नुस्खे फिल्म को सफल कराने के

(image) फिल्मों को फलने-फूलने का मौका देने में पिछले एक दशक में तेजी से बदली परिस्थितियों का खासा योगदान रहा है। पहले निर्माता फायनेंसरों से भारी ब्याज पर रकम लेकर या वितरकों की आर्थिक मदद से फिल्म बनाते थे। अब फिल्म शुरू होते ही उसकी मार्केटिंग की कवायद शुरू हो जाती है। फिल्म कारपोरेट उसके वितरण अधिकार खरीद लेते हैं। टीवी चैनल सेटेलाइट अधिकार के लिए मुंहमांगी रकम देने को तत्पर रहते हैं। सलमान खान की फिल्म ‘जय हो’ के बनने से पहले ही 110 करोड़ रुपए फिल्म के निर्माता सोहेल खान की जेब में आ गए थे। ‘सुल्तान’, ‘दंगल’ और ‘बाहुबली-2’ ने तो रिलीज से पहले ही लागत से ज्यादा पैसा वसूल लिया। फिल्म रिलीज होने के तीन महीने बाद उसे टीवी पर दिखाने की व्यवस्था ने सैटेलाइट अधिकार पाने की ऐसी होड़ मचा दी है कि बड़े स्टारों की फिल्म के लिए चालीस-पचास करोड़ रुपए मिलना अब आम हो गया है। नई व्यवस्था में कोई भी निर्माता फिल्म रिलीज कर उसकी गुणवत्ता के आधार पर कमाई करने का सपना नहीं देखता। व्यापक प्रमोशन के जरिए फिल्म के प्रति उत्सुकता जगा कर शुरुआती दिनों में ही ज्यादातर कमाई कूट लेने की रणनीति अब ज्यादा फल फूल रही है। इसी ने प्रिंटों की संख्या बढ़ा दी है। 1960 में ‘मुगल ए आजम’ के सौ प्रिंट रिलीज हुए थे। 1975 में ‘शोले’ के सात सौ प्रिंट निकाले गए। अब तो छोटी से छोटी फिल्म के हजार प्रिंट जारी होना आम हो गया है। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ के 3600 प्रिंट आए तो ‘कृश-3’ ने चार हजार प्रिंटों से दर्शकों पर धावा बोला। ‘धूम-3’ 4500 प्रिंटों के साथ रिलीज हुई। हजारों प्रिंट के साथ फिल्म को रिलीज करने के अलावा फिल्म के बारे में लोगों में उत्सुकता जगाने के लिए भी अब भरपूर कवायद हो रही है। फिल्म के सितारे टीवी सीरियल तक में अपना चेहरा दिखाने पहुंच जाते हैं। ‘थ्री इडियट्स’ के प्रचार के लिए आमिर खान हुलिया बदल कर कई शहरों में घूमे। ‘पीके’ के लिए न्यूड फोटो छपवा कर उन्होंने शालीनता बनवा अश्लीलता की बहस छिड़वा दी है। फिल्मों की कमाई बढ़ने की एक वजह ओवरसीज मार्केट का विस्तार भी है। दुनिया के कोने कोने में बस गए भारतीय मूल के दर्शक अपने पसंदीदा सितारे की फिल्म को सिर माथे लगा लेते हैं। सहारा अब भारतीय दर्शकों का ही नहीं रहा है। ‘डान-2’ का प्रीमियर बर्लिन में हुआ और उसमे जुटने वाली भीड़ में ज्यादातर जर्मन थे। अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, खाड़ी के देश, पाकिस्तान जैसे पारंपरिक बाजारों को लांघ कर फिल्में अब लेटिन अमेरिकी देशों, अफ्रीकी महाद्वीप, इजराइल, कैरेबियाई देशों और स्वीडन व नार्वे जैसे देशों में जड़े जमा चुकी हें। वहां की भाषाओं में फिल्म को डब करने का नया चलन शुरू हो गया है। ‘धूम-3’ को तेरह भाषाओं में डब कर पूरी दुनिया में फैला दिया गया। आमिर खान ने ‘दंगल’ को चीन ले जा कर नया रास्ता खोल दिया है।
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