चैत्र नवरात्र 2021: मां दुर्गा की छठी शक्ति देवी कात्यायनी क्यों कहलायी महिषासुरमर्दिनी - Naya India
लाइफ स्टाइल | धर्म कर्म| नया इंडिया|

चैत्र नवरात्र 2021: मां दुर्गा की छठी शक्ति देवी कात्यायनी क्यों कहलायी महिषासुरमर्दिनी

नवरात्रि में छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं।  इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि इस देवी की उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है।

इसे भी पढ़ें गुजरातः माता सती का ऐसा अनोखा मंदिर जहां श्रद्धालु तो आते है लेकिन मुर्ति नहीं देख पाते….

मां का स्वरूप

मां कात्यायनी अद्भुत रूप वाली हैं। नवरात्र के छठे दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित रहता है। योग साधना में आज्ञा चक्र का खास महत्व होता है। जातक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होने के कारण देवी कात्यायनी के आसानी से दर्शन मिलते हैं। मां कात्यायनी का रूप भव्य तथा प्रभावशाली होता है। उनका रूप सोने की तरह चमकीला है। देवी कात्यायनी की चार भुजाएं हैं। दायीं ओर का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में स्थित होता है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में विद्यमान होता है। मां के बायीं ओर वाले हाथ में तलवार होता है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल मौजूद रहता है। मां कात्यायनी सदैव शेर पर सवार रहती हैं।

मां कात्यायनी की पूजन विधि

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन ।

कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥

मां कात्यायनी को प्रसन्न करने के लिए विशेष प्रकार से आराधना करें। इसके लिए पहले फूलों से देवी मां को प्रणाम कर मंत्र का जाप करें। नवरात्र के छठे दिन दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करना चाहिए। देवी को फूल और जायफल प्रिय हैं इसलिए उन्हें पुष्प तथा जायफल अर्पित करें। देवी के साथ ही शंकर जी की भी पूजा करें। देवी कात्यायनी को शहद पसंद है इसलिए इस दिन लाल रंग के कपड़े पहनकर मां को शहद चढ़ाएं। मां की आरती करें। आरती के बाद पवित्र मन से प्रार्थना करे। मां को भोग लगाए। भोग को सभी में प्रसाद के रूप में वितरित करें ।

मां कात्यायनी की कथा

माँ का नाम कात्यायनी कैसे पड़ा इसकी भी एक कथा है- कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। कात्यायन ऋषि ने उनका पालन पोषण किया।

कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं।

ऐसी भी कथा मिलती है कि ये महर्षि कात्यायन के वहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्त सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध कर देवताओं को उसके आतंक से मुक्त करवाया था।

महिषासुर के बाद शुंभ-निशुंभ नाम के राक्षसों ने असुरी बल के घमंड में आकर तीनों लोकों का राज्य और धनकोष छीन लिया। नवग्रह को बंधक बनाकर इनके अधिकारों का प्रयोग करते रहे। वायु और अग्नि का कार्य भी दोनों राक्षस करने लगे। शुंभ-निशुंभ ने सभी देवताओं को अपमानित कर राज्य भ्रष्ट घोषित कर पराजित कर दिया तथा अधिकारहीन बनाकर स्वर्ग से निकाल दिया। सभी देवताओं ने अपराजित देवी के स्मरण किया कि हे जगदम्बा आपने हमें वरदान दिया था कि संकट काल में आपकों याद करने पर आप हमारे सभी कष्टों का तत्काल नाश करेंगी। इस प्रार्थना के साथ देवता हिमालय गये और वहां पर विष्णिमाया नामक देवी की स्तुति की।इसके बाद देवी कात्यायिनी ने इन दोनो असुरों को मार कर देवताओं की रक्षा की।

इसे भी पढ़ें चैत्र नवरात्र 2021 : मां स्कंदमाता अपने भक्तों पर करती है स्नेह की बारिश

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *