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आपदाओं से त्रस्त दुनिया

संयुक्त राष्ट्र एक वैश्विक संस्था के रूप में दुनिया पर मंडरा रहे खतरों के बारे में समय-समय पर चेतावनी देता है। मगर क्या उनका कोई असर होता है? ये सवाल इसलिए उठता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे पर पिछले तीस साल संयुक्त राष्ट्र की लगातार सक्रियता के बावजूद दुनिया में इसे रोकने के प्रभावी कदम आज तक नहीं उठाए गए। जबकि स्थितियां गंभीर होती गई हैं। इस बात का प्रमाण संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट है। उसके मुताबिक पिछले 20 सालों में प्राकृतिक आपदाओं में तेज वृद्धि हुई है। उस कारण जान का नुकसान तो हुआ है ही, दुनिया भर में आर्थिक नुकसान भी हो रहा है। आज हाल यह है कि तमाम समृद्धि और तकनीकी उन्नति के बावजूद प्राकृतिक आपदाओं के कारण दुनिया भर में लोग मर रहे हैं। दुनिया भर में आर्थिक नुकसान हो रहा है। एशिया प्राकृतिक आपदाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। यूएन के मुताबिक साल 2000 से लेकर 2019 तक चीन और अमेरिका में सबसे अधिक आपदाएं दर्ज की गईं।

इसके बाद भारत, फिलीपींस और इंडोनेशिया का नंबर रहा। सर्वाधिक क्षति वाले 10 देशों में से आठ देश एशिया में स्थित हैं। गुजरे दो दशक के दौरान 7,348 प्रमुख आपदा की घटनाओं को विश्व स्तर पर दर्ज किया गया। इन आपदाओं में दस लाख से अधिक लोगों की मौत हुई और 4.2 अरब लोग प्रभावित हुए। दो दशक के दौरान 2.97 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान भी दर्ज किया गया। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने बताया है कि बड़ी बाढ़ की संख्या दोगुनी होकर 3,254 हो गई। सूखा और जंगलों में आग लगने की घटनाओं ने भी कहर बरपाया। संयुक्त राष्ट्र ने आपदा जोखिम कम करने की सलाह दी है। उसने दुनिया भर की सरकारों से पूर्वानुमान चेतावनी पाने के लिए अधिक निवेश करने के साथ-साथ आपदा जोखिम कम करने की रणनीतियां अपनाने को कहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर चरम मौसम की घटनाओं में वृद्धि का यह स्तर इसी तरह जारी रहता है तो वास्तव में अगले 20 सालों में इंसान का भविष्य बहुत अंधकारमय हो जाएगा। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद कई अनुसंधान केंद्रों ने ही ताजा रिपोर्ट के लिए आंकड़े मुहैया कराए। रिपोर्ट के मुताबिक गर्म हवाएं अगले 10 साल में आम जन- खास कर गरीब देशों के बाशिंदों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रही हैं। क्या सरकारें अब इस बिगड़ते हाल की चिंता करेंगी?

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