‘ट्यूब लाइट’ ने जला दी बत्ती!

श्रीशचंद्र मिश्र

इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि ईद पर सलमान खान की फिल्म रिलीज हो और वह बाक्स आफिस पर फीकी साबित हो जाए। लेकिन ‘ट्यूब लाइट’ अपने नाम के अनुरूप शुरू में टिमटिमाने के बाद भी जबर्दस्त मुनाफे की रोशनी नहीं दे पाई। इतना उसने जरूर कर दिया कि कुछ मिथकों और गलत धारणाओं को गले से लगाए बैठे फिल्मी लोगों को उसने एक करारा झटका दे दिया। किसी खास दिन फिल्म रिलीज करने से बंपर कमाई होने की गारंटी मिलने का मिथक इससे टूट जाना चाहिए।

यह धारणा भी बदल जानी चाहिए कि सिर्फ साख के बल पर सफलता नहीं पाई जा सकती। हालांकि ये दोनों बातें फिल्मकारों और सितारों के गले से आसानी से उतरने नहीं वाली। फिल्म में सलमान के भाई सोहेल खान भी हैं। अरसे से सलमान खान के बल पर खड़े होने की कोशिश सिर्फ सोहेल ही नहीं, दूसरे भाई अरबाज भी कर रहे हैं लेकिन तमाम हाथ पैर मारने के बावजूद वे अपनी अलग हैसियत नहीं बना पाए हैं। इससे एक बार फिर साबित हो गया है कि स्टार भाई के बल पर कोई भाई नहीं चल सकता। पहले ‘हलो ब्रदर’ फिर ‘वीर’ और अब ‘ट्यूब लाइट’ की नाकामी सोहेल के लिए कड़ा सबक है।

जहां तक साख का सवाल है तो उसके बल पर कभी कभार सफलता मिल भी जाती है जैसा दो साल पहले दिवाली और क्रिसमस पर रिलीज हुई दो फिल्मों के साथ हुआ। उन पर उनके दिग्गज निर्देशकों की साख कसौटी पर थी। दिवाली पर सूरज बड़जात्या की फिल्म ‘प्रेम पतन धन पायो’ से साबित होना था कि क्या वे सलमान खान के साथ ही हिट फिल्म दे सकते हैं। क्रिसमस पर संजय लीला भंसाली की ‘बाजीराव मस्तानी’ से टकराने को तैयार रोहित शेट्टी की ‘दिलवाले’ बताने वाली थी।

दो साल में दूसरी बार शाहरुख खान के साथ उनका दम। साल के आखिरी दो महीनों की इन सबसे बड़ी फिल्मों से यह तय भी होना था कि सलमान खान और शाहरुख खान में सुपर कौन है? ‘प्रेम रतन धन पायो’ तो ठीक ठाक चल गई पर ‘दिलवाले’ लुढ़क गई।

ऐसे में यह धारणा टूट गई है कि दोनों खान ही सूरज बड़जात्या और रोहित शेट्टी की सफलता के सूत्रधार है। हालांकि इससे उनके निर्देशकीय कौशल और दर्शकों की नब्ज पहचानने के हुनर की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसके बाद भी अगर उन्हें फिर खुद को साबित करने की चुनौती का सामना करना पड़ा तो उसकी कुछ वजह है। उनके पिछले काम ने उन्हें उस स्थिति में खड़ा कर दिया था जहां उनसे पहले से बेहतर साबित होने की अपेक्षा सभी को थी। खास तौर से फिल्म बाजार जिसकी उम्मीदें दोनों फिल्मों से सबसे ज्यादा थी। कई सफल फिल्में दे चुकने के बाद भी सूरज बड़जात्या और रोहित शेट्टी की साख को दांव पर माना गया तो इंडस्ट्री की उस पुरानी परिपाटी की वजह से जिसमें ताजा नाकामी पिछली सफलताओं के गौरव को धो डालती है।

सूरज बड़जात्या की स्थिति ज्यादा सशंकित है। नए कलाकारों को लेकर कम बजट की फिल्में बनाने के अपने प्रोडक्शन हाउस ‘राजश्री’ के चलन को तोड़ कर उन्होंने भव्य व मंहगी फिल्मों से अपनी जमीन बनाई। पहली फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ बनाने में उन्होंने जितना समय लिया और जितना पैसा लगाया उसे देखकर दादा ताराचंद बड़जात्या ने टिप्पणी भी की- ‘तुम ‘मुगल-ए-आजम’ बना रहे हो क्या?’ फिल्म ने भरपूर पैसा कमा कर दिया। सलमान खान को नई पहचान मिली। अगले आठ साल में सलमान और सूरज बड़जात्या ने ‘हम आपके हैं कौन’ और ‘हम साथ साथ हैं’ में सफलता के नए प्रतिमान कायम किए।

‘मैं प्रेम की दीवानी हूं’ में यह जुगलबंदी टूटी। पहली बार ‘राजश्री’ की किसी फिल्म की शूटिंग विदेश (न्यूजीलैंड) में हुई। लेकिन फिल्म बुरी तरह फ्लाप हो गई। इसके बाद सूरज ने ‘विवाह’ निर्देशित की जो ठीक ठाक रही। अब सोलह साल बाद सलमान के सहारे वे फिर मैदान में उतरे। सलमान के बारे में आज यह स्थिति है कि उनके होने भर से फिल्म के हिट होने की गारंटी मान ली जाती है। लेकिन ‘ट्यूब लाइट’ ने यह भ्रम तोड़ दिया।

यह स्टार सिस्टम की सबसे बड़ी विडंबना ही है कि फिल्म सफल हो जाती है तो क्रेडिट हीरो को मिल जाता है और पिट जाए तो बेचारे निर्देशक को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। सबसे ज्यादा बट्टा उसकी साख को ही लगता है। निखिल आडवाणी की मिसाल सामने है। पहली फिल्म ‘कल हो न हो’ से उनकी जो साख बनी थी वह चार-पांच फिल्मों के लचर नतीजे के बाद ऐसी बिगड़ गई है कि कोई बड़ा स्टार अब उनके निर्देशन में काम करने को राजी नहीं है।

बात सूरज बड़जात्या और रोहित शेट्टी की की जाए तो तुलनात्मक मामले में रोहित ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं। पहली फिल्म ‘जमीन’ से वे कोई असर नहीं दिखा पाए लेकिन अपने समय के मशहूर फाइट मास्टर शेट्टी के इस बेटे ने तीन गोलमाल, दो सिंघम और ‘बोल बच्चन’ से सफलता का ऐसा सिलसिला बांधा कि सातवीं फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ से वे भारतीय सिनेमा में ही नहीं विश्व सिनेमा में एक नया प्रतिमान कायम करने के मुहाने पर पहुंच गए। लेकिन ‘दिल वाले’ ने उन्हें ऐसा झटका दिया कि वे फिर ‘गोलमाल’ की शरण में चले गए है।

कितने भी दिग्गज फिल्मकार क्यों न रहे हों, एक फिल्म का पिटना झेल पाना कभी किसी के लिए आसान नहीं रहा। सोहराब मोदी ‘झांसी की रानी’ के कड़वे अनुभव के बाद फिर कोई बड़ी फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं जुटा सके। ‘मेरा नाम जोकर’ से राजकपूर की साख इतनी खराब हो गई कि उसे बचाए रखने के लिए उन्हें उस फिल्म से वितरकों को हुए घाटे की भरपाई कर्ज लेकर करनी पड़ी। ‘त्रिमूर्ति’ की नाकामी के बाद सुभाष घई को भी यही रास्ता अपनाना पड़ा। मजबूरी जो थी।

साख बिगड़ने के बाद अगली फिल्म के लिए उपयुक्त माहौल बनाना और पर्याप्त फाइनेंस जुटाना मुश्किल हो जाता। दरअसल लगातार हिट फिल्म बना पाना किसी निर्देशक के लिए संभव नहीं हो पाया है। कुछ बदलते समय के मिजाज से मार खा जाते हैं। शांताराम सत्तर के दशक में अपनी पुरानी शैली को नहीं चला पाए। कुछ खुद को दोहराने का मोह नहीं छोड़ पाने के शिकार हो गए।

मनमोहन देसाई व प्रकाश मेहरा की आखिरी फिल्मों में इसका दुष्प्रभाव दिखा। अपने भाई बलदेव राज चोपड़ा, अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी और गुलशन राय सरीखे बाहर के निर्माताओं के लिए यश चोपड़ा ने करीब डेढ़ दर्जन हिट फिल्में बनाईं लेकिन उनमें निरंतरता नहीं बनाए रख पाए। बीच-बीच में ‘आदमी और इंसान’, ‘सिलसिला’,‘काला पत्थर’, ‘विजय’, ‘परंपरा’ व ‘जोशीला’ जैसी नाकाम फिल्में उन्होंने दीं।

फिल्म हिट तो वही खास दिन

दो साल पहले ‘बजरंगी भाई जान’ और फिर ‘सुल्तान’ को जबर्दस्त ईदी मिलने के बाद मान लिया गया था कि सलमान और ईद सफलता की गारंटी है। इस जुगलबंदी से मिली सफलता से सलमान ने भ्रम पाल लिया कि फिल्म कैसी भी हो ईद पर रिलीज होगी तो सुपर हिट तो होगी ही। दो साल पहले तीन दिन में सौ करोड़ रुपए, नौ दिन में दो सौ करोड़ और दूसरा हफ्ता बीतते बीतते सिर्फ भारतीय बाक्स आफिस से ढाई सौ करोड़ रुपए से ज्यादा बटोर कर ‘बजरंगी भाईजान’ से यह भ्रम पला।

भारत समेत पचास देशों में करीब छह हजार प्रिंट, उस पर सेटेलाइट व डिजिटल अधिकार की बड़ी बोली और फिल्म के प्रतीक चिन्ह वाले विभिन्न उत्पादों की मर्केंडाइज बिक्री। कुल मिला कर फिल्म का कारोबार पांच सौ करोड़ रुपए के पार गया। इस सफलता को ईद की मेहरबानी सलमान ने मान लिया। तभी तो ‘बजरंगी भाईजान’ हिट होते ही अगले दो साल की ईद पर ही अपनी फिल्में रिलीज करने का उन्होंने एलान कर दिया। 2016 की ईद पर ‘सुल्तान’ और 2017 की ईद पर ‘दबंग-3’ तय हुई। 2016 में सुल्तान आई, हिट हो गई। ‘दबंग-3’ की रूपरेखा ही नहीं बन पाई तो ‘ट्यूब लाइट’ को उसकी जगह मिल गई। मामला लेकिन फिस्स हो गया।

सवाल यह उठता है कि क्या ‘बजरंगी भाईजान’ और ‘सुल्तान’ सिर्फ इसलिए हिट हुई क्योंकि वह ईद पर रिलीज हुई। फिल्मों की जो विषय वस्तु थी और उसे जिस संवेदनशील तरीके से फिल्माया गया उसे देखते हुए फिल्म कभी भी आती तो सराही जाती। कोई खास दिन फिल्म की सफलता की अगर गारंटी होता तो ‘बजरंगी भाईजान’ से एक हफ्ते पहले रमजान के दिनों में रिलीज हुई ‘बाहुबली’ उससे ज्यादा कमाई नहीं कर पाती। रमजान के दिनों में कोई बड़ी फिल्म रिलीज करना अशुभ माना जाता है।

इसके बावजूद ढाई सौ करोड़ रुपए में बनी। ‘बाहुबली’ के निर्माताओं ने जोखिम मोल लिया और इसका उन्हें अच्छा खासा प्रतिफल भी मिला। साफ है कि फिल्म हिट होती है अपनी खूबियों की वजह से। किसी खास दिन का वह मोहताज नहीं होती। ‘बजरंगी भाईजान’ भी ईद के सहारे के बिना निश्चित रूप से हिट होती। ‘तनु वेड्स मनु रिटंर्स’ तो सामान्य दिनों में रिलीज होकर भी लागत के मुकाबले कमाई के आधार पर साल की सबसे सफल फिल्म साबित हो गई। लेकिन क्या कहा जाए फिल्मी सितारों की मानसिकता का कि वे कुछ खास दिनों को अपने लिए विशेष रूप से लकी मानने लगते हैं।

अजीब स्थिति बन गई है। शाहरुख आमतौर पर दिवाली का मोह छोड़ नहीं पाते। दिवाली पर रिलीज हुई उनकी सभी फिल्में हिट जो हुई हैं। 2015 में अप्रैल में घोषित हुई रोहित शेट्टी की फिल्म ‘दिल वाले’ के धुंआधार शूटिंग और काफी खींचतान के बाद दिवाली तक पूरी हो पाने के कोई आसार नहीं बन पाए तो आमिर खान की कोई फिल्म न होने की वजह से क्रिसमस को शाहरुख ने झपट लिया।

2016 की दिवाली को शाहरुख ने ‘फैन’ के लिए बुक कर लिया था। लेकिन अजय देवगन की ‘सिवाय’ ने उनका खेल बिगाड़ दिया। 2012 की दिवाली पर शाहरुख की ‘जब तक है जान’ और अजय देवगन की ‘सन आफ सरदार’ की रिलीज को लेकर बेहद अप्रिय स्थिति खड़ी हो गई थी। दोनों में से कोई झुकने को तैयार नहीं हुआ। फिल्म उद्योग दो खेमों में बंट गया। तब अजय देवगन के पक्ष में सलमान खान खड़े हो गए थे। आरोप-प्रत्यारोप लगे। स्क्रीन झपटने का खेल चला।

अजय देवगन को मन मुताबिक सिनेमा हाल नहीं मिले तो वे अदालत चले गए। हालांकि वहां से उन्हें कोई राहत नहीं मिली। दोनों की लड़ाई में दिवाली के मौके पर मिलने वाला जो बंपर मुनाफा एक फिल्म को मिल सकता था वह दो में बंट गया। सावधानी बरतते हुए अजय देवगन ने 2016 की दिवाली पर ‘शिवाय’ के लिए पहले ही हक जता दिया।

फिल्मों को कुछ खास दिन पर रिलीज करने की फिल्मी सितारों की लालसा हाल के कुछ सालों में ज्यादा बढ़ी है। फिल्म उद्योग पर बाजारवाद हावी हो जाने का यह असर है। उसने फिल्म निर्माण को एक उत्पाद बना दिया है। एक आकर्षक पैकेज की तरह फिल्में बनने लगी हैं। अब क्योंकि ज्यादातर बड़े सितारे या तो अकेले अथवा हिस्सेदारी में फिल्म बनाने लगे हैं इसलिए फिल्म के व्यावसायिक पहलुओं पर वे विशेष देने लगे हैं। यह बदलाव इस मायने में अच्छा है कि कुछ सीमा तक ही सही, फिल्म निर्माण में अनुशासन और प्रतिबद्धता आई है।

यह प्रतिबद्धता हालांकि फिल्म की गुणवत्ता के प्रति कम उसे बाजार में ज्यादा भाव पर बिकने लायक आकर्षक बनाने पर झुकी हुई हैं। पहले की तरह अब दो तीन साल में फिल्म बनाने का चलन नहीं रहा है। फिल्म की योजना बनते ही एक कमाऊ रिलीज डेट तय कर ली जाती है और उसी समयावधि में फिल्म पूरी करने में सब जुट जाते हैं। सलमान खान ने अस्वस्थता के बावजूद ‘बजरंगी भाईजान’ के लिए लगातार काम किया। चोट लगने के बालजूद दर्द निवारक गोलियां खा कर शाहरुख ने ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ व ‘हैप्पी न्यू ईयर’ पूरी कराई और तब आराम के लिए अस्पताल गए। रिलीज डेट पहले तय हो जाने की वजह से कोई स्टार पिछड़ना नहीं चाहता।

अब कभी कभार अन्य दिनों में हालांकि विशेष मौका देखकर फिल्म रिलीज कर दी जाती है। लेकिन आम तौर पर शुक्रवार को फिल्म रिलीज करने का चलन सनातन है। साल के 52 शुक्रवार। बड़े सितारे कितने? तीनों खान में अजय देवगन, ऋतिक को जोड़ लिया जाए तो कुल पांच। ज्यादा खींचतान की जाए तो उनकी सात-आठ फिल्में ही आती हैं। अक्षय कुमार की फिल्में इन सुपर स्टारों की फिल्मों से ज्यादा कमाई भले ही न कर पाएं लेकिन बाकी की एक-एक फिल्मों की तुलना में अक्षय की हर साल औसतन चार फिल्में सकल कमाई में बाजी मार ले जाती हैं।

फिर भी किसी खास दिन से अक्षय ने मोह नहीं पाला। साल भर में बड़े सितारों या करोड़ों के बजट की 15-20 फिल्में ही बनती हैं। उनके लिए 52 शुक्रवार काफी है। हर फिल्म के लिए कमाई के पर्याप्त मौके मिल सकते हैं। लेकिन सबको चाहिए तीज त्योहार के आसपास की तारीख। दलील यह है कि तीज त्योहारों में छुट्टियां ज्यादा होती हैं। आम लोग खर्च करने के मूड में होते हैं। इसका फिल्म को फायदा मिलता है। कुछ हद तक यह सही भी है। ऐसे में अगर एक खास दिन पर दो-तीन बड़ी फिल्में रिलीज हो जाएं तो क्या हर्ज है? दर्शकों को इससे चयन की सुविधा मिल सकती है। लेकिन जो बाजार तंत्र विकसित हो गया है वह चयन का अधिकार देने की बजाए धूमधाम से अपना उत्पाद लोगों पर थोपने में ज्यादा भरोसा करता है। पहले की तरह फिल्म की श्रेष्ठता का फैसला दर्शकों पर छोड़ने का रिवाज नहीं रह गया है।

प्रचार-प्रसार के तमाम माध्यमों का इस्तेमाल कर फिल्म का ऐसा धुंआधार प्रमोशन किया जाता है कि उसे देखना हर किसी को अनिवार्य लगे। चार-पांच हजार प्रिंट बाजार में फेंक कर और कोई विकल्प छोड़ा नहीं जाता। खास दिनों का सहारा इसलिए लिया जाता है ताकि एक आंधी की तरह पेश की गई फिल्म से लोगों को चौंधिया दिया जाए और जब तक वे उसकी विशेषता या गुणवत्ता को समझ पाएं, मुनाफे की थैली लटका कर फिल्म एक किनारे हो ले। दो हफ्ते में अब बड़ी से बड़ी फिल्मों का दम फूलने लगता है। तब तक पॉलिश् की गई चमक उतर जाती है।

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