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चैत्र नवरात्र 2021: मां दुर्गा का प्रथम स्वरूप भगवान शंकर की अर्द्धांगिनी क्यों कहलाती है शैलपुत्री

आज से चैत्र नवरात्र प्रारंभ हो गये हैं.  जो 21 अप्रैल को समाप्त होंगे. नवरात्र के साथ ही भारतीय नववर्ष भी प्रारंभ हो रहा है. नवरात्रों के नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है. नवरात्र के पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा होती है. मान्यता है कि माता की पूजा करने से सभी रोगों को नाश हो जाता है. शैलपुत्री  के बारे में जो जानकारी मिलती है उससे पता चलता है कि वे पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं.  हिमालय पर्वत अडिगता ओर दृढ़ता का परिचायक है.  जब हम भक्ति का रास्ता चुनते हैं तो हमारे मन में भी भगवान के लिए इसी तरह का अडिग विश्वास होना चाहिए, विश्वास से ही हम अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं. आज हम बात करेंगे मां दुर्गा के रूप शैलपुत्री की एक कथा के बारे में….

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वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌ ।

वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

शैलपुत्री का स्वरूप

हिमालय के वहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उनका नामकरण हुआ शैलपुत्री। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं. इस देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है. यही देवी प्रथम दुर्गा हैं. ये ही सती के नाम से भी जानी जाती हैं. उनकी एक कहानी है.

मां शैलपुत्री की कहानी

मां शैलपुत्री को सती के नाम से भी जाना जाता है। एक बार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ करवाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने सभी देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा लेकिन भगवान शिव को नहीं। देवी सती भलीभांति जानती थी कि उनके पास निमंत्रण आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो उस यज्ञ में जाने के लिए बेचैन थीं, लेकिन भगवान शिव ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि यज्ञ में जाने के लिए उनके पास कोई भी निमंत्रण नहीं आया है और इसलिए वहां जाना उचित नहीं है। सती नहीं मानीं और बार बार यज्ञ में जाने का आग्रह करती रहीं। सती के ना मानने की वजह से शिव को उनकी बात माननी पड़ी और अनुमति दे दी।

सती जब अपने पिता प्रजापित दक्ष के यहां पहुंची तो देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं और सिर्फ उनकी माता प्यार से उन्हें गले लगाया। उनकी बाकी बहनें उनका उपहास उड़ा रहीं थीं और सति के पति भगवान शिव को भी तिरस्कृत कर रहीं थीं। स्वयं दक्ष ने भी अपमान करने का मौका ना छोड़ा। ऐसा व्यवहार देख सती दुखी हो गईं। अपना और अपने पति का अपमान उनसे सहन न हुआ…और फिर अगले ही पल उन्होंने वो कदम उठाया जिसकी कल्पना स्वयं दक्ष ने भी नहीं की होगी।

सती ने उसी यज्ञ की अग्नि में खुद को भस्म कर अपने प्राण त्याग दिए। भगवान शिव को जैसे ही इसके बारे में पता चला तो वो दुखी हो गए। दुख और गुस्से की ज्वाला में जलते हुए शिव ने उस यज्ञ को ध्वस्त कर दिया।सती ने फिर अगले जन्म में हिमालय के यहां जन्म लिया और वहां जन्म लेने की वजह से इनका नाम शैलपुत्री पड़ा।

भगवान शंकर की अर्द्धांगिनी माता पार्वती

पर्वतराज हिमालय के पुत्री रूप में जन्म लेने के बाद सती का नाम माता पार्वती हुआ। इसके बाद माता पार्वती का विवाह भगवान शंकर से हुआ। नवरात्री में मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री के रूप में पूजा जाता है। मां शैलपुत्री का निवास काशी नगरी वाराणसी में माना जाता है। वहां शैलपुत्री का एक बेहद प्राचीन मंदिर है जिसके बारे में मान्यता है कि यहां मां शैलपुत्री के सिर्फ दर्शन करने से ही भक्तजनों की मनोकामना पूरी हो जाती है।यह भी कहा जाता है कि नवरात्र के पहले दिन यानि प्रतिपदा को जो भी भक्त मां शैलपुत्री के दर्शन करता है उसके सारे वैवाहिक जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं।

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