nayaindia Vijayadashami has many meanings विजयादशमी के है कई अर्थ
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विजयादशमी के है कई अर्थ

यह पर्व दस प्रकार के पापों यथा, काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा देता है। मानव मन में छाई हुई निराशाओं के मध्य आशा का संचार करता है, जो यह संदेश देता है कि अन्याय और अत्याचार का विस्तृत से विस्तृत साम्राज्य को भी एक न एक दिन न्याय और सदाचार के हाथों पराजित होना ही पड़ता है। दु:ख की कालीरात के साम्राज्य कायम कर लेने पर भी धैर्य पूर्वक अपने कर्तव्य निष्पादन करने से सुख का प्रभात अवश्य ही आता है।

नौ दिनों तक शक्ति की आराधना के बाद आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी अर्थात दशहरा का त्यौहार मनाये जाने की परिपाटी है। मान्यता है कि इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने रावण का वध कर श्रीलंका पर विजय पाई। भगवती दुर्गा ने नवरात्रि के दस दिन के युद्ध के बाद महिषासुर नामक राक्षस पर विजय पाई थी। यही कारण है कि इसे असत्य पर सत्य के विजय प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। और इसे विजयादशमी के नाम से संज्ञायित किया जाता है। इसे आयुध पूजा भी कहते हैं। यह तिथि भारतीय संस्कृति में अत्यंत पवित्र मानी जाती है।

इस दिन शस्त्र पूजन और अक्षर लेखन का आरम्भ, नया उद्योग प्रारम्भ, बीज बोआई आदि नवीन कार्य प्रारंभ करने की भी प्राचीन परिपाटी है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन शुरू किये गये नये कार्य में अवश्य ही विजयश्री प्राप्त होती है। एक अन्य मान्यतानुसार त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के समय से ही आश्विन शुक्ल दशमी का यह दिन विजय प्रस्थान के प्रतीक रूप में प्रचलित व निश्चित है। प्राचीन काल में राजागण इस दिन विजय की प्रार्थना कर रणयात्रा के लिए प्रस्थान किया करते थे। श्रीराम ने रावण से युद्ध हेतु इसी दिन प्रस्थान किया था। मराठा रत्न छत्रपत्ति शिवाजी महाराज ने भी औरंगजेब के विरुद्ध इसी दिन प्रस्थान करके हिन्दू धर्म का रक्षण किया था। भारतीय पौराणिक ग्रन्थों व इतिहास में अनेक उदाहरण ऐसे हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में हिन्दू राजा इसी दिन विजय प्रस्थान किया करते थे।

वर्तमान में विजयादशमी को दशहरा के रूप में देखा जाता है। और आम धारणा यह है कि इसी दिन श्रीराम ने राक्षसराज रावण को मारकर वैदिक धर्म की विजय की सनातन पताका फहराई थी। इसीलिए इसे अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक कहकर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाकर श्रीराम की विजय का हर्ष व उल्लास मनाया जाता है। किन्तु इस सम्बन्ध में रामायण और पौराणिक ग्रन्थों में उल्लिखित वर्णनों के समीचीन अध्ययन से सत्यापित होने वाले सत्य कुछ और ही तथ्य स्थापित करते हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम ने महाराष्ट्र राज्य में अवस्थित किष्किंधा के ऋष्यमूक पर्वत पर चातुर्मास व्रत का अनुष्ठान किया था। श्रीराम का यह अनुष्ठान आषाढ़ मास के पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन मास में शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि तक चला था।

इसके शीघ्र बाद विजयादशमी नाम से अभिहित आश्विन शक्ल पक्ष की दशमी को श्रीराम ने अपने अनुज लक्ष्मण, वानरपति सुग्रीव और महावीर हनुमान के साथ किष्किंधा से लंका की ओर प्रस्थान किया। पद्मपुराण के अनुसार श्रीराम का राक्षस रावण से युद्ध पौष शुक्ल द्वितीया से शुरू होकर चैत्र कृष्ण तृतीया तक चला। पौराणिक मान्यतानुसार चैत्र कृष्ण तृतीया को श्रीराम ने अधर्मी रावण का संहार किया था। इसके बाद अयोध्या लौट आने पर नव संवत्सर की प्रथम तिथि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ। इसलिए दशहरे को रावण वध की बात न केवल अतार्किक है, बल्कि पौराणिक मान्यताओं के भी विरुद्ध है। विद्वानों के अनुसार तुलसीकृत रामायण के प्रचलन में आने के समय पन्द्रहवीं शताब्दी के आस -पास पहली बार काशी में शारदीय नवरात्रि के अवसर पर आयोजित होने वाली रामलीलाओं में श्रीराम के द्वारा दसवें दिन अर्थात दशहरे के दिन राक्षसराज रावण का वध करते दिखाई देने का रामलीला मंचन कार्यक्रम आरम्भ हुआ, जो बाद में एक प्रथा के रूप में चल पड़ी।

और कुछ ही वर्षों में वर्तमान के उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा सहित आधे भारत में शारदीय नवरात्रि के अवसर पर आयोजित होने वाली रामलीलाओं में नौ दिन तक अनवरत चलने वाली यह रामलीला मनोरंजन के साथ ही ज्ञानवृद्धि के बड़े  साधन के रूप में व्यापक रूप में प्रचलित हो गई और नवरात्रि के बाद दसवें दिन रावण वध के प्रसंग को मनोरंजक व रोचक बनाने के लिए बांस की खपच्चियों और घास-फूस से उसका पुतला बनाकर दहन करने का रिवाज रामलीला में चल पड़ा। रामलीला के उल्लास के लिए रावण का वध सुखद व मनोरंजक अवश्य है। और आरम्भ में यह उल्लास और हंसी-खुशी के लिए रामलीला में अभिनय मात्र के लिए जोड़कर मंचन किया गया था, परन्तु कालान्तर में शनैः -शनैः यह  यह मंचन एक सत्य के रूप में प्रतिष्ठित, एक विश्वास के रूप में स्थापित हो गया कि दशहरे को ही श्रीराम ने रावण को मारा था।

उल्लेखनीय है कि प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक रही है, शक्ति की प्रार्थना- उपासना करती हुई शौर्य की उपासक रही है। श्रीराम का रावण पर विजय अथवा दुर्गा का महिषासुर पर विजय दोनों ही कथाएं शक्ति की महता की परिचायक हैं, और दशहरा अथवा विजयादशमी का पर्व दोनों ही रूपों में शक्ति पूजा का पर्व ही ठहरता है। इस रूप में यह शस्त्र पूजन की तिथि ठहरती है। और बुराई पर अच्छाई की जीत के इस पर्व में अपराजिता देवी की पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय विजय नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसे विजयादशमी कहा जाता है। मान्यतानुसार शत्रु पर विजय पाने के लिए यह मुहूर्त शुभ होने के कारण इसी समय रणयात्रा पर प्रस्थान करना चाहिए।

इस दिन श्रवण नक्षत्र का योग और भी अधिक शुभ माना गया है। युद्ध करने का प्रसंग न होने पर भी इस काल में राजाओं और महत्त्वपूर्ण पदों पर पदासीन लोगों के लिए सीमा का उल्लंघन करना शुभ व उत्तम माना गया है। दुर्योधन ने पांडवों को जुए में पराजित करके बारह वर्ष के वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त रख दी थी कि तेरहवें वर्ष में पांडवों का पता लग जाने पर उन्हें पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ेगा। इस अज्ञातवास काल में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष के खोड़र पर रख दिया और स्वयं वृहन्नला वेश में विराटनगर के राजा विराट के यहाँ नौकरी कर ली थी। जब गोरक्षा के लिए विराट के पुत्र उत्तर ने अर्जुन को सहयोग के लिए कहा, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष पर रखे अपने हथियार को उठाकर शत्रुओं पर विजय इसी दिन प्राप्त की थी। ऐसी भी मान्यता है कि विजयादशमी के दिन श्रीराम के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। यही कारण है कि विजयकाल में शमी पूजन किया जाता है। प्राचीन काल से ही भारत में वैदिक यज्ञों के लिए शमी वृक्ष में उगे अश्वत्थ (पीपल) की दो टहनियों (अरणियों) से अग्नि उत्पन्न किये जाए की परिपाटी रही है। अग्नि शक्ति एवं साहस की द्योतक है। शमी की लकड़ी के कुंदे अग्नि उत्पत्ति में सहायक होते हैं। वैदिक सूक्तों में अनेक ऐसे मन्त्र हैं, जिनमे अग्नि एवं शमी की पवित्रता एवं उपयोगिता से सम्बन्धित वर्णन प्राप्य हैं।

ध्यातव्य है कि रक्षाबंधन, दीपावली और होलिकोत्सव की भांति ही विजयादशमी भी अतिप्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में प्रचलित, जीवित और उत्सवधर्मित है। यह वैदिक काल से ही भारतीय समाज को सम्मोहित, उर्जस्वित, आराध्यित और आनन्दित करता रहा है। परन्तु यह सत्य है कि विजयादशमी का वैदिक महत्त्व अब घटकर नाममात्र का रह गया है। इसके मनाने की विधि- विधान बिगड़ी, परम्पराएँ बदली, और बदलकर एक नवीन प्रथा बनकर चल पड़ी। ऐसा कई बार हुआ। कृषि प्रधान देश भारत में अपने नवीन फसलोपज के घर आने पर यहाँ का किसान ख़ुशी, उल्लास व उमंग से फुला नहीं समाता। इस प्रसन्नता के अवसर पर वह भगवान को उसकी कृपा के लिए  धन्यवाद ज्ञापन, कृतज्ञता व्यक्त और पूजा -अर्चना करता है। भारत में प्राचीन काल से ही इस अवसर पर नये अन्नों को हवि देने की प्रथा थी। आज भी यह देश के कई भागों और वैदिक परिवारों में बदस्तूर जारी है। इसके साथ ही दरवाजे पर धान की हरी एवं अनपकी बालियों को टाँगने तथा गेहूँ, यव आदि को कानों, मस्तक या पगड़ी पर रखने के कृत्य होते हैं।

सहस्त्रों वर्षों के कालखंड में रूढ़ होते हुए स्थान- स्थान पर भांति- भांति के परिवर्तन के क्रम में कालान्तर में यह महोत्सव अपने अलग अलग रूपों में आयोजित एवं परिवर्द्धित होता रहा है। वर्तमान में देश के विभिन्न भागों में यह त्यौहार विभिन्न स्वरूपों में बड़े ही उमंग, उत्साह और उल्लास से मनाया जाता है। इस तिथि को प्रायः हर स्थान पर मेले लगते हैं, रामलीला का आयोजन होता है, रावण के पुतले बनाकर जलाए जाते हैं। विजयादशमी के इस त्योहार का विशद वर्णन हेमाद्रि, सिंधुनिर्णय, पुरुषार्थ चिंतामणि, व्रतराज, कालतत्त्वविवेचन, धर्मसिंधु आदि में किया गया है।

वस्तुतः हर्ष व विजय का पर्व दशहरा शक्ति और शक्ति का समन्वय प्रकट करने वाला उत्सव है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता के प्रकटन हेतु दशहरे का उत्सव मनाया जाता है। यह पर्व दस प्रकार के पापों यथा, काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा देता है। मानव मन में छाई हुई निराशाओं के मध्य आशा का संचार करता है, जो यह संदेश देता है कि अन्याय और अत्याचार का विस्तृत से विस्तृत साम्राज्य को भी एक न एक दिन न्याय और सदाचार के हाथों पराजित होना ही पड़ता है। दु:ख की कालीरात के साम्राज्य कायम कर लेने पर भी धैर्य पूर्वक अपने कर्तव्य निष्पादन करने से सुख का प्रभात अवश्य ही आता है।

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