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कार्तिक महीने का है बहुत महत्व

अशोक ‘प्रवृद्ध’

भारतीय पंचांग के अनुसार आश्विन माह के पश्चात आने वाला वर्ष का आठवाँ माह कार्तिक मास समस्त तीर्थों तथा धार्मिक कृत्यों से अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह मास शरद पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर कार्तिक पूर्णिमा अर्थात देव दीपावली पर समाप्त होता है। दान, पूजा-पाठ तथा स्नान का विशिष्ट महत्व रखने वाले इस माह को कार्तिक स्नान की संज्ञा दी गई है। कार्तिक मास में करवा चौथ, अहोई अष्टमी, रमा एकादशी, गौवत्स द्वादशी, धनतेरस, रूप चर्तुदशी, दीवाली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज, सौभाग्य पंचमी, छठ, गोपाष्टमी, आंवला नवमी, देव एकादशी, बैकुंठ चर्तुदशी, कार्तिक पूर्णिमा अथवा देव दीपावली आदि त्यौहार बड़े धूम-धाम से मनाये जाते हैं।

इस मास में आने वाली देव उठानी या प्रबोधिनी एकादशी का विशेष महत्व होता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की निद्रा के पश्चात उठते हैं। इस दिन के बाद से सारे मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं। देश की पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व होने का कारण इस मास में विवाहित तथा कुंवारी दोनों ही महिलाएं नदियों में ब्रह्ममूहुर्त में स्नान कर दान करती हैं। इस महीने में दान करना भी लाभकारी माना गया है। कार्तिक मास की पहले पंद्रह दिनों अर्थात कार्तिक कृष्ण पक्ष की रातें वर्ष की सर्वाधिक काली रातों में से होती हैं। लक्ष्मी पति के जागने के ठीक पूर्व के इन पंद्रह दिनों में प्रतिदिन दीप का प्रज्ज्वलन करने से जीवन में नई दिशा मिलती है। दीपदान का भी विशेष विधान है। यह दीपदान मंदिरों, नदियों के अलावा आकाश में भी किया जाता है। यही नहीं ब्राह्मण भोज, गाय दान, तुलसी दान,आंवला दान तथा अन्न दान का भी महत्व होता है।

इस दौरान सूर्य उपासना विशेष फलदायी होती है। कार्तिक मास में वृंदा अर्थात तुलसी की पूजा का विशिष्ट पौराणिक महत्त्व है। मान्यता है कि भगवान विष्णु तुलसी के हृदय में शालिग्राम के रूप में निवास करते हैं। इसलिए स्वास्थ्य को समर्पित इस मास में तुलसी पूजा व तुलसी दल का प्रसाद ग्रहण करने से श्रेष्ठ स्वास्थ्य प्राप्त होता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु की प्रिया तुलसी की पूजा कर भक्त भगवान विष्णु को भी प्रसन्न कर सकते हैं। इसलिए इस माह में श्रद्धालु गण विशेष रूप से तुलसी की आराधना करते हैं और प्रतिदिन स्नान के बाद तुलसी तथा सूर्य को जल अर्पित कर पूजा-अर्चना करते हैं। तुलसी के पत्तों के सेवन से शरीर निरोगी रहता है। तुलसी के पत्तों को चरणामृत बनाते समय डाले जाने की परिपाटी है। तुलसी के पौधे का कार्तिक महीने में दान दिए जाने,तुलसी के पौधे के पास सुबह-शाम दीया जलाये जाने का विधान है। तुलसी के पौधे के बाहर होने पर किसी भी प्रकार के रोग व व्याधि घर में प्रवेश नहीं कर पाते हैं। तुलसी अर्चना से घर के रोग, दुख दूर होने के साथ ही धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।

उल्लेखनीय है कि भारतीय संस्कृति में पाश्चात्य देशों में प्रचलित सौर की गति से प्रभावित होने के विपरीत समय की गणना की पद्धति चंद्रमा की गति पर आधारित है। उल्लेखनीय है कि चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट स्थित एक आकाशीय पिंड है, इसलिए प्राचीन भारतीयों ने इसे समय की गणना का सबसे सूक्ष्म साधन मान कर इसकी गति पर आधारित बारह मासों की रचना की। पौराणिक मान्यता है कि कार्तिक मास में मनुष्य की सभी आवश्यकताओं, जैसे- उत्तम स्वास्थ्य, पारिवारिक उन्नति, देव कृपा आदि का आध्यात्मिक समाधान बड़ी आसानी से हो जाता है।

कार्तिक मास में विशेष रूप से मांसाहार सर्वथा त्याज्य है। श्रीदत्त के समयप्रदीप पृष्ठ 46 तथा कृत्यरत्नाकर पृष्ठ 397- 399 में उद्धृत एक लेख में अंकित है कि महाभारत के अनुसार कार्तिक मास में मांसभक्षण, विशेष रूप से शुक्ल पक्ष में, त्याग देने से इसका पुण्य शत वर्ष तक के तपों के बराबर हो जाता है। मान्यता है कि भारत के समस्त महान राजा ययाति, राम तथा नल आदि कार्तिक मास में मांस भक्षण नहीं करते थे। इसी कारण से उनको स्वर्ग की प्राप्ति हुई। नारद पुराण उत्तरार्ध, 21-58 और बकपंचक के अनुसार कार्तिक मास में मांस खाने वाला चाण्डाल हो जाता है। कार्तिक मास में दालों का सेवन नहीं करना चाहिए। इस माह में सामान्य हल्के-फुल्के भोजन को उत्तम बताया गया है।

समस्त तीर्थों तथा धार्मिक कृत्यों से भी पवित्रतर कार्तिक मास के माहात्म्य का वर्णन स्कन्द पुराण के वैष्णव खण्ड का नवम अध्याय, नारद पुराण (उत्तरार्ध) अध्याय 22 और पद्म पुराण 4/92 में अंकित प्राप्य है। सम्पूर्ण कार्तिक मास में गृह से बाहर किसी नदी अथवा सरोवर में स्नान करना तथा गायत्री मंत्र का जाप करते हुए हविष्यान्न केवल एक बार ग्रहण उत्तम माना गया है।विष्णुधर्मोत्तर पुराण 81/ 1-4, कृत्यकल्पतरु, 418 द्वारा उद्धृत हेमाद्रि, 2/762 के अनुसार व्रती इस व्रत के आचरण से वर्ष भर के समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। पौराणिक ग्रन्थों में शिव, चण्डी, सूर्य तथा अन्यान्य देवों के मन्दिरों में कार्तिक मास में दीप जलाने तथा प्रकाश करने की बड़ी प्रशंसा की गयी है।

तिथितत्त्व 147 के अनुसार समस्त कार्तिक मास में भगवान केशव का मुनि (अगस्त्य) पुष्पों से पूजन किये जाने से अश्वमेध यज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है। शरद ऋतु की अंतिम तिथि कार्तिक पूर्णिमा बहुत ही पवित्र और पुण्यदायिनी मानी जाती है। इस अवसर पर कई स्थानों पर मेले लगते हैं। रासलीला होती है।इस तिथि पर किसी को भी बिना स्नान और दान के नहीं रहना चाहिए। ब्राह्मण, निर्धन सम्बन्धियों, बहिन, बहिन के पुत्रों, पिता की बहिनों के पुत्रों, फूफा आदि को भी दान देना चाहिए। हेमाद्रि, व्रतखण्ड, 1.605, व्रतकालविवेक, पृष्ठ 24 के अनुसार कार्तिकेय व्रत कार्तिक माह की षष्ठी को स्वामी कार्तिकेय के व्रत का अनुष्ठान किया जाता है।

दामोदर मास के नाम से भी प्रसिद्ध कार्तिक मास बहुत ही पवित्र मास होता है। स्कन्द पुराण में कार्तिक को समस्त मास में सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। कार्तिक मास को दामोदर मास भी कहते हैं। इस मास में पुण्य प्राप्त करना और समय से आसान और सहज है। इस माह में विष्णु मंदिर में दीपक जलाना बहुत पुण्यदायी माना गया है-
न कार्तिकसमो मासो न कृतेन सम्ा् युगम।
न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थ गंगा समम्ा्।।

अर्थात – कार्तिक के समान कोई अन्य महान मास नहीं है, सतयुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगा माता के समान कोई तीर्थ नहीं है। कार्तिक में गंगा स्नान का बहुत महत्वक बताया गया है। गंगा जी में भी दीपदान करते हैं।

कार्तिक मास को मनुष्य के मोक्ष का द्वार भी कहा गया है। भारतीय पुरातन ग्रन्थों में मुमुक्ष अर्थात किसी आशा से ईश्वराधना करने वाले मनुष्यों की आकांक्षाएं जब ईश्वरीय कृपा से पूर्ण हो जाती हैं और उनका क्षय भी नहीं होता तो मनुष्य को सद्गति प्राप्त होने की बात कही गई है। इसे ही मोक्ष की वास्तविक अवस्था कहा गया है। कार्तिक मास में ईश्वरीय आराधना से सर्वस्व प्राप्त करने की व्यापक संभावनाएं होती हैं। इस मास में स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु भगवान धन्वंतरी की आराधना का प्रावधान और यम को संतुष्ट कर पूर्ण आयु प्राप्त कर लेने की आध्यात्मिक व्यवस्था के साथ ही कार्तिक अमावस्या को देवी लक्ष्मी को प्रसन्न कर सम्पन्नता को प्राप्त करने का मार्ग भी है। इसी मास की एकादशी को विगत चार माह से सोये देव भी जागृत हो जाते हैं और सभी पूर्व आराधनाओं का शाश्वत फल प्रदान करते हैं। पौराणिक मान्यतानुसार कार्तिक में भगवान श्रीविष्णु की आराधना व उनका मंगल गान करने से वे चार माह की योग निद्रा से जागते हैं।

मनुष्य के लिए सर्व कल्याणकारी देव विष्णु के जागते ही सभी समस्याओं के समाधान का मार्ग खुल जाता है। इस मास में प्रत्येक घर की शक्ति अर्थात लक्ष्मी स्वरूपा महिलाओं द्वारा भगवान का दीप जला कर स्तुति किये जाने से पूरे परिवार की उन्नति और सांमजस्य का द्वार खुलता है। ईश्वर के जागने के ठीक पूर्व धन्वंतरी का अवतरण दिवस धनतेरस, यम को समर्पित यम दीप दान, कृष्ण विजय की प्रतीक नरक चौदस और लक्ष्मी पूजन दिवस दीपावली मनाये जाने की पौराणिक परिपाटी है। विशिष्ट आध्यात्मिक महत्त्व रखने वाले कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु का मत्स्यावतार हुआ था। उल्लेखनीय है कि जल में विचरण कर रहे मत्स्य की भांति मनुष्य को लचीलेपन और विपरीत से विपरीत परिस्थिति में स्वयं को विचलित न होने की प्रेरणा देने के लिए ही भगवान श्रीविष्णु ने यह रूप धारण किया था। कार्तिक मास की पूर्णिमा को ही भगवान शिव ने त्रिपुर नामक राक्षस का वध किया था और त्रिपुरारी कहलाए।

महादेव द्वारा त्रिपुर का वध संकेत है कि मनुष्य के तीन दोषों- वात, पित्त और कफ से उत्पन्न होने वाले काम, क्रोध व लोभ का नाश करने के लिए हमेशा प्रयास करते रहना चाहिए। कार्तिक मास के तीस दिन मनुष्य को देव आराधना द्वारा स्वयं को पुष्ट करने के लिए प्रेरित करते हैं।कार्तिक मास में देव आराधना हेतु विशिष्ट महत्व रखने वाले पांच आचरणों के पालन से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और जीवन में वास्तविक प्रगति की संभावनाएं प्रबल होती हैं। इस माह में भूमि शयन की महता बताते हुए पुरातन ग्रन्थों में कहा गया है कि भूमि पर सोने से मनुष्य विलासिता में जीने की प्रवृत्ति से कुछ दिनों के लिए मुक्त होता है। इससे स्वास्थ्य लाभ होता है और शारीरिक व मानसिक विकार भी दूर होते हैं।

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