nayaindia makarsankranti pujavidhi shubh muhurt मकर संक्रान्ति के पर्व के कई मायने
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मकर संक्रान्ति के पर्व के कई मायने

Hindu minority in India

जनवरी की चौदह तारीख को देश भर में ऋतु परिवर्तन का संदेशवाहक पर्व मकर संक्रान्ति का सम्बन्ध सौर मण्डल तथा मकर राशि से है। मकर सक्रान्ति पर्व सूर्य के मकर राशि, रेखा में संक्रान्त, प्रवेश करने का दिवस है। उत्साह से भरे इस दिन को मकर संक्रान्ति, लोहड़ी व पोंगल आदि नाम से जाना जाता है। मकर संक्रान्ति की महिमा सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य में वेद से लेकर पौराणिक ग्रन्थों तक सबमें विशेष रूप से गाई गई है। वेदों की वैदिक पद्धति में यज्ञ करते हुए हेमन्त और शिशिर ऋतुओं की वर्णनपरक ऋचाओं से विशेष आहुतियों का विधान किया गया है । इसमें संदेह नहीं कि यज्ञ करने से वातावरण दुर्गन्धमुक्त होकर सर्वत्र सुगन्ध का प्रसार करने वाला होता है। यज्ञ स्वास्थ्य के लिए तो लाभप्रद होता ही है इसके साथ ही इससे ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना भी सम्पन्न होती है। यज्ञ के गोघृत व अन्न-वनस्पतियों की आहुतियों का सूक्ष्म भाग वायुमण्डल को हमारे व दूसरे सभी के लिए सुख प्रदान करने में सहायक होता है। यही कारण है कि मकर संक्रान्ति के दिन कई घरों में यज्ञ, हवनादि का भी आयोजन किया जाता है ।

वैदिक ग्रन्थों में उत्तरायण को देवयान कहा जाता है और ज्ञानी लोग अपने शरीर त्याग तक की अभिलाषा इसी उत्तरायण अर्थात देवयान में रखते हैं। लोकमान्यता है कि उत्तरायण में देह त्यागने से मनुष्य की आत्मा सूर्य लोक में होकर प्रकाश मार्ग से प्रयाण करेगी। महाभारत की एक कथा से पता चलता है कि आजीवन ब्रह्मचारी भीष्म पितामह ने इसी उत्तरायण के आगमन तक शर-शय्या पर शयन करते हुए देहत्याग वा प्राणोत्क्रमण की प्रतीक्षा की थी। मकर संक्रान्ति के ऐसे प्रशस्त महत्व के कारण ही पूर्वजों ने मकर-संक्रान्ति अर्थात सूर्य की उत्तरायण संक्रमण तिथि को पर्व निर्धारित कर दिया। मकर संक्रान्ति का पर्व चिरकाल से भारत के सभी प्रान्तों में प्रचलित है।

यह सर्वविदित है कि पृथ्वी में दो प्रकार की गतियां होती हैं। एक तो यह अपने अक्ष पर घूमती है और दूसरी गति इसके द्वारा सूर्य की परिक्रमा की जाती है जो एक वर्ष में पूरी होती है। एक परिक्रमा के काल अर्थात समय को सौर वर्ष कहते हैं।

पृथ्वी का सूर्य की परिक्रमा का जो पथ होता है वह कुछ लम्बा वर्तुलाकार होता है। मकर संक्रान्ति के दिन से चल कर पुन: उसी स्थान पर आने अर्थात सूर्य का एक पूरा चक्र करने के मार्ग व परिधि को क्रान्तिवृत्त कहते हैं। हमारे ज्योतिषियों द्वारा इस क्रान्तिवृत्त के बारह  भाग कल्पित किए गये हैं और उन बारह भागों के नाम उन-उन स्थानों पर आकाश के नक्षत्र पुंजों से मिलकर बनी हुई कुछ मिलती जुलती आकृति वाले पदार्थों के नाम पर रखा गया है। यह बारह नाम यथा, मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन हैं। क्रान्तिवृत पर कल्पित प्रत्येक भाग व नक्षत्रपुंजों की आकृति राशि कहलाती है। पृथ्वी जब एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश व संक्रमण करती है तो इस संक्रमण को ही संक्रान्ति कहा जाता है। लोक व्यवहार में अर्थात साधारण भाषा  में पृथ्वी के संक्रमण को सूर्य का संक्रमण कहने लगे हैं। इस प्रकार मकर संक्रान्ति का अर्थ सूर्य का मकर संक्रान्ति के दिन मकर राशि में प्रवेश करना हुआ।

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छः महीनों तक सूर्य क्रान्तिवृत से उत्तर की ओर उदय होता है और छः मास तक दक्षिण की ओर से निकलता रहता है। इन छः मासों की अवधि का नाम अयन है। सूर्य के उत्तर की ओर से उदय की छः मास की अवधि का नाम उत्तरायण और दक्षिण की ओर से उदय की अवधि को दक्षिणायन कहते हैं। उत्तरायण काल में सूर्य उत्तर की ओर से उदय होता हुआ दीखता है और उस अवधि में दिन का काल बढ़ता जाता है तथा इस अवधि में दिन के बढऩे से रात्रि का काल कम होने से रात्रि घटती है। दक्षिणायन में सूर्योदय क्रान्तिवृत्त के दक्षिण की ओर से उदय होता हुआ दृष्टिगोचर होता है और उसमें दिन की अवधि घटती है तथा रात्रि की अवधि में वृद्धि होती है। सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता वा संक्रान्त होता है तो इसको उत्तरायण का आरम्भ होना तथा कर्क राशि में प्रवेश से दक्षिणायन का आरम्भ होना माना जाता है, जिन दोनों अयनों की अवधि छः माह होती है।

उत्तरायण में दिन बढऩे व रात्रि छोटी होने से पृथ्वी पर प्रकाश की अधिकता होती है, इस कारण इस उत्तरायण का महत्व दक्षिणायन से अधिक माना जाता है। उत्तरायण के महत्व का आरम्भ मकर संक्रान्ति से होने के कारण मकर संक्रान्ति वर्तमान में 14 जनवरी के दिवस को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है और इस दिन को पर्व के रूप में मनायें जाने की प्रथा है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार उत्तरायण का आरम्भ मकर संकान्ति के दिन से पहले हो जाता है परन्तु मकर संक्रान्ति पर्व पर ही दोनों पर्व एक साथ मनाये जाने की परम्परा चली आ रही है। इस प्रकार यह स्पष्ट है इस पर्व को मनायें जाने का मुख्य उद्देश्य मकर संक्रान्ति का ज्ञान कराने के साथ ही छः माह की अवधि वाले उत्तरायण के आरम्भ से है।

ध्यातव्य है कि सम्पूर्ण चराचर जगत् शीत ऋ़तु का लोहा मानता है। मकर-संक्रान्ति के दिन 14 जनवरी को शीत अपने यौवन पर होती है। इस दिन मनुष्यों के आवास, वन, पर्वत सर्वत्र शीत का आतंक सा रहता है। मनुष्य व वन्य आदि प्राणियों के हाथ पैर जाड़े से सिकुड़ जाते हैं। शरीर ठिठुरन से त्रस्त रहता है। बहुत से वृद्ध शीत की अधिकता से मृत्यु को प्राप्त होते हैं। हृदय रोगियों के लिए भी शीत ऋतु कष्ट साध्य होती है ।इन दिनों सूर्योदय से दिन का आरम्भ होता है परन्तु सूर्य शीघ्र ही अस्त हो जाता है अर्थात् सूर्योदय और उसके अस्त होने के बीच कम समय होता जबकि लोग अधिक समय तक सूर्य के प्रकाश व उष्णता की अपेक्षा करते हैं।

मकर संक्रान्ति से पूर्व रात्रि की अवधि अधिक होती है जिससे लोगों में क्लेश रहता है परन्तु मकर संक्रान्ति के दिन से रात्रि का समय बढऩे और दिन का घटने का क्रम बन्द हो जाता है। इस दिन सूर्य देव उत्तरायण में प्रवेश करते हैं। भारत में सर्वत्र इस पर्व पर शीत के प्रभाव को दूर करने के उपाय किये जाते दिखाई देते हैं। आयुर्वेद के ग्रन्थों में भी  शीत के प्रतीकार के लिए तिल, तेल, तूल (रूई) का प्रयोग बताया है। तिल इन तीनों में मुख्य हैं। पुराणों में तिल के महत्व के कारण इसे पापनाशक तक कहा गया है । इस सम्बन्ध में एक पौराणिक श्लोक प्रसिद्ध है –

तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमो तिलोदकी।

तिलभुक् तिलदाता च षट्तिला पापनाशना:।।

 अर्थात – तिल-मिश्रित जल से स्नान, तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल का जल, तिल का भोजन और तिल का दान ये छ: तिल के प्रयोग पापनाशक हैं।

यही कारण है कि मकर संक्रान्ति के दिन भारत के प्रायः सभी प्रान्तों में तिल और गुड़ के लड्डू बनाकर दान और इष्ट मित्रों में बांटे जाने की परिपाटी प्रचलित है। तिल को कूट कर उसमें खांड मिलाकर भी रुचिकर मिष्टान्न की भांति खाया जाता है। महाराष्ट्र में इस दिन तिलों से निर्मित तिलगूल नामक हलवा बांटने की प्रथा है और सौभाग्यवती स्त्रियां तथा कन्याएं अपनी सखी-सहेलियों से मिलकर उन को हल्दी, रोली, तिल और गुड़ भेंट करती हैं। यह पर्व प्राचीन भारत की संस्कृति का दिग्दर्शन कराता है जिसका प्रचलन स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर भी किया गया है। आज के समय में जो मिष्ठान्न हैं वह प्राय: स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं। ग्रीक के इतिहास से पता चलता है कि प्राचीन ग्रीक लोग भी वधू-वर को सन्तान वृद्धि के निमित्त तिलों का पकवान्न बांटते थे। इससे स्पष्ट है कि तिलों का प्रयोग प्राचीनकाल से ही विशेष गुणकारक माना जाता रहा है। प्राचीन रोमन लोगों में मकर संक्रान्ति के दिन अंजीर, खजूर और शहद अपने इष्ट मित्रों को भेंट देने की रीति थी। यह भी मकर संक्रान्ति पर्व की सार्वत्रिकता और प्राचीनता का परिचायक है।

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