टीवी सीरियलों का भी भूतियाकरण!

श्रीशचन्द्र मिश्र
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बाल कलाकारों को मुख्य भूमिका में लेकर प्रसारित हो रहे टीवी सीरियल ‘भूतू’ को महज सहज हास्य के लिए भले ही बनाया गया हो लेकिन पिछले कुछ समय से सीरियलों में एक अलग तरह की धारा बह रही है। शुरुआत हालांकि एक नाटक के तौर पर नायिका के शरीर में आत्मा के प्रवेश से हुई थी। 

सीरियल था ‘ये है मोहब्बते।’ नायिका इशिता एक ‘साजिश’ का पता लगाने के लिए ‘भूत आया भूत आया’ वाला खेल खेलती है। यह अलग बात है कि सीरियल में बेसिर पैर की एक साजिश खत्म होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है। लेकिन आत्मा वाले प्रसंग को कहते हैं कि लोगों ने काफी पसंद किया। उसी का नतीजा है कि एकता कपूर ने इच्छाधारी नागिन की कहानी को लेकर सीरियल ‘नागिन’ के दो सीरियल ही बना डाले। इसके दोनों पार्ट खत्म हो गए हैं। ‘नागिन’ की टीआरपी ऐसी बढ़ी कि एक समय वह नंबर एक सीरियल हो गया। अब एकता कपूर ने ‘नागिन पार्ट थ्री’ लाने की तैयारी शुरू कर दी है। 

नाग-नागिनों के किस्से एक समय थर्ड क्लास हिंदी फिल्मों के विषय होते थे। आज के टीवी सीरियलों के लिए यह मसालेदार नुस्खा हो गया है। पौराणिक आख्यान से जोड़ कर सीरियल ‘नागार्जुन’ बना दिया गया। कुछ और सीरियलों ने भी नाग-नागिन का उप विषय अपनी मूल कहानी में जोड़ कर बदलते शौक के साथ कदम मिलाने की कोशिश की। लेकिन मामला सिर्फ सांपों तक ही सीमित नहीं रहा है। भूत प्रेत और बुरी शक्तियां तेजी से सीरियलों का अनिवार्य हिस्सा बनती जा रही हैं। 

‘दिया और बाती हम’ जैसे सीरियलों में तो फिर भी पाखंड का पर्दाफाश दिखा दिया गया लेकिन बाकी सीरियलों ने अंधविश्वासी मान्यताओं को पुख्ता करने की मानों कसम खा ली है। ‘ससुराल सिमर का’ में यह खेल तो काफी समय तक चला। कभी पाताली देवी तो कभी और कोई देवी। जिसका जब मन चाहे किसी के भी शरीर में डेरा जमा लेती है। इससे भी मन नहीं भरा तो सिमर को मक्खी बना दिया गया। आत्माओं का एक नृत्य भी सीरियल में हो गया और फिर सिमर काली शक्तियों वाले काल की मां बन गई। ‘थपकी प्यार की’ में गोरिल्ला में दुष्ट आत्मा के प्रवेश का नया नुस्खा आजमाया गया। यह बुरा हाल उन सीरियलों का भी है जो हाल फिलहाल शुरू हुए यानी सौ दो सौ एपिसोड के बाद उन्हें पकड़ और रोमांच बनाए रखने के लिए आत्मा का सहारा लेना पड़ा। इस कतार में वे सीरियल भी है जो पांच सात साल से कहानी को तोड़ मरोड़ कर हजार-डेढ़ हजार एपिसोड के बाद भी घिसटते जा रहे हैं। कथित तौर पर क्योंकि उन्हें बहुसंख्यक दर्शक पसंद कर रहे हैं इसलिए न निर्माता को और न चैनल को उन्हें चलाए रखने में दिक्कत है।  

इन सीरियलों का केंद्रीय विषय तो कब का गायब हो चुका है। हर तरह की नौटंकी अपनाई जा चुकी है तो अब नाग नागिन या प्रेतात्मा का सहारा लेना सबको सुविधाजनक लग रहा है। दिलचस्प बात यह है कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ने का दावा करने वाले ये सीरियल सरोकार तो भूल गए हैं, एक हास्यास्पद समाज उन्होंने खड़ा कर दियाहै और लोगों को अंधविश्वास की तरफ धकेल रहे हैं। 
 

सीरियलों का अलग ही समाज
पिछले ढाई दशक में टीवी सीरियलों का रूप रंग कई बार बदला है। शुरुआत दूरदर्शन ने पारिवारिक व पौराणिक सीरियलों से की। निजी चैनलों पर सीरियलों का सिलसिला जब शुरू हुआ तो संकोच और मर्यादा का आधार सिकुड़ने लगा। साजिश और प्लाटिंग का ऐसा जाल कुछ टीवी सीरियलों ने फैलाया कि सभी उसमें उलझ कर रह गए। सास-बहू के चक्रव्यूह से बाहर निकल कर कुछ साल पहले जब छोटे पर्दे के सीरियलों ने सामाजिक व्यवस्था और समाज की कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई तो लगा कि शायद घरेलू मनोरंजन को नई दिशा मिलेगी। 
गुजराती या पंजाबी परिवार की धन कुबेरी चकाचौंध के बाद कस्बाई पृष्ठभूमि को लेकर शुरू हुए इन सीरियलों ने समाज को एक अलग नजरिए से देखने का मंच तैयार किया। समकालीन समाज की मानसिकता और उसकी रूढ़ियों के खिलाफ संघर्ष की आस जगाई। लेकिन ये तमाम क्रांतिकारी सीरियल सैकड़ों एपीसोड का सफर तय करने के बाद उन्हीं पुरानी मान्यताओं का पोषण करते दिखाई देने लगे। 

पचास के दशक की पारिवारिक हिंदी फिल्मों की तर्ज पर बने इन सीरियलों ने समाज की विडंबनाओं को एक बिकाऊ फार्मूले की तरह इस्तेमाल किया। ज्यादातर सीरियल जब अपने बनाए जंजाल में उलझ कर रह गए तो उनमें न तो बाहर निकलने की छटपटाहट नजर आई और न कोई नया सोच परोसने की इच्छा। दर्शक उनके लिए सिर्फ उपभोक्ता बन कर रह गए। 

छोटे शहरों और कस्बों पर बने सीरियलों के परिवारों में परंपरा और संस्कार के नाम पर ऐसा तमाशा चला कि सभी सीरियल एक ही ट्रैक पर आ गए। एक समय था जब सामूहिक परिवारों पर बने सीरियल साजिशों और कुचक्रों पर केंद्रित थे। बाद में कई सीरियलों ने नारी अस्मिता का मुद्दा उठाया पर न उनमें साजिशों के तत्व कम हुए और न कुचक्रों के। बाल विवाह के विरोध में शुरू हुआ ‘बालिका वधु’ थोड़ी भावनात्मक पकड़ बनाने के बावजूद बाल विवाह के खिलाफ कोई सार्थक उपाय नहीं सुझा पाया बल्कि व्यर्थ के संदर्भों में उलझ कर रह गया। 

सिर्फ ‘बालिका बधु’ ही नहीं ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’, ‘साथ निभाना साथिया’, ‘दिया और बाती हम’, ‘ये है मोहब्बते’ आदि का समाज अपनी दुनिया से तो मेल नहीं खा रहा। ज्यादातर सामाजिक सीरियल अपना एक अलग ही समाज बनाए हुए हैं। इस समाज में स्त्री के दो ही रूप हैं। या तो वह शोषण करने वाली कुटिल सास, बुआ, दादी या भाभी है या सब कुछ सहने वाली शोषित अवला। इस पर मुलम्मा चढ़ा दिया गया मान्यताओं और परंपराओं का। 
असल जिंदगी में भले ही महानगरों और छोटे शहरों की सामाजिक स्थितियां बदली हों, सीरियलों की दुनिया रूढ़िगत सोच के आगे बेबस है। दलील दी जाती है कि आज के दर्शकों खास कर महिला दर्शकों को यही नाटकीयता पसंद आती है। इस दलील को मापने का सिर्फ एक ही साधन है- टीआरपी। यह कैसे तय होती है इसे आसानी से समझा नहीं जा सकता। लेकिन इसकी आड़ में सीरियल निर्माता अपने रचे आधे-अधूरे समाज को तर्कसंगत ठहरा ही रहे हैं। 

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