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संधि हो तो बेहतर

प्रस्ताव है कि भविष्य की महामारियों के लिए दुनिया को तैयार रखने के लिए वैश्विक सहयोग की जमीन तैयार की जाए। कोरोना महामारी के दौरान ये साफ हुआ कि दुनिया इसके मुकाबले के लिए तैयार नहीं थी। दुनिया की स्वास्थ्य व्यवस्था कोरोना महामारी के आगे बहुत कमजोर साबित हुई।

भविष्य की महामारियों को रोकने के लिए एक वैश्विक संधि हो जाए, तो बेहतर ही होगा। आखिर संधि एक पैमाना होती है, जिसकी रोशनी में देश और दुनिया के कदमों को जांचा- परखा जाता है। लेकिन संधि पर बातचीत के लिए ये सही वक्त है, इस बारे में अगर कुछ देशों के मन में सवाल हैं, तो उन्हें भी सिरे से नकारा नहीं जा सकता। गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के तहत महामारियों के बारे में वैश्विक संधि करने का प्रस्ताव आया है। डब्लूएचओ की बैठक 24 मई से शुरू हो रही है। लेकिन जो चर्चा चल रही है, उससे साफ है कि ऐसी संधि के रास्ते में कई अड़चनें हैं। जबकि संधि के समर्थक देशों का कहना है कि अभी बातचीत शुरू की जाए और धीरे-धीरे इस दिशा में आगे बढ़ा जाए। संधि का विचार सबसे पहले यूरोपियन काउंसिल ने सामने रखा था। दो दर्जन देशों का समर्थन उसे मिल चुका है। डब्लूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अधनॉम घेब्रेयसस भी इस विचार के साथ हैँ। प्रस्ताव है कि भविष्य की महामारियों के लिए दुनिया को तैयार रखने के लिए वैश्विक सहयोग की जमीन तैयार की जाए।

कोरोना महामारी के दौरान ये साफ हुआ कि दुनिया इसके मुकाबले के लिए तैयार नहीं थी। अभी जो दुनिया की स्वास्थ्य व्यवस्था है, वह कोरोना महामारी के आगे बहुत कमजोर साबित हुआ। तो इस तर्क में दम है कि अब महामारी को जलवायु परिवर्तन और परमाणु निरस्त्रीकरण जितनी अहमियत देकर दुनिया के सभी देशों को सहयोग के लिए आगे आना चाहिए। लेकिन असहमत देशों की दलील है कि जिस समय दुनिया कोरोना महामारी से संघर्ष में जुटी है, नई संधि की कोशिश में बेवजह ऊर्जा और संसाधन लगेंगे। अभी फौरी जरूरत कोरोना महामारी पर काबू पाने की है। वैसे भी संधि की इच्छा जताना जितना आसान होता है, असल में सूत्रबद्ध कर पाना और फिर उसे सारी दुनिया में मानय बनवाना उतना ही कठिन होता है। मसलन, अमेरिका को लें। अमेरिकी कानून के मुताबिक किसी वैश्विक संधि को मंजूरी दिलवाने के लिए वहां सीनेट में दो तिहाई बहुमत चाहिए। अब अगर बाइडेन प्रशासन संधि पर सहमत हो जाए, तब भी उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए सीनेट से उसे मंजूरी दिलवाना टेढ़ी खीर साबित होगा। बहरहाल, उचित यह होगा कि वार्ता की शुरुआत की जाए। बाकी मुद्दे बाद में हल हो सकते हैँ।

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