प्राचीन समय में एक हजार से अधिक भारतीय विद्वानों ने चीन की यात्रा की

बीजिंग। भाजपा सांसद तरुण विजय ने कहा कि प्राचीन समय में करीब एक हजार से अधिक भारतीय विद्वानों ने चीन की यात्रा की थी जिनमें से दो सौ भारतीय विद्वानों के लिखित साक्ष्य चीन में विभिन्न जगहों पर मौजूद हैं। कुमारजीव के पूरे जीवन पर पिछले दो दशकों से शोध कर रहे तरुण विजय, सुप्रसिद्ध पत्रकार, लेखक, पूर्व राज्यसभा सांसद और वर्तमान में बीजेपी के वरिष्ठ नेता और भारतीय स्मारक प्राधिकरण के अध्यक्ष हैं।

तरुण विजय और तेजस्वी सूर्य (बंगलुरु दक्षिण से बीजेपी के लोकसभा सांसद) पिछले कुछ दिनों से कुमारजीव की यात्रा के माध्यम से चीन-भारत में आपसी संबंधों को एक नई मजबूती देने की कोशिश कर रहे हैं, इनके साथ कुछ चीनी विद्वान भी इस मुहिम में शामिल हैं, जिनमें सछ्वान विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष यान शीछिंग भी शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि चीन भारत संबंधों को अगर हमें सही रूप में देखना है तो हमें ईसा सन के प्रारंभिक वर्षो या उससे भी पीछे जाना होगा। जब दोनों देशों के ज्ञानी लोगों, संतों और विद्वानों का आना जाना एक दूसरे देश में बहुत बड़े स्तर पर था, इन्हीं में से एक थे चौथी शताब्दी के विद्वान कुमारजीव, जिन्होंने संस्कृत से भारतीय लेखों का चीनी भाषा में सटीक और अर्थपूर्ण अनुवाद किया था।

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सेमिनार से पहले तरुण विजय ने भारतीय राजदूतावास में कुछ भारतीय पत्रकारों से मुलाकात कर विस्तार से कुमारजीव के जीवन और उनके काम के बारे में बताया। तरुण विजय ने बताया कि कुमारजीव ने प्राचीन भारतीय लेखों का संस्कृत से सीधा चीनी में अनुवाद किया, और उनके द्वारा लिखी गई पांडुलिपियों को चीन के विभिन्न जगहों में सहेज कर रखा गया है। तरुण विजय ने बताया कि प्राचीन समय में करीब एक हजार से अधिक भारतीय विद्वानों ने चीन की यात्रा की थी जिनमें से दो सौ भारतीय विद्वानों के लिखित साक्ष्य चीन में विभिन्न जगहों पर मौजूद हैं।

कुमारजीव के बारे में बात करते हुए तरुण विजय ने बताया कि कुमारजीव के चीन आने से पहले ही बौद्ध धर्म चीन में फैल चुका था लेकिन सूत्रों का अध्ययन अभी तक सही रूप में नहीं हुआ था क्योंकि चीन में लोग भारतीय ग्रंथों का सिर्फ अनुवाद पढ़ रहे थे। उत्तर चीन के साम्राज्य के शासक फूचियान ने कुमारजीव को छांगआन यानी आज के शिआन में बौद्ध ग्रंथों का सही तरीके से अनुवाद करने के लिये आमंत्रित किया। सम्राट ने शिआन में एक अनुवाद केन्द्र की स्थापना की जहां पर कुमारजीव एक शोधार्थी की हैसियत से रहने लगे।

छांगआन आने पर कुमारजीव को राष्ट्रीय आचार्य की उपाधि प्रदान की गयी। यहां आने के बाद कुमारजीव ने जो काम किया उसका वर्तमान चीनी बौद्ध परंपराओं पर विशिष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। अगले दस वर्षो में कुमारजीव ने जिन ग्रंथों का चीनी में अनुवाद किया उनमें प्रज्ञापारमिता, वज्रच्छेदिका प्रज्ञापारमितासूत्र, विमलकीर्ति सूत्र और इत्यादि शामिल हैं। इस समय छांगआन यानी शिआन विदेशी प्रबुद्ध विद्वानों का केन्द्र बन चुका था, कुमारजीव के अलावा यहां पर बुद्धभद्र, बुद्धयासा, धर्मयासा और धर्मगुप्त जैसे भारतीय विद्वान भी मौजूद थे। (साभार-चाइना रेडियो इंटरनेशनल, पेइचिंग)

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