यौन रिश्ते में डर है जेनोफोबिया

 ऐसा रोग जिसमें व्यक्ति यौन अंतरंगता अर्थात सेक्सुअल इंटीमेसी से डरता है। यह पुरूषों और महिलाओं दोनों को होता है लेकिन हमारे देश में इसके पीड़ितों में महिलाओं का प्रतिशत ज्यादा है। मेडिकल साइंस में इसे क्वाइटोफोबिया या इरोटोफोबिया भी कहते हैं। यह नापंसदगी या घृणा से ज्यादा है, इससे ग्रस्त लोग सेक्सुअल इंटीमेसी तो दूर वे सेक्स के बारे में बात करने से भी घबराते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति हमेशा यौन सम्बन्धों से बचने की फिराक में रहता है। यहां यौन अंतरगंता से डरने का मतलब यह नहीं है कि वह सेक्स नहीं चाहता, बल्कि वह चाहकर भी अंतरंग (इंटीमेट) नहीं हो पाता। जेनोफोबिया से दिमाग इस तरह से रियेक्ट करता है कि व्यक्ति यौन इंटीमेसी के नजदीक पहुंचकर पैनिक (भय और चिंता से चीखना-चिल्लाना) हो जाता है।

क्यों होता है जेनोफोबिया?

लोगों को आपस में इंटीमेट (अंतरंग) होने के लिये भावनात्मक या शारीरिक जुड़ाव की जरूरत होती है। मनोविज्ञान के अनुसार व्यक्ति चार तरह से इन्टीमेसी (अंतरंगता)  बढ़ाता है-

अनुभवात्मक इंटीमेसी: इसमें व्यक्ति अंतरगंता बढ़ाने के लिये अपनी सामान्य गतिविधियां, रूचि और अनुभव दूसरों से शेयर करता है।

बौद्धिक इंटीमेसी: इसमें व्यक्ति दूसरों के साथ विचारों के गहन आदान-प्रदान और सार्थक चर्चा के माध्यम से जुड़ता है।

भावनात्मक इंटीमेसी: इसमें व्यक्ति अपनी आंतरिक भावनाओं (दुख-दर्द, खुशी व आसपास के लोगों के प्रति नजरिया इत्यादि) को साझा करके दूसरे से इंटीमेट सम्बन्ध बनाता है।

सेक्सुअल इंटीमेसी: इसमें व्यक्ति यौन (सेक्स) सम्बन्ध बनाकर दूसरे के करीब आता है।

यौन इंटीमेसी से डरने का कोई एक कारण नहीं बल्कि बहुत सी ऐसी घटनायें (जैसेकि अतीत के बुरे अनुभव) या चीजें होती हैं जिनके संयोजन का परिणाम जेनोफोबिया के रूप में सामने आता है। वास्तव में यह हमारे दिमाग के डिफेंस मैकेनिज्म (रक्षा तन्त्र) की उपज है जो व्यक्ति को असुरक्षा से बचाने के लिये किसी और पर भरोसे की अनुमति नहीं देता।

बहुत से लोग रिजेक्शन के डर से जेनोफोबियक हो जाते हैं, जब व्यक्ति यह डर सताता है, कि कोई उसे अस्वीकार कर देगा, तो वह अंतरंग होने से झिझकता है। यदि वह पहले रिजेक्ट हो चुका है तब यह सोच और पक्की हो जाती है क्योंकि हमारा रक्षा तन्त्र यह नहीं चाहता कि दोबारा हमें वही चोट खानी पड़े।

कुछ लोगों में परित्याग के भय से जेनोफोबिया पनपता है, उन्हें लगता है कि एक से अंतरंग सम्बन्ध बनने के बाद दूसरा उसे छोड़ देगा। परित्याग का यह डर बचपन में घटी बुरी घटनाओं की वजह से होता है जैसेकि माता-पिता या किसी करीबी की मृत्यु या अलगाव। इसके अलावा माता-पिता व अपनों से मिली उपेक्षा से भी व्यक्ति जेनोफोबियक हो जाता है।

कुछ लोग अवॉयडेन्ट पर्सनाल्टी डिस्आर्डर या इंटीमेसी एंग्जॉयटी डिस्आर्डर से जेनोफोबियक हो जाते हैं। वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन के मुताबिक दुनिया की 2.5 प्रतिशत आबादी इससे ग्रस्त है। ऐसे लोगों में आत्मसम्मान की कमी, झिझक, अपमान का डर, निर्णय न ले पाना, आलोचना के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता, सामाजिक स्थितियों से बचने की आदत, सम्भावित समस्याओं को वास्तविकता से बहुत ज्यादा समझना जैसे लक्षण होते हैं। यह विकार जेनेटिक या आसपास के माहौल से पनपता है। इसकी शुरूआत रिजेक्शन या परित्याग के डर से होती है जो धीरे-धीरे जेनोफोबिया में बदल जाती है।

कुछ लोगों में यौन इंटीमेसी से डर बचपन में हुए यौन शोषण या यौन दुर्व्यवहार (पीएसटीडी-पोस्ट ट्रॉमिक स्ट्रेस डिस्आर्डर) से पैदा होता है, इससे पीड़ित अपनी यौन इच्छाओं के प्रति संकोची होने से सेक्स को एक दायित्व के रूप में देखता है। सेक्सुअल इंटीमेसी की बात उसे गाली लगती है और ऐसी भावना से छूने पर उसमें क्रोध, घृणा और अपराध की भावनायें पनपती हैं। यदि ऐसे व्यक्ति से कोई जोर-जबरजस्ती सेक्स सम्बन्ध बना ले तो भी वह उससे भावनात्मक दूरी बनाये रखता है।

माता-पिता या परिवार पर बहुत ज्यादा निर्भरता से भी लोगों में यौन इंटीमेसी से डर पैदा होता है और वे समझने लगते हैं अगर वे किसी के साथ अंतरंग हुऐ तो वह उन्हें कंट्रोल करने लगेगा।

जर्मनी की हेड्यलबर्ग यूनीवर्सिटी में हुए के शोध के मुताबिक जेनोफोबिया व्यक्ति में डर सम्बन्धी इन  बीमारियों से भी पैदा होता है-

नोसोफोबिया: इससे ग्रस्त व्यक्ति को हमेशा यही डर रहता है कि दूसरे को छूने से उसमें वायरस या बैक्टीरिया प्रवेश कर जायेगा और वह बीमार हो जायेगा।

जिम्नोरोबिया: इसमें व्यक्ति को नग्नता से डर लगता है। वह न तो किसी को नंगा देख सकता है और न ही किसी के आगे नंगा हो सकता है।

हेट्रोफोबिया: इससे ग्रस्त व्यक्ति अपने विपरीत लिंग वाले व्यक्ति से डरता है।

हफ्फोबिया: इसमें ग्रस्त व्यक्ति दूसरों को छूने और खुद छुए जाने से डरता है।

टोकोफोबिया: इससे ग्रस्त व्यक्ति को गर्भाधारण या प्रसव का डर होता है।

ज़ीनोफोबिया: इससे ग्रस्त व्यक्ति हर उस व्यक्ति से डरता है जो दूसरे धर्म, नस्ल या दूसरे देश का हो।  यह डर स्वभाविक नहीं होता बल्कि समाज में फैलाई जा रहीं अफवाहों से पनपता है।

जेनोफोबिया पर रिसर्च से यह भी पता चला कि बहुत से लोग जिन्हें अन्य लोगों से भावनात्मक रूप से करीब होने में भय या चिंता होती है वे आसानी से जेनोफोबिया के शिकार हो जाते हैं। उनका भय और एंग्जॉयटी धीरे-धीरे यौन अंतरंगता (सेक्सुअल इंटीमेसी) के डर में तब्दील हो जाती है।

यौन इंटीमेसी से डर सम्बन्धी इन कारणों के अलावा कुछ शारीरिक/मानसिक कारण और भी हैं जो जेनोफोबिया को जन्म देते हैं जैसेकि-

गॉयनोफोबिया: कुछ पुरूष गॉयनोफोबिया के कारण यौन इंटमेसी से डरते हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार गॉयनोफोबिया से पीड़ित व्यक्ति महिलाओं से बुरी तरह डरता है। ऐसा उन पुरूषों के साथ होता है जो महिलाओं द्वारा निरन्तर अपमानित और प्रताड़ित होने के कारण अपनी पहचान भूलकर हीन भावना (इन्फीरियारटी कॉम्पलेक्स) से ग्रस्त हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में अंग्रेजी भाषा में एक विशेष शब्द इमेस्कुलेशन (बधिया हुआ)  का इस्तेमाल होता है। इस विकार से ग्रस्त लोग महिला के बारे में सोचते ही घबरा जाते हैं, इंटीमेट रिलेशन की बात पर तो उन्हें एंग्जॉयटी डिस्आर्डर हो जाता है। यदि महिला इन्हें जोर-जबरजस्ती गले लगाने, भींचने या चुम्बन लेने का प्रयास करे तो इन्हें लूज मोशन लग जाते हैं या चक्कर आने लगते हैं। कुछ की हार्ट बीट तेज होने से सांस फूलने लगती है और पसीने से तर-बतर हो जाते हैं।

बॉडी शेम या डिस्मोर्फिया: कुछ लोग अपने शरीर को लेकर बहुत ज्यादा आत्म-जागरूक (ओवरली सेल्फ कॉन्शस) होते हैं और उन्हें अपने शरीर में कमियां नजर आतीं हैं हालांकि दूसरों को वे सामान्य लगते हैं। ऐसी सोच के कारण वे गम्भीर शारीरिक शर्म से ग्रस्त हो जाते हैं और उन्हें दूसरों के आगे कपड़े उतारने से डर लगता हैं। इसका यौन इच्छाओं पर इतना ज्यादा नकारात्मक असर होता है कि वे यौन अंतरंगता से डरने लगते हैं।

वैजिनस्मस (योनि संकुचन): यौन इंटीमेसी में जब वजाइनल पेनिट्रेशन का प्रयास किया जाता है तो योनि की मांसपेशियां अप्रत्याशित रूप से बंद हो जाती है जिससे इंटरकोर्स बहुत दर्दयुक्त (पेन फुल) या असम्भव हो जाता है। यही कारण है कि जेनोफोबिया से पीड़ित महिलायें टैम्पोन (माहवारी में इस्तेमाल होने वाला एक विशेष पैड) का प्रयोग मुश्किल से कर पाती हैं। योनि संकुचन से उत्पन्न इसी दर्द के कारण वे हमेशा सेक्स से बचने का प्रयास करती हैं।

पेल्विक एरिया पेन: इसमें महिलाओं की पेल्विक मांसपेशियों के कमजोर होने से उनके योनि क्षेत्र में हमेशा दर्द रहता है जिससे कारण हाथ मिलाना, गले मिलना और चुम्बन लेने तक तो उनका व्यवहार सामान्य होता है लेकिन जैसे ही इंटरकोर्स की बात आती है वे पीछे हट जाती हैं।

इरेक्टाइल डिस्फंक्शन (ईडी): यह समस्या पुरूषों में होती है, इसमें इंटरकोर्स के समय लिंग में इतनी कठोरता नहीं आ पाती कि वह योनि में प्रवेश कर सके, इससे व्यक्ति शर्मिंदगी के कारण स्ट्रेस और एंग्जॉयटी ग्रस्त हो जाता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों से अपनी समस्या शेयर नहीं कर पाते जिससे यह बीमारी जेनोफोबिया में बदल जाती है।

सेक्सुअल परफॉरमेंस का डर: बहुत से लोगों को यह चिंता रहती है कि बिस्तर में उनकी परफॉरमेंस ठीक होगी या नहीं। क्या वे अपने साथी को संतुष्ट कर पायेंगे? कहीं उनका मजाक न बन जाये और वे अपने पार्टनर की नजरों में न गिर जायें इत्यादि? ऐसा सोचने से उनमें गहन मनोवैज्ञानिक परेशानी (इन्टेन्स साइक्लोजिकल डिस्कम्फर्ट) पैदा होती है जिससे वे यौन अंतरंगता से बचते हैं और जब कभी ऐसी स्थिति सामने आती है तो बुरी तरह नर्वस हो जाते हैं।

बाइपोलर डिस्आर्डर: इस बीमारी में व्यक्ति की मनोदशा (मूड) में उन्माद की स्थिति तक परिवर्तन होने से वह अचानक दुखी या उत्तेजना की अवस्था तक खुश हो जाता है। ऐसे लोगों को अपने रोज-मर्रा के काम और व्यक्तिगत रिश्ते निभाने में दिक्कतें आती हैं जो धीरे-धीरे जेनोफोबिया में बदल जाती हैं।

रेप हिस्ट्री: जो लोग कभी बलात्कार या मोलेस्टेशन का शिकार हुए हैं उनमें सेक्स के प्रति नकारात्मक भाव पैदा होने से वे जेनोफोबियक हो जाते हैं।

यौन रोग: हमारे देश में जेनोफोबिया का एक बड़ा कारण यौन रोग हैं। ऐसे रोगों को मेडिकल भाषा में एसटीडी (सेक्सुअली ट्रांसमिटिड डिसीस) कहते हैं, इनमें ह्यूमन पेपिलोमा वायरस संक्रमण, हर्पीज, क्लैमाइडिया इंफेक्शन, एचआईवी/एड्स, स्केबीस, सिफलिस, गनेरिया और कैनक्राइड प्रमुख हैं। इन रोगों से ग्रस्त लोग डाक्टर के पास जाने से डरते हैं कि इससे उनकी बदनामी होगी। हालांकि ये सभी रोग इलाज से पूरी तरह ठीक हो जाते हैं (एड्स को छोड़कर) लेकिन कुछ लोगों में इनका डर इतना ज्यादा बैठ जाता है कि उनमें जेनोफोबिया पनपने लगता है।

लक्षण-सिम्पटम

जेनोफोबिया का दायरा नापसन्दगी, घृणा और डर से ज्यादा बड़ा है। मनोचिकित्सकों के मुताबिक इसमें डर के साथ गहन चिंता (एंग्जॉयटी) शामिल होने से व्यक्ति गम्भीर शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियायें व्यक्त करता है जिनसे दैनिक क्रिया-कलापों में व्यवधान पड़ता है। भय और चिंता से मिश्रित ऐसी प्रतिक्रियायें उस घटना या स्थिति से उत्पन्न होती हैं जिनसे व्यक्ति डरता है। ऐसे फोबिक रियेक्शनों में, कारण (जैसेकि यौन अंतरंगता) के सामने आने से दिमाग में चिंता, घबराहट और भय की तीव्र लहर उठने से शरीर अजीबोगरीब प्रतिक्रियायें देने लगता है। ऐसे एपीसोड में व्यक्ति को पता होता है कि उसका यह डर और रियेक्शन असामान्य है लेकिन वह इसे कंट्रोल नहीं कर पाता। ऐसे में यदि कारण को पीड़ित के सामने से न हटाया जाये तो तबियत और बिगड़ जाती है। दूसरा व्यक्ति उसे समझाने का चाहे जितना प्रयास करे, पीड़ित पूरा जोर लगाकर फोबिया की स्थिति पैदा करने वाले कारण से बचने का प्रयास करता है। यदि कारण देर तक पीड़ित के सामने रहे तो पसीना आने के साथ उसके दिल की धड़कन बढ़ जाती है तथा मतली, चक्कर और सांस लेने में तकलीफ होने लगती है।

यौन अंतरंगता से डरने वाले लोग अपने आपको गुस्से वाला, उदासीन या ठंडा दर्शाते हैं और अकेले में विपरीत सेक्स वाले लोगों से मिलने से डरते हैं। ऐसे लोगों में आत्म सम्मान और दूसरों पर भरोसे की कमी, बात-बात पर क्रोध करना, उदासी, सक्रिय शारीरिक सम्पर्क (जैसेकि गले मिलना, हाथ मिलाना इत्यादि) से बचना, करीबी रिश्ते बनाने से बचना, भावनाओं को साझा करने या व्यक्त करने में असमर्थता, अतृप्त यौन इच्छा, सम्बन्धों में अस्थिरता और सेल्फ इम्पोज्ड सोशल आइसोलेशन जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

पुष्टि और इलाज

जेनोफोबिया की पुष्टि के लिये फिजिकल जांच के साथ ब्लड टेस्ट, एक्स-रे या अल्ट्रासाउंड जैसे इमेजिंग टेस्टों से डाक्टर व्यक्ति में शारीरिक कमी का पता लगाते हैं और कमी होने पर उसका इलाज करते हैं। यदि समस्या योनि संकुचन (वजाइनिस्मस), पैल्विक एरिया में दर्द या यौन रोगों से है तो इसका इलाज दवाओं से और यदि भावनात्मक कारणों से है तो इलाज मनोचिकित्सा से होता है।

मनोचिकित्सा में यौन अंतरंगता के समय उपजे फोबिया के प्रति सोच को बदलने का प्रयास किया जाता है। इस सम्बन्ध में बिहैवियरल थेरेपी (जैसेकि सीबीटी) से व्यवहार में ऐसा परिवर्तन लाते हैं जिससे व्यक्ति जेनोफोबिया ट्रिगर करने वाली स्थितियों का सामना कर सके और उसमें आत्म सम्मान की भावना जगे। साथ ही तर्कहीन डर और सेल्फ डिस्ट्रक्टिव व्यवहार से बचने के तरीके भी सिखाये जाते हैं।

जेनोफोबिया के इलाज में प्रयोग होने वाली एक्सपोजर थेरेपी में डर का सामना करना सिखाते हैं यह डर चाहे सोशल एंग्जॉयटी डिस्आर्डर से हो या जेनोफोबिया से। यह थेरेपी मरीज को दर्दनाक घटना या भय से निजात दिलाने में भावनात्मक रूप से सपोर्ट करती है इसका सिद्धान्त है कि डर से भागने के बजाय उसे भगाओ।

जेनोफोबिया के इलाज में सेक्स थ्रेपिस्ट काफी मददगार होते हैं। ये पेल्विक फ्लोर थेरेपी से योनि की मांसपेशियों में आयी कमी दूर करते हैं। इसमें दवाओं, एक्सरसाइज और स्पर्श चिकित्सा का इस्तेमाल किया जाता है। स्पर्श थेरेपी को योनि में दर्द और मांसपेशियों में ऐंठन के लिये कारगर माना जाता है। इसके अंतर्गत डायलेटर्स या स्ट्रेचर से योनि की दीवारों की लंबाई बढ़ाते हैं। यह थेरेपी उस स्थिति में और भी लाभदायक है जब रेडियेशन थेरेपी से योनि की दीवारें पतली या सूख गयी हों। इसके सेशन सप्ताह में 2 से 3 बार और 20 से 30 मिनट के होते हैं।

जीवन पर असर

इसका जीवन के सभी पहलुओं पर निगेटिव असर पड़ता है, विशेष रूप से रोमान्टिक रिलेशनशिप पर। यदि पार्टनर को इस बीमारी के बारे में न पता हो तो वह अपने आपको तिरस्कृत या फालतू समझने लगता है। इससे ग्रस्त लोग सोशल आइसोलेशन के कारण नशीले पदार्थों का सेवन करने लगते हैं। जेनोफोबिया पीड़ित, सीरियल डेटिंग करते हैं लेकिन रिलेशनशिप जल्द नाकाम होने से डिप्रेशन में चले जाते हैं जिससे उनमें आत्महत्या की प्रवृत्ति पनपने लगती है।

जेनोफोबिया के बारे में डाक्टरों और मनोचिकित्सकों का कहना है कि यह बहुत से मामलों में दूसरी बीमारियों से ज्यादा खराब है। इसमें व्यक्ति का आत्मसम्मान और पहचान समाप्त होने से    इन्फीरियारिटी कॉम्पलेक्स आ जाता है व उसका वैवाहिक जीवन भी बरबाद हो जाता है। इसलिये जैसे ही इसकी पुष्टि हो तुरन्त डाक्टर से मिलें। जेनोफोबिया सही इलाज से पूरी तरह ठीक हो जाता है इसलिये बिना किसी शर्म या संकोच के इसका जल्द से जल्द इलाज करायें। यह बीमारी कितनी भी गम्भीर हो सही इलाज से दो या चार महीने में ठीक हो जाती है। अगर जेनोफोबिया के डर से व्यक्ति डिप्रेशन में चला गया है तो इसका इलाज लम्बे समय तक चल सकता है।

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