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गिरिजा देवी: पूरब-अंग गायिकी की अंतिम दीपशिखा

आत्मीय जनों में 'अप्पा जी' के संबोधन से विख्यात गिरिजा देवी हमारे बीच नहीं रहीं. वो 88 साल की थीं। सेनिया और बनारस घराने से संबंध रखने वाली गिरिजा देवी 'ठुमरी क्वीन' के नाम से मशहूर थीं। सेनिया बनारस घराने की अंतिम दीपशिखा का मौन होना, जैसे ठुमरी, दादरा, कजरी और चैती का एकबारगी चुप हो जाना है। अपने आत्मीय जनों में 'अप्पा जी' के संबोधन से विख्यात गिरिजा देवी का होना, उप-शास्त्रीय संगीत का एक बड़ा परिसर घेरता था। वे पूरब-अंग गायिकी के चौमुखी गायन का आदर्श उदाहरण थीं।
ख्याल-टप ख्याल, ध्रुपद-धमार, ठुमरी-दादरा, चैती-होली और छंद-प्रबंध, सभी में उनकी दमसाज़ गायिकी की पाटदार उपस्थिति को बहुत सुंदर ढंग से महसूस किया जा सकता है। गिरिजा देवी ने अपनी तालीम सरजू प्रसाद मिश्र और श्री चंद मिश्र से पायी थी, जो बनारस के संगीत को पारंपरिक तरीके से सिखाने के लिए प्रसिद्ध थे।
गिरिजा देवी ने अपने भीतर के कलाकार को सही साबित करते हुए गुरुओं से पाई कला के ज्ञान को इतना माँजा कि उन लोगों ने गायिकी के कुछ दुर्लभ प्रकार भी अप्पा जी को सिखाए।
इनमें गुल, बैत, नक़्श, रुबाई, धरू, कौल कलवाना और बाक़ी ज़रूरी चीजें शामिल हैं। गिरिजा देवी इस मामले में अनूठी कलाकार हैं कि संभवत: वे ही अकेली ऐसी गायिका होंगी, जो बनारस की इन दुर्लभ गायिकी के रूपों को सीखकर प्रदर्शित भी कर सकीं हैं।
अप्पा जी ने गायन में एक निराली राह बनायी। सुरों की शुद्धता, रागों की भावमयी दर्शना और पुकार तान में एक नए ढंग से अकार की संरचना, गज़ब का संगीत निर्मित करती है, जिसमें उनका होना भी ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापन करने जैसा लगने लगता है।
कौन बुढ़वा-मंगल में गा पाएगा?

गिरिजा देवी ने एक बार 'गिरिजा' के लेखन वाले काल-खंड ( 1999-2000) में मुझसे कहा था, ''ठुमरी बिना महफ़िलों का रंग सीखे आ ही नहीं सकती। आपको नायिका के मनोभावों से गुजरकर ही मानिनी या अभिसारिका के भावों को सीखना या समझना होगा, तब कहीं ठुमरी या दादरा सफल हो पाएगी। बिना बजड़े (पानी पर सजी धजी नौका) का तहज़ीब सीखे कौन बुढ़वा-मंगल में गा पाएगा?'' और आश्चर्य की बात यह कि वो ये सारे एलिमेंट्स अपनी शिष्याओं को ज़रूरत के हिसाब से सिखाती और बताती रहती थीं। मेरे देखे कितने ऐसे अवसर आए कि उन्होंने गवाते हुए ही सुनंदा शर्मा, अजिता सिंह, रूपान सरकार को दादी-नानी सरीखी कई घरेलू युक्तियाँ सिखाईं।
उत्कृष्ट बंदिशें

गिरिजा देवी भारतीय शास्त्रीय संगीत का वो अध्याय हैं, जिनके कारण पीलू, कौशिक ध्वनि, पहाड़ी, झिंझोटी, खमाज और भैरवी जैसे रागों को एक नया अर्थ-अभिप्राय सुलभ हुआ है। उन्हीं के चलते साहित्यिक रचनाओं का पहले-पहल उपयोग कजरी और झूला गायन में हो सका। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और चौधरी बद्रीनारायण 'प्रेमघन' के ढेरों पद अप्पा जी ने गाकर अमर बनाए हैं। उन्होंने ख़ुद भी कई कजरियाँ लिखीं, जिनमें 'घिर आई है कारी बदरिया, राधे बिन लागे न मोरा जिया' जैसी उत्कृष्ट बंदिश भी शामिल हैं।
उपशास्त्रीय संगीत के बड़े चौगान में वे अपनी पूर्ववर्ती गायिकाओं मसलन- रसूलनबाई, बड़ी मोतीबाई, सिद्धेश्वरी देवी और निर्मला देवी के साथ मिलकर एक आलोक-वृत्त बनाती हैं, जिसमें बनारस का रस बूँद-बूँद भीना हुआ सुवासित मिलता है। (लेखक यतीन्द्र मिश्र, गिरिजा देवी के प्रामाणिक जीवनीकार हैं, जिनकी किताब 'गिरिजा' साल 2001 में प्रकाशित हुई थी। उसका अंग्रेजी अनुवाद 'गिरिजा: ए जर्नी थ्रू ठुमरी' साल 2005 में आया- 
 

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