तम्बाकू (निकोटीन) की लत सबसे हानिकारक

अपने देश में तम्बाकू को कम व शराब को ज्यादा खराब मानते हैं, सिगरेट व सिगार पीना स्टाइल स्टेटमेंट, गुटखा खाना नबाबी (रईसी) शौक लेकिन शराब पीना चरित्रहीनता है। शादी तय करते समय अक्सर पूछा जाता है कि लड़का पीता तो नहीं है। यदि शराब और तम्बाकू की तुलना सेहत को हानि पहुंचाने के दृष्टिकोण से की जाये तो तम्बाकू ज्यादा हानिकारक है। तम्बाकू सेवन (बीड़ी, सिगरेट, सिगार या गुटखे के रूप में) करने वाला घर, ऑफिस, वर्क प्लेस या किसी भी समारोह में कभी भी तम्बाकू सेवन करने लगता है और उसे टोका तक नहीं जाता, मगर दिन में ऑफिस, वर्कप्लेस या समारोहों में शराब पीने वालों को देखकर ज्यादातर लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। हमारे देश में अधिकतर लोग रात्रि के भोजन से पहले शराब पीते हैं, जबकि तम्बाकू सेवन करने वालों को ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर सभी के बाद तम्बाकू चाहिये और बहुतों को तो पानी पीने के बाद भी। कुछ का तो बिना तम्बाकू सुबह पेट ही साफ नहीं होता।

बीड़ी, सिगरेट, सिगार, पाइप से तम्बाकू सेवन करने वाले अपने आस-पास के वातावरण के साथ वहां मौजूद लोगों के फेफड़े भी धुऐं से खराब करते हैं जबकि शराब, केवल पीने वाले का ही (शारीरिक, आर्थिक और सामाजिक) नुकसान करती है। चबाकर तम्बाकू सेवन करने वाले बार-बार थूकते हैं जिससे टीबी और कोरोना जैसी संक्रामक बीमारियां फैलती हैं। यहां ये पंक्तियां लिखने का उद्देश्य शराब को तम्बाकू से बेहतर बताना नहीं बल्कि यह स्पष्ट करना है कि तम्बाकू सेवन, शराब से ज्यादा खतरनाक है इसलिये इसे हल्के में न लें और शराब की तरह से इसका भी प्रतिकार करें। शराब की भांति तम्बाकू का नशा भी व्यसनी (एडिक्टिव) होता है अर्थात दो-चार बार के सेवन से लत लग जाती है।

कौन-कौन सी बीमारियां हो सकती हैं?

तम्बाकू के किसी भी रूप में सेवन से टीबी, इम्फसीमा, मुंह, गले और फेफड़ों का कैंसर, ल्यूकेमिया, हार्ट डिसीज, ब्रेन स्ट्रोक, डायबिटीज, क्रोनिक ब्रोन्काइटिस, आंखो के रोग, नंपुसकता, इनफर्टिलिटी, पेप्टिक अल्सर, गर्भधारण करने में दिक्कत, गर्भपात, कोल्ड-फ्लू, श्वसन-तन्त्र में संक्रमण (रिसापाइटरी इंफेक्शन), टेस्ट और स्मेल में कमी, समय से पहले बुढ़ापा और ऑस्टियोपोराइसिस जैसी बीमारियों का रिस्क बढ़ जाता है। वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन के अनुसार दुनियाभर में प्रतिवर्ष तम्बाकू सेवन से करीब 60 लाख लोगों की मृत्यु होती है।

क्यों लगती है तम्बाकू की लत?

तम्बाकू में मौजूद निकोटीन नामक रसायन, नशे और लत के लिये जिम्मेदार है। जब निकोटीन धुएं के रूप में फेफड़ों में या चबाने पर आंतों में पहुंचता है तो यह ब्लडस्ट्रीम (रक्तप्रवाह) में मिल जाता है इससे शरीर की एड्रेनिल ग्रन्थि, न्यूरोट्रांसमीटर के रूप में काम करने वाले हारमोन एड्रेनालाइन (एपिनेफ्रीन) को अधिक मात्रा में रिलीज करती है जिससे व्यक्ति को जोश व उत्तेजना (थ्रिल) महसूस होती है, इसके साथ ही निकोटीन से शरीर में डोपामाइन हारमोन का स्तर बढ़ने से प्रसन्नता महसूस होती है क्योंकि डोपामाइन, दिमाग के खुश रहने से जुड़े क्षेत्र को उत्तेजित कर देता है। (मेडिकल साइंस में डोपामाइन को हैपी हारमोन कहते हैं।) तम्बाकू सेवन से व्यक्ति को वही खुशी महसूस होती है जो  किसी उपलब्धि, धन या इनाम मिलने पर होती है, इसलिये ऐसी खुशी की अभिलाषा में बार-बार तम्बाकू सेवन करने से इसकी लत लग जाती है। लत लगने पर तम्बाकू, सेवन करने वाले की शारीरिक और मनोवैज्ञानिक जरूरत बन जाती है और वह चाहकर भी इसे नहीं छोड़ पाता।

लत के लक्षण

तम्बाकू की लत को अन्य व्यसनों की तुलना में छिपाना ज्यादा कठिन है। यह आसानी से सुलभ है और सार्वजनिक रूप से इसका सेवन किया जाता है। इसकी लत लगने पर ये लक्षण उभरते हैं-

  1. छोड़ने के प्रयास करने के बाबजूद ऐसा न कर पाना।
  2. छोड़ने पर हाथों में झनझनाहट, पसीना आना, चिड़चिड़ापन व हृदय की गति बढ़ना।
  3. खाना खाने के बाद तम्बाकू चबाने या सिगरेट की हुड़क उठना।
  4. किसी भी काम को करने से पहले या बाद तम्बाकू का अनिवार्य रूप से सेवन।
  5. सिनेमा देखने के बाद या किताब पड़ते समय तम्बाकू सेवन।
  6. तनाव के समय सामान्य होने के लिये तम्बाकू सेवन।
  7. उन जगहों पर जाने से बचना जहां तम्बाकू सेवन की मनाही हो।
  8. सेहत से जुड़ी समस्याओं के बाद भी धूम्रपान जारी रखना।

तम्बाकू और फेफड़ों का कैंसर

जब व्यक्ति स्मोकिंग करता है तो उसके शरीर में हजारों की संख्या में कैमिकल रिलीज होते हैं जो न केवल फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं बल्कि हृदय और शरीर के अन्य अंगों को भी डैमेज करते हैं। फेफड़े जैसे अंग में तो खुद को ठीक करने की क्षमता होती है लेकिन लगातार स्मोकिंग से यह क्षमता घटने के कारण फेफड़े, कैंसर का शिकार हो जाते हैं। हमारे देश में प्रतिवर्ष इसके 12 लाख से ज्यादा मामले दर्ज होते हैं। वैसे तो लंग कैंसर किसी को भी हो सकता है लेकिन इसके 90 प्रतिशत मरीजों में यह धूम्रपान (स्मोकिंग) से होता है। जिस क्षण व्यक्ति धूम्रपान करता है उसी क्षण से लंग्स (फेफड़ों) के टिश्यू डैमेज होने शुरू हो जाते हैं, शरीर की अपने आप रिपेयर करने की क्षमता के कारण लंग्स ऐसे डैमेज से खुद को कुछ समय में रिपेयर कर लेते हैं लेकिन लगातार स्मोकिंग से लंग्स की खुद को रिपेयर करने की क्षमता घटने से डैमेज सेल्स पूरी तरह से रिपेयर नहीं हो पाने के कारण असामान्य व्यवहार करने लगते हैं जिससे लंग कैंसर की सम्भावना बढ़ती है। स्मॉल सेल लंग कैंसर (फेफड़ों के कैंसर का सबसे कॉमन टाइप) 99 प्रतिशत तक स्मोकिंग से होता है। जब व्यक्ति स्मोकिंग बंद कर देता है तो कैंसर होने का रिस्क घट जाता है। सीडीसी (सेन्टरर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रवेन्शन) के अनुसार सिगरेट पीने वालों को कैंसर होने का रिस्क अन्य लोगों की तुलना में 30 गुना अधिक होता है। जितने लम्बे समय तक व्यक्ति स्मोकिंग करता है यह रिस्क उतना ज्यादा हो जाता है। स्मोकिंग से होने वाले नुकसान के सम्बन्ध में हुए एक शोध के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति धूम्रपान करने वाले व्यक्ति से छोड़ा गया धुआं इन्हेल (ग्रहण) करता है तो उसके लिये भी लंग कैंसर का रिस्क बढ़ जाता है। मेडिकल भाषा में इसे सेकेंडहैंड स्मोक कहते हैं। सेकेंड हैंड स्मोक से अस्थमा, कानों में संक्रमण और छोटे बच्चों की मृत्यु दर बढ़ जाती है। हमारे देश सन् 2018 में 36000 ऐसे लोगों की लंग कैंसर से मृत्यु हुई जिन्होने कभी भी धूम्रपान नहीं किया था लेकिन वे धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के सम्पर्क में रहे।

कैसे छोड़ें ये लत?

आज के समय में तम्बाकू की लत छुड़ाने के कई तरीके उपलब्ध हैं, यदि व्यक्ति में दृढ़ इच्छा शक्ति है तो वह ट्रीटमेंट के इन तरीकों से यह लत छोड़ सकता है-

एनआरटी पैच: मेडिकल साइंस में इसे निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी कहते हैं और ये मेडकिल स्टोर पर आसानी से मिलते हैं। आकार में छोटे ये पैच शरीर में बाजू या पीठ पर स्टिकर की तरह से चिपकाकर प्रयोग किये जाते हैं। इन पैचों में अल्प मात्रा में निकाटीन होती है जो हमारी त्वचा में मौजूद छिद्रों से शरीर में जाती रहती है और व्यक्ति को इसकी तलब लगनी धीरे-धीरे कम हो जाती है। कुछ लोगों को एनआरटी के साइड इफेक्ट  सिर चकराने, अनिद्रा, जी मिचलाना और सिरदर्द के रूप में महसूस हो सकते हैं लेकिन इससे घबराने की जरूरत नहीं है ऐसे में दिन में तीन से चार लीटर पानी पियें।

निकोटीन च्युइंगम: यह भी एक निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी है, इसे मुंह में डालकर चबाते रहते हैं जिससे तम्बाकू की तलब धीरे-धीरे घट जाती है। इसमें अल्प मात्रा में निकाटीन होती है, यह स्मोकिंग और तम्बाकू चबाने वाले लोगों के लिये बराबर कारगर है। जब तम्बाकू की लत के शिकार लोग यह लत छोड़ने की कोशिश करते हैं तो उन्हें मुंह में कुछ डालकर चबाने की इच्छा होती है। इस च्युइंगम को चबाने से जहां यह इच्छा पूरी हो जाती है वहीं इससे ज्यादा मात्रा में निकोटीन लेने की आदत भी छूटने लगती है।

स्प्रे और इन्हेलर: निकोटीन स्प्रे और इन्हेलर, तम्बाकू के से सेवन के बिना ही अल्प मात्रा में निकोटीन की खुराक उपलब्ध कराते हैं जिससे इसकी तलब धीरे-धीरे घटने लगती है।

मेडीकेशन: तम्बाकू की लत छुड़ाने के लिये दवाओं के रूप में एंटीडिप्रेसेन्ट्स और ऐसी दवाओं का प्रयोग किया जाता है जो तम्बाकू की क्रेविंग (खाने की जोरदार इच्छा) कम करती हैं। इस सम्बन्ध में जिस मेडीकेशन का प्रयोग सबसे ज्यादा होता है उसका नाम वेरेन्सिलीन या चैन्टिक्स है। कुछ डॉक्टर बपरोप्योन या वेलबुटरिन नामक दवा भी प्रिस्क्राइब करते हैं। यह डिप्रेशन की दवा है और इससे धूम्रपान की इच्छा घट जाती है। मेडिकल साइस में इसे ऑफ लेवल ड्रग कहते हैं।

मनोवैज्ञानिक और बिहैवियरल ट्रीटमेंट: तम्बाकू की लत छुड़ाने के लिये हाइप्नोथेरेपी, कॉग्नेटिव बिहैवियरल थेरेपी और न्यूरोलिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग का प्रयोग किया जाता है। इसमें व्यक्ति के धूम्रपान  सम्बन्धी विचारों और भावनाओं को बदलने का प्रयास होता है। इन थेरेपी के सम्बन्ध में यह बात हमेशा याद रखें कि यह जरूरी नहीं है कि यदि यह एक व्यक्ति पर कारगर है तो दूसरे पर भी उतनी ही कारगर होगी। इस सम्बन्ध में डाक्टर कई बार थेरेपी के साथ दवायें भी प्रयोग करते हैं। यदि किसी पर इसका ज्यादा असर नहीं हो रहा है तो उसे डाक्टर से खुलकर बात करनी चाहिये।

लाइफ स्टाइल में बदलाव: लाइफ स्टाइल में परिवर्तन करके इस लत से छुटकारा पा सकते हैं। इसके लिये नियमित व्यायाम के साथ ऐसे स्नेक्स का सेवन जरूरी है जो आपके मुंह और हाथों को व्यस्त रखें। हमेशा पोषक तत्वों से भरपूर खाना खायें और धीरे-धीरे इसका सेवन कम करें। उदाहरण के लिये यदि व्यक्ति दिन में छह सिगरेट पीता है या तम्बाकू वाला गुटका खाता है तो इनकी संख्या प्रति सप्ताह एक-एक करके घटायें। ब्लड प्रेशर जैसी बीमारी में तम्बाकू छोड़ते ही सुधार होने लगता है। उदाहरण के लिये यदि स्मोकिंग के कारण व्यक्ति हाई ब्लड प्रेशर अर्थात हाइपरटेंशन का शिकार है यदि वह केवल एक दिन सिगरेट न पीये तो उसका ब्लड प्रेशर सामान्य होने लगेगा।

निकोटीन विड्रॉल सिम्पटम

बहुत से लोगों में तम्बाकू का सेवन अचानक बंद कर देने पर अजीबोगरीब लक्षण उभरते हैं जिन्हें मेडिकल साइंस में विड्राल सिम्पटम कहते हैं। जब व्यक्ति तम्बाकू सेवन करता है (किसी भी रूप में) तो हमारा दिमाग पर इस तरह से प्रभावित होता है-

– मूड बूस्ट होने से डिप्रेशन घटता है और खुशी महसूस होने से चिड़चिड़ापन कम।

– शार्ट-टर्म मेमोरी और ध्यान-केन्द्रित करने की क्षमता में बढ़ोत्तरी।

– दिमाग में भलाई की भावना जाग्रत होना।

– भूख कम लगना।

जब व्यक्ति की मनोदशा इस तरह की हो और ऐसे में अचानक तम्बाकू सेवन बंद कर दिया जाये तो  ये विड्रॉल सिम्पटम उभरते हैं-

– तम्बाकू सेवन की हुड़क अर्थात निकोटीन क्रेविंग।

– हाथ-पैरों में झनझनाहट और शरीर में सूजन।

– पसीना और मतली आना।

– कब्ज गैस और सिरदर्द

– खांसना और गले में खराश।

– अनिद्रा और ध्यान केन्द्रित करने में परेशानी।

– चिंता, चिड़चिड़ापन,डिप्रेशन, उदासी और बेचैनी।

– धीमी हृदय गति और वजन बढ़ना।

निकोटीन विड्रॉल सिम्पटम आमतौर पर दो या तीन दिन तक रहते हैं। ऐसा दिमाग में मौजूद निकोटीन रिसेप्टर्स के कारण होता है यदि आप इन लक्षणों को अनदेखा कर दें तो ये लक्षण दो से चार सप्ताह में अपने आप दूर हो जाते हैं।

आउटलुक

तम्बाकू की लत को स्व-नियन्त्रण और सही इलाज से छोड़ा जा सकता है यदि व्यक्ति की इच्छाशक्ति मजबूत नहीं है तो उसे इससे जीवन भर जूझना होगा जिसका परिणाम घातक बीमारियों के रूप में सामने आता है। इस लत की वास्तविकता यह है कि लम्बे समय के उपचार और बिहैवियरल थेरेपी से इसे छोड़ने के बाद भी सावधान रहना है। विचारों में आया मामूली परिवर्तन फिर से इसकी ओर अग्रसर करता है। इस सम्बन्ध में हुए शोध से पता चला है कि ऐसे लोग जो यह लत छोड़ना चाहते हैं उन्हें अपना व्यवहार सकारात्मक करने के साथ ऐसे यार दोस्तों को छोड़ना होगा जो इसके आदी है। इसके अलावा जब तम्बाकू खाने की हुड़क उठे तो परिवार के किसी सदस्य से बात करने लगें या उठकर टहलने चले जायें।

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