वायरस जैसी बीमारी और प्रोबॉयोटिक्स - Virus like probiotics disease
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वायरस जैसी बीमारी और प्रोबॉयोटिक्स

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कोरोना महामारी से पहले हुई रिसर्च के मुताबिक प्रोबॉयोटिक हमें अल्सर, इन्टसटाइन कैंसर, डाइबिटीज टाइप-2, चर्म रोग और कई गम्भीर मानसिक बीमारियों से बचाते हैं लेकिन कोरोना के बचाव और इलाज में इनकी उपयोगिता सामने आने पर जरूरी हो जाता है कि लोगों को प्रोबॉयोटिक्स की सही जानकारी हो जिससे वे अपना खान-पान ठीक रखकर शरीर में इनकी जरूरी संख्या हमेशा बनाये रखें और रोग मुक्त रहें।

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कोविड-19 (कोरोना) वायरस का इलाज खोजते हुए वैज्ञानिकों ने जब प्रोबॉयोटिक्स पहलू पर रिसर्च शुरू की तो पता चला कि वायरस साइटोकाइन स्टार्म के जरिये पाचन तन्त्र में मौजूद गट फ्लोरा (गुड बैक्टीरिया) नष्ट करते हुए इम्युटी कम करता है। साथ ही आंतों और फेफड़ों के नेचुरल लिंक गट-लंग्स एक्सेस को तोड़कर फेफड़ों में खुद को तेजी से रिप्लीकेट करते हुए ऑक्सीजन लेवल गिराता है। ऐसे में वैज्ञानिकों का मत है कि अगर पाचन तन्त्र में मौजूद गुड बैक्टीरिया को कमजोर न पड़ने दें तो कोरोना से बचाव के साथ संक्रमित होने पर जल्द ठीक हो सकते हैं।   कोरोना महामारी से पहले हुई रिसर्च के मुताबिक प्रोबॉयोटिक हमें अल्सर, इन्टसटाइन कैंसर, डाइबिटीज टाइप-2, चर्म रोग और कई गम्भीर मानसिक बीमारियों से बचाते हैं लेकिन कोरोना के बचाव और इलाज में इनकी उपयोगिता सामने आने पर जरूरी हो जाता है कि लोगों को प्रोबॉयोटिक्स की सही जानकारी हो जिससे वे अपना खान-पान ठीक रखकर शरीर में इनकी जरूरी संख्या हमेशा बनाये रखें और रोग मुक्त रहें।

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प्रोबॉयोटिक हैं क्या?

मेडिकल साइंस में प्रो-बॉयोटिक शब्द का इस्तेमाल उस बैक्टीरिया (सूक्ष्मजीवियों) समूह के लिये होता है जो पाचन तन्त्र दुरूस्त करके हमें स्वस्थ रखते हैं। हाल में हुई रिसर्च के अनुसार मानव शरीर में ऐसे बैक्टीरिया की संख्या कई ट्रिलियन है, ये स्वास्थ्य के लिये लाभदायक हैं, इनसे पाचन तन्त्र मजबूत होने के साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है जिससे हम अनेक जानलेवा बीमारियों से बचे रहते  हैं। आसानी से समझने के लिये कह सकते हैं कि प्रोबॉयोटिक ऐसे जीवित सूक्ष्मजीवी हैं जिन्हें खाने से सेहत ठीक रहती है।

सबसे आम प्रोबॉयोटिक बैक्टीरिया हैं- लैक्टोबैसलिस और बिफीडोबैक्टीरिया। अन्य प्रोबॉयोटिक बैक्टीरिया में सैक्रोमाइसिस, स्ट्रेप्टोकोकस, एंटरोकोकस, एस्चेरिचिया और बैसिलस आते हैं। प्रोबॉयोटिक बैक्टीरिया की अनेक प्रजातियां और उपजातियां हैं। प्रोबॉयोटिक सप्लीमेंट के लेबल पर आपको इस तरह की जानकारी मिल जायेगी जिसमें उनके विशिष्ट स्ट्रेन (जीन्स) का उल्लेख होता है। यदि प्रजाति और उप-प्रजाति एक है तो इन्हें एक ही अक्षर या संख्या से बने स्ट्रेन कोड द्वारा लिखा जाता है। व्यक्ति में इनकी जरूरी संख्या बनी रहे यह उसके खान-पान पर निर्भर है, फरमेन्टेड (किण्डवित) भोजन इनका प्राकृतिक सोर्स है लेकिन मेडिकल साइंस में हुयी उन्नति के कारण अब ये सप्लीमेंट के रूप में उपलब्ध हैं।

अलग-अलग बीमारियों (हेल्थ कंडीशन्स) के लिये अलग-अलग टाइप के प्रोबॉयोटिक दिये जाते हैं, इसलिये स्वास्थ्य समस्या के अनुरूप प्रोबॉयोटिक सप्लीमेंन्ट्स का चयन करना चाहिये। आजकल ब्रॉड स्पेक्ट्रम या मल्टी प्रोबॉयोटिक सप्लीमेंट भी उपलब्ध हैं जिनका इस्तेमाल स्वास्थ्य सम्बन्धी अनेक समस्याओं के निदान में होता है, ऐसे प्रोबॉयोटिक सप्लीमेंट अलग-अलग प्रजातियों के गुड बैक्टीरिया मिलाकर बनाये जाते हैं।

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प्रोबॉयोटिक्स ही गट फ्लोरा

पेट के लिये जरूरी माइक्रोआर्गेनिज्म (सूक्षमजीवियों) की कॉम्प्लेक्स कम्युनिटी को मेडिकल साइंस में गट फ्लोरा या गट माइक्रोबॉयोटा या माइक्रोबॉयोमी कहते हैं। इसमें बैक्टीरिया, वायरस, फंगी, ऑर्किया और हेलमिन्थ्स जैसे कई तरह के सूक्ष्मजीवी बड़ी तादात में होते हैं। पेट में बैक्टीरिया का कॉम्प्लेक्स ईको सिस्टम 300 से 500 प्रजातियों से मिलकर बनता है और बड़ी आंत में इनकी संख्या सबसे अधिक होती है।

हमारे मेटाबॉलिज्म (चयापचय) के सन्दर्भ में गट फ्लोरा (प्रोबॉयोटिक बैक्टीरिया समूह) की गतिविधियां एक अंग जैसी हैं इसलिये वैज्ञानिक गट फ्लोरा को भूला-बिसरा अंग (फारगॉटन आर्गन) भी कहते हैं। गट फ्लोरा सेहत के लिये जरूरी विटामिनों का निर्माण करता है जिनमें विटामिन के और विटामिन बी के कई घटक शामिल हैं। यह भोजन में मौजूद फाइबर को शॉर्ट-चेन वसा (फैट) जैसेकि ब्यूटारेट, प्रोपियोनेट और एसीटेट में बदलता है जिससे आंतों की दीवारें स्वस्थ रहती हैं और मेटाबॉलिक सिस्टम (चयापचय) अच्छी तरह से काम करता है। गट फ्लोरा द्वारा निर्मित वसा की वजह से हमारा इम्यून सिस्टम एक्टिव (सजग) होकर अवांछित तत्वों को शरीर में घुसने नहीं देता।

प्रोबॉयोटिक, प्रिबॉयोटिक और सिनबॉयोटिक

प्रोबॉयोटिक के अलावा एक अन्य शब्द प्रिबॉयोटिक का इस्तेमाल खाद्य पदार्थों के लिये होता है, लेकिन ये दोनों अलग-अलग हैं। प्रिबॉयोटिक, डायटरी फाइबर वाले कार्बोंहाइड्रेट हैं जो पेट में मौजूद बैक्टीरिया (प्रोबॉयोटिक्स) का भोजन हैं। प्रिबॉयोटिक आहार से पेट में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया ढंग से फलते-फूलते हैं जिससे सेहत ठीक रहती है। आज बाजार में अनेक ऐसे सप्लीमेंट उपलब्ध हैं जिनमें प्रिबॉयोटिक और प्रोबॉयोटिक दोनों होते हैं इन्हें सिनबॉयोटिक कहा जाता है।

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कोविड-19 (कोरोना) से कैसे बचाते हैं?

कोरोना महामारी के दौरान वैज्ञानिकों ने रिसर्च शुरू की, कि कोरोना वायरस शरीर में मौजूद प्रोबॉयोटिक बैक्टीरिया पर क्या असर डालता है तो पता चला कि कोरोना, साइटोकाइन स्टार्म के जरिये शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) ध्वस्त करके सेहत को गम्भीर नुकसान पहुंचाकर मौत का कारण बनता है। चूंकि हमारी आंतों में मौजूद गट फ्लोरा इम्यून सिस्टम मजबूत करके सूजन घटाता है ऐसे में कोरोना से पीड़ित होने पर प्रोबॉयोटिक की डोज इस साइटोकाइन स्टार्म को सीमित कर कोरोना इंफेक्शन ठीक करने में मदद करती है। कोरोना वायरस शरीर की गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कोशिकाओं पर अटैक करके नष्ट करने लगता है ऐसे में प्रोबॉयोटिक्स, एन्जियोटेंशन-कन्वर्टिंग एन्जाइम (एसीई) रिसेप्टर अवरूद्ध करके कोरोना वायरस का फैलाव रोकते हैं, इससे मरीज को दस्त, मतली, उल्टी, डायरिया, पेट दर्द और भूख न लगने जैसी समस्याओं से राहत मिलती है।

शोध से गट-लंग्स एक्सेस नामक नये लिंक का पता चला, इसके जरिये आंतों और फेफड़ों के ऊतकों के बीच संचार का काम भी यही सूक्ष्मजीवी (ह्यूमन माइक्रोबियॉन) करते हैं। श्वसन तन्त्र और फेफड़ों में संक्रमण से गट फ्लोरा में बैक्टीरियल असुंतलन होता है, यदि यह असुंतलन ठीक हो जाये तो फेफड़े और श्वसन प्रणाली के स्वस्थ होने से कोरोना से जल्द निजात मिल सकती है। एक अन्य रिसर्च से पता चला कि प्रोबॉयोटिक सप्लीमेंट इम्यूनिटी बढ़ाने के साथ पलमोनरी और एंटी इन्फ्लेमेटरी रिस्पांस सिस्टम भी ठीक करते हैं जिससे कोविड संक्रमण से जल्द उबरने में मदद मिलती है।

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इन बीमारियों में पहले से कारगर

पाचन तन्त्र में मौजूद गट फ्लोरा हमारे भोजन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है, यदि शरीर में इसका बैलेंस बिगड़ जाये तो कई जानलेवा बीमारियों का रिस्क बढ़ जाता है जैसेकि कोलोरेक्टल कैंसर, अल्सर, टाइप-2 डॉयबिटीज, मेटाबॉलिक सिन्ड्रोम, हार्ट डिसीस, अल्जाइमर, डिप्रेशन और मोटापा। प्रोबॉयोटिक्स और प्रिबॉयोटिक आहार गट फ्लोरा संतुलित करके इन बीमारियों का रिस्क घटाते हैं-

अल्सर और पेट का कैंसर: रिसर्च में सामने आया कि हेलिकोबैक्टर पाइलेरी संक्रमण के इलाज में  प्रोबॉयोटिक सप्लीमेंट कारगर हैं। मेडिकल साइंस में इस रिसर्च को बड़ी घटना माना गया है क्योंकि हेलिकोबैक्टर पाइलेरी संक्रमण से ही अल्सर और पेट का कैंसर पनपता है। पेट से जुड़ी कुछ जानलेवा बीमारियों जैसेकि क्रोहन डिसीस और अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे रोग जिनकी वजह से आंतें सूज जाती है के उपचार में प्रोबॉयोटिक्स लाभदायक सिद्ध हुए हैं।

आईबीएस या इरीटेबल बॉउल सिन्ड्रोम: पेट की कॉमन बीमारी आईबीएस (इरीटेबल बॉउल सिन्ड्रोम) के इलाज में प्रोबॉयोटिक कारगर हैं, प्रोबॉयोटिक सप्लीमेंट से आंतों की सूजन घटती है व गैस बनना कम होने के साथ दस्त-कब्ज जैसी समस्यायें दूर होती हैं। एक रिसर्च में कुछ मरीजों को लगातार आठ सप्ताह प्रोबॉयोटिक सप्लीमेंट देने से यह बीमारी ठीक हो गयी। अभी इस बात पर शोध जारी हैं कि किस प्रजाति के प्रोबॉयोटिक्स आईबीएस के इलाज में ज्यादा कारगर हैं।

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डाइरिया: हमारी डाइजेस्टिव हेल्थ पूरी तरह से प्रोबॉयोटिक संतुलन पर टिकी है, स्टडी से पता चला कि एंटीबॉयोटिक खाने से होने वाला डाइरिया, प्रोबॉयोटिक सप्लीमेंट (जैसे विजीलेक) के सेवन से ठीक हो जाता है।

ऑटिज्म, एल्जामाइर और पार्किन्सन डिसीस: प्रोबॉयोटिक और दिमाग के बीच सम्बन्ध पर रिसर्च के  आश्चर्यजनक परिणाम सामने आये और पता चला कि ये दोनों एक विशेष संचार प्रणाली जिसे मेडिकल लैंग्वेज में गट-ब्रेन एक्सेस कहते हैं से आपस में जुड़े रहते हैं। यह एक्सेस शरीर के केन्द्र और एन्ट्रिक नर्वस सिस्टम को जोड़ता है जिससे डाइजेशन सिस्टम संचालित होता है। रिसर्च में सामने आया कि पेट में मौजूद कुछ विशेष माइक्रोब्स (सूक्ष्मजीवी)  इसी एक्सेस से दिमाग को प्रभावित करते हैं। मेडिकल साइंस में इस बैक्टीरिया को साइकोबॉयोटिक्स कहते है। शोध के मुताबिक साइकोबॉयोटिक्स, कॉन्ग्नीटिव और न्यूरोलॉजिकल डिस्आर्डर जैसेकि ऑटिज्म, एल्जामाइर और पार्किन्सन डिसीस के इलाज में मददगार हैं। इसी निष्कर्ष के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी बीमारियों से पीड़ित अपने भोजन में प्रोबॉयोटिक्स शामिल करके इन बीमारियों के अलावा मेन्टल स्ट्रेस और डिप्रेशन दूर कर सकते हैं।

मोटापा: शोध से पता चला कि मोटे वयस्कों और बच्चों, दोनों की आंतों में अलग तरह का बैक्टीरिया होने से वे मोटे होते हैं, साथ ही असन्तुलित गट फ्लोरा भी मोटापे का बड़ा कारण है। गट फ्लोरा में किसी विशेष बैक्टीरिया की मात्रा व्यक्ति का वजन निर्धारित करती है। ऐसे में वैज्ञानिक गट फ्लोरा में मोटापे के लिये जिम्मेदार बैक्टीरिया की पहचान करने और उससे सम्बन्धित प्रोबॉयोटिक सप्लीमेंट व उसके सेवन की अवधि निर्धारण में शोधरत हैं। ऐसे एक शोध में शामिल 210 मोटे लोगों को प्रतिदिन 12 सप्ताह तक लैक्टोबैसलिस गैसरी बैक्टीरिया वाला प्रोबॉयोटिक दिया गया, इससे उनके पेट की चर्बी 8.5 प्रतिशत घट गयी। जब इन लोगों ने प्रोबॉयोटिक सप्लीमेंट का सेवन बंद किया तो चार सप्ताह में चर्बी वापस आ गयी। शोधकर्ताओं के अनुसार लैक्टोबैसिलस रमनोसस और विकीडोबैक्टीरियम लैक्टिस बैक्टीरिया युक्त प्रोबॉयोटिक सप्लीमेंट मोटापा रोकने में मददगार है।

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जनरल हेल्थ और प्रोबॉयोटिक

गम्भीर और जानलेवा बीमारियों का रिस्क कम करने के अलावा प्रोबॉयोटिक जनरल हेल्थ के लिये बहुत लाभदायक हैं जैसेकि-

इन्फ्लेमेशन (सूजन): अनेक बीमारियां और शारीरिक समस्यायें शरीर के अंदरूनी अंगों में सूजन आने से होती हैं, रिसर्च में पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि प्रोबॉयोटिक का नियमित सेवन चाहे वह खाद्य पदार्थों के रूप में हो या सप्लीमेंट के, अंदरूनी सूजन कम करता है।

स्किन हेल्थ: प्रोबॉयोटिक युक्त खाद्य पदार्थों और सप्लीमेंट्स के सेवन से त्वचा सम्बन्धी डिस्आर्डर जैसेकि मुंहासे, रोसैसिया, एक्जिमा, फंगल संक्रमण तथा एलर्जिक रियेक्शन से होने वाले चर्म रोग ठीक होते हैं और भविष्य में इनसे पीड़ित होने का रिस्क भी घटता है।

एंटी एजिंग: शोध में पाया गया कि प्रोबॉयोटिक्स कोशिकाओं में खुद को रिप्लीकेट करने की अद्भुत क्षमता होने से वे अपना जीवनकाल बढ़ा लेती हैं, ऐसी एंटी-एजिंग क्षमता के कारण ये त्वचा को जल्द बूढ़ा नहीं होने देतीं। वैज्ञानिक, प्रोबॉयोटिक बैक्टीरिया के एंटी-एजिंग क्षमता वाले स्ट्रेन की सटीक पहचान के लिये शोधरत हैं और उम्मीद है कि जल्द ही सकारात्मक परिणाम सामने आयेंगे।

डिप्रेशन-एंग्जायटी: लैक्टोबैसिलस हैल्वेटिकस और बीफीडोबैक्टेरियम लोगम ऐसे प्रोबॉयोटिक स्ट्रेन हैं जो एंग्जॉयटी और डिप्रेशन दूर करते हैं।

ब्लड कोलेस्ट्रॉल: कुछ विशेष प्रोबॉयोटिक, टोटल कोलेस्ट्रॉल और एडीएल जिसे खराब कोलेस्ट्रॉल कहते हैं को घटाते हैं लेकिन इस सम्बन्ध में रिसर्च जारी है।

ब्लड प्रेशर: नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (अमेरिका) के तत्वाधान में हुयी रिसर्च से पता चला कि प्रोबॉयोटिक्स एलीवेटेड (बढ़ा हुआ) ब्लड प्रेशर कम करने में सहायक है।

इम्यून फंक्शन: अनेक प्रोबॉयोटिक स्ट्रेन इम्यून सिस्टम मजबूत करके सम्भावित संक्रमण का रिस्क कम करते हैं यहां तक कि जुकाम जैसे संक्रमण भी नहीं होने देते।

प्रोबॉयोटिक्स किन खाद्य-पदार्थों में ज्यादा?

घर में जमा दही प्रोबॉयोटिक बैक्टरीरिया से भरपूर है, बाजार में डिब्बा बंद दही खरीदते समय इस बात पर ध्यान दें कि उस पर प्रोबॉयोटिक लिखा हो।

आजकल बाजार में फरमेन्टेड (किण्वित) प्रोबॉयोटिक दूध उपलब्ध है। इसे गाय या बकरी के दूध में केफिर अनाज (तुर्की में होने वाला अनाज) मिलाकर बनाते हैं, इसलिये इसे केफिर मिल्क भी कहते हैं।

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हमारे देश में बनने वाली कांजी नेचुरल प्रोबॉयोटिक है। गाजर और राई से बनने वाली कांजी में  प्रोबॉयोटिक गुणों के साथ विटामिन ए, बी, सी और फाइबर के साथ सोडियम, आयरन, मैंगनीज जैसे मिनिरल्स प्रचुर मात्रा में होते हैं। राई के साथ बिना तेल वाला गाजर और मूली का आचार भी नेचुरल प्रोबॉयोटिक है।

रोटी का आटा गूधंते समय यदि उसमें यीस्ट या खमीर मिलाकर एक घंटे रख दें तो उससे बनने वाली रोटी नेचुरल प्रोबॉयोटिक्स से भरपूर होती है। छोले के साथ खाये जाने वाले भटूरे भी नेचुरल प्रोबॉयोटिक हैं।

डोसा और इडली भी प्रोबॉयोटिक से भरपूर भोजन है लेकिन तभी जब इसके बेटर (आटे) को प्राकृतिक तरीके से फरमेंट किया गया हो।

बारीक कटी हुयी फरमेन्टेड पत्तागोभी से बना खाद्य-पदार्थ साउरक्राउट नेचुरल प्रोबॉयोटिक है, इसे लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया मिलाकर बनाते हैं। यह योरोप और मध्य एशिया के पारम्परिक खाद्य-पदार्थों में से एक है। इसमें प्रोबॉयोटिक गुणों के अलावा विटामिन सी, बी और फाइबर के साथ सोडियम, आयरन, मैंगनीज जैसे मिनिरल्स तथा ल्यूटिन और जेक्सेथिन नामक एंटीऑक्सीडेंट होते हैं।

पत्तागोभी, मिर्च, अदरक, लहसुन और अन्य सब्जियों से बने एक अन्य नेचुरल प्रोबॉयोटिक खाद्य-पदार्थ किमची को लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया से फरमेंट करके बनाते हैं, इसमें विटामिन के, बी12 और आयरन प्रचुर मात्रा में होते हैं। यह ओरिजनली कोरियन खाद्य पदार्थ है।

आजकल बाजार में सोयाबीन से बने कई नेचुरल प्रोबॉयोटिक खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं जिनमें नेटो, मीसो और टेम्पेह प्रमुख हैं। पेट में मौजूद प्रोबॉयोटिक बैक्टीरिया को स्वस्थ रखने के लिये प्रिबॉयोटिक फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों  जैसेकि बीन्स, मटर, ओट्स, केला, बेरीज, लहसुन और प्याज का सेवन बढ़ायें।

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सेफ्टी और साइड इफेक्ट्स

आमतौर पर प्रोबॉयोटिक सभी के लिये सुरक्षित हैं लेकिन कुछ विशेष हेल्थ कंडीशन्स (एचआईवी-एड्स और आर्गन ट्रांसप्लांट) में इनका सेवन डाक्टर से पूछकर करना चाहिये। बाजार में प्रोबॉयोटिक खाद्य-पदार्थ, दवाइयों और डाइटरी सप्लीमेंट के रूप में उपलब्ध है। जहां तक इनके साइड इफेक्ट्स की बात है तो ज्यादा सेवन से डाइजेशन सिस्टम गड़बड़ा सकता है जिससे पेट में गैस या हल्के दर्द की शिकायत होती है लेकिन कुछ दिनों में ये सब अपने आप ठीक हो जाता है। जहां तक पेट और पाचन-तन्त्र को स्वस्थ्य रखने की बात है तो खाने में नेचुरल प्रोबॉयोटिक्स शामिल करें और नियमित व्यायाम को दिनचर्या बनायें। शराब, गुटका और मादक द्रव्यों के सेवन से बचें क्योंकि इनके डेली सेवन से पेट के गुड बैक्टीरिया नष्ट होने लगते हैं जिसका सम्पूर्ण स्वास्थ्य पर बुरा असर होता है।

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