डॉयबिटीज: पते की सच्ची बात

डॉयबिटीज मेलिटस, जिसे आम बोलचाल की भाषा में डॉयबिटीज (मधुमेह) कहते हैं, एक मेटाबॉलिक (चयापचय) रोग है, इससे रक्त में शुगर का स्तर बढ़ने से स्वास्थ्य सम्बन्धी गम्भीर समस्यायें हो जाती हैं। डॉयबिटीज से पेनक्रियाज, इंसुलिन हारमोन बनाना कम कर देता है। इंसुलिन की वजह से शुगर (शर्करा) ब्लड से हमारे शरीर की कोशिकाओं (सेल्स) में स्थानान्तरित होती है जिससे ऊर्जा सेल्स में स्टोर होती है और इनके द्वारा प्रयोग की जाती है। जब रक्त में शुगर का स्तर लम्बे समय तक बढ़ा रहता है तो नसों, आंखों, किडनी और शरीर के अन्य अंगों को नुकसान पहुंचने लगता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के अनुसार दुनिया में छह लोगों में से एक इस बीमारी से ग्रस्त है,  हमारे देश में इस समय करीब 8 करोड़ लोग डॉयबिटीज से पीड़ित हैं।

कितने प्रकार की होती है डॉयबिटीज?

मेडिकल साइंस के अनुसार डॉयबिटीज ये चार टाइप हैं-

टाइप-1 डॉयबिटीज: इसे आटोइम्यून डॉयबिटीज भी कहते हैं, इसमें हमारा इम्यून सिस्टम, पेनक्रियाज सेल्स पर हमला करके उन्हें नष्ट करने लगता है जिससे पेनक्रियाज की इंसुलिन बनाने की क्षमता घटने से रक्त में शुगर की मात्रा बढ़ जाती है। ऐसा क्यों होता है यह अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं है लेकिन डॉयबिटीज के कुल मरीजों में दस प्रतिशत मरीज इसी टाइप की डॉयबिटीज से ग्रस्त होते हैं। हमारे देश में इस टाइप की डॉयबिटीज के करीब दस लाख मामले प्रतिवर्ष सामने आते हैं।

टाइप-2 डॉयबिटीज: इसमें शरीर में इंसुलिन प्रतिरोधकता (रजिस्टेन्स) पैदा होने से रक्त में शुगर की मात्रा बढ़ने लगती है। इसे लाइफ स्टाइल डिसीस कहते हैं। स्वस्थ लाइफ स्टाइल अपनाकर इसे कंट्रोल किया जा सकता है। कुछ मामलों में यह पूरी तरह ठीक भी हो जाती है। अपने देश में प्रतिवर्ष इसके एक करोड़ से ज्यादा मामले सामने आते हैं।

प्रिडॉयबिटीज: इस कंडीशन में रक्त में शुगर की मात्रा सामान्य से ज्यादा रहती है लेकिन इतनी ज्यादा नहीं कि उसे टाइप-2 डॉयबिटीज माना जाये।

जेस्टेशनल डॉयबिटीज: इस टाइप की डॉयबिटीज गर्भावस्था के दौरान होती है ऐसा प्लेसेन्टा (गर्भनाल)  द्वारा इंसुलिन ब्लॉक करने वाले हारमोन्स बनने से होता है।

एक दुलर्भ कंडीशन जिसे डॉयबिटीज इन्सीपिड्स कहा जाता है से लोगों को डॉयबिटीज का भ्रम हो जाता है लेकिन इसका सामान्य डॉयबिटीज अर्थात मघुमेह से कोई लेना-देना नहीं है, यह कंडीशन तब पैदा होती है जब किडनी शरीर से बहुत अधिक मात्रा में फ्लूड (पानी) निकालने लगती है।

क्या लक्षण उभरते हैं डॉयबिटीज में?

डॉयबिटीज होने पर ज्यादा भूख-प्यास लगना, मुंह सूखना, वजन गिरना, बार-बार पेशाब आना, दृष्टि धुंधलाना (ब्लरी विजन), ज्यादा थकान और देर से जख्म भरने जैसे लक्ष्ण पुरूषों और महिलाओं दोनों में उभरते हैं, लेकिन कुछ लक्षण अलग भी होते हैं जैसेकि डॉयबिटीज होने पर पुरूषों की मांसपेशियां कमजोर होने से इनकी स्ट्रेन्थ घटती है और जख्म देर से भरते हैं, इसके अलावा  सेक्स क्षमता में कमी और इरेक्टाइल डिस्फंक्शन (ईडी) जैसी समस्यायें भी हो जाती है।

डॉयबिटीज की शिकार महिलाओं में यूरीनरी ट्रेक्ट इंफेक्शन (यूटीआई), यीस्ट इंफेक्शन (योनि में सफेद क्रीमी पदार्थ का ज्यादा बनना), त्वचा में सूखापन और खुजली जैसे लक्षण उभरते हैं। कुछ महिलाओं में मूड स्विंग भी होते हैं।

जेस्टेशनल डॉयबिटीज में ज्यादातर महिलाओं में कोई लक्षण नहीं उभरता। इसका पता भी रूटीन ब्लड शुगर या ग्लूकोज टॉलरेन्स की जांच से चलता है जोकि प्रेगनेन्सी के 24 वें और 28 वें सप्ताह में किया जाता है। बहुत ही दुर्लभ मामलों में इस टाइप की डॉयबिटीज की शिकार महिलाओं को ज्यादा प्यास या बार-बार पेशाब की शिकायत होती है।

क्या कारण हैं डॉयबिटीज के?

डॉयबिटीज के टाइप के अनुसार इसके कारण अलग-अलग होते हैं। टाइप-1 डॉयबिटीज में इम्यून सिस्टम, पेनक्रियाज के इंसुलिन बनाने वाले बीटा सेल्स को बाहरी समझकर उन्हें नष्ट करने लगता है, ऐसा जीन्स में आयी खराबी से होता है। ऐसा भी पाया गया है कि किसी वायरस की वजह से हमारा इम्यून सिस्टम अपने सेल्स की पहचान नहीं कर पाता है और उन्हें नष्ट करने लगता है।

टाइप-2 डॉयबिटीज में जीन्स के अलावा लाइफ स्टाइल की अहम भूमिका है। इसमें मोटापा सबसे बड़ा फैक्टर है, यदि पेट ज्यादा बड़ा है तो डॉयबिटीज के चांस बढ़ जाते हैं, यदि किसी के माता पिता को टाइप-2 डॉयबिटीज है तो बच्चों में इसका रिस्क बढ़ जाता है।

जेस्टेशनल डॉयबिटीज का मुख्य कारण, प्रेगनेन्सी के दौरान शरीर में आये हारमोनल परिवर्तन है। गर्भावस्था में प्लेसन्टा (गर्भनाल) ऐसे हारमोन्स बनाता है जिससे गर्भवती महिला के सेल्स की इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता घटने से रक्त में शुगर की मात्रा बढ़ जाती है। गर्भावस्था में जिन महिलाओं का वजन ज्यादा बढ़ जाता है उन्हें अक्सर जेस्टेशनल डॉयबिटीज हो जाती है।

डॉयबिटीज पर हुए शोध से पता चला है कि जीन्स के अलावा इन्वॉयरमेन्टल फैक्टर और लाइफस्टाइल (दैनिक क्रिया-कलाप और खानपान) भी डॉयबिटीज को ट्रिगर करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

किन्हें डॉयबिटीज का रिस्क ज्यादा है?

– जिनके माता-पिता या भाई बहन टाइप-1 डॉयबिटीज से पीड़ित हों।

– यदि टाइप-2 डॉयबिटीज की बात करें तो मोटे लोगों को, 45 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को, सुस्त जीवनशैली वाले व्यक्तियों को, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलोस्ट्रॉल व हाई ट्राइगिल्सराइड वाले लोगों को इसका शिकार होने का रिस्क होता है।

– ओवरवेट महिलायें जिनकी उम्र 25 साल से अधिक हो, पॉलीसिस्टिक ओवरी सिन्ड्रोम से पीड़ित हों, परिवार में किसी को टाइप-2 डॉयबिटीज हो या गर्भ में पल रहे बच्चे का वजन 9 पाउंड से अधिक हो तो इन्हें जेस्टेशनल डॉयबिटीज का रिस्क होता है।

क्या जटिलताएं हो सकती हैं?

रक्त में शुगर की ज्यादा मात्रा शरीर के टिश्यू (ऊतकों) और अंगों को डैमेज करती है, जिससे हार्ट डिसीस, हार्ट अटैक, स्ट्रोक, न्यूरोपैथी, रेटिनोपैथी, विजन लॉस (दृष्टि खराब होना), सुनने में दिक्कत, पैरों में जख्म, त्वचा में बैक्टीरियल और फंगल संक्रमण, डिमेन्सिया और डिप्रेशन जैसे कॉम्प्लीकेशन्स हो सकते हैं।

अनियन्त्रित जेस्टेशनल डॉयबिटीज से प्रि-मैच्योर डिलीवरी, बच्चे का ज्यादा वजन, डिलीवरी के बाद टाइप-2 डॉयबिटीज का रिस्क, ब्लड शुगर लो होना, जॉन्डिस (पीलिया) और स्टिलबर्थ (मृत शिशु) जैसे कॉम्प्लीकेशन हो सकते हैं। कुछ महिलायें तो हाई ब्लड प्रेशर (प्रिक्लम्पशिया) का शिकार हो जाती हैं। इस कंडीशन में ज्यादातर सी-सेक्शन या सीजेरियन की जरूरत पड़ती है।

कैसे पुष्टि होती है डॉयबिटीज की?

व्यक्ति डॉयबिटीज से पीड़ित है या नहीं इसकी पुष्टि के लिये ब्लड टेस्ट किया जाता है। इससे तीन तरह से ब्लड में शुगर का स्तर जांचते हैं-

फास्टिंग ब्लड शुगर: इसमें कम से कम 8-12 घंटे की फास्टिंग जरूरी है। फास्टिंग ब्लड शुगर लेवल 100 एमजी/डेसीलीटर या इससे कम होना चाहिये। यदि फास्टिंग ब्लड शुगर लेवल 101 से 125 एमजी/डेसीलीटर के बीच है तो इसे प्रि-डॉयबिटिक मानते हैं। यदि यह 125 एमजी/डेसीलीटर या इससे ज्यादा है तो व्यक्ति को डॉयबिटीज है।

रैंडम ब्लड शुगर: स्वस्थ व्यक्ति का रैंडम शुगर लेवल 140 एमजी/डेसीलीटर से कम होना चाहिये। भोजन करने के दो घंटे पश्चात यदि शुगर का स्तर 200 एमजी/डेसीलीटर से अधिक है तो इसका अर्थ है कि व्यक्ति डॉयबिटीज से पीड़ित है। 140 से 199 एमजी/डेसीलीटर के बीच की रीडिंग व्यक्ति के प्रि-डॉयबिटिक होने का संकेत हैं।

एचबीए1सी (ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन) टेस्ट: इसे संक्षेप में ए1सी टेस्ट कहते हैं। रक्त में मौजूद हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणिकाओं में पाया जाने वाला एक प्रोटीन है जिससे रक्त का रंग लाल रहता  है। इसका काम सम्पूर्ण शरीर में ऑक्सीजन आपूर्ति करना है। जब रक्त में शुगर की मात्रा बढ़ती है तो शुगर (ग्लूकोज) लाल रक्त कणिकाओं में जमने लगती है, इस टेस्ट से पता चलता है कि हीमोग्लोबिन में कितनी शुगर जमा हो चुकी है। चूंकि लाल रक्त कणिकाओं का जीवन करीब तीन महीने होता है, इसी वजह से इस टेस्ट से रक्त में पिछले तीन महीने की औसत शुगर का पता चल जाता है। यदि टेस्ट की रीडिंग 4 से 5.7 के बीच है तो व्यक्ति को शुगर नही है। यदि यह 5.7 से 6.4 के बीच है तो वह प्रि-डॉयब्टिक है,  यदि यह रीडिंग 6.4 से ज्यादा है तो व्यक्ति डॉयबिटीज का शिकार है।

डॉयबिटीज का मेडिकल ईलाज

टाइप-1 डॉयबिटीज का इलाज इंसुलिन से होता है। इसमें एक विशेष इंजेक्शन के जरिये खाने से कुछ मिनट पहले शरीर में इंसुलिन हारमोन इंजेक्ट करते हैं। यह इंसुलिन चार तरह की होती है-

रैपिड एक्टिंग इंसुलिन: यह शरीर में इंजेक्ट होने के 15 मिनट के अंदर काम करना शुरू कर देती है, इसका असर 3 से 4 घंटे रहता है।

शार्ट एक्टिंग इंसुलिन: यह शरीर में इंजेक्ट होने के 30 मिनट के अंदर काम करना शुरू कर देती है, इसका असर 6 से 8 घंटे रहता है।

इंटरमीडियेट एक्टिंग इंसुलिन: यह इंसुलिन शरीर में इंजेक्ट होने के 1 से दो घंटे के अंदर काम करना शुरू कर देती है, इसका असर 12 से 18  घंटे रहता है।

लांग एक्टिंग इंसुलिन: यह इंसुलिन शरीर में इंजेक्ट होने के कुछ घंटे के अंदर काम करना शुरू कर देती है, इसका असर 24 घंटे या इससे अधिक समय तक रहता है।

टाइप-2 डॉयबिटीज ट्रीटमेंट

शुरूआत में खानपान और व्यायाम से टाइप-2 डॉयबिटीज मैनेज करते हैं, यदि इससे शुगर कंट्रोल न हो तो डॉक्टर ये दवायें लिखते हैं-

अल्फाग्लूकोसाइडेस इन्हिबिटर्स: ये शरीर की शुगर और स्टार्च पचाने की क्षमता धीमी करती हैं। इस वर्ग में एसारबोस (प्रिकोज) और मिग्लीटोल (ग्लाइसेट) जैसी दवायें आती हैं।

बिग्वनाइड्स: ये लीवर की ग्लूकोज उत्पादन क्षमता घटाती हैं। इसके अंतर्गत आने वाली एक प्रमुख दवा है मेल्टफारमिन (ग्लूकोफेज)।

डीपीपी-4 इन्हिब्टर्स: ये रक्त में शुगर की मात्रा घटाये बिना ही इसे ठीक करती हैं। इनके अंतर्गत लिंगालिप्टिन (ट्रेजेन्टा), साक्साग्लिम्पटिन (ऑन्गिल्यजा) और सिटाग्लिपटिन जैसी दवायें आती हैं।

ग्लूकोनलाइक पेप्टीड्स: ये शरीर की इन्सुलिन बनाने की प्रक्रिया को परिवर्तित करती हैं जिससे वह ज्यादा प्रभावी ढंग से काम करे। इसके तहत ड्यूलाग्लूटाइड (ट्रयूलीसिटी), एक्सेटाइड (बियेटा) और लीराग्लूटाइड (विक्टोजा) जैसी दवायें आती हैं।

मेग्लीटिनाइड्स: ये पेनक्रियाज को ज्यादा इंसुलिन रिलीज करने के लिये प्रेरित करती है। इस वर्ग में नेटग्लेनाइड (स्टारलिक्स) और रेपागिल्नाइड जैसी दवायें आती हैं।

एसजीएलटी-2 इन्हिबटर्स: ये रक्त में मौजूद ग्लूकोज को मूत्र के जरिये शरीर से बाहर निकालती हैं। इनके अंतर्गत कैनाग्लिफ्लोजिन  (इन्वोकाना) और डेपाग्लीफ्लोजिन (फरिक्सगा) जैसी दवायें आती हैं।

सल्फोनील्यूरियस: इस टाइप की दवायें पेनक्रियाज को अधिक मात्रा में इन्सुलिन रिलीज करने के लिये प्रेरित करती हैं। इसके अंतर्गत ग्लाइबपाइड्स (डाइबीटा, ग्लाइनेस), ग्लिपजाइड (ग्लूकोट्रॉल) और ग्लिमप्राइड (एमारिल) जैसी दवायें आती हैं।

थियाजोलिडिनेडियोन: ये इंसुलिन की कार्य क्षमता बढ़ाती हैं। इसके अंतर्गत पियोग्लिटाजोन (एक्टॉस) और रोसीग्लिटाजोन (एवान्डिया) नामक दवायें आती हैं।

यह जरूरी नहीं है कि केवल एक दवा से ही टाइप-2 डॉयबिटीज मैनेज हो जाये, कई बार एक से ज्यादा दवाओं का कॉम्बीनेशन प्रयोग किया जाता है और जब यह भी कारगर नहीं होता तो इंसुलिन लेनी पड़ती है।

जेस्टेशनल डॉयबिटीज मैनेज करने के लिये प्रेगनेन्सी के दौरान शुगर लेवल नियमित मॉनीटर करना पड़ता है। कई बार तो दिन में दो बार शुगर चैक करने की जरूरत पड़ती है। यदि शुगर ज्यादा आ रही है तो खानपान बदलकर और हल्के व्यायाम (जैसेकि टहलना इत्यादि) से इसे मैनेज करें। जब शुगर इससे मैनेज नहीं होती है इंसुलिन दी जाती है। इंसुलिन गर्भ में पल रहे बच्चे के लिये पूरी तरह से सुरक्षित है ऐसा म्यो क्लीनिक, अमेरिका में हुए एक शोध में सामने आया है।

डॉयबिटीज में खानपान

शुगर के मरीजों को भोजन सोच समझकर करना चाहिए अन्यथा शुगर हाई होने से जानलेवा कंडीशन पैदा हो सकती है। ऐसे में भोजन से सम्बन्धित इन बातों का विशेष ध्यान रखें-

डायबिटीज के मरीजों को देर तक भूखा नहीं रहना चाहिए। इससे शरीर में ब्लड शुगर लेवल लो हो जायेगा। कभी भी अपना नाश्ता स्किप न करें, नाश्ते में हेल्‍दी चीजों का सेवन करें। इससे शरीर को पर्याप्त एनर्जी मिलती है। हार्ड बॉइल्ड अंडा हाई प्रोटीन युक्त होता है और ये ब्लड शुगर का स्तर बढ़ाए बिना शरीर में ग्लूकोज के अवशोषण को कम करता है। ये डायबिटीज के मरीजों के लिए काफी अच्छा नाश्ता है, दो अंडों के साथ में मल्टीग्रेन ब्रेड ले सकते हैं ताकि कई घंटों के लिए पेट भरा रहे।

डॉयबिटीज के मरीजों को शुगर नियंत्रित रखने के लिए लो GI (ग्लाइसेमिक इंडेक्स) डाइट फॉलो करनी चाहिये। ऐसी डाइट का ग्लाइसमिक इंडेक्स 17 से 19 के बीच में हो। चावल में स्टार्च और शुगर ज्यादा होने से इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स ज्यादा होता है जिसके चलते इसे डायबिटीज में खाने से मना किया गया है ऐसे में विकल्प के रूप में ब्राउन राइस खायें। आलू का ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) 20 यानि कि दूसरे कार्बोहाइड्रेट्स की तुलना में मीडियम से हाई होता है। इसलिये आलू खाने से परहेज करें।

विशेषज्ञों की मानें तो प्राकृतिक वसा से भरपूर फूड्स जैसे – घी, बादाम, दही, अंडे आदि डायबिटीज के रोगियों के लिए बेहतर हैं। ये आसानी से पच जाते हैं। सुबह या फिर दोपहर के समय एक कटोरी लो फैट दही खाएं। इसमें प्रोटीन, कैल्‍शियम और अन्‍य पौष्‍टिक तत्‍व पाए जाते हैं। इसे खाने से शुगर लेवल तुरंत नहीं बढ़ता है। बादाम खाने से टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों में ग्लूकोज कंट्रोल में और लिपिड प्रोफाइल ठीक रहता है।

फलों में अमरूद, सेब, नाशपाती, जामुन को प्राथमिकता दें। मधुमेह के रोगियों के लिए गाजर का इस्तेमाल फायदेमंद है, क्योंकि गाजर की शुगर आसानी से पच जाती है।

कुछ फलों में शर्करा की उच्च मात्रा होने के कारण इन फलों को डायबिटीज के रोगियों को नहीं खाना चाहिए। जैसे- अंगूर, चेरी, अनानास, केला, आम, सूखे मेवे और मीठे फलों का जूस भी नहीं लेना चाहिए।

सूखे मेवों का अधिक सेवन न करें। खासकर किशमिश या बाजार में उपलब्ध शुगर या चॉकलेट युक्त सूखे मेवों का। कुछ लोगों को भ्रम है कि चीनी के स्थान पर गुड़ का सेवन किया जा सकता है लेकिन यह गलत है, डॉयबिटीज होने पर गुड़ से भी उतना ही नुकसान करता है जितना चीनी से।

मीठे फलों के जूस का सेवन तब तक न करें जब तक शरीर में हाइपरग्लाइसीमिया की स्थिति न हो। डायबिटीज के रोगी को जूस नहीं लेना चाहिए। जूस की जगह फलों का सेवन करें।

डायबिटीज के रोगी का आहार ज्यादा फाइबर युक्त होना चाहिए जैसे- छिलके सहित पूरी तरह से बनी हुई गेहूँ की रोटी, जई (oats) आदि। गेहूँ और जौ 2-2 किलो की मात्रा में लेकर एक किलो चने के साथ पीस लें। रोटी बनाने के लिए इस चोकर सहित आटे का प्रयोग करें। 25 ग्राम अलसी को पीसकर आँटे में गूथकर रोटी बनाएँ। अलसी रक्त शर्करा को नियंत्रित करने में मदद करती है।

सब्जियों में करेला, मेथी, सहजन, पालक, तुरई, शलगम, बैंगन, टिंडा, चौलाई, परवल, लौकी, मूली, फूलगोभी, ब्रोकली, टमाटर, बंदगोभी, सोयाबीन की बड़ी, काला चना, बीन्स, शिमला मिर्च, हरी पत्तेदार सब्जियाँ आहार में शामिल करें। कमजोरी दूर करने के लिए कच्चा नारियल, अखरोट, मूंगफली के दाने, काजू, इसबगोल, सोयाबीन, दही और छाछ आदि का सेवन करें।

यदि आप मधुमेह के मरीज हैं तो थोड़े-थोड़े अंतराल में भोजन करें, क्योंकि एक साथ बहुत सारा खाना खाने से रक्त में शुगर का स्तर तेजी से बढ़ता है। दिनभर के भोजन को पाँच हिस्सों में बाँट लें तथा हर बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में खाएँ।

डॉयबिटीज में पेय पदार्थ

दूध डायबिटीज के मरीजों के लिए लाभदायक है। एक शोध में पता चला है कि कम फैट के डेयरी प्रोडक्ट्स का सेवन करने से डायबिटीज और ब्लड प्रेशर में कमी आती है।

ग्रीन टी डायबिटीज के लिए लाभकारी पेय है। इसमें कार्बोहाइड्रेट और कैलोरी की मात्रा कम होती है व भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो किसी भी तरह के संक्रमण से बचाते हैं। एक शोध से पता चला है कॉफी का सीमित मात्रा में सेवन टाइप 2 डायबिटीज का रिस्क घटाता है लेकिन कॉफी का ज्यादा सेवन रक्त में शुगर का लेवल बढ़ा भी सकता है। कॉफी में कॉलेर्गेनिक नाम का एक एसिड पाया जाता है। यह एसिड, ग्लूकोज को खून में मिलने से रोकता है।

करेले का जूस डायबिटीज के दोनों प्रकारों के लिए लाभदायक है। यह ना केवल ग्लूकोज कंट्रोल करता है बल्कि पेट की कई बीमारियों में भी लाभदायक है।

खीरे में भरपूर मात्रा में कैल्शियम, आयरन, फास्फोरस, विटामिन ए, बी1, विटामिन सी और एमिनो एसिड पाया जाता है। खीरे का जूस खून में शुगर, संक्रमण और शरीर की सूजन कम करता है।

नारियल पानी में भरपूर मात्रा में विटामिन, मिनरल्स, एमिनो एसिड, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, विटामिन सी, सोडियम और मैग्नीज जैसे खनिज तत्व पाए जाते हैं जो रक्त में शुगर लेवल कम करने में बहुत प्रभावी हैं।

डायबिटीज और जीवन शैली

डायबिटीज के मरीजों को खानपान के साथ-साथ जीवनशैली पर विशेष ध्यान देना चाहिए। खराब जीवनशैली अपनाने से शुगर की समस्या और बढ़ जाती है। इसलिये अपनी जीवनशैली में इन्हें शामिल करें-

– रोजाना सुबह 45 मिनट ज़रूर टहलें।

– प्रतिदिन सुबह और शाम को कुछ देर व्यायाम करें।

– प्रतिदिन योग एवं प्राणायाम करें।

– तनावमुक्त जीवन जियें।

– शराब और धूम्रपान से परहेज करें।

नजरिया

यदि व्यक्ति डॉयबिटीज टाइप 2 का शिकार है तो घबराने की जरूरत नहीं, यह लाइफस्टाइल डिसीस है और शुरूआत में खानपान तथा जीवनशैली बदलने से इस पर काबू पाया जा सकता है। डॉयबिटीज टाइप 1 के मामले में आप कुछ नहीं कर सकते सिवाय इंसुलिन लेने और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के। डॉयबटीज टाइप 2 के मामले में यदि डाक्टर इंसुलिन लेने के लिये कहे तो परेशान न हों, क्योंकि बीमारी की शुरूआत में इंसुलिन लेने से इसके पूरी तरह ठीक होने की सम्भावना अधिक होती है। ऐसे ज्यादातर मामलों में छह महीने के अंदर डॉयबिटीज से पूरी तरह छुटकारा मिल जाता है लेकिन लाइफस्टाइल हेल्दी ही रखना पड़ेगा। यदि आप डॉयबिटिक हैं और दवायें ले रहे हैं तो शराब पीते समय सावधानी बरतें। शराब पीने से पहले ब्लड शुगर लेवल जांच लें। भूलकर भी बियर न पियें। बीमारी के प्रति सकारात्मक नजरिया अपनायें क्योंकि लाइफस्टाइल ठीक करने से डॉयबिटीज तो काबू में रहेगी ही, दूसरी लाइफस्टाइल बीमारियां भी नहीं होंगी।

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