dadhichi jayanti maharshi dadheechi महान दानी, त्यागी महर्षि दधीचि
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महान दानी, त्यागी महर्षि दधीचि

Mahrish dadhachi

जन कल्याण में रत रहने वाले शल्य चिकित्सा के ज्ञाता महर्षि दधीचि ने देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों को ब्रह्म विद्या का ज्ञान दिया। वेद शास्त्र आदि के पूर्ण ज्ञाता और स्वभाव के बड़े ही दयालु महर्षि दधीचि में अहंकार नाममात्र का भी नहीं था। सदा दूसरों का हित करने में अपना परम धर्म समझने वाले दधीचि के व्यवहार से उनके निवास स्थल वन के पशु-पक्षी तक संतुष्ट थे। (dadhichi jayanti maharshi dadheechi)

त्याग व दानवीर के महाधनी महर्षि दधीचि अग्नि उपासक, आदर्श के प्रणेता, ग्रहस्थ धर्म का पालन, त्यागमय जीवन, श्रेष्ठ वैज्ञानिक, अणु शक्ति के ज्ञाता, शल्य क्रिया के विशेषज्ञ, मधु विद्या के प्रकाण्ड विद्वान, मां शारदा के सच्चे उपासक, शिव भक्त, विश्व के कल्याण हेतु अपनी अस्थियों का दान करने वाले प्रथम मनुष्य थे। तपस्या और बलिदान के लिए प्रसिद्ध महर्षि दधीचि ने अत्याचार, शोषण, अन्याय और दानवों के जघन्य अपराध से मानवता को बचाने के लिए अपनी अस्थियों तक का दान कर दिया था। विश्व कल्याण के लिए अपना शरीर का बलिदान कर देने वाले महर्षि दधीचि का जन्म भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को हुआ था, इसीलिए इस तिथि को महर्षि दधीचि जयंती मनाये जाने की पौराणिक परिपाटी कायम है। महान त्यागी, दानी महर्षि दधीचि अर्थवा ऋषि के पुत्र थे। इनकी ममतामयी माता का नाम शांति था। इनका नाम ब्रह्मा ने दध्यंग अर्थात दधीचि रखा था। इनका विवाह तृणबिन्दु राजा की पुत्री वेदवती के साथ हुआ। कतिपय स्थानों पर उनकी पत्नी का नाम गभस्तिनी बताया गया है। इनके जन्म व तपस्या के सम्बन्ध में अनेक भ्रांतियां हैं, और विद्वानों के मध्य इस सम्बन्ध में विभेद है।

यास्काचार्य के मतानुसार दधीचि की माता चित्ति और पिता अथर्वा थे, इसीलिए इनका नाम दधीचि हुआ था। विभिन्न पुराण के अनुसार यह कर्दम ऋषि की कन्या शांति के गर्भ से उत्पन्न अथर्वा के पुत्र थे। इनका प्राचीन नाम दध्यंच कहा जाता है। कुछ अन्य पुराणानुसार यह शुक्राचार्य के पुत्र थे। महर्षि दधीचि तपस्या और पवित्रता की प्रतिमूर्ति थे। भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति और वैराग्य में इनकी जन्म से ही निष्ठा थी। विश्वकल्याणार्थ स्वअस्थि दानी महान त्यागी महर्षि दधीचि त्रिवेणी संगम में अर्थव वन में निवास करते थे। राजा क्षुव से उन्होंने युद्ध किया, जिसमें क्षत्रिय व ब्राह्माण कौन श्रेष्ठ हैं का निर्णय हुआ। इनका शरीर युद्ध में विच्छिन्न हो गया था। दैत्य गुरू शुक्राचार्य ने मृत संजीवनी विद्या से शरीर पूर्ववत कर दिया। इनसे दधीचि नें महामृत्युंजय मंत्र का ज्ञान सीखा। जन कल्याण में रत रहने वाले शल्य चिकित्सा के ज्ञाता महर्षि दधीचि ने देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों को ब्रह्म विद्या का ज्ञान दिया। वेद शास्त्र आदि के पूर्ण ज्ञाता और स्वभाव के बड़े ही दयालु महर्षि दधीचि में अहंकार नाममात्र का भी नहीं था। सदा दूसरों का हित करने में अपना परम धर्म समझने वाले दधीचि के व्यवहार से उनके निवास स्थल वन के पशु-पक्षी तक संतुष्ट थे। गंगा के तट पर अवस्थित उनके आश्रम में आने वाले अतिथियो का स्वयं महर्षि तथा उनकी पत्नी अतिथि की पूर्ण श्रद्धा भाव से सेवा करते थे।

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महर्षि दधीचि बाल्यकाल से ही अत्यंत परोपकारी और साहसी थे। एक बार एक पेड़ पर जहरीला सांप चढ़ उस पेड़ पर निवास करने वाले एक तोते के परिवार के नन्हे बच्चे को पकड़ लिया। बच्चा सर्प से बचने के लिए फडफडाने लगा, और अपने बच्चे की मृत्यु समीप देख तोता और तोती बिलखने लगे। पेड़ के नीचे इस दृश्य को देखने वाले लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई, परन्तु किसी ने भी तोते के बच्चे को बचाने की हिम्मत नही दिखाई। समीप ही बालक दधीचि खेल रहे थे, शोर गुल सुनकर वे वहां पहुंचे और वस्तुस्थिति को समझते ही वे पेड़ पर चढ़ गये। पेड़ के नीचे खड़े लोग चिल्लाने लगे- दधीचि नीचे उतर आओ, सांप तुम्हे डंस लेगा। दधीचि ने कहा- जीव की रक्षा करना मनुष्य का धर्म हैं, मैं तोते के परिवार को विपत्ति में पड़ा देख, उससे मुख मोड़ नहीं सकता। पेड़ पर चढ़ बालक दधीचि ने लकड़ी के टुकड़े से मार- मारकर सांप के मुंह से तोते के बच्चे को छुड़ा लिया । इससे पहले कि क्रोधित सांप उन पर हमला करता, उन्होंने पेड़ से छलांग लगा दी, उन्हें काफी चोटे आई। अपने बच्चे को जीवित -सुरक्षित देख तोता और तोती चहचहा उठे। बाद में जब लोगों ने पूछा कि तुम्हें जहरीले सर्प से डर नहीं लगा? तो उन्होंने उत्तर दिया कि डरना कैसा, डरना ही है, तो गलत काम से डरना चाहिए, अच्छा काम करने वालों की रक्षा तो स्वयं भगवान करते हैं। दधीचि की यही लोक रक्षा की भावना आगे चलकर इतनी प्रगाढ़ हो गई कि उन्होंने अपने शरीर की हड्डियों तक असुरता के नाश हेतु दान दे डाली। परोपकार और साहस की इस प्रकार की कई कथाएं दधीचि के जीवन से सम्बन्धित हैं।

पुराणों में दधीचि के तपस्या के सम्बन्ध में अनेक कथाएं अंकित प्राप्य हैं। एक बार महर्षि दधीचि बड़ी ही कठोर तपस्या कर रहे थे। इनकी अपूर्व तपस्या के तेज से तीनों लोक आलोकित हो उठा और इन्द्र का सिंहासन हिलने लगा। इन्द्र को लगा कि महर्षि अपनी कठोर तपस्या के द्वारा इन्द्र पद छीनना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने महर्षि की तपस्या को खण्डित करने के उद्देश्य से परम रूपवती अलम्बुषा अप्सरा और कामदेव को भेजा। अलम्बुषा और कामदेव के अथक प्रयत्न के बाद भी महर्षि अविचल रहे और अन्त में विफल मनोरथ होकर दोनों इन्द्र के पास लौट गये। कामदेव और अप्सरा के निराश होकर लौटने के बाद इन्द्र ने महर्षि की हत्या करने का निश्चय कर देवसेना को लेकर महर्षि दधीचि के आश्रम पर पहुँचे। वहाँ पहुँचकर देवताओं ने शान्त और समाधिस्थ महर्षि पर अपने कठोर-अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करना शुरू कर दिया, परन्तु देवताओं के द्वारा चलाये गये अस्त्र-शस्त्र महर्षि की तपस्या के अभेद्य दुर्ग को न भेद सके और महर्षि अविचल समाधिस्थ बैठे रहे। इन्द्र के अस्त्र-शस्त्र भी उनके सामने व्यर्थ हो गये। हारकर देवराज स्वर्ग लौट आये। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवराज इन्द्र की सभा में देवगुरु बृहस्पति के आगमन पर अहंकारवश इन्द्र गुरु बृहस्पति के सम्मान में उठकर खड़े भी नहीं हुए। बृहस्पति ने इसे अपना अपमान समझा और देवताओं को छोड़कर अन्यत्र चले गये।

बृहस्पति के अन्यत्र चले जाने पर देवलोक में गुरु और पुरोहित पद का कार्य सम्हालने के लिए देवताओं ने बृहस्पति के स्थान पर विश्वरूप को अपना पुरोहित बनाया, किन्तु विश्वरूप कभी-कभी देवताओं से छिपाकर असुरों को भी यज्ञ-भाग दे दिया करते थे। इन्द्र ने उस पर कुपित होकर उसका सिर काट लिया। विश्वरूप त्वष्टा ऋषि का पुत्र था, उन्होंने क्रोधित होकर इन्द्र को मारने के उद्देश्य से महाबली वृत्रासुर को उत्पन्न किया। वृत्रासुर के भय से इन्द्र अपना सिंहासन छोड़कर देवताओं के साथ मारे-मारे फिरने लगे। सभी देवता अपनी व्यथा लेकर ब्रह्मा, विष्णु व महेश के पास गए, लेकिन त्रिदेवों में से कोई भी उनकी समस्या का निदान न कर सका। बाद में ब्रह्मा ने उपाय बताते हुए पृथ्वी लोक में निवास करने वाले दधीचि नाम केएक महर्षि के पास जाने का सुझाव दिया और कहा कि यदि वे अपनी अस्थियों का दान कर दें, तो उन अस्थियों से निर्मित वज्र से वृत्रासुर मारा जा सकता है, क्योंकि वृत्रासुर को किसी भी अस्त्र-शस्त्र से नहीं मारा जा सकता। महर्षि दधीचि की अस्थियों में ही वह ब्रह्मतेज़ है, जिससे निर्मित वज्र से वृत्रासुर राक्षस मारा जा सकता है। इसके अतिरिक्त अन्य और कोई दूसरा उपाय नहीं है। सभी देवता इसके लिए तैयार हो गये, परन्तु देवराज इन्द्र महर्षि दधीचि के पास जाना नहीं चाहते थे। इसका कारण यह था कि इन्द्र ने एक बार दधीचि का अपमान किया था।

एक अन्य पौराणिक आख्यानानुसार समस्त संसार में ब्रह्मविद्या ज्ञान के ज्ञाता एकमात्र महर्षि दधीचि ही थे, और वे इस  ब्रह्मविद्या का ज्ञान मात्र विशिष्ट व्यक्ति को ही देना चाहते थे, लेकिन इन्द्र ब्रह्मविद्या प्राप्त करने के परम इच्छुक थे। परन्तु दधीचि की दृष्टि में इन्द्र इस विद्या के पात्र नहीं थे, इसलिए उन्होंने इन्द्र को इस विद्या को देने से मना कर दिया। दधीचि के इंकार करने पर इन्द्र ने उन्हें किसी अन्य को भी यह विद्या देने को मना करते हुए कहा कि- यदि आपने ऐसा किया तो मैं आपका सिर धड़ से अलग कर दूँगा। इस पर महर्षि ने कहा कि- यदि उन्हें कोई योग्य व्यक्ति मिलेगा तो वे अवश्य ही ब्रह्म विद्या उसे प्रदान करेंगे। और बाद में उन्होंने ऐसा ही किया तथा कुछ समय बाद इन्द्रलोक से ही आये अश्विनीकुमार को महर्षि दधीचि ने ब्रह्मविद्या पाने के योग्य जान ब्रह्मविद्या ज्ञान प्रदान करने का मन बना लिया। उन्होंने अश्विनीकुमारों को इन्द्र द्वारा कही गई बातें बताईं। तब अश्विनीकुमारों ने महर्षि दधीचि के अश्व का सिर लगाकर ब्रह्म विद्या प्राप्त कर ली। इन्द्र को जब इसकी सूचना  मिली तो वह पृथ्वी लोक में आकर अपनी घोषणा के अनुसार महर्षि दधीचि का सिर धड़ से अलग कर दिया। अश्विनीकुमारों ने महर्षि के असली सिर को फिर से लगा दिया। इन्द्र ने अश्विनीकुमारों को इन्द्रलोक से निकाल दिया। यही कारण था कि अब इन्द्र महर्षि दधीचि के पास उनकी अस्थियों का दान माँगने के लिए आना नहीं चाहते थे।

वे इस कार्य के लिए बड़ा ही संकोच महसूस कर रहे थे। परन्तु ब्रह्मा के समझाने पर देवराज इन्द्र महर्षि दधीचि के पास उनकी हड्डियाँ माँगने के लिये गये। उन्होंने महर्षि से प्रार्थना करते हुए कहा- कि प्रभो! त्रैलोक्य की मंगल-कामना हेतु आप अपनी हड्डियाँ हमें दान दे दीजिये। दान में अस्थियां मांगे जाने पर महर्षि बहुत प्रसन्न हुए और हंसकर बोले- यद्यपि अपना शरीर सबको प्रिय होता है, किन्तु यह शरीर तो नाशवान है, एक दिन तो इसका अंत होना ही है, तो क्यों न मैं संसार के कल्याण, उपकार के लिए मानवता के काम आऊँ? यह कहकर दधीचि ने आदेश दिया कि ऐसी गायें बुलाकर लाई जाएँ, जो अपनी जीभ से मेरे शरीर के हर हिस्से को इस तरह चाटे कि मांस और त्वचा को चाट लें और अस्थियां अपने स्थान पर आप ही शेष रह जाए। मैं अभी समाधि लगाकर प्राण त्याग देता हूं। यह कह उन्होंने समाधि लगाई और अपनी प्राण त्याग दी। उस समय उनकी पत्नी आश्रम में नहीं थी। अब देवताओं के समक्ष यह समस्या उत्पन्न हुई कि महर्षि के शरीर के मांस को कौन उतारे? बहुत सोच- विचारकर इन्द्र ने कामधेनु गाय को बुलाया और उसे महर्षि के शरीर से मांस उतारने को कहा। कामधेनु ने अपनी जीभ से चाट-चाटकर महर्षि के शरीर का मांस उतार दिया। अब केवल अस्थियों का पिंजर रह गया था। और इस प्रकार प्राप्त दधिची की हड्डियों से देवताओं के राजा इन्द्र ने वज्र बनाया, और उस वज्र से वृत्रासुर का बध कर उसकी इहलीला समाप्त कर दी।

महर्षि दधीचि के द्वारा अपनी देह त्याग देने के बाद जब उनकी पत्नी गभस्तिनी वापस आश्रम में  आई तो अपने पति की देह को देखकर विलाप करने लगी तथा सती होने की जिद करने लगी। गभस्तिनी के उस समय गर्भवती होने के कारण देवताओं ने उन्हें इस कार्य के लिए बहुत मना करते हुए उन्हें अपने वंश के लिए सती न होने की सलाह दी, परन्तु गभस्तिनी नहीं मानी। इस पर देवताओं ने उन्हें अपने गर्भ को देवताओं को सौंपने का निवेदन किया। इस पर गभस्तिनी राजी हो गई और अपना गर्भ देवताओं को सौंपकर स्वयं सती हो गई। देवताओं ने गभस्तिनी के गर्भ को बचाने के लिए पीपल को उसका लालन-पालन करने का दायित्व सौंपा। कुछ समय बाद वह गर्भ पलकर शिशु हुआ तो पीपल द्वारा पालन -पोषण किये जाने के कारण उसका नाम पिप्पलाद रखा गया। यही कारण है कि दधीचि के वंशज दाधीच कहलाते हैं।

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