सोराइसिस यानी जानलेवा चर्मरोग

मेडिकल साइंस में सोराइसिस एक क्रोनिक ऑटो-इम्यून स्किन डिसीस है, इसमें त्वचा की कोशिकायें (स्किन सेल्स) तेजी से बनने के कारण स्केलिंग (शल्कन) होने लगती है, जिससे त्वचा पर सूजन और लाल-सफेद चकत्ते बनते हैं, इनसे खुजली, जलन और दर्द होता है। कुछ समय बाद इन पर सूखी पपड़िया बन जाती हैं। ये चकत्ते शरीर में एक स्थान पर एक महीने या इससे ज्यादा रहते हैं, ठीक होने के बाद फिर से किसी दूसरे स्थान पर उभर आते हैं। स्किन सेल्स का जीवन चक्र एक महीने का होता है। सामान्य प्रक्रिया में स्किन सेल्स को स्किन में गहराई की ओर बढ़ना चाहिये लेकिन सोराइसिस की वजह से इनके सतह पर बढ़ने के कारण पपड़ियां बन जाती हैं। सोराइसिस से स्किन सेल्स अति-उत्पादन की प्रक्रिया तेजी से कुछ दिनों या महीनों चलती रहती है। ज्यादातर मरीजों में सोराइसिस के चकत्ते जोड़ों (कोहनी और घुटने) पर उभरते हैं, लेकिन ये शरीर में कहीं भी उभर सकते हैं जैसेकि हाथ, पैर, गले, खोपड़ी या चेहरे।

दुर्ल मामलों में यह रोग नाखून, मुंह और जननांगों में भी होता है। डायबिटीज 2, इन्फ्लेमेटरी बॉउल डिसीस, हार्ट डिसीस, सोराइटिक गठिया, एंग्जॉयटी और डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों को सोराइसिस होने के चांस अधिक होते हैं। हमारे देश में प्रतिवर्ष इसके एक करोड़ से ज्यादा मामले सामने आते हैं, यह बीमारी पूरी तरह से ठीक नहीं होती लेकिन दवाओं, खानपान और लाइफस्टाइल परिवर्तन से इसे कंट्रोल करके सामान्य जीवन जी सकते हैं।

लक्षण

सोराइसिस में स्किन पर लाल चकत्ते, खोपड़ी पर सफेद चांदी जैसे चकत्ते, त्वचा में खुजली, जोड़ों में सूजन और जकड़न (सोराइटिक गठिया) जैसे लक्षण उभरते हैं। मेडिकल साइंस में सोराइसिस को लक्षणों के आधार पर प्लॉक, गटेट, इन्वर्स, पस्चलर, अर्थोडेरेमिक नामक वर्गों में बांटा गया है। इन्हें शरीर में इसकी स्थिति के आधार पर उप-वर्गीकृत भी किया गया है। यह पूरी तरह से न ठीक होने वाली बीमारी है लेकिन संक्रामक नहीं, इसलिये यह एक से दूसरे में नहीं फैलती।

यदि सोराइसिस शरीर के 3 प्रतिशत से कम भाग में है तो माइल्ड, 3 से 10 प्रतिशत में है तो मॉडरेट और यदि 10 प्रतिशत से ज्यादा में है तो इसे सिवियर (गम्भीर) मानते है। इसके अलावा इसके बढ़ने की रफ्तार से भी गम्भीरता का पता चलता है। एक अध्ययन में पाया गया कि सोराइसिस ग्रस्त लोगों में मानसिक तनाव, चिंता, आत्मसम्मान में कमी और डिप्रेशन जैसे लक्षण भी पाये जाते हैं।

प्लॉक सोराइसिस: सोराइसिस के 80 से 90 प्रतिशत मरीज इससे ग्रस्त होते हैं। इसमें कोहनियों, घुटनों, लोअर बैक और खोपड़ी में लाल चकत्ते उभरते हैं जिनपर सफेद पपड़ी बन जाती है। इनका आकार 1 से 10 सेंटीमीटर तक होता है, समय से इलाज न कराने पर ये शरीर के बड़े भाग में फैल जाते हैं। खोपड़ी में इनका होना बहुत तकलीफदेह होता है। एक स्थान पर हील होने के बाद ये किसी अन्य स्थान पर उभर आते हैं। आमतौर पर प्लॉक सोराइसिस बगलों (आर्मपिट) और जननांगों में नहीं होता लेकिन 50 प्रतिशत मरीजों में यह खोपड़ी में जरूर होता है। खोपड़ी के सोराइसिस का इलाज शेष शरीर के सोराइसिस से अलग होता है। इसके शरीर के बड़े भाग में फैलने पर जानलेवा स्थिति बन जाती है। प्लॉक सोराइसिस पैच प्रत्येक मरीज में अलग-अलग जगहों पर होते हैं और लोगों को सिम्पटम भी अलग-अलग महसूस होते हैं।

डाक्टरों का कहना है कि इससे होने वाली तकलीफ कम करने के लिये चकत्तों पर ओटीसी मोस्चराइजर जैसेकि कोर्टीसोन क्रीम लगाते रहें जिससे स्किन सूखने न पाये और दर्द कम हो। प्लॉक सोराइसिस के लक्षण उभरने पर तुरन्त डाक्टर से मिलें जिससे उन कारकों की पहचान हो सके जिनकी वजह से यह उभर रहा है। म्यो क्लीनिक (अमेरिका) के त्वचा विशेषज्ञ (डर्माटोलोजिस्ट) क्रिस्ट्रोफर जे. आर्पे के अनुसार नींद की कमी, स्ट्रेस और एंग्जॉयटी प्लॉक सोराइसिस को ट्रिगर करती है। इसके उपचार में विटामिन डी युक्त क्रीम्स (जैसेकि कैल्सीप्रोट्राइन – डोवोनेक्स, कैल्सीट्रोन-रोकॉलट्रोल) ग्रोथ और टॉपिकल रेटिनॉयड्स का प्रयोग चकत्तों की सूजन व टेजारोटेन, कोलटार युक्त क्रीम, ऑयल या शैम्पू प्लॉक सोराइसिस कंट्रोल करने में सहायक हैं। चकत्तों की सूजन बढ़ने पर इसका इलाज एंटी-इन्फ्लेमेटरी ड्रग्स की एक विशेष कैटागरी बॉयोलॉजिक्स द्वारा प्लान बनाकर किया जाता है। कुछ केसों में लाइट थेरेपी का प्रयोग होता है इसमें सोराइसिस के चकत्तों पर यूवीए और यूवीबी किरणों को डालते हैं। अति गम्भीर स्थिति में क्रीम, दवा (टेबलेट और इंजेक्शन दोनो रूपों में) और लाइट थेरेपी का कॉम्बीनेशन इस्तेमाल होता है।

गटेट सोराइसिस: सोराइसिस का यह दूसरा सबसे बड़ा कॉमन टाइप 30 साल से कम उम्र के युवाओं में सबसे ज्यादा होता है। इसमें घड़, खोपड़ी, बाजुओं और टागों पर इरीटेशन वाले छोटे-छोटे गुलाबी स्पॉट उभरते हैं। ऐसा सांस सम्बन्धी समस्या, गले में वायरल संक्रमण, स्ट्रेस और टॉन्सिलाइटिस की वजह से होता है। कभी-कभी अधिक दिनों तक बीटा ब्लॉकर (ब्लड प्रेशर की दवा) और एंटीमलेरियल दवाइयां लेने से भी गटेट सोराइसिस हो जाता है। संक्रामक न होने की वजह से यह सही इलाज से जल्द कंट्रोल हो जाता है। इसके इलाज में क्रीम या ऑइन्टमेंट के अलावा कार्टीकॉस्टीराइड, साइक्लोस्पोराइन, बॉयोलॉजिक्स और मेथोट्रेक्सेट जैसी दवाएं प्रयोग की जाती हैं।

पस्चलर सोराइसिस: यह वयस्कों में सबसे ज्यादा होता है। इसमें शरीर पर पस से भरे हुए छाले हो जाते हैं और स्किन में सूजन आने से शरीर के बड़े भाग में लालामी आ जाती है। ये छाले काफी दूर-दूर होते हैं। आमतौर पर ये छाले हाथों और पैरों में होते हैं लेकिन ये कहीं पर भी हो सकते हैं। इनकी वजह से बहुत ज्यादा खुजली (इचिंग), बुखार, पल्स में तेजी, मांसपेशियों में कमजोरी, एनीमिया, ठंड लगना और डि-हाइड्रेशन हो सकता है। इसमें तुरन्त मेडिकल केयर की जरूरत होती है। इलाज में देरी से वजन गिरना, थकान, बाल गिरना, नाखून खराब होना,  बैक्टीरियल इंफेक्शन और लीवर डैमेज होने लगता है। इलाज में देरी करने पर कार्डियोरिसपाइटिरी सिस्टम फेल होने से जानलेवा स्थिति बन जाती है।

इसके इलाज में एंटीबॉयोटिक, रिहाइड्रेशन, क्रीम्स प्रयोग की जाती हैं, जब इनसे फायदा नहीं होता तो डाक्टर ओरल स्टीराइड लिखते हैं। इन  स्टीराइड्स को कभी भी अपने आप बंद न करें अन्यथा सोराइसिस के छाले और ज्यादा मात्रा में उभर आयेंगे।

पश्चलर सोराइसिस के एक अन्य प्रकार जिसे पलमोप्लांटर पश्चुलोसिस (पीपीपी) कहते हैं हाथों की हथेलियों (आमतौर पर अंगूठे के आधार पर) के साथ-साथ पैरों के तलवों पर होता है। शुरूआत में इसका रंग लाल और बाद में भूरा हो जाता है। धूम्रपान करने वाले इसकी चपेट में जल्दी आ जाते हैं। पश्चलर सोराइसिस का एक अन्य रेयर रूप एक्रोपस्टुलोसिस उंगलियों और अंगूठों के छोरों पर  दर्दनाक घाव बना देता है। जब ये घाव फटते हैं तो त्वचा पर लगातार रिसने वाले चमकीले लाल पपड़ीदार पैच बन जाते हैं। इसकी गम्भीरता का अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि यह उंगलियों और हड्डियों को विकृत कर देता है। डा. क्रिस्ट्रोफर जे. आर्पे के अनुसार पश्चुलर सोराइसिस के पीछे त्वचा में संक्रमण और चोट के अलावा भावनात्मक स्ट्रेस, प्रेगनेन्सी, स्किन इंजरी, संक्रमण, किसी खास धातु या रसायन और यूवी लाइट से ओवर एक्सपोजर जैसे कारक भी होते हैं। कुछ महिलाओं में मेनोपॉज के समय शरीर में होने वाला हारोमोनल बदलाव सोराइसिस को ट्रिगर करता है। इनके अलावा इंटरनल मेडीकेशन और सिस्टेमिक स्टीराइड्स में प्रयुक्त कुछ ड्रग्स भी इसे ट्रिगर कर देते हैं।

इसके इलाज में एसीट्रेटिन, साइक्लोस्पोराइन, मेथोट्रेक्सेट, टीएनएफ-अल्फा ब्लॉकर्स और इंटरल्यूकिन-12/23 इन्हेबीटर्स जैसे बॉयोलॉजिक्स प्रयोग किये जाते हैं। डाक्टर क्रिस्ट्रोफर जे. आर्पे का कहना है कि इस सोराइसिस को ठीक करने के लिये जितनी जरूरी दवायें हैं उतना ही जरूरी है डिहार्ड्रेशन से बचना और इंफेक्शन रोकना।

इन्वर्स सोराइसिस: इसे हिडन या इन्टरट्रीजीनियस सोराइसिस भी कहते हैं, इसमें बगलों, छाती, ग्रोइन (पेट और जांघ के बीच का भाग) और प्रजनन अंगों के स्किनफोल्ड (वह स्थान जहां खाल से खाल रगड़ती है) में लाल चकत्ते बनते हैं। इन्वर्स सोराइसिस के शिकार ज्यादातर मरीजों को प्लॉक सोराइसिस भी होती है। इसका मुख्य कारण है इम्यून सिस्टम का आसामान्य व्यवहार। मोटे लोगों को इसके चांस ज्यादा होते हैं। इसके इलाज में सामान्य दवाओं के अलावा लाइट थेरेपी प्रयोग की जाती है। इन्वर्स सोराइसिस की तकलीफ कम करने के लिये कॉटन के ढीले कपड़े पहनें और बेकिंग सोडा व जिंक ऑक्साइड वाला पाउडर प्रयोग करें।

अर्थोडेरमिक सोराइसिस: यह गम्भीर और रेयर सोराइसिस है। यह एक बार में ही शरीर के बड़े भाग को अपनी चपेट में ले लेता है। इससे प्रभावित त्वचा घूप से जली हुई प्रतीत होती है, मरीज को अक्सर बुखार रहता है और वह जल्दी-जल्दी बीमार होने लगता है। यह जानलेवा रोग है अत: इसके होने पर तुरन्त डाक्टर से मिलें।

नेल सोराइसिस: सोराइसिस का यह टाइप हाथ-पैरों की उंगलियों व अंगूठे के नाखूनों में होता है। इससे नाखूनों की वृद्धि असामान्य हो जाती है और उनका रंग खराब होने के साथ नाखूनों में गड्ढे पड़ जाते हैं और वे मेल बेड (ओनीकोलसिस) से अलग होने लगते हैं। गम्भीर मामलों में नाखून अपने आप उखड़ने भी जाते हैं।

क्यों होता है सोराइसिस?

सोराइसिस का मूल कारण इम्यून सिस्टम बिगड़ना है। इसमें खून में मौजूद टी सेल्स अपनी त्वचा को बाहरी तत्व समझकर उसे नष्ट करने लगते हैं तो त्वचा में सूजन आने से वह लाल रंग की हो जाती है, इससे बचने के लिये शरीर, त्वचा के सेल्स का ओवर प्रोडक्शन करता है जिससे नये स्किन सेल्स तेजी से बनते हैं और ये त्वचा पर पपड़ी के रूप में जम जाते हैं।

कुछ मामलों में यह जेनेटिक होती है, यदि परिवार में कभी भी किसी को सोराइसिस हुआ है तो यह नजदीकी फैमिली मेम्बर को भी हो सकता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के अनुसार सोराइसिस के 2 से 3 प्रतिशत मरीज जेनेटिक होते हैं।

बहुत से मामलों में कुछ अन्य कारण भी सोराइसिस को सक्रिय (ट्रिगर) करते हैं, मेडिकल लैंग्वेज में इन्हें सोराइसिस ट्रिगरर्स कहा जाता है। इनमें सबसे कॉमन है स्ट्रेस या तनाव। यदि व्यक्ति लम्बे समय से तनाव में हैं तो वह कभी भी सोराइसिस का शिकार हो सकता है। धूम्रपान और ज्यादा मात्रा में शराब पीना इसे ट्रिगर करता है, इससे सोराइसिस बार-बार उभरती है। ऐसे में सोराइसिस शांत करने के लिये स्मोकिंग और शराब छोड़ना सबसे अच्छा उपाय है। इनके अलावा चोट, त्वचा पर लगा जख्म, संक्रमण, सनबर्न, किसी वैक्सीन का शॉट और हाई बल्ड प्रेशर, लीथियम व एंटी-मलेरियल दवाएं भी सोराइसिस को ट्रिगर करती है।

सोराइसिस की पुष्टि

इसकी पुष्टि दो तरह से होती है- फिजिकल जांच और बॉयोप्सी। ज्यादातर मामलों में स्किन विशेषज्ञ लक्षणों के देखकर इसकी पुष्टि कर देते हैं। लेकिन इसके लिये जरूरी है कि मरीज के शरीर के जो भाग इससे प्रभावित हैं उनके बारे में डाक्टर को खुलकर बताये और दिखाये। जब पुष्टि की इस प्रक्रिया में संदेह रहता है तो बॉयोप्सी से इसे कन्फर्म करते हैं। इसमें सोराइसिस से प्रभावित त्वचा का एक टुकड़ा माइक्रोस्कोपिक जांच के लिये प्रयोगशाला भेजते हैं। इससे सोराइसिस की पुष्टि के साथ उसका टाइप भी पता चल जाता है और यह कोई अन्य बीमारी तो नहीं है यह भी रूल आउट हो जाता है।

सोराइसिस और आर्थराइटिस: सोराइसिस के 30 से 33 प्रतिशत मरीजों को सोराइटिक ऑर्थराइटिस होता है, इसकी वजह से जोड़ों में सूजन, जलन और दर्द रहने से कई बार रियूमेटाइड ऑर्थराइटिस या गठिया का भ्रम हो जाता है। सोराइटिक ऑर्थराइटिस क्रोनिक डिसीस है और ज्यादातर मरीजों में इसके लक्षण आते-जाते रहते हैं। कुछ मरीजों में इसके लक्षण लगातार रहने से जीवन कष्टप्रद हो जाता है। यह कंडीशन उंगलियों और अंगूठे के जोड़ों के अलावा  कलाई, लोअर बैक (पीठ का निचला भाग) और टखनों (एंकल) को प्रभावित करती है। यहां यह बात ध्यान रखनी चाहिये कि जोड़ों की समस्या (ऑर्थराइटिस) बिना सोराइसिस के भी होती है। सही उपचार और खानपान सोराइटिक ऑर्थराइटिस की तकलीफ कम करता है, इससे दर्द में राहत के साथ जोड़ों में चिकनाहट आने से जीवन में गतिशीलता आती है। जितनी जल्दी यह कन्फर्म होगा उतनी ही आसानी से इसका इलाज हो सकेगा और इससे होने वाली समस्याओं में (जैसेकि जोड़ों का डैमेज होना) में कमी आयेगी।

खान पान, जीवन शैली बदलाव का असर

खाने से सोराइसिस ठीक नहीं होती लेकिन खान-पान और लाइफस्टाइल बदलकर इसके तकलीफदेह लक्षणों को कम कर सकते हैं-

यदि मरीज ओवरवेट है तो उसे अपना वजन घटाना चाहिये। इसके लिये सैचुरेटेड फैट अर्थात अधिक वसा वाला खाना कम करें। रेड और चर्बीदार मीट का सेवन छोड़ें।

खाने में ओमेगा 3 फैटी एसिड युक्त प्रोटीन और फाइबर युक्त अनाजों का सेवन बढ़ायें। मांसाहारी लोग मछली का सेवन करें और शाकाहारी अपने भोजन में अखरोट, फ्लेक्स सीड और सोयाबीन की मात्रा बढ़ायें। सोराइसिल कंट्रोल करने में मेडीटेरेनियन डाइट लाभदायक है, इस सम्बन्ध में डायटीशियन की सलाह लें। रोजाना हल्दी युक्त बिना फैट वाले दूध का सेवन कम से कम दो बार जरूर करें। हल्दी को टेबलेट के रूप में लेना और भी लाभदायक है।

डाक्टर से पूछकर विटामिन सप्लीमेंट लेना शुरू करें जिससे इम्यून सिस्टम और ओवरऑल हेल्थ इम्प्रूव हो। डाइटरी सप्लीमेंट सोराइसिस को अंदर से कंट्रोल करने में सहायक हैं। इसके लिये फिश ऑयल, विटामिन डी और सी और ओमेगा-3 फैटी एसिड युक्त सप्लीमेंट लेना शुरू करें। इससे त्वचा की सूजन कम होने से खुजली और दर्द में कमी आती है।

रेड मीट, वसा युक्त डेयरी उत्पाद, डिब्बा बंद खाना और रिफाइन शुगर सोराइसिस को ट्रिगर करते हैं इसलिये या तो इन्हें खाना छोड़ दें या इनकी मात्रा कम करें।

एल्कोहल और धूम्रपान भी सोराइसिस को ट्रिगर करते हैं इसलिये सोराइसिस की पुष्टि होते ही इन्हें तिलांजलि दे दें।

प्रभावित स्किन को कभी भी सूखा न रहने दें और मॉश्चराइजर प्रयोग करें। एलोवेरा युक्त मॉश्चराइजर सोराइसिस की तकलीफ कम करने में मदद करते हैं। एलोवेरा, महोनिया एक्वेफोलियम और भटकटैया का रस (मिल्क थेसेल) व वसंती गुलाब का तेल (प्रिमोर्स ऑयल) का प्रयोग सोराइसिस कंट्रोल करने में मदद करते हैं।

खोपड़ी में सोराइसिस की तकलीफ कम करने के लिये सप्ताह में दो बार पानी में एपल साइडर वेनेगर डालकर सिर धोयें। यदि टी-ट्री ऑयल वाला शैम्पू उपलब्ध है तो सिर इसी से धोयें लेकिन खोपड़ी में ब्लीडिंग या क्रैक्स की स्थिति में ऐसा न करें। सुगन्धित साबुनों और शैम्पू के प्रयोग से बचें।

बाथ टब में गुनगुना पानी भरकर उसमें पिसे हुए ओट्स, सी सॉल्ट या इप्सम साल्ट डालकर उसमें 15-20 मिनट के लिये बैठ जायें, इसके बाद स्नान करें। स्नान के तुरन्त बाद शरीर पर मॉश्चराइजर लगायें। इससे शरीर पर बने सोराइसिस चकत्तों में खुजली और सूजन घटने लगेगी।

रोजाना 5-10 मिनट धूप में बैठें, सूर्य से निकलने वाले यूवी किरणों से सोराइसिस कंट्रोल में मदद मिलती है। सूर्य की रोशनी उन अति-सक्रिय ब्लड सेल्स को नष्ट करती है जो हेल्दी स्किन सेल्स पर अटैक करके सोराइसिस की ग्रोथ तेज करते हैं।

इमोशनल हेल्थ ठीक रखने के लिये नियमित मेडीटेशन, योगा व व्यायाम के साथ पढ़ने की आदत डालें, इससे स्ट्रेस, एंग्जॉयटी और डिप्रेशन घटेगा और सोराइसिस नियन्त्रित रहेगा।

इलाज

हल्के या मध्यम सोराइसिस में प्रभावित त्वचा पर क्रीम्स और ऑइन्टमेंट से इसे कंट्रोल किया जाता है। डाक्टरों का कहना है कि महोनिया एक्वेफोलियम पौधे से बनी क्रीम्स सोराइसिस की तकलीफ कम करने में सहायक है। इनके साथ में कोर्टीकोस्टीराइड्स, रेटीनॉइड्स, एन्थ्रालिन, विटामिन डी एनॉलाग्स और सेलीसाइलिक एसिड जैसी दवाइयां भी प्रयोग की जाती हैं।

मध्यम से गम्भीर सोराइसिस के शिकार मरीजों के इलाज में सिस्टेमिक मेडीसन (मेथॉट्रेक्सेट, साइक्लोस्पोराइन या सैंडीइम्यून, बॉयोलॉजिक्स और रेडिनॉयड्स) इस्तेमाल होती हैं लेकिन इनके साइड इफेक्ट होने की वजह से डाक्टर इन्हें बहुत कम समय के लिये प्रिस्क्राइब करते हैं।

बहुत से मामलों में सोराइसिस के इलाज में लाइट थेरेपी के तहत अल्ट्रावॉयलेट (यूवी) किरणों और नेचुरल लाइट का इस्तेमाल किया जाता है। म्यो क्लीनिक (अमेरिका) में हुए एक शोध के मुताबिक यूवीए और यूवीबी लाइट हल्के व मध्यम सोराइसिस को कम करने में मददगार है। मरीजों में इन दोनों के कॉम्बीनेशन को प्रयोग करने पर एक से पांच सिंटिंग में सोराइसिस के लक्षण कम हो गये। लेकिन कुछ मरीजों को लाइट थेरेपी का प्रयोग बहुत लम्बे समय तक भी करना पड़ा। यह भी सामने आया है कि एक या दो साल में जब इस थेरेपी का असर कम हो गया तो डाक्टरों ने इसके स्थान पर किसी अन्य मेडीकेशन जैसेकि बॉयोलाजिक्स, रेटिनॉयड्स, साइक्लोस्पोराइन और मेथोट्रेक्सेट से सोराइसिस को कंट्रोल किया।

निष्कर्ष-नजरिया

सोराइसिस ऑटो इम्यून डिसीस है इसे कंट्रोल किया जा सकता है लेकिन समाप्त नहीं। यदि आपके आसपास या परिवार में कोई व्यक्ति इससे पीड़ित है तो उससे घृणा न करें क्योंकि यह संक्रामक नहीं है और न ही उससे किसी को लगेगी। यह वास्तव में शरीर के प्रतिरक्षा तन्त्र (इम्यून सिस्टम) में आयी उस गड़बड़ी का परिणाम है जिसमें हमारा इम्यून सिस्टम अपने स्किन सेल्स को बाहरी ऑब्जेक्ट समझकर उन्हें नष्ट करने लगता है। आमतौर पर यह स्थिति अत्यधिक स्ट्रेस, एंग्जॉयटी,  किसी दवा के रियेक्शन या खाने की वस्तु से एलर्जी से होती है। एक अध्ययन में पाया गया कि सोराइसिस ग्रस्त लोगों में आत्म सम्मान (सेल्फ इस्टीम) की भावना घटने से डिप्रेशन हो जाता है। जैसे ही शरीर पर एक पैच ठीक होने से पहले किसी अन्य स्थान पर दूसरा पैच उभरता है मरीज का आत्म-विश्वास घट जाता है। ऐसे में परिवार के लोगों को इमोशनल सपोर्ट की जरूरत होती है, परिवार से मिला भावनात्मक सपोर्ट सोराइसिस के उपचार में बहुत मददगार है। सोराइसिस होने पर तुरन्त डाक्टर से मिलें और उन कारणों को समझें जिनसे सोराइसिस उभरता है, इनसे दूर रहने का प्रयास करें। सोराइसिस कंट्रोल करने के लिये डॉक्टर द्वारा दी जा रही दवाओं को ठीक समय पर लें और इन्हें डाक्टर के कहने पर ही छोड़ें अपने आप नहीं।

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