गणतंत्र के कितने रूप दिखे!

इस साल 26 जनवरी को समूचे देश में गणतंत्र के अनेक रूप देखने को मिले। एक रूप राजपथ पर सरकारी आयोजन का था तो दूसरा रूप दिल्ली के शाहीन बाग में धरने पर बैठे हजारों लोगों का था। राजपथ पर भी तिरंगा लहराया जा रहा था कि राष्ट्र गान गाया जा रहा था तो शाहीन बाग में भी तिरंगे लहरा रहे थे और राष्ट्र गान के साथ साथ भारतीय संविधान की प्रस्तावना का भी पाठ हो रहा था। दिल्ली में राजपथ और शाहीन बाग एक प्रतीक हैं। इन्हें देश के अलग-अलग राज्यों में अलग अलग जगहों पर हुए सरकारी और गैर-सरकारी आयोजनों से जोड़ कर भी देखा जा सकता है।

दिल्ली के शाहीन बाग जैसे आयोजन लगभग सभी राज्यों में हुए। हर राज्य में कहीं न कहीं शाहीन बाग बना हुआ है। केरल में संशोधित नागरिकता कानून के विरोध में 631 किलोमीटर लंबी मानव शृंखला बनाई गई। भारतीय गणतंत्र का एक रूप वह भी दिखा। असल में गणतंत्र दिवस के मौके पर होने वाले सरकारी कार्यक्रम हों या नागरिकता कानून के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के दौरान हुए कार्यक्रम हों दोनों का मकसद भारतीय संविधान और गणतंत्र की रक्षा करना और उसे मजबूत करना ही है। अगर राजपथ पर भारत की समावेशी और बहुलतावादी संस्कृति की झलक दिखाने की जरूरत है तो सरकार के किसी फैसले के विरोध में लोगों का अहिंसक प्रदर्शन करना भी उतना ही जरूरी है। ध्यान रहे गणतंत्र दिवस के मौके पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हिंसा से किसी मसले का हल नहीं निकलता है और एकजुटता ही असली ताकत है। बहरहाल, अगर गणतंत्र को बचाने के लिए राजपथ पर भारतीय सेना की ताकत और शौर्य का प्रदर्शन जरूरी है तो जनता का सड़कों पर उतर कर लोकतंत्र की ताकत दिखाना भी उतना ही जरूरी है।

असल में प्रतिरोध ही लोकतंत्र की असली ताकत है और यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि गणतंत्र का मतलब ही लोकतंत्र है। ब्रिटेन दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र है पर वह गणतंत्र नहीं है। वहां महारानी का शासन है। पर भारत ने ब्रिटेन के वेस्टमिनिस्टर मॉडल को अपनाने के बावजूद लोकतांत्रिक गणतंत्र का विकल्प चुना, जिसमें राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष दोनों ही चुने जाते हैं। यह लोकंतत्र में भारत की ज्यादा गहरी आस्था का प्रतीक है। तभी लोकतंत्र और गणतंत्र दोनों को बचाने के लिए अहिंसक प्रतिरोध को उस हथियार का समय समय पर इस्तेमाल बहुत जरूरी है, जिसके दम पर महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई की बुनियाद मजबूत की थी।

गणतंत्र दिवस के मौके पर प्रतिरोध का मुद्दा संशोधित नागरिकता कानून का है। केंद्र सरकार ने नागरिकता कानून में बदलाव करके यह प्रावधान किया है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर भारत आने वाले गैर मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी जाएगी। भारत में न तो संविधान संशोधन नई बात है और न नागरिकता कानून में संशोधन नई बात है। पहले कई बार नागरिकता कानून में बदलाव किया जा चुका है। इस बार के बदलाव को लेकर विवाद कई कारणों से है। पहला कारण तो यह है कि इसमें धर्म के आधार पर नागरिकता देने या नहीं देने का प्रावधान किया गया है, जबकि भारत का संविधान धर्म के आधार पर भेदभाव की इजाजत नहीं देता है। दूसरी वजह यह है कि सरकार के मंत्रियों और भाजपा के नेताओं ने अपने बयानों से इस नागरिकता कानून को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी से जोड़ दिया है। तभी प्रधानमंत्री की सफाई के बावजूद लोगों को यकीन नहीं हो रहा है कि सरकार एनआरसी नहीं लाएगी।

तभी धीरे धीरे जन प्रतिरोध का दायरा और उसकी तीव्रता बढ़ती जा रही है। नागरिकता कानून के खिलाफ चल रहा प्रतिरोध आंदोलन राजनीतिक नहीं है। कोई भी पार्टी इसका नेतृत्व नहीं कर रही है। हो सकता है कि परदे के पीछे से इसकी व्यवस्था करने वाले संगठन सक्रिय हों पर प्रत्यक्ष रूप से यह जन प्रतिरोध ही दिख रहा है, जिसमें लोग अपने आप जुड़े हैं। उनका दावा है कि उनका प्रयास लोकतंत्र और गणतंत्र को बचाने का है, भारतीय संविधान को बचाने का है। अब सवाल है कि इसमें सरकार की क्या भूमिका बनती है? सरकार मान रही है कि लोकतंत्र में सबको शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है। इसका मतलब है कि कानून बनाने वाली सरकार और उसका विरोध करने वाली जनता दोनों अपनी अपनी जगह पर सही हैं तो क्या फिर अनंतकाल के लिए ऐसा गतिरोध बने रहने दिया जा सकता है?

क्या यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह प्रदर्शन कर रहे अपने लोगों से बात करे, उनकी दलीलें सुने, उनको अपनी बात समझाए और आंदोलन खत्म कराने का प्रयास करे? यहां महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में किए गए एक अहिंसक प्रतिरोध आंदोलन की याद दिलाना जरूरी है। दक्षिण अफ्रीका के ब्रिटिश प्रशासन ने भारत में हिंदू और मुस्लिम समाज में प्रचलित विवाह की मान्यताओं को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। इसके विरोध में गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह किया। तब भारत के वायसराय लॉर्ड हेडिंग्ले ने अपना प्रतिनिधि दक्षिण अफ्रीका भेजा। उसने गांधी से बात की और उनकी मांगों को मानते हुए उनका सत्याग्रह खत्म कराया। सोचें, हजारों किलोमीटर दूर बैठ कर किए गए गांधी के सत्याग्रह ने ब्रिटिश शासन को उनसे बात करने और अपने नियम बदलने के लिए मजबूर कर दिया पर राजधानी दिल्ली में बैठी सरकार अपने नागरिकों से बात नहीं कर रही है। क्या ऐसे ही लोकतंत्र और गणतंत्र बचाने का पुनीत कर्तव्य पूरा होगा? क्या सरकार को अहिंसक प्रतिरोध कर रही अपनी जनता से संवाद नहीं करना चाहिए?

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