हमेशा सराही गई नई कोशिश

(image) ‘शोले’ ने हिंदी फिल्मों का मिजाज और अंदाज बिगाड़ने में खासी भूमिका निभाई। नए विषय तलाशने की सिलसिला कम हो गया लेकिन उसके पहले के सालों में कई ऐसी फिल्में जिन्होंने मनोरंजन की दकियानूसी परिभाषा को बदला और दर्शकों को अलग तरह की फिल्मों से परिचित कराया। सामाजिक मुद्दों पर क्रांतिकारी फिल्में तो बनी हीं, नायक-नायिका की अवधारणा से अलग हट कर भी कई फिल्में बनीं। 1944 में गजानन जांगीरदार के निर्देशन में बनी ‘राम शास्त्री’ ऐसी ही फिल्म थी। सिद्धातों की खातिर घर बार ही नहीं पेशवा दरबार के मुख्य न्यायाधीश का पद तक ठुकरा देने वाले राम शास्त्री के जीवन पर बनी यह फिल्म भारत में तो सराही ही गई, उसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति भी मिली। डाक्टर द्वारका नाथ कोटनीस 1938 में घायल चीनी सैनिकों की सेवा करने के लिए चीन गए थे। वहीं उनकी मौत हो जाती है। शांताराम ने 1946 में इसी पर एक फिल्म बनाई ‘डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी।’ 1948 में उदय शंकर ने नृत्य नाटिका पर ‘कल्पना’ बना कर नया प्रयोग किया। 1950 में पॉल जिल्स की बनाई फिल्म ‘हिंदुस्तान हमारा’ को मील का पत्थर माना जाता है। इसमें महाभारत काल से लेकर तब तक के भारत के इतिहास का चित्रण था। इटली के नव यथार्थवाद से प्रभावित हो कर विमल राय ने 1953 में ‘दो बीघा जमीन’ बनाई जो औद्योगिकीकरण के दौर में पिसते आम आदमी की व्यथा कथा थी। इस फिल्म को कान समारोह में पुरस्कार भी मिला। प्रकाश अरोड़ के निर्देशन में 1954 में बनी ‘बूट पालिश’ अनाथ बच्चों के हालात से लड़कर बेहतर भविष्य तलाशने के संघर्ष पर केंद्रित था। दो साल बाद निर्देशक शंभू मित्रा व अमित मित्रा ने ‘जागते रहो’ में एक अभिनव प्रयोग किया। एक रात की घटनाओं पर बनी यह फिल्म रिश्तों की अलग-अलग तरह से व्याख्या करती है। ‘जागते रहो’ भारत की पहली फिल्म थी जिसे कार्लोवी वारी फिल्म समारोह में ग्रां प्री पुरस्कार मिला। हिंदी फिल्मों का अनिवार्य रंग रहे हैं गीत लेकिन 1937 में वाडिया मूवीटोन ने ‘नौजवान’ में कोई गीत न रख कर जो पहल की उसे बाद में ख्वाजा अहमद अब्बास ने ‘मुन्ना’ (1954), बीआईआर चोपड़ा ने ‘कानून’ (1960) और ‘इत्तफाक’ (1969), मृणाल सेन ने ‘भुवन शोम’ (1969), बासु चटर्जी ने ‘सारा आकाश’ (1969), मणि कौल ने ‘आषाढ़ का एक दिन’ (1971), गुलजार ने ‘कोशिश’ (1972) और ‘अचानक’ (1973) में दोहराया। ये सभी फिल्में गैर पारंपरिक विषयों पर थी। इनमें कला फिल्मों की श्रेणी में आने वाली फिल्में अपनी दुरूहता की वजह से आम दर्शकों को रास नहीं आई, लेकिन सीधे सहज अंदाज में बनी फिल्मों को सराहना मिली। ख्वाजा अहमद अब्बास ने 1957 में सोवियत संघ के सहयोग से ‘परदेसी’ बना कर जो रास्ता दिखाया उस पर बाद में और भी कई फिल्में चलीं लेकिन सबकी निगाह कारोबार पर रही। विषय को संवेदनशीलता से उठाने की कोई कोशिश नहीं हुई। 1964 में सुनील दत्त ने एक व्यक्ति की अतीत की स्मृतियों में डूबे रहने की कहानी को बेहद प्रयोगात्मक तरीके से फिल्माने का जोखिम उठाया। फिल्म में और कोई पात्र नहीं था। सिर्फ आवाजें थी। यह भारत की ही नहीं, विश्व की एक मात्र एक पात्रीय फिल्म है। 1966 में गीतकार शैलेंद्र ने ‘तीसरी कसम’ बनाई। कश्मीर दर्शन कराती रोमांटिक रंगीन फिल्मों की भीड़ में यह काली सफेद फिल्म दब कर रह गई लेकिन सालों बाद उसकी कलात्मकता को महसूस किया गया। बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ (1969), हृषिकेश मुखर्जी की ‘आनंद’ (1971) और श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ (1934) ने हिंदी फिल्मों के मिजाज को अलग-अलग रुप दिए। मुख्य लक्ष्य विषय केंद्रित था। शैली जरूर अलग थी। लेकिन सराहना आम तौर पर हर तरह की फिल्मों को मिली। स्टार या बैनर दर्शकों की पसंद का आधार नहीं बने। उन्हें अनछुए विषयों ने लुभाया। दंत कथाओं पर विमल दत्त ने ‘कस्तरी’ बनाई। सई परांजपे की ‘स्पर्श’, विप्लव राय चौधरी की ‘शोध’, विनोद पांडे की ‘एक बार फिर’, बासु भट्टाचार्य की ‘गृह प्रवेश’, गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश’, श्याम बेनेगल की ‘कलयुग’, शेखर कपूर की ‘मासूम’ और कुंदन शाह की ‘जाने भी दो यारों’ जैसी फिल्मों ने दिखा दिया कि फिल्में रिश्तों और स्थितियों को किस गहराई तक छू सकती हैं। यह सफर उन्नीस सौ नब्वे के दशक तक दर्शकों को हर तरह के विकल्प मुहैया कराता रहा। 1987 में सिंगीतम श्रीनिवास राव ने सिनेमा को भाषाई बाधा से मुक्त कर दिया। उनकी फिल्म ‘पुष्पक’ इस मायने में अब तक की अनूठी फिल्म कही जा सकती है कि उसमें एक भी संवाद नहीं था फिर भी फिल्म का रोचकता से रत्ती भर भी नाता नहीं टूट पाता। भारत-पाक विभाजन की त्रासदी पर एमएस सथ्यू की ‘गरम हवा’ और गोविंद निहलानी की ‘तमस’ एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन गई। इन तमाम उदाहरणों से साफ है कि बाजारवाद के दबाव के बावजूद कई फिल्मों ने एक नई पहचान दी। निर्माताओं ने सृजनात्मक नजरिया अपनाया तो उससे सिनेमा को एक नया रूप मिला। अब नए-नए मोर्चे इस सहस्राब्दी में कारपोरेट के फिल्म बाजार में कूद पड़ने से समीकरण बदले हैं। इससे बड़े सितारों की महंगी फिल्मों को मजबूती जरूर मिली है लेकिन बदली हुई परिस्थितियों ने अलग अंदाज की फिल्मों को विकसित होने का व्यापक मौका भी दिया है। इसी का नतीजा है कि पिछले एक दशक में कई फिल्मों ने नए विषयों पर हाथ आजमाया है। जिन विषयों पर निर्माता पहले फिल्म बनाने से कतराते थे अब उन्हीं फिल्मों की मांग बढ़ती जा रही है। ऐसी दर्जनों फिल्में आ चुकी हैं और दर्जनों पर काम हो रहा है।  बायोपिक यानी किसी विशिष्ट हस्ती के जीवन पर फिल्म बनाने से हमेशा परहेज किया गया। करीब तीस साल पहले जब रिचर्ड एटनबरो ने ‘गांधी’ बनाई और उसके लिए सरकार ने आठ करोड़ रुपए दिए तो यह विरोध तो मुखर रहा कि विदेशी फिल्मकार पर इतनी कृपा क्यों? लेकिन आजादी के बाद किसी भी फिल्मकार ने बायोपिक नहीं बनाई। सरदार पटेल, अंबेडकर व सुभाष चंद्र बोस पर फिल्में उनसे जुड़े ट्रस्टों के पैसे से बनीं। भगत सिंह व चंद्रशेखर आजाद पर छोटी फिल्म बनाने तक ही मामला सीमित रहा। ‘पान सिंह तोमर’ और ‘भाग मिल्खा भाग’ की सफलता ने नई राह खोल दी। मेरी कॉम, धोनी व अजहर के बाद कुछ और खिलाड़ियों पर भी फिल्म की तैयारी चल रही है। सिर्फ खेल से ही नहीं अन्य क्षेत्रों से जुड़ी हस्तियों और असामान्य काम करने वाले सामान्य लोगों पर भी फिल्म बनाने का उत्साह जाग चुकी है। अकेले सालों की मेहनत के बाद पहाड़ काट कर रास्ता बनाने वाले दशरथ मांझी पर केतन मेहता फिल्म बना चुके हैं। बाल धावक बुधिया और नन्हीं उम्र में एवरेस्ट फतह करने वाली पूर्णा पर बनी फिल्मों को इस कड़ी में रखा जा सकता है। साहित्यकार अमृता प्रीतम और गीतकार साहिर लुधियानवी के रोमांस पर बनने वाली फिल्म के अलावा साहित्यकार मंटो, पुलिस अधिकारी के रूप में खास पहचान बनाने के बाद समाज सेवा व राजनीति में सक्रिय किरण बेदी पर भी फिल्म की योजना बन रही है। हिंदी और मराठी में एक फिल्म बनी है ‘डॉक्टर प्रकाश बाबा आमटेः द रियल हीरो’ यह एक व्यक्ति के प्रयास से महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में हेमलकसा गांव के आदिवासियों का जीवन सुधरने पर केंद्रित है। हेमलकसा गांव के माडिया गोंड आदिवासी भूख, अंधविश्वास बीमारी और अशिक्षा से जकड़े हुए थे। 1973 में समाज सेवी बाबा आमटे ने उनके उत्थान के लिए लोक बिरादरी प्रकल्प शुरू किया था। बाबा आमटे के बड़े बेटे प्रकाश आमटे और उनकी पत्नी मंदाकिनी आमटे ने तीस साल की मेहनत से गांव का हुलिया बदल दिया है। वे गांव में ही लगातार रहे और अपने काम का उन्होंने कोई प्रचार नहीं किया। अमेरिका में उनके एक कार्यक्रम से लोगों को पता चला कि एक डाक्टर है जो तीस साल से आदिवासियों की निशुल्क और निस्वार्थ सेवा कर रहा है। फिल्म में डाक्टर प्रकाश की भूमिका नाना पाटेकर ने की। उनकी पत्नी बनी सोनाक्षी कुलकर्णी। करीब साढ़े पांच दशक पहले सोवियत संघ के साथ मिल कर भारत में एक उद्देश्यपूर्ण फिल्म बनी थी- ‘परदेसी’। उसके बाद संयुक्त उपक्रम में करीब डेढ़ दर्जन फिल्में बनीं लेकिन सभी व्यावसायिक दृष्टिकोण से बनी थीं। यह सिलसिला पिछले दिनों टूटा। भोपाल में तेतीस साल पहले हुए गैस हादसे की पृष्ठभूमि पर रवि कुमार के निर्देशन में एक फिल्म बनी है- ‘भोपाल, ए प्रेयर फॉर रेन’। इसमें हॉलीवुड के मार्टिन शीन, काल पेन, मीशा बर्टन के साथ राजपाल यादव व तनिष्ठा चटर्जी जैसे भारतीय कलाकार भी थे। सहारा मूवी स्टूडियो की इस फिल्म की सहनिर्माता कंपनी है- ‘राइजिंग स्टार एंटरटेनमेंट’। फ्रांस के सहयोग से एक फिल्म बन रही है- ‘डिवाइन लवर्स’। इसमें मुख्य भूमिका  इरफान खान व कंगना रानाउत की है। ‘तनु वेड्स मनु’, ‘दिल कबड्डी’ व ‘शाहिद’ जैसे फिल्में बनाने वाले शैलेष आर सिंह के साथ इरफान खान यह फिल्म बना रहे हैं। 2014 में चार जुलाई को पचास साल तक जंजीर से बांध कर रखे गए राजू नामके हाथी की आंखों से बहते आंसू ने लोगों को द्रवित किया ही, अमेरिका के लैरी ब्रेजनर ने उस पर फिल्म बनाने के अधिकार खरीद लिए। ‘गुड मार्निंग विएतनाम’ फिल्म से चर्चा में आए लैरी भारत के पूर्व टेनिस खिलाड़ी विजय अमृतराज के बेटे के साथ मिल कर यह फिल्म बनाएंगे। इन फिल्मों के अलावा भारत में भी कुछ अलग अंदाज की फिल्में बन चुकी हैं और कुछ बनने जा रही हैं। 2015 में ऑस्कर पुरस्कार के लिए भारतीय प्रविष्टि के रूप में चुनी गई ‘लायर्स डाइस’ एक आदिवासी महिला की अपने लापता पति की तलाश से जुड़ी जद्दोजहद पर केंद्रित थी। गीतू मोहनदास के निर्देशन में बनी इस फिल्म में गीतांजलि थापा और नवाजुद्दीन सिद्दीकी मुख्य भूमिकाओं में थे। गीतांजलि थापा को फिल्म में अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। इसी तरह की अनूठी पृष्ठभूमि पर बनने वाली फिल्में इस बात का प्रमाण हैं कि फिल्मों का चेहरा बदल रहा है। वह कल्पना लोक की दुनिया से उतर कर यथार्थ से नाता जोड़ रहा है।
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