स्वार्थ पर टिके रिश्ते

(image) फिअसल में जब व्यावसायिक हित टकराते हैं तो रिश्तों और दोस्ती का कोई मतलब नहीं रह जाता। कुछ समय पहले तक शाहरुख खान से करन जौहर की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। लेकिन निजी स्वार्थ पर टिके होने की वजह से इस रिश्ते का रंग रूप बदलता रहा। निर्देशक के रूप में जमने के लिए करन जौहर ने शाहरुख खान का सहारा लिया। और संकल्प भी किया कि शाहरुख खान के बिना कोई फिल्म निर्देशित नहीं करेंगे। पिछले कुछ साल से उन्होंने कोई फिल्म निर्देशित भी नहीं की, सिवाय ‘स्टूडेंट्स आफ द इयर’ और ‘ए दिल है मुश्किल’ को छोड़ कर। उसमें शाहरुख नहीं थे। अगले सालों के लिए जिन फिल्मों की करन ने योजना बना रखी है, उनमें से किसी में शाहरुख नहीं है। इन दिनों करन सलमान खान के कसीदे पढ़ने में ज्यादा व्यस्त हैं। इस बढ़ती दूरी की असल वजह तो वे दोनों ही जानते होंगे। लेकिन यह एक मामला नहीं है। और इसे अस्वाभाविक भी नहीं कहा जा सकता। किसी ने एक बार सही ही कहा था कि राजनीतिज्ञ सार्वजनिक तौर पर झगड़ते हैं लेकिन बंद कमरे में हम प्याला हो जाते हैं जबकि फिल्मी लोग सार्वजनिक रूप से एक दूसरे का हमदर्द होने का दिखावा करते हैं लेकिन परदे के पीछे एक दूसरे का चेहरा देखना तक गंवारा नहीं करते। पहले भी ऐसा होता था। फर्क यह था कि तब सितारे अपने मतभेद जाहिर नहीं होने देते थे। दिलीप कुमार, देव आनंद व राज कपूर अपने जमाने के स्टार थे। उनमें कभी बनती नहीं थी लेकिन भीड़ के सामने ऐसे व्यवहार करते थे मानों उनमें गजब का याराना है। आज के सितारे यह दिखावा नहीं करते। एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी मौका वे हाथ से नहीं जाने देना चाहते। ईर्ष्या, लालच व अहंकार की लड़ाई फिल्मी दुनिया की कथित एकजुटता की बार बार कलई खोलती रही है। फिल्म इंडस्ट्री में दोस्ती और रिश्तों का आधार आम तौर पर स्वार्थ होता है। जब तक हित सधता है, लोग गले मिलते रहते हैं। जहां हितों का टकराव हुआ नहीं कि अहं सिर उठा लेता और मनमुटाव का बीज पड़ जाता है। ‘प्रभात’ और ‘बांबे टाकीज’ जैसी प्रतिष्ठित फिल्म निर्माण संस्थाएं इसी वजह से बिखरी भीं। 1948 में जब राजकपूर ने बतौर निर्माता-निर्देशक ‘आग’ बनाई तो उसमें संगीत राम गांगुली ने दिया था। ‘बरसात’ में उनकी जगह शंकर जयकिशन को लिया गया। फिल्म बनने के बाद तक राज कपूर संशय में रहे कि रिकार्ड पर संगीतकार के रूप में शंकर जयकिशन का नाम दिया जाए या नहीं? फिल्म हिट हो गई तो राज कपूर ने कई फिल्मों में शंकर जयकिशन को दोहराया। उनकी दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। समय बीता। शंकर-जयकिशन भी स्टार हो गए। लाखों में मेहनताना मिलने लगा। राज कपूर हजारों में देते थे। शंकर ने शिकायत की तो बात इतनी बिगड़ गई कि उनमें बोलचाल बंद हो गई। 1970 में ‘मेरा नाम जोकर’ पिटने के साथ ही 22 साल की यह घनिष्ठ दोस्ती टूट गई। शंकर जयकिशन के अलावा एक जमाने में राजकपूर की मित्र मंडली में गीतकार शैलेंद्र भी थे। शैलेंद्र ने फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पर ‘मारे गए गुलफाम’ पर ‘तीसरी कसम’ जब बनाई तो राजकपूर ने बिना पैसे लिए उसमें काम किया और आर्थिक सहयोग भी दिया। फिल्म को प्रशंसा और राष्ट्रीय पुरस्कार तो खूब मिला लेकिन कामयाबी नहीं मिली। शैलेंद्र पर भारी कर्ज चढ़ गया। ऐसे वक्त में सहारा देने की बजाए राज कपूर ने अपना हिस्सा मांगने के लिए तगादा करना शुरू कर दिया। तनाव और हताशा ने शैलेंद्र की जान ले ली। अभिनेता राजेंद्र कुमार और निर्देशक हरनाम सिंह रवेल में गहरी दोस्ती थी। हरनाम सिंह ने जब ‘मेरे महबूब’ बनाई तो राजेंद्र कुमार ने उन्हें आर्थिक मदद दी। इसी दोस्ती की खातिर राजेंद्र कुमार ने ‘लव स्टोरी’ का निर्देशन हरनाम सिंह के बेटे राहुल रवेल को सौंप दिया। ‘लव स्टोरी’ कुमार गौरव की बतौर हीरो पहली और निर्माता के रूप में उनके पिता राजेंद्र कुमार की भी पहली फिल्म थी। जब फिल्म रिलीज हुई तो उसमें निर्देशक का नाम ही नहीं था। किस्सा दिलचस्प है। राहुल से राजेंद्र नाराज इसलिए हो गए क्योंकि उन्हें लगा कि राहुल राज कपूर की फिल्म ‘बीवी ओ बीवी’ पर ज्यादा मेहनत कर रहे हैं। दिलचस्प यह भी है कि राजेंद्र कुमार और राज कपूर एक समय बहुत अच्छे दोस्त माने जाते थे। कहा जाता है कि कुमार गौरव और राज कपूर की बेटी रीमा की सगाई टूट जाने की वजह से राहुल ने राज कपूर के इशारे पर अंतिम क्षणों में ‘लव स्टोरी’ से नाता तोड़ लिया। हालांकि राजेंद्र कुमार ने इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया। उनका सीधा आरोप था कि 185 दिन की शूटिंग में डेढ़ लाख फुट नैगिटिव फिल्म खपाने के बाद भी राहुल फिल्म पूरी नहीं कर पा रहे थे। मामला अगर कारोबार से जुड़ा हो तो उसमें आम तौर पर लंबे समय तक दोस्ती बनी नहीं रह पाती। ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ का नारा कभी भी ‘दोस्त दोस्त ना रहा’ में बदल जाता है। फिल्मों में कारोड़ों दांव पर लगे होते हैं और मुख्य सवाल व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का भी आ जाता है। व्यावसायिक रिश्ते बनने आसान होते हैं लेकिन उन्हें लंबे समय तक निभाए रखने में प्रतिस्पर्धा आड़े आ जाती है। पैसों के बीच लेन-देन को लेकर मनमुटाव होना तो आम बात है। काला धन लगा हो। माफिया का दबाव हो और कोई लिखत पढ़त न हो तो इस तरह के विवाद स्वाभाविक हैं। हेमा मालिनी के भाई की फिल्म ‘रत्नदीप’ में पैसा एफसी मेहरा ने लगाया। फिल्म बुरी तरह पिट गई तो अपना डूबा हुआ पैसा वसूलने के लिए अपनी फिल्म ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ में एफसी मेहरा ने हेमा से मुफ्त में काम कराना चाहा। इसके लिए कोई लिखित समझौता तो हुआ नहीं था लिहाजा विवाद खड़ा हो गया। लेकिन दोस्ती की तरह फिल्मी सितारों में मनमुटाव भी लंबे समय तक नहीं चलते। व्यावसायिक फायदा अंह को तोड़ देता है लेकिन कुछ समय के लिए। ऐसे ही खट्टे-मीठे रिश्ते अक्सर सामने आते रहते हैं। अभिनेता सनी और निर्देशक राज कुमार संतोषी का रिश्ता इसकी मिसाल है। सनी का करिअर बनाने में हालांकि राहुल रवेल का खासा योगदान भी रहा, जिन्होंने ‘बेताब’, ‘अर्जुन’ व ‘डकैत’ में उन्हें विकास का मौका दिया लेकिन जब सनी एक्शन फिल्मों की एकरसता में उलझ गए थे, राज कुमार संतोषी ने उन्हें ‘दामिनी’, ‘घायल’ व ‘घातक’ में एक आक्रोशित व्यक्ति की अलग पहचान दी जिसे सनी ने कई साल तक दोहराया, इस हद तक कि उनकी यह पहचान जल्दी ही हास्यास्पद हो गई और वही सनी के पराभव का कारण भी बनी। ‘घातक’ के बाद राज कुमार संतोषी से रानी के मतभेद इतने ज्यादा हो गए कि सनी ने उनके साथ किसी भी कीमत पर काम न करने का फैसला कर लिया। तब अनिल शर्मा की फिल्म ‘गदर एक प्रेम कहानी’ से सनी को ताजा और काफी मजबूत सहारा मिल गया था। ‘अपने’ व ‘द हीरो’ ने जब भ्रम तोड़ा तो सनी को फिर मजबूत सहारे की जरूरत आ पड़ी। सनी ने नाता टूटने के बाद राज कुमार संतोषी ने अजय देवगन को पकड़ा लेकिन अजय के कुछ अलग गुट बन गए हैं। खुद संतोषी का भी पुराना जलवा नहीं रहा। लिहाजा राज कुमार संतोषी और सनी देओल के साथ होने का रास्ता साफ हो गया। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। दोनों ही असफलता से जूझ रहे हैं। फिल्मी बिरादरी में मनमुटाव के कई रूप सामने आते रहे हैं। कभी-कभी तो उसकी वजह बेहद अजीब होती है। एक खास दिन फिल्म को रिलीज करने का झगड़ा तो अब आम हो गया है। दिवाली, ईद, क्रिसमस या 26 जनवरी व 15 अगस्त जैसे विशेष मौकों पर फिल्म रिलीज करने का चलन काफी पुराना है। पहले भी इस पर विवाद या साजिश का खेल चलता रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों से जब से हफ्ते दो हफ्ते में सारी कमाई कूट लेने का दौर शुरू हुआ है तब से हर बड़ा निर्माता विशेष मौकों पर आंखें गड़ा लेता है। फिल्म बननी शुरू भी नहीं होती या थोड़ी बहुत बनी होती है तो ‘खास’ दिन पर उसे रिलीज करने का एलान कर सिनेमाघर बुक कर लिए जाते हैं। हर निर्माता ज्यादा से ज्यादा प्रिंटों के साथ अधिकतम सिनेमाघरों पर अपना आधिपत्य जमा लेना चाहता है। इसी होड़ से विवाद होताहै जो कभी-कभी बदमजगी की सीमा लांघ जाता है। अनिश्चितता और संशय का शिकार रहने वाले फिल्म लोगों की गुटबाजी और उस गुटबाजी में दूसरों की फिल्में पिटवाने में पहले भी कभी परहेज नहीं किया गया। यह कोई नहीं समझना चाहता कि फिल्म किसी तिकड़म या विवाद से नहीं चलती। अपनी खूबियों और उन खूबियों के आम दशर्कों को भा जाने से ही फिल्म सफल हो पाती है।
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