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रमजान 2021 : आज से रमजान का पाक महीना शुरू, जानें क्यों रखे जाते हैं रोजे…

आज से रमजान का पवित्र महीना शुरु हो गया है। मुसलमान समाज पुरे साल भर से रमजान के पवित्र महीने का इंतज़ार करते है। रमजान इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र महीनों में आता है। ऐसा माना जाता है कि रमज़ान के महीने में की गई इबादत का फल आम दिनों में की गई इबादतों के मुकाबले 70 गुना ज्यादा मिलता है। लोग पूरे महीने का रोजा भी करते है.  मान्यता है कि रोजे हमेशा जोड़े में किये जाते है. कभी भी 1 या 3 रोजे नहीं होते हैं. नमाज़ पढ़ते हैं और कुरान की तिलावत करते हैं। 13 अप्रैल को इस साल के रमज़ान की पहली सहरी खाई गई और इसके बाद आज से ही रोजे़- नमाज़ का सिलसिला शुरू हो गया है . आज रमजान का पहला रोजा है। रमजान के अंतिम दिन ईद मनायी जाती है।

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कैसे रखा जाता है रोजा

रोजा सुबह की सहरी से शुरु होकर शाम को इफ्तार पर खत्म हो जाता है. सुबह सुरज निकलने से पहले एक प्रकार का नाश्ता या हल्का-फुल्का खाना खाया जाता है। पास के मस्ज़िद में सुबह सहरी का ऐलान हो जाता है। फिर पूरे दिन पानी भी नहीं पीया जाता है। शाम को सुरज ढ़लने से पहले पानी पीकर या कुछ खाकर रोजा खोला जाता है।इसे इफ्तार कहते है। इफ्तार के वक्त भी पास की मस्ज़िद में रोजा खोलने का ऐलान किया जाता है।  उसके बाद आप रात तक कुछ भी खा-पी सकते है।

रमजान का महत्व

मान्यताएं हैं कि रमजान के इस पवित्र महीने में अल्लाह अपने बंदों को बेशुमार रहमतों से नवाज़ता है और उनपर जहान्नम के दरवाजे बंद कर देता है और जन्नत के दरवाजे खोल देता है।माना जाता है कि रमज़ान के महीने में अल्लाह अपने बंदों की हर जायज़ दुआ को कुबूल करता है और उनको गुनाहों से मुक्त करता है। यही वजह है कि इस महीने में लोग इबादत करने के साथ-साथ अल्लाह से अपने गुनाहों की दिल से तौबा भी करते हैं।

कुरान पढ़ने की अहमियत

रमजान के महीने में कुरान पढ़ने का उतना ही महत्व है जितना कि नवरात्र में रामायण पढ़ने का। इस्लाम में रमज़ान के पाक महीने में रोज़ा रखने और नमाज़ पढ़ने के साथ कुरान पढ़ने का भी महत्व बताया गया है। क्योंकि रमज़ान के महीने में ही 21वें रोजे को पैगंबर हज़रत मोहम्मद साहब पर अल्लाह ने ‘कुरान शरीफ’ नाजिल किया था। यानी कुरान अस्तित्व में आया था। इसलिए इस महीने में कुरान को ज्यादा से ज्यादा पढ़ी जाती है।

क्या होती है सहरी और इफ्तार

रमज़ान के महीने में सहरी और इफ्तार करने का भी अत्यंत महत्व है। सहरी में  सुबह सूरज निकलने से पहले हल्का नाश्ता किया जाता है । सहरी खाकर ही रोजा रखा जाता है। कहा जाता है कि पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने सहरी करने को सुन्नत बताया है। कहते हैं कि सहरी करने से बरकत होती है। इसलिए सहरी करने से सवाब मिलता है। शाम में सूरज ढलने पर जब रोजा खोलते हैं तो उसे इफ्तार कहते हैं।कहा जाता है कि इफ्तार के समय रोजेदार दिल से जो दुआ मागंते हैं, अल्लाह उनकी तमाम जायज दुआएं कुबूल करता है।

रोज़ा रख गलत काम करना है वर्जित

रोजे रखने का मतलब सिर्फ खाने और पीने की चीजों से दूरी बनाना नहीं होता है। बल्कि रोजा आंख, जुबान और कान का भी होता है। यानी रोजा रखने के बाद रोजेदार ना गलत बात कर सकता है और ना झूठ बोल सकता है और ना ही किसी की बुराई कर सकता है। इसी तरह गलत चीजों को देखने और सुनने से भी रोजा टूट जाता है। इसलिए कहा जाता है कि रोजा रखने पर इंसान हर गलत काम और बुराइयों से पाक हो जाता है।

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