नींद में सांस रुकना (स्लीप एपनिया)

नींद में सांस रूकना वह मेडिकल स्थिति-दशा है जब सोते हुए कुछ समय के लिये सांस रुक जाती है। आमतौर पर हवा, मुंह और नाक के जरिये फेफड़ों में प्रवाहित होती है, जब सोते समय कुछ क्षण के लिये फेफड़ों में वायु संचार बाधित होता है तो इस पीरियड को एपनिया व इस कंडीशन में सांस रूकने को एपेनिक एपिसोड कहते हैं। यह दशा गले में वायु प्रवाह का स्पेस कम होने से पैदा होती है, इसका पहला लक्षण खर्राटे लेने के रूप में उभरता है और यदि समय से इलाज न कराया जाये तो स्वास्थ्य सम्बन्धी जानलेवा समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं जैसेकि हाइपरटेंशन, हृदय रोग, ब्रेन स्ट्रोक और डॉयबिटीज।

लक्षण-सिंपटम

इस बीमारी में ऑक्सीजन सप्लाई कम होने से दिमाग और दूसरे अंगों पर बुरा असर पड़ता है, जिससे नींद डिस्टर्ब होती है और इससे सुबह उठने पर व्यक्ति सारा दिन तन्द्रा (ड्राउजीनेस) में  रहता है। इससे पीड़ित लोग सिरदर्द (जिसका इलाज मुश्किल है), सुबह उठने पर मुंह और गला सूखना, स्वभाव में चिड़चिड़ापन और विस्मृति जैसे लक्षण महसूस करते हैं। यदि बच्चों में यह बीमारी है तो वे ज्यादा एक्टिव नजर आते हैं। डिप्रेशन के शिकार लोगों में अवसाद (डिप्रेशन)  बढ़ जाता है, स्कूल व नौकरी में खराब प्रदर्शन और पैरो में सूजन (एडिमा) जैसे लक्षण भी उभरते हैं। दिन के समय तन्द्रा में रहने से गाड़ी चलाते समय एक्सीडेंट व इंडस्ट्रियल वातावरण में काम करने वालों को गम्भीर दुर्घटना का डर रहता है।

इसका शरीर पर असर

इसका शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर अलग-अलग तरह से नकारात्मक असर पड़ता है। जैसेकि-

रेसपिरेटरी सिस्टम: इसका पहला  नकारात्मक असर श्वसन तन्त्र पर होता है, इससे अस्थमा तथा सीओपीडी (क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पुलमोनरी डिसीज) के मरीजों की स्थिति ज्यादा खराब हो जाती है।

इंडोक्राइन सिस्टम: स्लीप एपनिया के मरीजों में इंसुलिन प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने से पेनक्रियाज के सेल्स शरीर की जरूरत के मुताबिक इंसुलिन हारमोन नहीं बना पाते और व्यक्ति टाइप-2 डायबिटीज का शिकार हो जाता है। ऐसे मरीजों का ब्लड शुगर लेवल हमेशा बढ़ा रहता है। मेडिकल साइंस के अनुसार स्लीप एपनिया मेटाबोलिक सिंड्रोम से भी एसोसियेट है जिसकी वजह से हृदय सम्बन्धी बीमारियों जैसेकि हाई ब्लड प्रेशर, हाई एलडीएल कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड शुगर के साथ कमर का घेरा भी बढ़ने लगता है।

डाइजेस्टिव सिस्टम: स्लीप एपनिया से पीड़ित ज्यादातर लोग फैटी लीवर रोग से ग्रस्त हो जाते हैं, लीवर एन्जाइम ज्यादा बनने से इन्हें सीने में जलन, खट्टी डकारें तथा गैस्ट्रोसोफेगल रिफलेक्स डिसीज (जीईआरडी) जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिससे नींद ज्यादा डिस्टर्ब होती है।

सर्कुलेटरी एंड कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम: स्लीप एपनिया से मोटपा और ब्लड प्रेशर बढ़ने से हृदय पर स्ट्रेन पड़ता है व दिल की लय असमान्य (एट्रियल फ्रिबिलेशन) हो जाती है, जिससे स्ट्रोक का रिस्क बढता है। यही कारण है कि स्लीप एपनिया के मरीजों में हार्ट फेल होना सबसे आम है।

नर्वस सिस्टम: स्लीप एपनिया का एक प्रकार जिसे सेन्ट्रल स्लीप एपनिया कहते हैं से पीड़ित होने पर दिमाग द्वारा भेजे जाने वाले वे सिगनल जो सांस लेने की प्रक्रिया को सक्रिय करते हैं डिस्टर्ब हो जाते हैं इससे शरीर में सुन्नता और झनझनाहट जैसे न्यूरोलॉजिकल लक्षण उभरते हैं।

रिप्रोडक्टिव सिस्टम: नींद डिस्टर्ब होने से सेक्स की इच्छा घटती है और इससे ईडी अर्थात इरेक्टाइल डिस्फंक्शन जैसी समस्यायें पैदा होती हैं जिनका प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है।

कारण और प्रकार

स्लीप एपनिया के तीन प्रकार है लेकिन इसमें ओएसए अर्थात ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया सबसे आम है। मोटे और अधिक उम्र के लोगों में इससे पीड़ित होने की सम्भावना ज्यादा होती है। इस सम्बन्ध में हुए शोध से पता चला है कि वजन कम करने से इसमें सुधार होता है और पीठ के बल गलत पोस्चर में सोने से यह बढ़ जाता है-

ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया: यह स्लीप एपनिया का सबसे कॉमन टाइप है, इससें श्वसन प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाला गले का वायु मार्ग सकरा होकर अवरूद्ध हो जाता है।

सेन्ट्रल स्लीप एपनिया: इसमें वायु मार्ग में रूकावट नहीं आती लेकिन मस्तिष्क, सांस लेने के लिये श्वसन क्रिया से जुड़ी मांसपेशियों को सिगनल नहीं भेज पाता है।

मिक्सड स्लीप एपनिया: इसमें वायु मार्ग सकरा हो जाता है तथा दिमाग भी सांस लेने के लिये सिगनल भेजना भूल जाता है।

किन्हें होता है इस बीमारी का खतरा?

– बड़े टॉन्सिल और एडेनोइड वाले बच्चों को।

– 17 इंच या इससे अधिक कॉलर साइज वाले पुरुषों को।

– 16 इंच या इससे अधिक कॉलर साइज वाली महिलाओं को।

– बड़ी जीभ वाले व्यक्तियों को क्योंकि इससे वायुमार्ग अवरूद्ध होता है।

– रेट्रोग्नेथिया की कंडीशन में, इसमें निचला जबड़ा, ऊपर वाले जबड़े से छोटा होता है।

– संकीर्ण या सकरा तालू या वायुमार्ग।

– मोटे लोगों को।

यदि व्यक्ति की उम्र 60 वर्ष से ज्यादा है, सोते समय उसे प्रति घंटे 20 या इससे अधिक स्लीप एपनिया एपीसोड आते हैं व ऑक्सीजन लेवल घटकर 78 रह जाता है तो यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है। इससे कार्डियक अरेस्ट या ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। इस सम्बन्ध में हुए एक शोध के मुताबिक हार्ट फेल से मरने वाले 60 प्रतिशत लोग स्लीप एपनिया ग्रस्त होते हैं।

कैसे पता चलता है स्लीप एपनिया का?

स्लीप एपनिया की पुष्टि के लिये डाक्टर मेडिकल हिस्ट्री पता करने के साथ सम्पूर्ण फिजिकल जांच करते हैं। इस सम्बन्ध में दिन में तन्द्रा में रहना और सोते समय खर्राटे लेना इसका सबसे बड़ा सुराग है। फिजिकल जांच के दौरान डाक्टर सिर और गर्दन की जांच करते हैं व नींद की गुणवत्ता पता लगाने के लिये एक प्रश्नावली भी दे सकते हैं।

इस जांच में यदि स्लीप एपनिया की पुष्टि में संदेह है तो पॉलीसोमनोग्राम टेस्ट होता है। इस टेस्ट के लिये पीड़ित को एक रात अस्पताल में रहना पड़ता है। इसके अंतर्गत रात को सोते समय शरीर के अलग-अलग अंगों की गतिविधि मापते हैं, जैसेकि-

– इलेक्ट्रोएन्सेफ्लोग्राम (ईईजी) से मस्तिष्क की तरंगें मापना।

– इलेक्ट्रोऑक्यूलोग्राम (ईओएम) से आंखों की गतिविधि मापना।

– इलेक्ट्रोमोग्राम (ईएमजी) से मांसपेशियों की गतिविधि मापना।

– इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी या ईकेजी) से हृदय गति और लय मापना।

– पल्स ऑक्सीमेट्री टेस्ट से रक्त में ऑक्सीजन के स्तर में बदलाव का पता लगाना।

– आर्टियल ब्लड गैस एनालिसिस (एबीजी) अर्थात धमनी रक्त गैस विश्लेषण। इस टेस्ट से रक्त में ऑक्सीजन कंटेंटस, ऑक्सीजन सैचुरेशन, पार्शियल पेशर ऑफ ऑक्सीजन, पार्शियल प्रेशर ऑफ कार्बन डाइ ऑक्साइड और बाइकार्बोनेट स्तर का पता चलता है।

इलाज

इस बीमारी के इलाज का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नींद के दौरान सांस लेने में प्रयुक्त वायु मार्ग अवरूद्ध न हो।  इसके अंतर्गत सबसे पहले वजन कम करने के लिये दवायें,  भोजन व व्यायाम सम्बन्धित निर्देश दिये जाते हैं जिनका पालन करके पीड़ित कम समय में वजन कम कर सके।

यदि व्यक्ति में ओएसए अर्थात ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया की शुरूआत है तो डाक्टर नेजल डिकन्जेस्टेंट ड्रॉप लिखते हैं। यह खर्राटे कम करने में मदद करता है जिससे व्यक्ति को अच्छी नींद आये।

ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया के इलाज में जब ये तरीके ज्यादा कारगर नहीं होते तो सीपेप (कॉन्टीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर) थेरेपी का इस्तेमाल होता है। यह स्लीप एपनिया के उपचार की पहली प्रभावी पंक्ति है, इसमें पीड़ित को सोते समय फेसमास्क पहनाते हैं जिससे पॉजिटिव वायु प्रवाह उपलब्ध होता है और वायुमार्ग खुला रहता है। इस प्रक्रिया में निचले जबड़े में एक डेंटल डिवाइस भी लगायी जाती हैं।

ओएसए के उपचार में कभी-कभी बाइलेवल पॉजटिव एयरवे प्रेशर (बाइपेप) मशीन का प्रयोग भी होता है। ऐसा उस स्थिति में किया जाता है जब सीपेप (कॉन्टीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर) थेरेपी कारगर  नहीं होती। बाइपेप मशीनों में कई तरह की सेटिंग्स होती हैं जो अपने आप सांस लेने के अनुरूप, वायु प्रेशर एडजस्ट करती हैं।

कुछ लोगों की सोने की पोजीशन ठीक न होने से स्लीप एपनिया की स्थिति ज्यादा बिगड़ जाती है ऐसे में पोजीशनल थेरेपी से पीठ के बल सोने की पोजीशन को ठीक किया जाता है।

जब यह समस्या किसी दवा या थेरेपी से ठीक नहीं होती तो इलाज के अंतिम विकल्प के रूप में सर्जरी की जाती है। इसके अंतर्गत सबसे पहले यूपीपीपी अर्थात युवलॉप्लेटोफेरिन्जोप्लास्टी करते हैं जिसमें गले के पीछे (बैक साइड) से अतिरिक्त टिश्यू (ऊतकों) सर्जरी से निकाल दिये जाते हैं। यह सर्जरी स्लीप एपनिया ठीक करने का सबसे कॉमन तरीका है। इससे खर्राटे दूर करने में मदद मिलती है लेकिन यह सभी के लिये कारगर  हो ऐसा जरूरी नहीं, कुछ लोगों में इससे दूसरे कॉम्प्लीकेशन्स हो जाते हैं।

एक अन्य सर्जिकल मैथड जिसे ट्रैक्सटमी कहते हैं का प्रयोग स्लीप एपनिया ठीक करने के अंतिम उपाय के तौर पर किया जाता है। इसमें गले की रूकावट दूर करने के लिये श्वसन नलिका को बाइपास करके रूकावट हटाते हैं।

बच्चों में स्लीप एपनिया की समस्या अगर बढ़े हुए टॉन्सिल या एडेनोइड्स के कारण है तो 75 प्रतिशत बच्चों को सर्जरी से राहत मिल जाती है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने टॉन्सिल और एडेनोहाइड को सर्जिकल तरीके से हटाने का समर्थन किया है।

घरेलू उपचार

स्लीप एपनिया के नकारात्मक असर को कम करने के लिये सबसे पहले अपने लाइफ स्टाइल में ये बदलाव करें-

आहार-भोजन: रेशेदार आहार जैसे हरी पत्तेदार सब्जियाँ, सलाद और फल तथा साबुत अनाज अधिक मात्रा में लें। कम वसायुक्त डेरी उत्पाद अपनायें व चाय, कॉफ़ी (कैफीनयुक्त उत्पाद), बासी व खमीरी खाने से परहेज करें। शराब, धूम्रपान, मांस व प्रोसेस्ड फूड छोड़ें।

योग और व्यायाम: गले के व्यायाम हवा के मार्ग में स्थित माँसपेशियों को मजबूत बनाकर स्लीप एपनिया की गंभीरता कम करते हैं और उनके सकरे होने की संभावना घटाते हैं-

– दिन में एक बार तीन मिनट के लिए अपनी जीभ को तालू से चिपकाएँ और तालू पर जीभ से दबाव डालें।

– मुँह के भीतर एक तरफ ऊँगली रखें। ऊँगली को गाल के विपरीत रखें और ठीक उसी समय गाल की माँसपेशियों को भीतर खींचें। 10 बार दोहराएँ, विराम लें और फिर दूसरे गाल पर करें। इस पूरी प्रक्रिया को तीन बार करें।

– अपने होंठों को चुम्बन की अवस्था में बंद कर लें। अपने होठों को जोर लगाकर साथ रखें और पहले ऊपर दाहिनी ओर 10 बार ले जाएँ, फिर ऊपर बायीं ओर 10 बार ले जाएँ। यह प्रक्रिया तीन बार करें।

अपने होंठों को गुब्बारे पर रखें। नाक से गहरी साँस लें और मुँह से हवा बाहर निकालते हुए गुब्बारे को जितना हो सके उतना फुलाएँ। गुब्बारे को मुँह से हटाए बिना इसे पाँच बार दोहराएँ।

– एरोबिक गतिविधियाँ (पैदल चलना, तैरना, बाइकिंग), शक्ति प्रशिक्षण (वजन उठाना) और लचीलापन (स्ट्रेचिंग) बढ़ाने वाले व्यायाम उचित वजन बनाए रखने में सहायक होते हैं। मेरू वक्रासन इसमें बहुत लाभदायक है।

इन बातों का विशेष ध्यान रखें-

– रात्रि के भोजन और सोने के बीच कम से कम 2 घंटों का अन्तराल रखें और पेट को हलका रखकर सोएँ।

– नियमित व्यायाम करें।

– निश्चित समय पर सोने का प्रयास करें।

– पीठ के बल ना सोकर करवट के बल सोएँ।

– रात के समय अपने नाक के मार्गों को सलाइन स्प्रे, नाक का मार्ग को फ़ैलाने वाली औषधियां या नेति पात्र के प्रयोग से खुला रखें।

– अपने बिस्तर के सिरे को चार से छः इंच ऊँचा रखें या फोम के टुकड़ों के प्रयोग से अपने कमर के हिस्से को ऊँचा उठा लें। आप गर्दन हेतु विशेष प्रकार के तकिये भी प्रयोग कर सकते हैं ये मेडिकल स्टोर से मिल जाते हैं।

नजरिया

यदि व्यक्ति स्लीप एपनिया पीड़ित है तो उसे जितना जल्द हो सके उपचार कराना चाहिये, इलाज में देरी से होने वाले कॉम्प्लीकेशन्स से मृत्यु का खतरा बढ़ता है। इसके ज्यादातर केसों में दवायें, थेरेपी और लाइफस्टाइल परिवर्तन से राहत मिल जाती है। ब्च्चों में यदि यह समस्या टॉन्सिल बढ़ने के कारण है और डाक्टर सर्जरी से टॉन्सिल रिमूव करने की सलाह दें तो इसमें झिझकें नहीं, केवल इतना ध्यान रखें सर्जरी करने वाला ईएनटी विशेषज्ञ अनुभवी हो। वयस्कों में इस बीमारी का पता चलते ही इलाज जरूरी है, इलाज में देरी से हार्ट की कंडीशन दिनोदिन खराब होती है जिससे स्लीप एपनिया के साथ आर्टियल फिब्रीलेशन का इलाज भी कराना पड़ता है। इसके अलावा इलाज में देरी से टाइप-2 डाइबिटीज होने के चांस सामान्य लोगों की अपेक्षा दोगुने हो जाते हैं।

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