लगातार खून बहना हेमोफीलिया

सौ साल पहले सन् 1917 में इस बीमारी के कारण रूस में जारों का शासन समाप्त हुआ था, कहानी यह है कि रूस के राजा (ज़ार) निकोलस रामानोव के पुत्र को यह बीमारी थी और तब मेडिकल साइंस में  इसका कोई इलाज नहीं था, इसी बात का फायदा उठाकर रासपुतिन नामक एक तान्त्रिक-ओझा टाइप के व्यक्ति ने राजपरिवार में घुसपैठ की और वहां की रानी (जराइन) को यकीन दिलाया कि वह अपनी दैवीय शक्तियों से उसके पुत्र की रक्षा करेगा। पुत्र मोह में रानी की उस तान्त्रिक से नजदीकियां  बढ़ती गयीं और रूस में अफवाह फैलने लगी कि रानी के रासपुतिन से अवैध सम्बन्ध हैं। इस वजह से राजपरिवार के वफादार लोग धीरे-धीरे उन्हें छोड़ते गये व रूस की शासन व्यवस्था में रासपुतिन का दखल बढ़ता गया, जिसका परिणाम जन विद्रोह के रूप में सामने आया। जनता ने निकोलस रामानोव का तख्ता पलट दिया और सत्ता पर कम्युनिस्ट काबिज हो गये। जरा सोचिये कि अगर हेमोफीलिया बीमारी न होती तो रूस आज शायद कुछ और होता या दुनिया भी कुछ और होती। आइये जानें कि क्या है यह बीमारी, जिसने रूस और दुनिया का इतिहास बदल दिया।

क्या है हेमोफीलिया?

रक्तस्राव अर्थात लगातार रक्तस्राव से जुड़ी इस बीमारी में पीड़ित के शरीर में एक खास प्रोटीन की कमी से खून में थक्का नहीं जमता जिससे शरीर में चोट लगने या कटने पर खून बिना रूके बहता रहता है। मेडिकल साइंस के मुताबिक यह जेनेटिक या वंशानुगत ब्लीडिंग डिस्आर्डर है। स्वस्थ व्यक्ति के रक्त में 13 ब्लड फैक्टर होते हैं जो रक्त में मौजूद प्लेटलेट्स से मिलकर थक्का बनाते हैं जिससे कटने या चोट लगने पर कुछ समय में खून बहना बंद हो जाता है। वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ हेमोफीलिया के अनुसार प्रति 10,000 लोगों में एक व्यक्ति इस बीमारी के साथ पैदा होता है। ऐसे लोगों को चोट लगने पर खून बहना आसानी से बंद नहीं होता, यदि होता भी है तो बहुत देर से। इसके अलावा इन्हें आंतरिक रक्त स्राव का खतरा रहता है जिसकी वजह से इनके जोड़ों में दर्द और सूजन हो जाती है।

ये  तीन तरह का होता है- हेमोफीलिया-ए, हेमोफीलिया-बी और हेमाफीलिया-सी।

हेमोफीलिया-ए इसका सबसे कॉमन टाइप है, इसके 10 मरीजों में से 8 इसी से पीड़ित होते हैं। यह बीमारी रक्त में आठवें फैक्टर की कमी से होती है।

हेमोफीलिया-बी, जिसे क्रिसमस डिसीस भी कहते हैं  रक्त में नौवें फैक्टर की कमी से होती है।

हेमोफीलिया-सी रक्त में ग्यारहवें फैक्टर की  कमी से होती है। यह हेमोफीलिया बीमारी का सबसे हल्का रूप है, इसमें स्पॉन्टेनियस ब्लीडिंग का अनुभव शायद ही कभी होता है। इसका असर सर्जरी या ट्रोमा के दौरान ही दिखता है।

इस जेनेटिक बीमारी को व्यक्ति अपने पूर्वजों से ग्रहण करता है और इसे पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता लेकिन इलाज से भविष्य में होने वाले स्वास्थ्य सम्बन्धी कॉम्प्लीकेशन्स को कंट्रोल किया जा सकता है।

अत्यन्त रेयर मामलों में हेमोफीलिया जन्म के तुरन्त बाद डेवलप होता है जिसे एक्वायर्ड हेमोफीलिया कहते हैं। ऐसे मामलों में पीड़ित का इम्यून सिस्टम ऐसी एंटीबॉडी बनाने लगता है कि वे रक्त के आठवें और नौवें फैक्टर पर अटैक करने लगती हैं। इसके अलावा यह बीमारी कैंसर और मल्टीपल स्क्लेरोसिस के रोगियों में भी पनपने लगती है।

क्या लक्षण उभरते हैं इसमें?

इसके लक्षण, रक्त में फैक्टर की कमी के अनुसार उभरते हैं। जिनमें बहुत कम डिफीशियेन्सी होती है उन्हें सर्जरी या ट्रोमा में ही ब्लीडिंग होती है, जिनमें ज्यादा डिफीशियेन्सी होती है उन्हें बिना किसी कारण ब्लीडिंग होने लगती है। ऐसी ब्लीडिंग को स्पॉन्टेनियस ब्लीडिंग कहते हैं।

हेमोफीलिया से पीड़ित बच्चों में इसके लक्षण 2 साल की उम्र में दिखाई देते हैं। स्पॉन्टेनियस ब्लीडिंग में यूरीन और स्टूल में ब्लड, शरीर पर गहरी और बड़ी खरोंचें, मसूड़ों से रक्तस्राव, नाक से लगातार ब्लीडिंग, जोड़ों में दर्द और अकड़न जैसे लक्षण उभरते हैं।

हेमोफीलिया से पीड़ित व्यक्ति को अगर तेज सिरदर्द, लगातार उल्टी, गरदन में दर्द, सीजर्स, दृष्टि धुंधलाना, ज्यादा नींद आना और चोट लगने पर लगातार ब्लीडिंग हो तो उसे तुरन्त नजदीकी अस्पताल  ले जायें। गर्भवती महिलाओं को यदि इनमें से कोई भी लक्षण महसूस हो तो तुरन्त डाक्टर से सम्पर्क करना चाहिये।

क्यों होता है हेमोफीलिया?

सामान्य ब्लीडिंग रोकने के लिये कॉगुलेशन कैस्केड प्रोसेस काम करता है, इसमें ब्लड प्लेटलेट्स चोट या जख्म के आसपास इकठ्ठे होकर  क्लॉट बनाते  हैं। ऐसे में शरीर का क्लॉटिंग फैक्टर एक साथ काम करता है और जख्म के आसपास स्थायी रूप से पपड़ी बना देता है। जब शरीर में ये क्लॉटिंग फैक्टर न्यूनतम या अनुपस्थित होते हैं तो ब्लीडिंग चालू रहती है। व्यक्ति में कौन से क्लॉटिग फैक्टर हैं और कौन से नहीं ये पूरी तरह से इस बात पर निर्भर है कि उसके माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी की जीन्स संरचना क्या थी। इसीलिये इसे जेनेटिक बीमारी कहते हैं।

किन्हें होता है इसका रिस्क?

जेनेटिक ट्रांसमिशन की वजह से हेमोफीलिया-ए और बी महिलाओं की अपेक्षा पुरूषों को अधिक प्रभावित करता है। हेमोफीलिया-सी दोनों को समान रूप से प्रभावित करता है।

कैसे पुष्टि होती है इसकी?

इसकी पुष्टि ब्लड टेस्ट से होती है। इसमें रक्त की अल्प मात्रा लेकर उसमें क्लॉटिंग फैक्टर की मौजूदगी का पता लगाते हैं। इसमें सैम्पल की ग्रेडिंग से बीमारी की गम्भीरता का पता चलता है-

– माइल्ड हेमोफीलिया में रक्त प्लाज्मा में क्लॉटिंग फैक्टर 5 से 40 प्रतिशत तक होता है।

– मॉडरेट हेमोफीलिया में रक्त प्लाज्मा में क्लॉटिंग फैक्टर 1 से 5 प्रतिशत तक होता है।

– सिवियर या गम्भीर हेमोफीलिया में रक्त प्लाज्मा में क्लॉटिंग फैक्टर 1 प्रतिशत से भी कम होता है।

क्या जटिलताएं हो सकती हैं?

इस बीमारी में लगातार ब्लीडिंग से शरीर के जोड़ डैमेज हो जाते हैं और ज्यादा अंदरूनी ब्लीडिंग होने पर मृत्यु हो सकती है। यदि ब्रेन में ब्लीडिंग होने लगे तो स्ट्रोक आने से व्यक्ति कोमा में चला जाता है या उसकी मृत्यु हो जाती है। इनके अलावा हमेशा संक्रमित होने का खतरा रहता है विशेष रूप से हेपेटाइटिस से।

इलाज क्या है इस बीमारी का?

हेमोफीलिया-ए के इलाज में विशेष हारमोन्स प्रयोग किये जाते हैं, जिन्हें डेस्मोप्रसिन कहते हैं। इन्हें पीड़ित के शरीर में नस (वेन) में इंजेक्शन द्वारा पहुंचाया जाता है। यह मेडीकेशन उन फैक्टरर्स को स्टीमुलेट करता है जो ब्लड क्लॉटिंग प्रोसेस के लिये जरूरी होते हैं।

हेमोफीलिया-बी के इलाज में पीड़ित को ऐसा ब्लड चढ़ाया जाता है जिसमें जरूरी मात्रा में ब्लड क्लॉटिंग फैक्टर मौजूद हों। कई बार इन फैक्टरर्स को सिन्थेटिक फार्म में भी दिया जाता है। इन्हें रिकॉम्बीनेन्ट क्लॉटिंग फैक्टर कहते हैं।

हेमोफीलिया-सी के इलाज में पीड़ित को प्लाज्मा चढ़ाते हैं, इलाज का यह तरीका प्रोफ्यूज ब्लीडिंग रोकने में कारगर है। इसके अलावा अब ऐसी दवायें भी उपलब्ध हैं जो हेमोफीलिया-सी के जिम्मेदार फैक्टर्स की कमी को पूरा करती हैं।

हेमोफीलिया से अगर जोड़ों को नुकसान हुआ है तो फिजियोथेरेपी की जरूरत पड़ती है।

कैसे बच सकते हैं इससे?

सामान्य परिस्थितियों में इसकी रोकथाम का कोई तरीका नहीं है, क्योंकि यह बीमारी मां से बच्चे में जाती है। प्राकृतिक तरीके से गर्भधारण में तो यह जानने का कोई सिस्टम नहीं है कि जो बच्चा मां के गर्भ में पल रहा है उसे हेमोफीलिया है या नहीं। लेकिन जो महिलायें आईवीएफ तकनीक से गर्भधारण करती हैं उनके लिये यह सुविधा होती है कि जो अंडा निषेचित किया जा रहा है वह पूरी तरह से स्वस्थ है या नहीं। इसमें अंडे के स्तर पर ही हेमोफीलिया का पता लगाया जा सकता है। ऐसे में हेमोफीलिया वाले अंडे को निषेचित करने से बच सकते हैं।

हेमोफीलिया के साथ जीवन

हेमोफीलिया, उम्रभर की बीमारी है लेकिन मेडीकेशन से इसे मैनेज करके इसके दुष्परिणामों से बच सकते हैं। योरोप, अमेरिका और हमारे देश के गिने-चुने अस्पतालों में तो इसके टाइप सी का सरल इलाज उपलब्ध है जिसमें केवल दवा खाकर इसे कंट्रोल कर सकते हैं। इसके इलाज के लिये  अच्छा अनुभवी डाक्टर चुनें और जीवन भर उसी की सलाह पर चलें। यदि ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है तो सावधानी बरतें और किसी अच्छे ब्लड बैंक से ही ब्लड लें अन्यथा दूसरे संक्रमणों का खतरा रहता है। इसके इलाज में हारमोन प्रयोग होते हैं ऐसे में ट्रीटमेंट प्लान पर बने रहें और डाक्टर की अनुमति के बिना कोई भी दवा न बंद करें। उन परिस्थितियों से बचकर रहें जहां चोट लगने या कटने का खतरा हो। किचन में फल और सब्जियों के काटने जैसे कामों से दूर रहें। शेव करते समय सावधानी बरतें कि कहीं कट न लग जाये। एक्सटर्नल ब्लीडिंग शुरू होने पर उस स्थान को तब तक दबाकर रखें जब तक सही मेडिकल एड न मिल जाये। इंटरनल ब्लीडिंग महसूस होते ही जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचें अन्यथा जानलेवा कंडीशन बन सकती है। हेमोफीलिया के मरीज को यदि उल्टियां होने लगें और विजन डबल हो जाये तो इसका अर्थ है कि दिमाग में इंटरनल ब्लीडिंग शुरू हो गयी है ये मेडिकल इमरजेंसी है ऐसे में जितनी जल्दी हो सके निकटवर्ती अस्पताल ले जायें।

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