करणी माता मंदिर देशनोक : करणी माता के इस मंदिर में भक्त खाते है चूहों का झूठा प्रसाद, आइये जानते है मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

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राजस्‍थान के पश्चिमी भाग में बीकानेर के देशनोक में स्थित करणी माता का मंदिर है। करणी माता के इस मंदिर में करीब 25 हजार चूहे रहते हैं। इन काले चूहों को माता की संतान माना जाता है। आमतौर पर कोई भी चूहों की जूठी चीजें खाने के बजाय फेंक देता है लेकिन इस मंदिर में भक्तों को चूहों का जूठा प्रसाद ही दिया जाता है। इस मंदिर में काले चूहों के सफेद चूहे भी रहते है। लेकिन ऐसा कहते है कि सफेद चूहे बड़े ही किस्मत वालों को दिखते है। सफेद चूहे बड़े ही कम दिखने को मिलते है। देशनोक में हर वर्ष नवरात्र के समय मेला भरता है। भारी संख्या में लोग मां के दर्शन करते आते है। लेकिन इस वर्ष यह संभव ना हो सका। पुरे देश में कोरोना ने अपना आतंक मचाया हुआ है। कोरोना गाइडलाइन के तहत सभी धार्मिक स्थल बंद किये हुए है। करणी माता के आशीर्वाद की वजह से ही बीकानेर की स्थापना हुई थी।

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काबा का मंदिर

राजस्थान में बीकानेर से करीब 30 किमी. दूर देशनोक में स्थित इस मंदिर को चूहों वाली माता, चूहों का मंदिर और मूषक मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर चूहों को काबा कहा जाता है। मंदिर में करीब 25000 चूहे हैं। यहां पैरों को ऊपर उठाने के बजाय घसीटकर चलना होता है ताकि कोई काबा पैर के नीचे न आ जाएं। इसे अशुभ माना जाता है। ये चूहे आपके पैरों में घूमते रहेंगे।

कौन थीं करणी माता?

मां करणी को जगदंबा माता का अवतार माना जाता है। कहा जाता है कि इनका जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था और इनका बचपन का नाम रिघुबाई था। इनका विवाह साठिका गांव के किपोजी चारण से हुआ था लेकिन सांसारिक जीवन में मन ऊबने के बाद उन्होंने किपोजी चारण की शादी अपनी छोटी बहन गुलाब से करवा दी थी। इसके बाद खुद माता की भक्ति और लोगों की सेवा में लीन हो गई थीं। कहते हैं कि वे 151 सालों तक जीवित रही थीं। करणी माता अब चारणों की कुल देवी है। राजस्थान में हर घर में करणी माता को पूजा जाता है। राजस्थान में हर गांव में करऩी माता का मंदिर देखने को मिलता है।

 

आखिर इसे चूहों का मंदिर क्यों कहते हैं?

करणी माता के मंदिर में काले चूहों के साथ कुछ सफेद चूहे भी हैं, जिन्हें ज्‍यादा पवित्र माना जाता है। कहते हैं कि एक बार करणी माता की संतान, उनके पति और उनकी बहन का पुत्र लक्ष्मण कपिल सरोवर में डूब कर मर गए थे। जब मां को यह बात पता चली तो उन्होंने मृत्यु के देवता यम से लक्ष्मण को जीवित करने की काफी प्रार्थना की। इसके बाद यमराज ने विवश होकर उसे चूहे के रूप में पुनर्जीवित किया था।

मां ने सैनिकों को बना दिया चूहा

बीकानेर के लोक गीतों में इन चूहों की एक अलग कहानी बताई गई है। उनके अनुसार, एक बार बीस हजार सैनिकों की एक टुकड़ी देशनोक पर आक्रमण करने आई, जिन्हें माता ने अपने प्रताप से चूहा बना दिया था। इन चूहों की एक विशेषता यह भी है कि सुबह पांच बजे मंदिर में होने वाली मंगला आरती और शाम सात बजे संध्‍या आरती के समय चूहे अपने बिलों से बाहर आ जाते हैं।

भक्तों को मिलता है चूहों का जूठा प्रसाद

घर में अगर चूहे खाने-पीने की कोई भी चीज जूठी कर देते हैं तो हम लोग उन्हें फेंक देते हैं। लेकिन इस मंदिर में आने वाले भक्तों को प्रसाद में इन चूहों की जूठन दी जाती है। खास बात है कि इस प्रसाद को खाने के बाद अब तक किसी के भी बीमार होने की कोई खबर नहीं मिली है। भक्त बड़े ही शौक से चूहों का झूठों प्रसाद ग्रहण करते है।

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साभार - ऐसे भी जानें सत्य

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