प्रोस्टेट फुलाव को (बीपीएच) न लें हल्के में

विष्णु प्रिया सिंह

केवल पुरूषों में पायी जाने वाली प्रोस्टेट ग्रन्थि शरीर के रिप्रोडक्टिव सिस्टम का हिस्सा है, यह यूरेथ्ररा की उत्पत्ति के स्थान पर होती है। यूरेथ्ररा उस ट्यूब या नली को कहते हैं जो पेशाब, मूत्र को शरीर से बाहर लेकर आती है। स्वस्थ अवस्था में प्रोस्टेट ग्रन्थि का आकार अखरोट जितना और वजन 20-30 ग्राम होता है। इन्लार्ज होने पर इसका वजन 100 ग्राम तक हो जाता है। प्रोस्टेट ग्रन्थि हमारे शरीर के बहि:स्त्रावी (exocrine) सिस्टम का भाग है और यह शरीर के कुछ बाहरी फंक्शनों जैसेकि वीर्य (सीमन) निर्माण के लिये जरूरी दूधिया द्रव्य डिस्चार्ज करता है। इसमें एक विशेष मांसपेशी होती है जो स्खलन के समय सीमन डिस्चार्ज में सहायक होती है। इसका आकार बढ़ने से अनेक समस्याएं हो जाती हैं जो इलाज न कराने पर गम्भीर रूप ले लेती हैं। प्रोस्टेटिटिस, बिनायन प्रोस्टेट हाइपरप्लासिया और प्रोस्टेट कैंसर प्रोस्टेट ग्रन्थि से सम्बन्धित प्रमुख डिस-आर्डर हैं। ये सभी प्रोस्टेट ग्रन्थि की सूजन के आधार पर वर्गीकृत होते हैं।

मेडिकल भाषामें बढ़े हुऐ (इन्लार्ज) प्रोस्टेट को बीपीएच अर्थात बिनायन प्रोस्टेट हाइपरप्लासिया कहते हैं। यह कंडीशन तब होती है जब प्रोस्टेट ग्रन्थि के सेल्स मल्टीप्लाइ होकर अतिरिक्त सेल्स बनाते हैं जिससे प्रोस्टेट ग्रन्थि में सूजन की वजह से यूरेथ्ररा सिकुड़ती है और पेशाब का फ्लो कम हो जाता है। बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रन्थि, कैंसर हो ऐसा जरूरी नहीं है और न ही इससे कैंसर होने का रिस्क होता है, लेकिन इससे क्वालिटी ऑफ लाइफ प्रभावित होती है और बार-बार पेशाब आने की अनुभूति रहती है। 50 वर्ष से ज्यादा के पुरूषों में बीपीएच अर्थात बिनायन प्रोस्टेट हाइपरप्लासिया कॉमन समस्या है।

क्यों होता है प्रोस्टेट इन्लार्ज?
मेडिकल साइंस के अनुसार ज्यादातर पुरूषों में उम्र बढ़ने से यह समस्या होती है। 50-80 वर्ष के बीच कभी भी यह समस्या हो सकती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसा मेल (पुरूष) सेक्स हारमोन्स की वजह से होता है। कुछ मामलों में टेस्टीकल्स में किसी तरह की असमानता और फैमली हिस्ट्री भी प्रोस्टेट इन्लार्जमेन्ट का कारण होता है। जिन लोगों के टेस्टीकल्स किसी कारण से छोटी उम्र में रिमूव कर दिये जाते हैं उन्हें यह समस्या नहीं होती है।

लक्षण-सिम्पटम्स
प्रोस्टेट बढ़ने की शुरूआत में कम लक्षण नजर आते हैं लेकिन इलाज न कराने से जब प्रोस्टेट ग्रन्थि का आकार काफी बढ़ जाता है तो रात को बार-बार यूरीनेशन के लिये उठना, यूरीनेशन के अंत में बहुत धीरे-धीरे यूरीन आते रहना (ड्रिबलिंग), यूरीन लीक होना, यूरीनेशन के लिये जोर लगाना, धीमें फ्लो में यूरीन आना, यूरीन रोकने में कठिनाई, यूरीनेशन में दर्द और यूरीन में खून आने जैसे लक्षण नजर आते हैं। यदि आपकी उम्र 50 वर्ष के आसपास या इससे ज्यादा है और इनमें से कोई भी लक्षण नजर आ रहे हैं तो तुरन्त ही यूरोलाजिस्ट से सम्पर्क करें।

बीपीएच (प्रोस्टेट इन्लार्जमेंट) डायग्नोज
प्रोस्टेट इन्लार्जमेंट का संदेह होने पर डॉक्टर सबसे पहले फिजिकल और मेडिकल हिस्ट्री की जांच करते हैं, इस प्रक्रिया में रैक्टल (मलाशय) की जांच से डॉक्टर प्रोस्टेट के साइज और शेप का पता लगाते हैं। इसके बाद ये टेस्ट किये जाते हैं-
यूरीन एनालिसिस: इससे पेशाब में खून और बैक्टीरिया का पता चलता है।
पीएसए (प्रोस्टेट स्पेसीफिक एन्टीजन) टेस्ट: यह ब्लड टेस्ट है और इससे प्रोस्टेट कैंसर का पता लगाते हैं।
प्रोस्टेट बॉयोप्सी: इसमें प्रोस्टेट कैंसर या किसी अन्य प्रकार की अबनार्मल्टीज का पता लगाने के लिये प्रोस्टेट ग्रन्थि से एक छोटा से मांस का टुकड़ा लेकर जांच की जाती है।
यूरोडॉयनामिक टेस्ट: इससे पेशाब के प्रेशर का पता लगाते हैं।
पोस्ट-वॉयड रेसीडुयेल: इससे पता चलता है कि यूरीनेशन के बाद ब्लेडर में कितना पेशाब शेष रह जाता है।
सिस्टोस्कॉपी: इसमें लोकल एनीसथीसिया का इस्तेमाल करके मूत्र-मार्ग से मूत्राशय की इन्डोस्कोपी की जाती है जिससे उसकी आंतरिक स्थिति का पता चल सके।
कुछ गम्भीर मामलों में इन्ट्रावेनस पाइलोग्राफी या यूरोग्राफी भी करते हैं। इसमें एक विशेष डाइ (स्याही) को शरीर में इन्जेक्ट करके एक्स-रे या सीटी स्कैन से सम्पूर्ण यूरीनरी सिस्टम की जांच होती है।
प्रोस्टेट इन्लार्जमेंट की जांच करते समय डॉक्टर आपसे करेंट में चल रहे मेडीकेशन के बारे में पूछ सकता है। यदि आप एंटीडिप्रसेंट, डायूरेटिक, एन्टीहिस्टामाइन्स या सेडेटिव ले रहे हैं तो डॉक्टर को जरूर बतायें।

इलाज-ट्रीटमेंट
प्रोस्टेट इन्लार्जमेंट का इलाज सेल्फ केयर भी है। जब सेल्फ केयर से कोई सुधार नहीं होता है तो डाक्टर इसके लिये दवायें देते हैं। जब मामला दवाओं से भी ठीक नहीं होता तो सर्जरी करनी पड़ती है। सेल्फ केयर और नेचुलर ट्रीटमेंट से प्रोस्टेट बढ़ने की समस्या से राहत पा सकते हैं। इस संदर्भ में ये कदम उठायें-
जैसे पेशाब की अनुभूति हो तुरन्त बाथरूम जायें। यदि पेशाब की अनुभूति नहीं भी है तो भी समय-समय पर बाथरूम जायें और यूरीनेशन का प्रयास करें।
प्रोस्टेट इन्लार्जमेंट के कन्फर्म होने पर एनेस्थेटिक मेडीकेशन से बचें।
शराब और काफी न पियें। डिनर के बाद काफी पीने से परहेज करें।
अपने आपको नवर्स होने से बचायें क्योंकि नर्वस होने पर ज्यादा पेशाब आता है।
नियमित व्यायाम करें क्योंकि व्यायाम की कमी से यह समस्या और बढ़ जायेगी।
केगल एक्सरसाइज का अभ्यास करें जिससे पैल्विक मांसपेशी मजबूत हो सके।
सर्दी के मौसम में शरीर को गर्म रखें क्योंकि यह बीमारी सर्दी में सबसे ज्यादा परेशान करती है।
इसके मेडीकेशन में अल्फा-1 ब्लाकर, हारमोन रिडक्शन मेडीसन और एंटीबॉयोटिक दवायें दी जाती हैं। इस बीमारी से सम्बन्धित कोई भी दवा बिना डाक्टर की सलाह के न लें।

सर्जिकल ट्रीटमेंट
जब प्रोस्टेट ग्रन्थि का आकार बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और दवायें असर नहीं करती हैं तो सर्जरी की जरूरत पड़ती है। इसमें कई तरह के सर्जिकल प्रोसीजर इस्तेमाल किये जाते हैं। इनमें से कुछ प्रोसीजर तो बिना चीर-फाड़ के किये जाते हैं। आजकल ओपीडी में इन प्रोसीजरों से प्रोस्टेट इन्लार्जमेंट का सफल इलाज किया जाता है-
टूना (ट्रांस्योथ्रॉल नीडिल एबलेशन): इसमें रेडियो तरंगों से प्रोस्टेट टिश्यू को रिमूव करते हैं।
टीयूएमटी (ट्रांस्योथ्रॉल माइक्रोवेब थेरेपी): इसमें माइक्रोवेव के द्वारा प्रोस्टेट टिश्यू को निकालते हैं।
वाटर इन्डक्टेड थर्मों थेरेपी: इसमें गरम पानी की सहायता से अतिरिक्त प्रोस्टेट टिश्यू को नष्ट करते हैं।
एचआईएफयू (हाइ-इन्टेन्सिटी अल्ट्रासोनोग्राफी): इसमें सोनिक इनर्जी का प्रयोग अतिरिक्त प्रोस्टेट टिश्यू को रिमूव करने में किया जाता है।
प्रोस्टेट इन्लार्जमेंट के सभी मामलों में समस्या का निदान उपरोक्त प्रोसीजरों से नहीं होता है। कुछ में हॉस्पीटल में भर्ती होना पड़ता है, लेकिन ऐसा तभी जरूरी है जब मरीज को किडनी फेलियर, ब्लैडर स्टोन, रिकरेंट यूरेनरी ट्रैक इन्फेक्शन, ब्लेडर खाली न हो या यूरीन में खून आने की शिकायत हो। ऐसी अवस्था में इन प्रोसीजरों से प्रोस्टेट इन्लार्जमेंट की सर्जरी की जाती है-
टीयूआरपी (ट्रांस्योथ्रॉल रिसेक्शन ऑफ द प्रोस्टेट): बढ़े हुए प्रोस्टेट को रिमूव करने के लिये सबसे ज्यादा इसी सर्जिकल प्रोसीजर का इस्तेमाल होता है। इसमें डाक्टर मूत्र की नली में एक छोटा सा उपकरण इंसर्ट करके प्रोस्टेट को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर निकालते हैं।
सिम्पल प्रोस्टेटेक्टॉमी: इस सर्जरी में मरीज को करीब 10 दिन तक अस्पताल में रहना पड़ सकता है। इसमें एब्डोमन या पेरीनियम (यह स्कॉरटम के पीछे का भाग होता है) में सर्जरी से प्रोस्टेट के अंदरूनी भाग को निकालकर आउटर भाग को छोड़ देते हैं।
टीयूआईपी (ट्रांस्योथ्रॉल इनसीजन ऑफ द प्रोस्टेट): यह टीयूआरपी की तरह से ही है, जब टीयूआरपी से प्रोस्टेट रिमूव नहीं होता है तो प्रोस्टेट में छोटा सा चीरा लगा देते हैं जिससे यूरीन का फ्लो सही हो जाता है। ज्यादातर मामलों में इस तरह के प्रोसीजर में एक दिन में अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है।

कॉम्प्लीकेशन
बहुत से लोग प्रोस्टेट इन्लार्जमेंट को अनदेखा करते रहते हैं लेकिन सही समय पर इलाज न कराने से अनेक जटिलतायें पैदा हो जाती है जो आगे चलकर सेहत के लिये बड़ा खतरा बन जातीं हैं। जैसेकि यूरीनरी ट्रैक इन्फेक्शन, यूरीनरी स्टोन, किडनी डैमेज, यूरीनरी ट्रैक में ब्लीडिंग और अचानक अपने आप पेशाब निकल जाना इत्यादि। यदि प्रोस्टेट इन्लार्जमेंट की वजह से लम्बे समय तक ब्लैडर पूरी तरह से खाली न हो पाये तो किडनी डैमेज हो सकती है। इस अवस्था को यूरीनरी ऑब्स्ट्रक्शन फ्रॉम बीपीएच कहते हैं। इससे यूरीनरी ट्रैक इन्फेक्शन के चांस कई गुना बढ़ जाते हैं।

निष्कर्ष
ऐसा जरूरी नहीं है कि प्रोस्टेट इन्लार्जमेंट के इलाज के लिये हमेशा दवाइयों की जरूरत पड़े, कई बार डाक्टर आपसे रेगुलर चैकअप और लक्षणों की मानीटरिंग के लिये भी कह सकता है। वैसे लाइफ स्टाइल बदलने से इसमें राहत मिल जाती है। इसके अलावा दवाइयों और सर्जरी जैसे विकल्प तो हमेशा ही उपलब्ध हैं। बीपीएच और प्रोस्टेट कैंसर के कई लक्षण एक जैसे होते हैं, लेकिन प्रोस्टेट कैंसर, बीपीएच से ज्यादा गम्भीर कंडीशन है। प्रोस्टेट कैंसर के ज्यादातर मामलों में इलाज हो जाता है लेकिन इसके लिये जरूरी है कि जैसे ही कोई लक्षण नजर आये तो जल्दी से जल्दी डाक्टर से इलाज के लिये सम्पर्क करें।

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