इसकी खतरनाक बात यह है कि यह बैक्टीरिया, वायरस और फंगी (फफूंद) तीनों में से किसी से भी हो सकता है। इससे फेफड़ों के वायु प्रकोष्ठ (एयर सैक्स) सूज जाते हैं जिसे मेडिकल लैंग्वेज में एल्वियोलाइ कहते हैं। एल्वियोलाइ से फेफड़ों में फ्लूड (द्रव्य) या पस भरने से सांस लेना मुश्किल होता है।

निमोनिया के कीटाणु संक्रामक होते हैं जिसका अर्थ है कि यह एक से दूसरे में फैल सकता है। वायरल और बैक्टीरियल निमोनिया दोनों ही छींक या खांसी से पैदा हुई ड्रापलेट्स से दूसरों को संक्रमित करते  हैं। यदि व्यक्ति निमोनिया वायरस से दूषित सतहों या वस्तुओं के सम्पर्क में आ जाये तो वह इसका शिकार हो जायेगा। फंगल निमोनिया एक से दूसरे में नहीं फैलता, व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण और पक्षियों की बीट से इसकी चपेट में आता है।

लक्षण क्या हैं निमोनिया के?

निमोनिया के लक्षण हल्के और गम्भीर दोनों तरह के होते हैं। आमतौर पर इससे बलगम वाली खांसी, बुखार, ठंड लगना, पसीना आना, सांस लेनें में दिक्कत, छाती में दर्द, थकान, भूख कम लगना, उल्टी, सिर चकराना और सिरदर्द जैसे लक्षण उभरते हैं। इसके कई लक्षण मरीज की उम्र और उसके स्वास्थ्य के हिसाब से उभरते हैं जैसेकि-

– पांच साल से कम उम्र के बच्चों की सांस तेज चलने के साथ घरघराहट की आवाज।

– नवजात शिशुओं में इसके लक्षण उल्टी और कम इनर्जी के रूप में सामने आते हैं।

– उम्रदराज लोगों में माइग्रेन और शरीर का तापमान सामान्य से कम हो जाता है।

क्या कॉम्प्लीकेशन्स हो सकते हैं?

निमोनिया से कमजोर इम्यून सिस्टम, क्रोनिक कंडीशन व डॉयबिटिक लोगों को जानलेवा कॉम्प्लीकेशन हो जाते हैं जैसेकि-

– क्रोनिक कंडीशन ज्यादा खराब होने से कन्जेस्टिव हार्ट फेलियर और इम्फाइसीमा की कंडीशन बन जाती हैं, कुछ लोगों को हार्ट अटैक भी हो जाता है।

– बैक्टीरेमिया जैसी खतरनाक कंडीशन पैदा होने से निमोनिया इंफेक्शन का बैक्टीरिया ब्लड स्ट्रीम में चला जाता है, जिससे लो ब्लड प्रेशर, सेप्टिक शॉक और मल्टी ऑर्गन फेलियर की स्थिति बन जाती है।

– फेफड़ों की कैविटी में पस बनने लगता है, यदि यह एंटीबॉयोटिक से ठीक न हो तो इसे निकालने के लिये सर्जरी करनी पड़ती है।

– सांस की तकलीफ बढ़ने पर वेन्टीलेटर की जरूरत पड़ती है।

– एक्यूट रेसिपिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम से श्वसन तंत्र फेल होने लगता है,  यह मेडिकल इमरजेन्सी है।

– प्लूरल इफ्यूजंन से पसलियों और फेफड़ों के बीच पानी भरने लगता है।

– कुछ केसों में स्थिति बिगड़ने से मृत्यु भी हो जाती है। वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में प्रतिवर्ष निमोनिया से लाखों लोगों की मृत्यु होती है। इस वर्ष कोरोना की वजह से यह संख्या कहां तक पहुंचेगी अनुमान लगाना भी मुश्किल है।

कारण क्या हैं निमोनिया के?

निमोनिया के लिये अलग-अलग तरह के कई संक्रामक एजेन्ट जिम्मेदार हैं-

बैक्टीरियल निमोनिया: मुख्यत: यह स्ट्रेप्टोकोकल निमोनियाय बैक्टीरिया से होता है। इसके अलावा माइकोप्लाज्मा, हेमोफिलस इंफ्लूएंजा और लेजियोनेला न्यूमोफिला जैसे बैक्टीरिया भी इसके लिये जिम्मेदार हैं।

वायरल निमोनिया: यह इन्फ्लूएंजा(फ्लू), रेसिपिरेटरी सिनसाइटियल वायरस (आरएसवी), रेहनोवायरस (कॉमन कोल्ड) और कोविड-19  जैसे रेसिपिरेटरी वायरसों से होता है।

फंगल निमोनिया: यह मिट्टी में पनपी फफूंद या पक्षियों की बीट से होता है। कमजोर इम्यून सिस्टम वाले व्यक्ति इसके आसान शिकार हैं। यह न्यूमोसाइटिक जरोवेसी, क्रिप्टोकोकस स्पीसीज़, हिस्टोप्लासमोसिस स्पेसीज नामक फंगी या फफूंद से फैलता है।

निमोनिया कहां या कैसे हुआ इस आधार पर भी इसे वर्गीकृत किया गया है जैसेकि-

हॉस्पिटल-एक्वार्यड निमोनिया (एचएपी): यह बैक्टीरियल निमोनिया अस्पताल में इलाज के दौरान होता है। यह बहुत खतरनाक है क्योंकि इसका बैक्टीरिया एंटीबॉयोटिक रजिस्टेंस हो जाता है।

कम्युनिटी एक्वार्यड निमोनिया (सीएपी): यह सोसाइटी में निमोनिया के मरीजों से फैलता है।

वेन्टीलेटर एसोसियेटेड निमोनिया (वीएपी): यह वेन्टीलेटर से फैलता है।

एसपाइरेशन निमोनिया: यह खाने-पीने की वस्तुओं व लार से व्यक्ति में चला जाता है। जिन लोगों को निगलने की समस्या हो या जो ज्यादा मात्रा में शराब/ड्रग्स का सेवन करते हैं वे आसानी से इसके शिकार हो जाते हैं।

वॉकिंग निमोनिया: यह सबसे हल्का निमोनिया है, जब तक इसके लक्षण परेशान न करें तब तक मरीज को इसका पता भी नहीं चलता। इससे ग्रस्त मरीज को हल्का बुखार, एक सप्ताह से सूखी खांसी, ठंड लगना, सांस फूलना, चेस्ट पेन और कम भूख लगने जैसे लक्षण महसूस होते हैं। इसका कारण वायरस और बैक्टीरिया दोनों ही हो सकते हैं। सामान्य निमोनिया अक्सर स्ट्रेप्टोकोकल या हेमेफिलस इंफ्लूएंजा से होता है जबकि इसके लिये माइकोप्लास्मा, क्लोमाइडोफिजा और लेजियेनेला जिम्मेदार हैं। वॉकिंग निमोनिया को ठीक होने में सामान्य की तुलना में अधिक समय लगता है।

निमोनिया की स्टेजेज

ब्रोन्कोनिमोनिया: इसमें दोनों फेफड़ों का अधिकतम भाग प्रभावित होता है। कभी-कभी यह ब्रोन्ची और उसके आसपास तक फैल जाता है।

लोबर निमोनिया: इससे फेफड़ों के एक या एक से अधिक लोब्स प्रभावित होते हैं। फेफड़े का निर्माण लोब्स से होता है। इसकी चार स्टेज हैं-

कंजेशन: इसमें लंग्स के टिश्यू हैवी और कंजस्टेड होने से एयर सैक्स में फ्लूड भर जाता है।

रेड हैप्टाइजेशन: इस कंडीशन में लाल रक्त कणिकायें और इम्यून सेल्स लंग्स फ्लूड में प्रवेश करते हैं जिससे लंग्स का रंग लाल हो जाता है।

ग्रे हैप्टाइजेशन: इस कंडीशन में लाल रक्त कणिकायें ब्रेक होने लगती हैं लेकिन इम्यून सेल्स बने रहते हैं, जिससे लंग्स का रंग लाल से ग्रे हो जाता है।

रेजोल्यूशन: इस कंडीशन में इम्यून सेल्स, इंफेक्शन को क्लियर करते हैं और कफ के जरिये फ्लूड फेफड़ों से बाहर निकल जाता है।

कौन से वायरस हैं जिम्मेदार?

मेडिकल साइंस में निमोनिया के लिये इन वायरसों को जिम्मेदार माना जाता है- इंफ्लूएंजा, आरएसवी इंफेक्शन, राइनोवायरस, ह्यूमन पैराइन्फ्लूएंजा वायरस, ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस, मीजल्स, चिकनपॉक्स (वेरीसेला जोस्टर वायरस) एडिनोवॉयरस और कोरोना वायरस।

जहां तक लक्षणों की बात है तो वायरल और बैक्टीरियल निमोनिया के लक्षण एक जैसे हैं, वायरल निमोनिया के केस बैक्टीरियल की तुलना में कम गम्भीर होते हैं लेकिन वायरल निमोनिया के शिकार लोगों को यदि सही ट्रीटमेंट न मिले तो मरीज बैक्टीरियल निमोनिया का भी शिकार हो जाता है। जहां तक दोनों तरह के निमोनिया के अंतर का सवाल है तो यह केवल इलाज का है। बैक्टीरियल निमोनिया के इलाज में एंटीबॉयोटिक और वायरल निमोनिया में एंटीवायरल दवायें इस्तेमाल होती हैं।

किन्हें है निमोनिया का ज्यादा रिस्क?

वैसे तो निमोनिया किसी को भी हो सकता है लेकिन इन्हें अधिक रिस्क है-

– नवजात शिशुओं से लेकर दो साल की उम्र तक के बच्चे।

– जिनकी उम्र 65 साल से ऊपर हो।

– कमजोर इम्यून सिस्टम और किसी अन्य बीमारी के इलाज के लिये दवायें ले रहे मरीज, जैसेकि स्टीराइड्स या कैंसर की दवायें।

– अस्थमा, सिस्टिक फाइब्रोसिस, डॉयबिटीज और हार्ट फेलियर के मरीज।

– जिन लोगों को हाल में कोल्ड या फ्लू जैसा रेसपिरेटरी इंफेक्शन हुआ हो।

– अस्पताल में भर्ती रहे लोग विशेष रूप से जो वेन्टीलेटर पर रहे हों।

– जिन्हें स्ट्रोक हो चुका हो, खाना निगलने में दिक्कत हो या जो चलने-फिरने में असमर्थ हों।

– धूम्रपान, अधिक मात्रा में शराब पीने या ड्रग्स लेने वाले।

– अधिक प्रदूषित वातावरण और रसायनों के धुंयें के सम्पर्क में रहने वाले।

कैसे पुष्टि होती है निमोनिया की?

शरीर की फिजिकल कंडीशन जांचने के बाद डाक्टर स्टेथोस्कोप से फेफड़ों की आवाज सुनते हैं यदि इन्हें क्रेकिंग जैसी आवाज सुनाई देती है तो इसका अर्थ है कि मरीज में निमोनिया के लक्षण पनपने लगे हैं। इसकी पुष्टि के लिये छाती का एक्स-रे किया जाता है, यदि संक्रमण है तो छाती में सूजन होने लगती है जोकि एक्स-रे में नजर आ जाती है। जब एक्स-रे से सही स्थिति पता नहीं चलती तो सीटी स्कैन करते हैं, इससे फेफड़ों की क्लियर तस्वीर सामने आती है और पता चल जाता है कि संक्रमण कितना है व इससे हमारे फेफड़े कितने प्रभावित हुए हैं।

इंफेक्शन की पुष्टि और टाइप का पता लगाने के लिये ब्लड कल्चर और बलगम कल्चर टेस्ट करते हैं इससे निमोनिया का कारण पता चल जाता है।

पल्स ऑक्सीमीटर से ब्लड ऑक्सीजन लेवल जांचते हैं, यदि ब्लड में ऑक्सीजन का स्तर 92 से कम है तो इसका अर्थ है कि फेफड़ों में संक्रमण बढ़ रहा है।

कुछ मामलों में छाती और फेफड़ों के बीच प्यूरल स्पेस से फ्लूड लेकर जांच की जाती है जिससे इंफेक्शन का कारण पता चल जाये।

ब्रोन्कोस्कोपी से श्वसन तन्त्र की जांच करते हैं, इसमें एक कैमरा प्रयोग होता है जिससे गले, सांस की नली और फेफड़ों की क्लियर पिक्चर मिल जाती है। यह टेस्ट बहुत गम्भीर अवस्था में किया जाता है, विशेष रूप में तब, जब मरीज अस्पताल में भर्ती हो और उस पर एंटीबॉयोटिक का असर न हो रहा हो।

इलाज क्या है निमोनिया का?

निमोनिया का इलाज उसके कारण, गम्भीरता और मरीज की जनरल हेल्थ को ध्यान में रखकर किया जाता है। इलाज के पहले चरण में डाक्टर निमोनिया के उपचार के लिये दवायें लिखते हैं, ज्यादातर केसों में बैक्टीरियल निमोनिया होता है जिसके लिये ओरल एंटीबॉयोटिक दी जाती हैं। मरीज को एंटीबॉयोटिक का पूरा कोर्स करना अनिवार्य है। आपको यदि एक या दो दिन की दवा लेने के बाद बेहतर महसूस हो रहा है और डाक्टर ने पांच दिन दवा लेने को कहा है तो पांच दिन दवा लेनी जरूरी है अन्यथा यह समस्या कुछ दिनों में फिर उभर आयेगी और तब इसका इलाज मुश्किल होगा या इसके लिये अधिक शक्तिशाली एंटीबॉयोटिक खानी होंगी।

एंटीबॉयोटिक दवायें कभी भी वायरस पर काम नहीं करतीं, यदि निमोनिया का कारण वायरस है तो डाक्टर एंटीवायरल दवायें लिखते हैं। एंटी वायरल दवाओं का कोर्स करने से यह आसानी से क्लियर हो जाता है।

एंटीफंगल दवाओं का इस्तेमाल फंगल निमोनिया के इलाज में होता है, मरीज को ये दवायें कई सप्ताह खानी पड़ती है तब जाकर यह क्लियर होता है।

घरेलू-देखभाल: यदि मरीज घर पर है तो निमोनिया का कष्ट कम करने के लिये डाक्टर ओटीसी अर्थात ओवर द काउंटर दवायें लिखते हैं इनसे दर्द और बुखार में राहत मिलती है। इन दवाओं में एसप्रिन, आइब्रूफेन और एक्टामीनेफेन प्रमुख हैं। खांसी की स्थिति में कफ सीरप लेने पड़ते हैं जिससे मरीज आराम से सो सके। खांसी के लिये दी जाने वाली दवायें फेफड़ों से फ्लूड (द्रव्य) कम करने में मदद करती हैं जिससे सांस लेने में आसानी हो जाती है। निमोनिया से जल्द रिकवरी के लिये मरीज को ज्यादा से ज्यादा आराम और अधिक मात्रा में पानी पीना चाहिये।

हॉस्पिटलाइजेशन: यदि निमोनिया के सिम्पटम गम्भीर हैं तो मरीज को अस्पताल में भर्ती कराना चाहिये। गम्भीर स्थिति में हार्ट रेट, ऑक्सीजन लेवल व तापमान ट्रैक करने की जरूरत होती है और अस्पताल में ये सुविधायें होती हैं। अस्पताल में निमोनिया के इलाज में-

– इंट्रावीनस एंटीबॉयोटिक, इसे इंजेक्शन के द्वारा नस में दिया जाता है।

– रेसिपिरेटरी थेरेपी, इसमें कुछ विशेष दवायें सीधे-सीधे फेफड़ों में दी जाती हैं और सांस सम्बन्धित व्यायाम कराते हैं जिससे शरीर में ऑक्सीजन लेवल बढ़े।

– ऑक्सीजन थेरेपी, इसमें मरीज को नेजल ट्यूब, फेस मास्क और वेन्टीलेटर से ऑक्सीजन देते हैं जिससे ब्लड में ऑक्सीजन लेवल ठीक रहे।

क्या निमोनिया का घरेलू उपचार है?

निमोनिया घरेलू उपचार से ठीक नही होता है केवल इससे होने वाले कष्ट कम किये जा सकते हैं। इसके लिये स्टीम लें, नमक के पानी से गरारे करें और पिपरमिंट, अदरक, तुलसी व हल्दी वाली चाय पियें। जितना सम्भव हो सके पानी पीते रहें। यदि सर्दी का मौसम है तो गुनगुना पानी पियें। सांस लेने में दिक्कत होने पर कॉफी भी फायदा करती है।

निमोनिया और ब्रोकाइटिस में अंतर

ये दोनों ही श्वसन प्रक्रिया बाधित करते हैं लेकिन ये अलग-अलग रोग हैं। निमोनिया से फेफड़ों के एयर सैक्स (वायु प्रकोष्ठ) सूज जाते हैं जबकि ब्रोन्काइटिस से ब्रोन्चियल ट्यूब में सूजन आती है। ये वो ट्यूब या नलिकायें हैं जो फेफड़ों और सांस की नली के मध्य होती हैं।

निमोनिया हो या एक्यूट ब्रोन्काइटिस दोनों का कारण इंफेक्शन ही है। क्रोनिक ब्रोन्काइटिस की कंडीशन प्रदूषित वातावरण और सिगरेट पीने से होती है। एक्यूट ब्रोन्काइटिस वायरस या बैक्टीरिया दोनों में से किसी से भी हो सकता है, यदि इसका समय से इलाज न कराया जाये तो मरीज निमोनिया का शिकार हो जाता है।

कैसे बचें निमोनिया से?

निमोनिया से बचने का सबसे आसान तरीका है वैक्सीनेशन-

वैक्सीनेशन: यह निमोनिया की पहली रक्षा पंक्ति है। इसके अंतर्गत कई वैक्सीन उपलब्ध हैं जिनसे काफी हद तक निमोनिया से बचा जा सकता हैं जैसेकि-

प्रेनवर 13 और न्यूमोवैक्स 23: ये दोनों वैक्सीन्स निमोनिया और मेनिनजाइटिस से बचाती हैं जोकि न्यूमोकोक्कल बैक्टीरिया से होता है। इस सम्बन्ध में डाक्टर से पूछें कि आपके लिये कौन सी वैक्सीन बेहतर रहेगी।

प्रेनवर 13 नामक वैक्सीन 13 तरह के न्यूमोकोक्कल बैक्टीरिया से बचाती है इस सम्बन्ध में सेन्टर फॉर डिसीस कंट्रोल एंड प्रवेन्शन (सीडीसी) इस वैक्सीन को इनके लिये रिकमेन्ड किया है-

– 2 साल से कम उम्र के बच्चे।

– 65 या इससे ज्यादा उम्र के लोग।

– किसी क्रोनिक कंडीशन से जूझ रहे 2 से 64 साल के बीच के लोग।

न्यूमोवैक्स 23 को 23 तरह के न्यूमोकोक्कल बैक्टीरिया के लिये प्रभावी पाया गया है, इस सम्बन्ध में सीडीसी के रिक्मन्डेशन हैं-

– 65 साल या इससे अधिक उम्र के लोग।

– धूम्रपान करने वाले 19 से 64 साल के बीच के लोग।

– किसी क्रोनिक कंडीशन से जूझ रहे 2 से 64 साल के बीच के लोग।

फ्लू वैक्सीन: सीडीसी के अनुसार फ्लू के साथ निमोनिया ज्यादा खतरनाक है ऐसे में फ्लू से बचने के लिये साल में एक बार फ्लू शॉट लेना चाहिये। फ्लू शॉट 6 माह से ऊपर के सभी लोग ले सकते हैं। उन लोगों के लिये यह बहुत जरूरी है जिन्हें अक्सर जुकाम रहता हो।

हिब या एचआईबी वैक्सीन: यह वैक्सीन निमोनिया और मेननजाइटिस के लिये जिम्मेदार हेमोफिलस इंफ्लूएंजा टाइप बी, जोकि बैक्टीरिया का एक प्रकार है के लिये कारगर है। सीडीसी की रिक्मेडेशन के मुताबिक इसका वैक्सीनेशन इनके लिये जरूरी है-

– 5 साल से कम उम्र के सभी बच्चों को।

– जिन लोगों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुआ हो।

– किसी गम्भीर बीमारी के शिकार किशोर और वयस्क।

नेशनल हेल्थ इंस्टीट्यूट के अनुसार निमोनिया वैक्सीन सभी केसों में सौ प्रतिशत कारगर नहीं है लेकिन इससे 80 प्रतिशत तक बचाव सम्भव है और कॉम्प्लीकेशन्स भी कम हो जाते हैं।

वैक्सीनेशन के अलावा इन तरीकों को अपनाकर भी निमोनिया से बच सकते हैं-

– यदि आप धूम्रपान करते हैं तो तुरन्त छोड़ें क्योंकि यह रेसिपेरेटरी संक्रमण को बुलावा देता है विशेष रूप से निमोनिया को।

–  किसी को भी छूने के बाद अपने हाथ साबुन और पानी से धोयें।

– खुले में न थूकें और इस्तेमाल किया टिश्यू या रूमाल सही ढंग से डिस्पोज करें।

– हेल्दी लाइफ स्टाइल अपनाकर इम्यून सिस्टम मजबूत करें। अच्छी तरह आराम करें, पौष्टिक भोजन लें और नियमित व्यायाम करें।

नजरिया

निमोनिया के लक्षण उभरते ही डाक्टर से मिलें और इसकी पुष्टि होते ही इलाज शुरू करें। उपचार शुरू होते ही निमोनिया में सुधार नजर आना चाहिये। युवाओं में जल्द सुधार नजर आता है और उम्रदराज लोगों में दो या तीन दिन में। डाक्टर द्वारा बताये ट्रीटमेंट प्लान पर टिके रहें और अपने आप दवायें बंद न करें। निमोनिया में आराम करना भी दवा समान है इससे शरीर को इंफेक्शन से लड़ने में मदद मिलती है। यदि  सुधार नजर न आये तो अस्पताल में भर्ती हो जायें। यह बात हमेशा याद रखें कि यह एक से दूसरे में फैलने वाला इंफेक्शन है इसलिये मरीज के कपड़े और बर्तनों को अलग रखें। मरीज को खुले में न थूकने दें और उसके पास बिना मास्क के न जायें। निमोनिया, बैक्टीरिया, वायरस या फंगी से होता है इसलिये सही दवा खानी जरूरी हैं, घरेलू उपचार से दर्द और खांसी में राहत मिलती है, बैक्टीरिया, वायरस और फंगी मारने के लिये दवा ही खानी होगी। गलत दवा मामले को बिगाड़ देती है इसलिये इलाज के लिये अनुभवी डाक्टर के पास ही जायें।

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