नेतुला महारानी की पूजा से नेत्र विकार से मिलती है मुक्ति

जमुई। बिहार के जमुई जिले के सिकंदरा प्रखंड स्थित नेतुला महारानी मंदिर में पूजा करने से श्रद्धालुओं को नेत्र संबंधित विकार से मुक्ति मिलती है और उन्हें मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।

देश में कई मंदिरें है, जिनकी अलग-अलग मान्यताएं हैं। बिहार के जमुई जिले के सिकंदरा प्रखंड के कुमार गांव में स्थित मां नेतुला महारानी मंदिर लोगों के बीच अपनी मान्यताओं को लेकर काफी प्रसिद्ध हैं।

यह मंदिर जमुई का गौरव माना जाता है। जुमई रेलवे स्टेशन एवं लखीसराय से मां नेतुला महारानी मंदिर की दूरी करीब तीस किलोमीटर है। मान्यता है कि इस मंदिर में भक्तिभाव से पूजा करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में सालों भर नेत्र रोग से पीड़ित श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मनचाही मुराद पूरी होने के बाद श्रद्धालु सोने या चांदी की आंखें मंदिर में चढ़ाते हैं।

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पौराणिक कथा के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति ने एक यज्ञ किया था लेकिन उन्होंने अपने दामाद भगवान शंकर को नहीं बुलाया। शंकर जी की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती ने जब अपने पिता से इसका कारण पूछा तो उन्होंने शिव जी को अपशब्द कहे। इस अपमान से पीड़ित हुई सती ने अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी।

भगवान शंकर को जब इस बात का पता चला तब उन्होंने भगवती सती के मृत शरीर को लेकर तीनों लोकों में तांडव मचाना शुरू कर दिया था। संपूर्ण सृष्टि भयाकूल हो गयी थी। तभी देवताओं के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित किया था। लोगों का कहना है कि यहां सती की पीठ गिरी थी। लोग यहां मां के पीठ की भी पूजा करते हैं।

नेतुला महारानी मंदिर में हर मंगलवार और शनिवार को विशेष पूजा का इंतजाम किया जाता है। इस दिन भक्तों की काफी भीड़ होती है। यहां पर लोग संतान प्राप्ति के लिए भी मन्नत मांगते हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर में श्रद्धापूर्वक पूजा करने से कई नि:संतान दंपत्तियों को संतान की प्राप्ति हो चुकी है। नवरात्र में नेतुला महारानी मंदिर में मां दुर्गा के नौ अवतारों की पूजा की जाती है।

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बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल से हजारो व्रती पहुंचकर नौ दिन तक मंदिर परिसर में उपवास एवं फलहार पर रहकर माता की पूजा-अर्चना एवं आरती करते हैं। कुमार गांव के ग्रामीण द्वारा साफ-सफाई एवं व्रतियों की सेवा की जाती है।

इस मंदिर का इतिहास 2600 साल पुराना रहा है। जैन धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ कल्पसूत्र के अनुसार, 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर अपने घर का त्याग कर कुंडलपुर से निकले थे, तब प्रथम दिन मां नेतुला मंदिर स्थित वटवृक्ष के नीचे रात्रि विश्राम किया था। इसी स्थान पर भगवान महावीर ने अपना वस्त्र का त्याग कर दिया था। इस मंदिर में हिंदूओं के साथ-साथ मुस्लिम संप्रदाय के लोग भी मन्नत मांगने के लिये आते हैं।

मंदिर की देखरेख के लिए 11 सदस्यीय कमेटी गठित है। यह मंदिर धार्मिक न्यास बोर्ड से भी संबद्ध है। कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष हरदेव सिंह ने बताया कि स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर का रख-रखाव किया जाता है। मंदिर के मुख्य पुजारी विश्वजीत पांडे ने बताया कि नेतुला महारानी मंदिर में प्रत्येक दिन सुबह-शाम मां का श्रृंगार और आरती की जाती है। फूलों से मां का दरवार सजाया जाता है।

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