Loading... Please wait...

स्टार हमेशा नहीं बिकते!

श्रीशचन्द्र मिश्र
ALSO READ

सलमान की ‘ट्यूब लाइट’ और शाहरुख खान की ‘रईस’ के साथ-साथ ‘जग्गा जासूस’, ‘शेफ’, ‘रंगून’,  ‘भूमि’, ‘सिमरन’ समेत करीब आधा दर्जन फिल्मों के पिट जाने से यह साबित हो गया है कि सिर्फ स्टार के बल पर फिल्मों को नहीं चलाया जा सकता। यह सबक पिछले दो साल से मिल रहा है। 2015 के आखिरी दिनों में धमाकेदार अंदाज में रिलीज हुई दो फिल्मों- ‘दिल वाले’ व ‘बाजीराव मस्तानी’ को मिली सामान्य सफलता ने बता दिया था कि स्टार सफलता की गारंटी नहीं है। 

उनकी तुलना में तब ‘तलवार’, ‘तनु वेड्स मनु रिंटर्स’, ‘प्यार का पंचनामा-2’ जैसी फिल्में ज्यादा सफल हुई। उनमें कोई बड़ा चर्चित चेहरा नहीं था। बस विषय में ताजगी थी जिसे दमदार अभिनय से खूबसूरती से उभारा गया था। इस साल भी ‘सीक्रेट सुपर स्टार’ को मिली सराहना प्रमाण है कि चेहरा हमेशा नहीं चलता, अभिनय ही सिक्का जमाता है।

हिंदी फिल्मों में हमेशा से यह बहस चलती रही है कि स्टार बड़ा होता है या अभिनेता? फिल्म बाजार का जिस तरह का ढांचा है उसमें स्टारों का बोलबाला निश्चित रूप से रहा है। उनका जलवा ज्यादा रहता है। पैसा ज्यादा मिलता है और लोकप्रियता पाने की कोई सीमा नहीं रहती। लेकिन स्टार आते हैं, चमकते हैं और फिर बुझ कर ऐसे गायब हो जाते हैं कि कोई उन्हें याद नहीं करता। 

अभिनय पर केंद्रित रह कर जिन कलाकारों ने फिल्में की उनकी ग्लैमरस छवि भले ही नही बन पाई लेकिन वाहवाही खूब मिली देश में ही नहीं विदेश में भी। समय का अंतर उनकी प्रतिभा और उपलब्धियों को कभी ढंक नहीं पाया। संजीव कुमार बेहद अनुशासनहीन कलाकार थे। सेट पर देर से पहुंचना, कभी भी निकल जाना और खाने पीने का कोई परहेज न रखना उनकी आदत में शुमार था। फिर भी गुलजार ने उन्हें कई फिल्मों में लिया जबकि उस समय के सभी स्टार उनके साथ काम करने को लालयित थे। 

वजह गुलजार बताते हैं- ‘परिचय’, ‘कोशिश’, ‘आंधी’ और ‘मौसम’ में उन्हें देखिए। लगेगा नहीं कि एक व्यक्ति ने ये फिल्में की। अपनी पहचान भुला कर फिल्म के चरित्र को जीवंत कर देने की उनकी क्षमता की वजह से उनकी तमाम व्यक्तिगत खामियों के बावजूद मैं उन्हें लेता था।’

शुरू से फिल्मों की सफलता का आधार रहे हैं कलाकार। कलाकारों की दो श्रेणिया हैं- स्टार और अभिनेता। स्टार वह जिसके नाम पर फिल्म चले और अभिनेता वह जो अपने अभिनय के दम पर फिल्म को यादगार बना दे। बेहतर कौन है? इस पर हमेशा बहस होती रही है। हिंदी फिल्मों ने दोनों वर्गों के कलाकारों को देखा और सराहा है। कभी कभी दोनों एक दूसरे के पूरक भी बनते रहे हैं। 1913 में पत्नी के गहने गिरवी रख कर और इधर-उधर से पूंजी जुटा कर, महिला कलाकार नहीं मिले तो पुरुषों को महिला बनाकर दादा साहब

फाल्के ने जब भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई तो वह एक प्रयोग भर था। 
फिल्म निर्माण को कारोबार बनाने की तब कोई सोच भी नहीं सकता था। लेकिन दादा साहब फाल्के के प्रयोग ने दर्शको को इतना चमत्कृत कर दिया कि देखते-देखते बंबई (अब मुंबई), पुणे, कोल्हापुर और कलकत्ता (अब कोलकाता) में फिल्म कंपनियां खुलनी शुरू हो गई। कलाकारों व तकनीशियनों को मासिक वेतन पर रख कर फिल्म बनाने का सिलसिला करीब बीस साल चला। 1931 में फिल्मों को आवाज मिलने, फिल्मों का प्रसार बढ़ने और फिल्मों से होने वाली आय ने कलाकारों की महत्वाकांक्षाएं जगाई। अपनी हैसियत का आभास होते ही वे कंपनी के बंधन से मुक्त होने का रास्ता तलाशने लगे। व्यक्तिगत मतभेदों से फिल्म कंपनियों के हिस्सेदारों में दरार पड़ने लगी। 

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फिल्म कंपनियों की आर्थिक हालत बिगड़ने लगी। इस बीच नई सोच और नए साधनों के साथ ऐसे फिल्मकार सामने आए जिन्होंने फिल्म निर्माण को एक व्यवस्थित व्यवसाय का रूप दिया। स्टार सिस्टम की शुरुआत इसी दौर में हुई। कलाकार अपनी कीमत तय करने लगे और निर्माता उनकी बाजार हैसियत भांप कर उन्हें ज्यादा पैसा आफर करने लगे। यहीं से कलाकारों को दो वर्गों में बांटने का सिलसिला शुरू हुआ। स्टार वह जिसकी अदाए देखकर दर्शक परदे पर सिक्के फेंके और अभिनेता वह जो अपनी निजता भूल कर फिल्म चरित्र से एकाकार हो जाए।

दोनों तरह के कलाकारों के बीच श्रेष्ठता का पैमाना अभिनेता की तरफ मुड़ा है लेकिन व्यावसायिक स्तर पर स्टार उस पर हावी होता आया है। यह अलग बात है कि स्टार का जीवन हमेशा नहीं तो आम तौर पर छोटा रहा और जब तक वह चमकता है, उसकी पूछ बनी रहती है और जैसे ही वह धुंधलाया उसे याद करने की जहमत भी कोई नहीं उठाता। अभिनेता फिल्म की सफलता की हमेशा गारंटी नहीं रहता लेकिन उसे भुला पाना आसान नहीं होता। कुछ कलाकार स्टार और अभिनेता दोनों के चौखटे में फिट हुए जैसे अशोक कुमार, संजीव कुमार और अमिताभ बच्चन।

स्टार का मैनरिज्म होता है जो एक दौर में बिकता है। और इसी बिकने के चक्कर में स्टार अपनी अदाओं के जंजाल से मुक्त नहीं हो पाता। भूमिका कोई भी हो उस पर स्टार हावी रहता है। भारत भूषण अपने जमाने के इतने बड़े स्टार थे कि जिन दिनों इंपाला गाड़ी को कौतुक की नजर से देखा जाता था वे एक इंपाला में साल भर से ज्यादा नहीं चलते थे। लेकिन अभिनय क्योंकि उनका आधार नहीं था इसलिए स्टारडम हटा तो गुजारा चलाने के लिए उन्होंने छोटी मोटी भूमिकाएं की। 

राजेंद्र कुमार हिंदी फिल्मों के पहले जुबली कलाकार थे। फिल्म में उनके होने का एक ही मतलब होता था कि फिल्म कम से कम पच्चीस हफ्ते जरूर चलेगी। उन्होंने सौ से ज्यादा फिल्में की लेकिन उनमें एक भी ऐसी नहीं है जिसे उनके अभिनय के लिए याद किया जाए। राजेश खन्ना पहले और अब तक के एकमात्र सुपर स्टार कहे जा सकते हैं। उनकी लोकप्रियता को कोई भी स्टार टक्कर नहीं दे पाया। एक ‘आनंद’ को छोड़   कर बाकी किसी भी फिल्म में वे अपने मैनरिज्म को नहीं छोड़ पाए।

 जीतेंद्र, धर्मेंद्र, मनोज कुमार, दिलीप कुमार, संजय खान समेत दजर्नों ऐसे नाम गिनाए जा सकते हैं जो अभिनय कर सकते थे लेकिन व्यावसायिक मांग की वजह से अपने विशिष्ट अंदाज छोड़ने का जोखिम नहीं उठा पाए। आज के तीनों खान हों या अजय देवगन व ऋतिक रोशन जैसे स्टार, अभिनय पर कम अपनी लोकप्रियता पर ज्यादा आश्रित हैं। 

स्टार बनने और उससे कुछ समय के लिए ही सही बेहताशा लोकप्रियता और पैसा पाने का मोह छोड़ कर अभिनय की तरफ ज्यादा केंद्रित रहने वालों में पहला नाम आता है मोतीलाल का। वे स्टार नहीं थे। उनके नाम पर फिल्में बिकती नहीं थीं। लेकिन ‘देवदास’, ‘मिस्टर संपत’, ‘परख’, ‘जागते रहो’ जैसी दर्जन भर फिल्में उनके अभिनय की वजह से याद की जाती हैं। लटकों-झटकों का इस्तेमाल किए बिना स्वाभाविकता से फिल्मी चरित्र को निभाने वाले बलराज साहनी ‘सीमा’, ‘अनुराधा’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘गर्म कोट’, ‘काबुली वाला’ आदि फिल्मों में नायक भी रहे और सफल भी हुए। 

संजीव कुमार चॉकलेटी हीरो कभी नहीं बन पाए लेकिन अभिनय का सहारा लेकर वे अपने वक्त के तमाम बड़े स्टारों पर हावी रहे। रंगमंच से आए और कला फिल्मों से संवरे नसीरुद्दीन शाह तो इस बात की मिसाल हैं कि अभिनेता कितना लंबा और कितना विविधतापूर्ण सफर तय कर  सकता है। तथाकथित व्यावसायिक फिल्मोंम भी उन्होंने अभिनय का रंग जमाया और इस मिथक को तोड़ दिया कि सिर्फ स्टार ही फिल्म को चला सकते हैं। उन्हीं की कड़ी में अनुपम खेल, ओमपुरी पंकज कपूर, रघुवीर यादव, राज कुमार राव, इरफान खान व नवाजुद्दीन सिद्दीकी आदि का भी नाम लिया जा सकता है।

एकदम से ऐसा भी नहीं है कि सभी स्टार अभिनय क्षमता के मामले में कमजोर रहे हैं। दिलीप कुमार स्टार भी थे और विलक्षण अभिनेता भी। उनकी अभिनय शैली की नकल कई पीढ़ियों के कलाकार कर चुके हैं। राजेश खन्ना अपनी खास अदाओं तक ज्यादातर फिल्मों में भले ही सीमित रहे हों लेकिन जब ‘आनंद’, ‘नमक हराम’ और ‘बावर्ची’ में उन्हें खुद को बेहतर अभिनेता साबित करने का मौका मिला उन्होंने इसका भरपूर फायदा उठाया। बासु भट्टाचार्य की ‘आविष्कार’ में भी उन्होंने लीक से हट कर भूमिका की। स्टार और अभिनेता दोनों अभिनय करते हैं। स्टार जनता की रूचि के हिसाब से और अभिनेता कहानी की जरूरत के मुताबिक। स्टार को अभिनेता की श्रेणी में आने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। बाजार के रुख की उपेक्षा से कई तरह की आशंकाएं जुड़ जाती हैं। 

अभिनेत्रियों के लिए एक खास छवि में कैद रहना जरूरी माना जाता रहा है। मीना कुमारी ने ‘मिस मेरी’ में कॉमेडी की और ‘आजाद’ व ‘कोहिनूर’ में चुलबुलाहट भी दिखाई लेकिन उन्हें याद किया जाता है- ट्रेजडी क्वीन के रूप में। नूतन ने स्टार और अभिनेत्री दोनों का दायित्व बखूबी निभाया। रेखा उन्हीं की राह पर चलीं लेकिन उन्हीं की समकालीन हेमा मालिनी स्टार की बंदिशों में ज्यादा उलझी रहीं।  स्मिता पाटील और शबाना आजमी ने अभिनय के नए मानदंड कायम किए और कमर्शियल फिल्मों में भी अपनी उपयोगिता साबित की। आज विद्या बालन और कंगना रानाउत यह मोर्चा संभाले हुए हैं। इसी कड़ी में कोंकणा सेन, निमरत कौर, स्वरा भास्कर आदि का भी नाम लिया जा सकता है। 

स्टार अक्सर आइकॉन भी बन जाते हैं लेकिन उनकी हैसियत फिल्म की सफलता पर टिकी होती है। दो फिल्में पिटी नहीं कि गाड़ी उलटी पटरी पर दौड़ने लगती है। स्टार का नाम न पहले सफलता की गारंटी था और न आज है। फिर भी स्टारों का जलवा ज्यादा रहता है क्योंकि उनके नाम पर फिल्म आसानी से बिक जाती हैं। लेकिन जब अभिनय की बात आती है तो फिल्म में सहजता और स्वाभाविकता बनाए रखने वाले अभिनेता की याद रहती है। 

कुछ साल पहले नसीरुद्दीन शाह ने अभिनय छोड़ने की इच्छा जताई थी। छोड़ नहीं पाए। करीब आधा दशक का उनका फिल्म सफर आज भी पूरे सम्मान से जारी है। उनका फिल्म में होना बाकी कलाकारों को अतिरिक्त सजग कर देता है। स्मिता पाटील को गए हुए दो दशक हो गए। आज भी उनकी याद की जाती है। शबाना आजमी इन दिनों कम सक्रिय हैं पर जब भी कोई फिल्म करती है उनका अभिनय फिल्म का सबसे मजबूत सहारा बन जाता है। स्टार तात्कालिक रोमांच जगा जाता है लेकिन अभिनेता अपनी एक अमिट याद छोड़ जाता है।
 

463 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2016 nayaindia digital pvt.ltd.
Maintained by Netleon Technologies Pvt Ltd