पूरा मुल्क भयभीत!

दायरा फिर देश से ले कर आम नागरिक तक है। देश आज चीन से लड़ने की दुविधा में है। चीन पर आर्थिक निर्भरता भयावह है लेकिन कुछ नहीं कर सकते। अदानी-अंबानी की देशी और विदेशी अमेजन जैसी चार-पांच कंपनियों का एकाधिकार पूरे देश को पिंजरे में बदल डाल रहा है लेकिन न विकल्प है और न समझ है कि कैसे ईस्ट इंडिया कंपनी वाला शोषण रोकें। आंकड़ों में न जाएं लेकिन सोचें कि भारत के कितने प्रतिशत उद्योगपति, उद्यमी, कारोबारी आज वक्त काट रहे होंगे?ये भारत राष्ट्र-राज्य के पिंजरे में आजादी, सुकून, स्वतंत्रता फील कर रहे हैं या भय, चिंता, अनिश्चितता वघुटन?

आम आदमी याकि 138 करोड़ लोगों में बहुसंख्यकों पर भय का पाला कैसे पड़ा इसे पूरी दुनिया ने तब देखा जब लाखों परिवार पैदल ही घर के लिए चल पड़े! भारत क्या है और पिंजरे व पिंजरे के मालिकों की क्या बुद्धिमता है, इसे दुनिया ने मार्च-अप्रैल के पंद्रह दिनों में जैसे जो जाना है तोउसका लब्बोलुआब था कि भय ने प्रधानमंत्री से बिना आगा-पीछा सोचे लॉकडाउन का फैसला करवाया तो लोग भी भय, खौफ में यह सोच पैदल चल पड़े कि मरना ही है तो घर जा कर मरेंगे!

क्या मनोविज्ञान है? चुनौती, खतरा, हमला, आपदा-विपदा है तो भागो। साहस, निडरता, निर्भयता इसलिए नहीं क्योंकि न तो संस्कार वैसे पैठाए गए हैं और न भरोसा सिस्टम व सरकार पर है। फिरनिडरता, निर्भयता में शरीर तभी बुना हुआ होता है जब उसका दिमाग, बुद्धि अपनेपर भरोसा लिए हुए हो।

मैं कई बार लिख चुका हूं इस बात को कि भारत में हिम्मत नहीं हुई कि अफगानिस्तान में वह सैनिक भेजे। अमेरिका, पश्चिमी देश चाहते रहे कि भारत अपने इलाके में महाशक्ति की तरह को रोल अपनाए। लेकिन दिल्ली सल्तनत के हिंदू राजाओं की मध्यकाल में भी कांधार पार जा कर सेना तैनात करने की हिम्मत नहीं थी तो एटमी ताकत वाले भारत की भी अफगानिस्तान में सैनिक चौकसी की हिम्मत नहीं हुई। प्रधानमंत्री दफ्तर हो या नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, विदेश मंत्रालय हो या रक्षा-गृह और वित्त मंत्रालय सब इस हिंदू तासीर में नेहरू से लेकर मोदी के वक्त तक इस कूटनीति में रहे है कि हमे तेवर नहीं दिखाने हैं। लड़ना नहीं, बुद्धम् शरणम् गच्छामी होना है? वाघा पर मोमबत्ती जलानी है, पंचशील का राग अलापना है! तभीभारत का लड़ना दुश्मन के हमलों से, जंग छेड़ने, आंतकी वारदातों से हुआ! दुश्मन ने भारत की जमीन कब्जाई। तब भी कब्जाई, अब भी कब्जाई तो अर्थ क्या निकलेगा? निडरता, निर्भीकता, बहादुरी का या भय व खौफ में जीने का?

भय से चीन को भारत जैसे पटा रहा है उसे यदि वैश्विक सिस्टम, महाशक्ति के आगे अनुनय-विनय है तो इस अनुभव में ही सभी हिंदुओं का औसत जीवन गुजरता है? हजार साल की गुलामी ने सत्ता और सत्ता के सिस्टम, हाकिम और उनके पदों को औसत हिंदू के लिए इतनी बड़ी चीज बना दी है कि भारत का कैबिनेट सचिव हो या सुप्रीम कोर्ट का जज या देश के नंबर एक अखबार का संपादक या मुख्यमंत्री, मंत्री सभी की बुद्धि से बड़ा क्योंकि पद है व पद के साथ सत्ता का डंडा निज जीवन की सुरक्षा है तो उसे वह कहीं गंवा न बैठे, इस भय में भारत का श्रेष्ठिजन हमेशा रहेगा और वह सब करेगा, जिसकी किसी और सभ्य देश, किसी बहादुर कौम में कल्पना नहीं की जा सकती।

कई मायनों में दिल्ली सल्तनत की जो रचना मुगलों के मध्यकाल में थी वह अंग्रेजों के वक्त रही और नेहरू से मोदी के वक्त में भी चिरंतन है। बहुत किस्से हैं कि लालकिले में बैठा बादशाह चांदनी चौक के कोतवाल से राज करता था। वह नागरिक, व्यापारी, समाज, धर्म सभी को हांकता था और टैक्स, नजराना सब वसूलवाता था। कोतवाल याकि डंडे याकि फरमान की व्यवस्था को अंग्रेजों ने जस का तस अपनाए रखा। नियम-कानून नए बनाए लेकिन सबका कोर उद्देश्य लोगों को गुलाम बनाए रखना था। आजादी मिली तो भी चांदनी चौक का कोतवाल जस का तस। फिर भले उसका इंस्पेक्टर राज वाला रूप बना हो या अफसर-जनप्रतिनिधियों द्वारा जनता को हांके जाने का! भारत के नागरिक शास्त्र में नागरिक को स्वतंत्रचेता बनाने के पाठ नहीं पढ़ाए गए हैं, बल्कि उसे बार-बार राज्य- सरकार, लीडर के प्रति कर्तव्य में, मोह में बांधने की वह कोशिश हुई जो बिना शिक्षा के पहले भी भक्ति युग से थी!

तभी आज सर्वत्र भय और चिंता कि जान बचेगी या नहीं? खाने के लिए अनाज-रोजगार होगा या नहीं?धंधा चलेगा या नहीं?कैसे सरकार की नजरों से बचा कर धंधा करें? पड़ोस के मुसलमान का क्या करें?पाकिस्तान का क्या करें?चीन का क्या करें? कैसे आत्मनिर्भर बनें? डर के रूप ऐसे और इतनी तरह के हैं कि हिंदुओं का भगवान ही मालिक है! कोरोना हो गया है तो अस्पताल जाएं या न जाएं?अस्पताल गए तो कितना लुटेंगे और बचेंगे या नहीं?पड़ोस को बताए या नहीं? कोई सड़क चलते फोन छीन ले गया है तो थाने जाएं या न जाएं? डेंगू वाला इंस्पेक्टर आ कर गमलों में मच्छर तलाश रहा है तो उससे कैसे निपटें? इनकम टैक्स, ईएसआई, पीएफ के इंस्पेक्टरों से कैसे बचें? प्रधानमंत्री के दारोगाओं, सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स से मुख्यमंत्री अपने को कैसे बचाएं तो मुख्यमंत्री के थानदारों से प्रदेश के विरोधी, बाकी नेता कैसे कोलकत्ता में निपटें! यह चैन अंतहीन है। सभी138 करोड़ लोगों के दिल ऐसी बातों में कंपकंपाते रहते हैं! तभी सबके लिए मुक्ति का रास्ता भक्ति, भजन का है न कि निडरता, निर्भीकता, बुद्धि और सत्यता का। इसलिए नोट रखें कि भारत कभी नहीं बन सकता और हिंदू कभी बहादुर, निर्भीक व निडर नहीं बन सकते।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares